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एससी-एसटी एक्ट और बदलता सामाजिक संतुलन: संरक्षण से विभाजन तक की बहस



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 


एससी-एसटी एक्ट को सामान्यतः सामाजिक न्याय के कानून के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यदि इसे व्यापक ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ में देखा जाए तो यह केवल एक कानूनी व्यवस्था नहीं बल्कि समाज को स्थायी रूप से वर्गों में बाँटने की प्रक्रिया का हिस्सा प्रतीत होता है। यह बात आज बहुत लोगों को तुरंत समझ में नहीं आएगी, लेकिन आने वाले वर्षों में इसके परिणाम अधिक स्पष्ट दिखाई देंगे। किसी भी समाज में भय और दंड आधारित कानून सामाजिक विश्वास को कमजोर करते हैं। समाज कानून से कम और विश्वास से अधिक चलता है। जब समाज का एक वर्ग दूसरे वर्ग से कानूनी जोखिम के डर से दूरी बनाने लगे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसी वर्ग को होता है जिसे संरक्षण देने के नाम पर कानून बनाया गया हो।

एससी-एसटी आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट दोनों की प्रकृति अलग है। संविधान सभा की बहसों (1946-1949) में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष अवसर देने का निर्णय ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक बहिष्कार को ध्यान में रखकर लिया गया था। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी इसे एक अस्थायी सुधारात्मक उपाय के रूप में देखा था। इसलिए एससी-एसटी आरक्षण को समाज के बड़े वर्ग ने स्वीकार भी किया। लेकिन एससी-एसटी एक्ट 1989 की प्रकृति अलग है। यह दंडात्मक कानून है। 11 सितम्बर 1989 को संसद में पारित हुआ और 30 जनवरी 1990 से लागू हुआ। 2015 और 2018 में इसमें संशोधन कर इसे और कठोर बनाया गया। 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में इस कानून के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की और गिरफ्तारी से पहले प्राथमिक जांच का सुझाव दिया। बाद में संसद ने संशोधन कर इस निर्णय को प्रभावहीन कर दिया। यह पूरा घटनाक्रम स्वयं इस बात का संकेत है कि इस कानून को लेकर सामाजिक और न्यायिक स्तर पर भी चिंताएँ रही हैं।

वामपंथी वर्ग-संघर्ष की विचारधारा का मूल आधार ही समाज को दो स्थायी वर्गों में बाँटना है — शोषक और शोषित। इस विचारधारा में समाज को जोड़ने की नहीं, बल्कि संघर्ष को स्थायी बनाने की अवधारणा होती है। यही सोच आज जाति आधारित राजनीति में दिखाई देती है। जब समाज को यह बताया जाता है कि एक वर्ग जन्मजात शोषक है और दूसरा जन्मजात पीड़ित, तब सामाजिक विश्वास समाप्त होने लगता है। यह वही सोच है जो अमेरिका में क्रिटिकल रेस थ्योरी के नाम पर चल रही है, जिसमें श्वेत समाज को जन्मजात अपराधी और अश्वेत समाज को स्थायी पीड़ित बताया जाता है। इसी प्रकार भारत में भी एक वर्ग को जन्मजात शोषक सिद्ध करने का नैरेटिव बनाया जा रहा है।

एससी-एसटी एक्ट के कारण समाज का बड़ा वर्ग एससी-एसटी समाज से धीरे-धीरे दूरी बना रहा है। यह दूरी केवल सामाजिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है। भारत में आर्थिक अवसर केवल सरकारी नौकरी से नहीं आते। ग्रामीण समाज में रोजगार, श्रम सहयोग, साझेदारी, छोटे व्यापार और पारंपरिक व्यवसाय सामाजिक संपर्क पर आधारित होते हैं। जब लोग कानूनी जोखिम के डर से दूरी बनाने लगते हैं, तो आर्थिक अवसर कम होने लगते हैं। इसका दीर्घकालिक प्रभाव एससी-एसटी समाज की आर्थिक स्थिति पर पड़ेगा। क्योंकि सबको सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती। सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं, जबकि आर्थिक सशक्तिकरण व्यापार, कौशल और उत्पादन से आता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि आज जिन समुदायों को एससी-एसटी-ओबीसी कहा जाता है, वही भारत की पारंपरिक अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार थे। कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, धातु कार्य, वस्त्र निर्माण, चमड़ा उद्योग, निर्माण कार्य, परिवहन और सेवा आधारित कार्य इन सभी क्षेत्रों में यही समुदाय प्रमुख थे।

औपनिवेशिक काल से पहले भारत उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था था। एंगस मैडिसन के अनुसार 1700 में भारत विश्व अर्थव्यवस्था का लगभग 23% हिस्सा था। अंग्रेजों के शासन के अंत तक यह घटकर लगभग 3% रह गया। अंग्रेजों ने भारतीय पारंपरिक उद्योगों को व्यवस्थित रूप से समाप्त किया, भारी कर लगाए, विदेशी वस्तुओं को बढ़ावा दिया और स्थानीय उत्पादन को कमजोर किया। इससे पारंपरिक रूप से संपन्न समुदाय मजदूरी आधारित अर्थव्यवस्था में धकेल दिए गए। इसलिए इन समुदायों का सबसे बड़ा शोषण अंग्रेजों ने किया।

भारतीय समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने की प्रक्रिया औपनिवेशिक काल में शुरू हुई। 1871 में पहली जाति आधारित जनगणना हुई। 1901 में ब्रिटिश अधिकारी हर्बर्ट रिज़ली ने भारतीय समाज को नस्ल और जाति के आधार पर वर्गीकृत किया। उनकी पुस्तक The People of India (1908) में भारतीय समाज को नस्लीय समूहों में बाँटा गया। 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने कम्युनल अवॉर्ड घोषित किया, जिसने समाज को राजनीतिक आधार पर विभाजित किया। यह सब “डिवाइड एंड रूल” नीति का हिस्सा था।
स्वतंत्र भारत में ओबीसी आरक्षण भी अलग प्रकृति का था। 1979 में बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग गठित हुआ। 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने इसे लागू किया। यह आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था, न कि जातिगत उत्पीड़न के आधार पर। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने Indra Sawhney vs Union of India केस में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू की। इससे स्पष्ट हुआ कि ओबीसी आरक्षण सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन पर आधारित था।

लेकिन हाल के वर्षों में इस अंतर को धीरे-धीरे समाप्त करने का प्रयास दिखाई दे रहा है। 13 जनवरी 2026 को यूजीसी द्वारा जारी नए भेदभाव विरोधी विनियमों में ओबीसी को भी एससी-एसटी के साथ शामिल करने का निर्णय लिया गया। यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन है क्योंकि इससे पहली बार ओबीसी को भी जातिगत उत्पीड़न की समान श्रेणी में रखने की दिशा में कदम बढ़ाया गया। इसके साथ ही 2026 के बजट में कर्नाटक सरकार के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया द्वारा “रोहित वेमुला एक्ट” लाने की घोषणा भी इसी दिशा का संकेत मानी जा रही है। इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य शिक्षा संस्थानों में भेदभाव के मामलों को रोकना बताया गया है, लेकिन इसमें ओबीसी सहित व्यापक सामाजिक वर्गों को शामिल करने की चर्चा ने एक नई बहस को जन्म दिया है।

यहाँ चिंता का विषय यह है कि यदि एससी, एसटी और ओबीसी तीनों को एक समान श्रेणी में रखा जाता है, तो समाज का बहुत बड़ा हिस्सा “संरक्षित” श्रेणी में आ जाएगा। भारत की जनसंख्या में एससी लगभग 16-17%, एसटी लगभग 8-9% और ओबीसी लगभग 40-45% माने जाते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर लगभग 65-70% आबादी संरक्षित श्रेणी में आ सकती है। इससे शेष समाज को संभावित रूप से “अत्याचारी” या “शोषक” के रूप में देखा जाने लगेगा। यही वह स्थिति है जो समाज को स्थायी रूप से दो वर्गों में बाँट सकती है—एक संरक्षित और दूसरा आरोपित।

यह दृष्टिकोण भारतीय समाज की परंपरा से अलग है। भारतीय समाज में विविधता रही है जाति, भाषा, क्षेत्र, परंपरा, मत और पंथ सब अलग-अलग होते हुए भी समाज एक सांस्कृतिक धारा से जुड़ा रहा। यहाँ समाज को स्थायी संघर्ष के रूप में नहीं देखा गया। परस्पर निर्भरता और सहअस्तित्व भारतीय समाज की विशेषता रही है। लेकिन समाज को स्थायी शोषक और शोषित में बाँटने की अवधारणा बाहरी वैचारिक प्रभावों से आई।
मजहबी दृष्टिकोण में भी समाज को दो वर्गों में देखने की प्रवृत्ति मिलती है विश्वासी और अविश्वासी, मोमिन और काफिर, बिलीवर और नॉन-बिलीवर। इसी प्रकार मार्क्सवादी विचारधारा समाज को शोषक और शोषित में बाँटती है। कल्चरल मार्क्सवाद इस विचार को पहचान आधारित राजनीति में बदल देता है जाति, नस्ल, लिंग आदि के आधार पर संघर्ष पैदा करना। क्रिटिकल रेस थ्योरी में श्वेत और अश्वेत का विभाजन इसी का उदाहरण है। इन सभी में एक समान तत्व है समाज को दो स्थायी वर्गों में बाँटना।

भारतीय समाज को विभाजित करने का पहला संगठित प्रयास अंग्रेजों ने किया। 1871 से जाति आधारित जनगणना शुरू हुई। 1901 की जनगणना में हर्बर्ट रिज़ली ने भारतीय समाज को नस्ल और जाति के आधार पर वर्गीकृत किया। 1932 का कम्युनल अवॉर्ड भी इसी नीति का हिस्सा था। अंग्रेजों की “डिवाइड एंड रूल” नीति का उद्देश्य समाज को विभाजित करना था। इसके बाद स्वतंत्र भारत में भी कुछ वैचारिक समूहों ने इसी विभाजनकारी दृष्टि को आगे बढ़ाया।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों में भी यह देखा गया है कि एससी-एसटी एक्ट के मामलों में आरोपित केवल तथाकथित सामान्य वर्ग से ही नहीं होते, बल्कि बड़ी संख्या में ओबीसी समुदाय से भी होते हैं। इसका अर्थ यह है कि सामाजिक संबंध जटिल हैं, लेकिन विमर्श को सरल बनाकर एक वर्ग को जन्मजात शोषक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यदि भविष्य में एससी-एसटी एक्ट में ओबीसी को शामिल किया जाता है, तो यह स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। इससे समाज को स्थायी रूप से दो वर्गों में बाँट दिया जाएगा—एक संरक्षित और दूसरा संभावित अपराधी। यह स्थिति राष्ट्र की एकता और सामाजिक समरसता के लिए चुनौती बन सकती है। राजनीतिक स्तर पर भी इस प्रकार के विचार सामने आते रहे हैं। राहुल गांधी सहित कई राजनीतिक नेताओं द्वारा जाति आधारित सामाजिक विभाजन और जनगणना जैसे मुद्दों को प्रमुखता देना इसी व्यापक बहस का हिस्सा माना जाता है।

यह प्रवृत्ति वैश्विक स्तर पर भी दिखाई देती है। कार्ल मार्क्स ने 1848 में Communist Manifesto में वर्ग संघर्ष की अवधारणा दी। एंटोनियो ग्राम्शी ने 1920-30 के दशक में सांस्कृतिक वर्चस्व का सिद्धांत दिया। 1970 के दशक में अमेरिका में डेरिक बेल और किम्बर्ले क्रेंशॉ ने क्रिटिकल रेस थ्योरी विकसित की। इसमें श्वेत और अश्वेत समाज को स्थायी वर्गों में बाँटा गया।

मार्क्सवाद का जन्म यूरोप के ईसाई समाज में हुआ और कई विद्वान इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यह ईसाई नैतिकता के पुनर्गठन का भी प्रयास था। जर्मन दार्शनिक कार्ल लोविथ (Karl Löwith) और एरिक वोगेलिन (Eric Voegelin) जैसे विचारकों ने लिखा कि मार्क्सवाद ईसाई धार्मिक विचारधारा का ही सेक्युलर संस्करण है, जिसमें स्वर्ग की अवधारणा को वर्गहीन समाज में बदल दिया गया। इसी तरह "Liberation Theology" 1960 के दशक में लैटिन अमेरिका में उभरी जिसमें ईसाई मिशनरियों ने मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष को ईसाई रिलिजन प्रचार के साथ जोड़ा। 1968 में लैटिन अमेरिका के मेडेलिन (Medellin Conference, Colombia) सम्मेलन में चर्च ने सामाजिक न्याय के नाम पर वर्ग संघर्ष आधारित आंदोलन को समर्थन दिया। इसके बाद ब्राज़ील, निकारागुआ, चिली और एल साल्वाडोर जैसे देशों में वामपंथी आंदोलन और ईसाई मिशनरी गतिविधियाँ साथ-साथ बढ़ीं।।

चीन भी इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। 1949 में माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीन कम्युनिस्ट देश बना। 1980 के बाद चीन में ईसाई आबादी तेजी से बढ़ी। Pew Research Center और Center for the Study of Global Christianity (Gordon-Conwell Theological Seminary) के अनुसार 1980 में चीन में ईसाई आबादी लगभग 10 मिलियन थी, जबकि 2020 तक यह 60-70 मिलियन (6-7 करोड़) तक पहुँच गई। कुछ स्वतंत्र अनुमानों में यह संख्या 100 मिलियन तक बताई गई है। चीन में "हाउस चर्च" आंदोलन और विदेशी मिशनरी नेटवर्क सक्रिय रहे हैं। इससे यह तर्क दिया जाता है कि वामपंथी शासन वाले समाजों में पारंपरिक सांस्कृतिक संरचनाएँ कमजोर होने के बाद मिशनरी गतिविधियों के लिए जगह बनती है।

आज वैश्विक स्तर पर पहचान आधारित राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है नस्ल, जाति, लिंग, धर्म, पहचान के आधार पर समाज को विभाजित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। भारत में जाति आधारित संघर्ष का विमर्श भी इसी वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है। यदि समाज को लगातार विभाजन के आधार पर देखा जाएगा, तो सामाजिक विश्वास, आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक समरसता प्रभावित होगी।

भारतीय समाज की शक्ति उसकी विविधता और एकता में रही है। यदि समाज को स्थायी रूप से संघर्ष की दिशा में ले जाया गया, तो इसका असर केवल सामाजिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि सामाजिक न्याय की नीतियों को समाज को जोड़ने की दिशा में लागू किया जाए, न कि समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने की दिशा में।

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