- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि हम समय की गणना नहीं जानते, बल्कि यह है कि हमने अपने समय को स्वीकार करना ही छोड़ दिया है। घड़ी, कैलेंडर और तारीख़ें हमारे जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन वे हमारे कालबोध का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। पहली जनवरी को वर्ष बदलता है, यह हमें पता है। लेकिन यह प्रश्न शायद ही हम खुद से पूछते हैं कि क्या सचमुच हमारे जीवन की दिशा, हमारी चेतना या हमारी सामाजिक लय भी उसी दिन बदलती है।
भारत में समय कभी केवल प्रशासनिक सुविधा मात्र नहीं रहा। भारतीय दृष्टि में समय एक ऐसी व्यापक व्यवस्था है, जो प्रकृति, समाज और मनुष्य के आचरण को एक ही सूत्र में बाँधकर रखती है। ऋग्वेद में इस व्यवस्था को ‘ऋत’ कहा गया है। ऋत का आशय सृष्टि के उस शाश्वत नियम से है, जिसे आधुनिक शब्दावली में कॉस्मिक ऑर्डर कहा जा सकता है। यदि धर्म को केवल ‘रिलिजन’ के संकीर्ण अर्थ में समझने का प्रयास किया जाए, तो ऋत अर्थात् इस सार्वभौमिक अनुशासन की सनातन अवधारणा को समझ पाना संभव नहीं होता।
यहीं से समय और काल के वास्तविक स्वरूप का प्रश्न उपस्थित होता है। समय क्या है, काल किस तत्त्व का नाम है, युग, मन्वंतर और कल्प जैसी संकल्पनाएँ सृष्टि के किन चरणों को अभिव्यक्त करती हैं—इन प्रश्नों पर भारतीय चिंतन परंपरा ने गहन विचार किया है। इसी क्रम में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश क्या हैं। क्या वे केवल उपासना की प्रतिमाएँ हैं, या सृष्टि के सृजन, संरक्षण और लय की क्रियाशील शक्तियों के प्रतीक?
वेद और पुराण यह बताते हैं कि ब्रह्म के संकल्प से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और प्रलय के पश्चात वही सृष्टि परब्रह्म में लीन हो जाती है। परम ब्रह्म अपनी माया-रूपिणी शक्ति के माध्यम से सृजन की प्रक्रिया को प्रकट करता है। यह सृष्टि किसी आकस्मिकता या अराजकता से संचालित नहीं होती, बल्कि एक सुनिश्चित सार्वभौमिक अनुशासन के अधीन चलती है। इसी अनुशासन के कारण सूर्य अपनी निर्धारित कक्षा में गतिमान रहता है, ऋतुएँ क्रमबद्ध रूप से आती-जाती हैं और जीवन अनियमित नहीं होता।
यदि यह अनुशासन न हो, तो न कृषि संभव हो, न खगोल-विज्ञान का विकास, और न ही सामाजिक जीवन की स्थिरता की कल्पना की जा सकती है। सृष्टि का यह अनवरत चक्र—सृजन, स्थिति और प्रलय—समय के माध्यम से ही अभिव्यक्त होता है। इसी कारण भारतीय परंपरा में समय को केवल माप की इकाई नहीं, बल्कि सृष्टि-संचालक तत्त्व के रूप में देखा गया है।
इस लेख में समय की वैदिक एवं पौराणिक अवधारणा को स्पष्ट करते हुए यह विवेचन किया जाएगा कि भारतीय पंचांग केवल तिथियों की गणना नहीं, बल्कि सृष्टि-दृष्टि का प्रतिबिंब है। साथ ही यह भी विचार किया जाएगा कि किस प्रकार नेहरू और कांग्रेस द्वारा भारतीय कालबोध के साथ छल किया गया, और क्यों विक्रम संवत को राष्ट्रीय पंचांग के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई है।
ऋत को यदि “धार्मिक नियम” कहा जाए, तो इसमें कोई त्रुटि नहीं है—बशर्ते धर्म को उसके सनातन वैदिक अर्थ में समझा जाए। समस्या तब पैदा होती है, जब धर्म को आधुनिक या पश्चिमी अर्थ में रिलिजन मान लिया जाता है। सनातन वैदिक परंपरा में धर्म का अर्थ किसी मत, पंथ या पूजा-पद्धति से नहीं है। धर्म का मूल अर्थ है—धारण करना। जो इस संसार को, इस सृष्टि को और इस जीवन को धारण करे, वही धर्म है।
इसी अर्थ में ऋत स्वयं धर्म है। ऋत वह शाश्वत नियम है, जिसके आधार पर सृष्टि टिकी हुई है। सूर्य का अपने पथ पर चलना, ग्रहों का संतुलन बनाए रखना, ऋतुओं का क्रम, बीज का अंकुरित होना, जीवन का जन्म लेना और मृत्यु के बाद लय में जाना—यह सब धर्म के ही स्वरूप हैं। ये किसी ग्रंथ द्वारा बनाए गए नियम नहीं हैं, बल्कि सृष्टि में अंतर्निहित अनुशासन हैं। इसलिए ऋत को धर्म कहना न केवल उचित है, बल्कि आवश्यक भी है।
वेदों में धर्म और ऋत को अलग-अलग नहीं देखा गया। ऋत ब्रह्मांडीय स्तर पर धर्म है और धर्म सामाजिक तथा मानवीय स्तर पर ऋत की अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि सनातन वैदिक परंपरा में धर्म को कभी बदलने योग्य नियमों की सूची नहीं माना गया। धर्म शाश्वत है, क्योंकि ऋत शाश्वत है। रूप, आचार और व्यवहार काल के अनुसार बदल सकते हैं, लेकिन जिस नियम के आधार पर सृष्टि धारण होती है, वह अपरिवर्तनीय है।
जब कहा जाता है कि धर्म सृष्टि को धारण करता है, तो इसका अर्थ यही है कि धर्म कोई बाहरी अनुशासन नहीं, बल्कि सृष्टि का आंतरिक संतुलन है। यही संतुलन समय को गति देता है, कारण और परिणाम को जोड़ता है और जीवन को अर्थ देता है। इस दृष्टि से समय, धर्म और ऋत—तीनों एक ही तत्त्व के विभिन्न आयाम हैं।
इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि ऋत कोई “धार्मिक नियम” नहीं, बल्कि धर्म का ब्रह्मांडीय स्वरूप है। और धर्म कोई संकीर्ण व्यवस्था नहीं, बल्कि वह शाश्वत नियम है, जो इस संपूर्ण जगत को धारण करता है।
सनातन वैदिक परंपरा में समय को कभी घड़ी या कैलेंडर की इकाई के रूप में नहीं देखा गया। यहाँ समय स्वयं सृष्टि का एक सक्रिय तत्त्व है। वेदों में काल को सृष्टि की गति के रूप में समझा गया है, जबकि उपनिषदों में उसे चेतना के विस्तार से जोड़ा गया है। पुराणों ने इसी काल को सृष्टि के चक्र के रूप में व्यवस्थित किया और गीता ने काल को प्रत्यक्ष ब्रह्म-सत्ता से संबद्ध कर दिया।
ऋग्वेद में काल का उल्लेख किसी विनाशक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि को चलाने वाले नियम के रूप में आता है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र कहता है—
“ऋतेन ऋतमपिहितं ध्रुवं वाम सूर्यस्य यत्र विमुचन्त्यश्वान्।”
यह स्पष्ट करता है कि सूर्य की गति भी ऋत से आबद्ध है। यहाँ समय सूर्य से नहीं चलता, बल्कि सूर्य समय के अनुशासन में चलता है। अर्थात काल प्रकृति पर शासन करता है, प्रकृति काल को नहीं बनाती।
यजुर्वेद में काल को सृष्टि की व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा गया है कि समय ही कर्म और फल के संबंध को स्थिर करता है। कर्म तत्काल फल नहीं देता, बल्कि काल के भीतर परिपक्व होता है। इससे स्पष्ट होता है कि काल केवल प्रवाह नहीं, न्याय का तत्त्व भी है।
उपनिषदों में काल की अवधारणा और अधिक स्पष्ट हो जाती है। कठोपनिषद में नचिकेता और यम का संवाद काल और मृत्यु को एक ही धरातल पर रखता है। यम कहते हैं कि जो आत्मा को जान लेता है, वह काल से भयभीत नहीं होता। यहाँ काल को अंतिम सत्य नहीं माना गया। आत्मा काल से परे है। काल आत्मा को नहीं निगलता, बल्कि देह को रूपांतरित करता है।
बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है कि ब्रह्म वह है, जिससे काल उत्पन्न होता है और जिसमें काल अंततः लीन हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि काल ब्रह्म के अधीन है, ब्रह्म काल के अधीन नहीं। यही कारण है कि ब्रह्म को कालातीत कहा गया है।
पुराणों में काल की भूमिका और व्यवस्थित रूप में सामने आती है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण स्पष्ट कहते हैं कि सृष्टि, स्थिति और लय—तीनों काल के माध्यम से घटित होते हैं। लेकिन यह काल स्वतंत्र सत्ता नहीं है। यह विष्णु की शक्ति के रूप में कार्य करता है। इसी कारण विष्णु को कालस्वरूप भी कहा गया है।
भागवत पुराण में काल को भगवान की वह शक्ति बताया गया है, जो अहंकार, आसक्ति और जड़ता को तोड़ती है। जब सृष्टि अपने संतुलन से हटती है, तब काल सक्रिय होता है। यहाँ काल दंड नहीं देता, बल्कि संतुलन पुनः स्थापित करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में काल की अवधारणा सबसे प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप में प्रकट होती है। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः।”
यहाँ काल को विनाश के सीमित अर्थ में नहीं समझना चाहिए। कृष्ण स्वयं को काल कहते हैं—अर्थात वही शक्ति जो रूपों का क्षय करती है ताकि नया रूप प्रकट हो सके। यह कथन काल को ब्रह्म-सत्ता से सीधे जोड़ देता है।
गीता यह भी स्पष्ट करती है कि जो काल को समझ लेता है, वह मोह से मुक्त हो जाता है। काल किसी का शत्रु नहीं है। काल वह व्यवस्था है जो जड़ता को समाप्त करती है और सृष्टि को आगे बढ़ने का अवसर देती है।
इसी आधार पर सनातन परंपरा में समय को रेखीय नहीं माना गया। न सृष्टि एक बार बनी और समाप्त हो गई, न काल का कोई अंतिम बिंदु है। समय चक्र में चलता है—सृजन, स्थिति और लय के क्रम में। यही कारण है कि युग, महायुग, मन्वंतर और कल्प की अवधारणाएँ विकसित हुईं। ये संख्याएँ नहीं, बल्कि यह बताने का प्रयास हैं कि सृष्टि कैसे चलती है और काल उसमें कैसे कार्य करता है।
इस दृष्टि से काल भय का विषय नहीं बनता। मृत्यु अंत नहीं रहती। प्रलय विनाश नहीं रहता। सब कुछ रूपांतरण बन जाता है। जो बदलता है, वह रूप है। जो बना रहता है, वह तत्त्व है।
सनातन वैदिक समयबोध का यही सार है।
काल ब्रह्म का विरोधी नहीं है।
काल ब्रह्म की क्रिया है।
और मनुष्य उसी क्रिया का सहभागी है—काल का दास नहीं, उसका साक्षी।
सनातन वैदिक परंपरा में समय को समझने से पहले सृष्टि को समझना आवश्यक है, और सृष्टि को समझने से पहले उसके मूल तत्त्व को। यहाँ सृष्टि किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं मानी गई, बल्कि एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया के रूप में देखी गई है। इस प्रक्रिया के मूल में परब्रह्म की अवधारणा है।
परब्रह्म वह अंतिम तत्त्व है जो स्वयं उत्पन्न नहीं होता, न नष्ट होता है। वह न देश में बंधा है, न काल में। वह निराकार, निर्गुण और अव्यक्त है। समय उसी परब्रह्म से प्रकट होता है, इसलिए परब्रह्म को कालातीत कहा गया है। परब्रह्म स्वयं क्रिया नहीं करता, बल्कि उसकी सृजन-शक्ति के माध्यम से सृष्टि प्रकट होती है।
इस सृजन-शक्ति को वैदिक परंपरा में महा माया कहा गया है। महा माया भ्रम नहीं है, बल्कि वह शक्ति है जिसके द्वारा अव्यक्त व्यक्त होता है, एक से अनेक की उत्पत्ति होती है और चेतना रूप धारण करती है। देश, काल और कारण—तीनों महा माया के क्षेत्र में कार्य करते हैं। सृष्टि का विस्तार, उसका क्रम और उसका लय—सब इसी शक्ति के भीतर घटित होता है।
इसी सृष्टि-प्रक्रिया को समझाने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अवधारणा सामने आती है। ये तीन अलग-अलग ईश्वर नहीं हैं और न ही किसी मत-विशेष के देवता हैं। ये सृष्टि की तीन मूल अवस्थाएँ हैं।
ब्रह्मा सृजन का तत्त्व हैं—वे सृष्टि की रचना करते हैं, और यह रचना पहले मानसिक स्तर पर होती है, जिसे शास्त्रों में मानसी सृष्टि कहा गया है।
विष्णु धारण का तत्त्व हैं—वे सृष्टि को स्थिर रखते हैं, उसका संतुलन बनाए रखते हैं और उसे अव्यवस्था में जाने से रोकते हैं।
महेश (शिव) लय का तत्त्व हैं—वे सृष्टि का विनाश नहीं करते, बल्कि उसे पुनः मूल तत्त्व में विलीन करते हैं, ताकि अगला सृजन संभव हो सके।
इस पूरी प्रक्रिया को संचालित करने वाला मूल सिद्धांत है—ऋत। ऋत का अर्थ किसी संकीर्ण या समयबद्ध नियम से नहीं है। ऋत वह शाश्वत कॉस्मिक ऑर्डर है, जिसके कारण सृष्टि अराजक नहीं होती। सूर्य का अपने निश्चित पथ पर चलना, ग्रहों का संतुलन बनाए रखना, ऋतुओं का क्रम, कारण और परिणाम का नियम, जन्म और मृत्यु की मर्यादा—ये सभी ऋत के ही स्वरूप हैं।
सनातन वैदिक दृष्टि में धर्म इसी ऋत का सामाजिक और मानवीय रूप है। धर्म का अर्थ है—धारण करना। जो इस संसार को धारण करता है, वही धर्म है। इसलिए धर्म कोई मनुष्य-निर्मित व्यवस्था नहीं, बल्कि सृष्टि-निहित अनुशासन है। ऋत ब्रह्मांडीय स्तर पर धर्म है और धर्म सामाजिक स्तर पर ऋत की अभिव्यक्ति।
यहीं से समय की सनातन वैदिक अवधारणा जन्म लेती है। समय कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। समय ऋत की गति है। समय उसी अनुशासन के भीतर कार्य करता है, जिसके कारण सृष्टि बनती है, टिकती है और लय में जाती है। इसलिए भारतीय परंपरा में समय को भय का कारण नहीं माना गया। मृत्यु अंत नहीं मानी गई। प्रलय विनाश नहीं कहा गया। यह सब परिवर्तन और विश्राम की अवस्थाएँ हैं।
इसी दृष्टि के आधार पर आगे युग, महायुग, मन्वंतर और कल्प की अवधारणाएँ विकसित हुईं। इनका उद्देश्य भविष्यवाणी करना नहीं, बल्कि सृष्टि की गति को समझना था—और उसमें मनुष्य के स्थान को पहचानना।
यही सनातन वैदिक समयबोध की भूमिका है।
यहीं से भारतीय सभ्यता का काल-बोध आरंभ होता है।
भारत में समय की गणना किसी राजा के राज्यारोहण या किसी ऐतिहासिक घटना से शुरू नहीं होती। यहाँ समय सृष्टि से शुरू होता है। इसी कारण सृष्टि-संवत की अवधारणा सामने आती है। वैदिक ग्रंथों में कहा गया कि चार युग—सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि—मिलकर एक महायुग बनाते हैं, जिसकी अवधि 43,20,000 वर्ष मानी गई। यह संख्या अनुमान नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक खगोलीय निरीक्षणों पर आधारित है, जिनमें सूर्य, चंद्र, विषुव और अयन के चक्र शामिल हैं।
71 महायुग मिलकर एक मन्वंतर बनाते हैं और 14 मन्वंतर मिलकर एक कल्प। कल्प को ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है, और उतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि मानी गई है। यहाँ “दिन” और “रात्रि” को सामान्य अर्थों में नहीं समझना चाहिए। यह सृष्टि के सक्रिय और निष्क्रिय चरणों का संकेत है। पुराणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मा के जीवन में 84 कल्पों के बाद महाप्रलय होता है, जहाँ स्थूल सृष्टि लय में चली जाती है। यह विनाश नहीं, बल्कि पूर्ण विश्राम है—बीज रूप में अस्तित्व बना रहता है।
यही चक्रीय दृष्टि भारतीय कालबोध की मूल पहचान है। पश्चिमी दृष्टि में समय एक सीधी रेखा है—एक आरंभ, एक अंत। भारतीय दृष्टि में समय चक्र है—उत्पत्ति, स्थिति, लय और पुनः उत्पत्ति। खेत फसल के बाद खाली दिखाई देता है, लेकिन वह मृत नहीं होता। वह अगली ऋतु की तैयारी कर रहा होता है। यही उदाहरण सृष्टि के लय-प्रलय को समझने में सहायक है।
सृष्टि को समझने के लिए केवल कालगणना पर्याप्त नहीं है। भारतीय दर्शन सृष्टि को तीन स्तरों में देखता है—आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। आधिभौतिक सृष्टि वह है जो दिखाई देती है—पंचमहाभूतों से बनी हुई। ग्रह, नक्षत्र, शरीर, पदार्थ—आधुनिक विज्ञान यहीं कार्य करता है। गुरुत्वाकर्षण, ऊर्जा, विस्तार—ये सभी इसी स्तर के नियम हैं।
इसके ऊपर आधिदैविक स्तर है। इसका अर्थ किसी काल्पनिक स्वर्गलोक से नहीं, बल्कि उन नियामक शक्तियों से है जो भौतिक जगत को अनुशासन में रखती हैं। सूर्य का अपने पथ से विचलित न होना, ऋतुओं का क्रम, जैविक घड़ी का संतुलन—ये संयोग नहीं हैं। वैदिक परंपरा ने इन्हें ‘देव’ कहा। देव का अर्थ यहाँ किसी मानवीय रूप वाली सत्ता नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो धारण करती है, व्यवस्था बनाए रखती है। आज का विज्ञान इन्हें प्राकृतिक नियम कहता है।
तीसरा स्तर आध्यात्मिक है। यहाँ भारतीय दर्शन स्पष्ट रूप से भिन्न दिशा में जाता है। उपनिषद कहते हैं कि चेतना मूल है, पदार्थ उसकी अभिव्यक्ति। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया कि देह नश्वर है, आत्मा अविनाशी। आधुनिक न्यूरोसाइंस आज इस निष्कर्ष के निकट पहुँच रहा है कि चेतना को केवल मस्तिष्क की रासायनिक क्रियाओं से पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता।
इन तीनों स्तरों को जोड़ने वाली कड़ी मानसिक सृष्टि है। विचार, संस्कार, स्मृति, भय और विश्वास—यहीं से समाज का निर्माण होता है या उसका पतन।
जब हम सृष्टि की बात करते हैं, तो सामान्यतः हमारी दृष्टि आकाश, ग्रहों, प्रकृति और पदार्थ तक ही सीमित रह जाती है। लेकिन भारतीय दर्शन वहाँ रुकता नहीं। वह एक ऐसा प्रश्न पूछता है, जो आधुनिक मन के लिए असहज है—क्या सृष्टि केवल वही है जो दिखाई देती है?
वेद, उपनिषद और पुराणों का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। दृश्य सृष्टि से पहले और उसके साथ-साथ एक और सृष्टि चल रही है, और वही सबसे निर्णायक है। उसे मानसिक सृष्टि कहा गया है।
ऋग्वेद में सृष्टि की उत्पत्ति का जो सबसे गूढ़ सूक्त है—नासदीय सूक्त—वह सीधा इस प्रश्न से टकराता है। वहाँ कहा गया कि प्रारंभ में न सत था, न असत, न आकाश था, न पृथ्वी। और फिर एक पंक्ति आती है, जो बहुत कुछ खोल देती है—
“कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।”
अर्थात सृष्टि के आरंभ में जो पहला तत्त्व प्रकट हुआ, वह काम था—इच्छा। और वह इच्छा मन में उत्पन्न हुई।
यह पंक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ काम का अर्थ वासना नहीं है, बल्कि सृजन की इच्छा है। इसका सीधा संकेत यह है कि सृष्टि की पहली अभिव्यक्ति पदार्थ नहीं, मानसिक प्रेरणा है। यानी सृष्टि का बीज मन में पड़ा।
उपनिषद इस बात को और स्पष्ट करते हैं। छांदोग्य उपनिषद में कहा गया—
“यथाक्रतु: पुरुषो भवति, तत् कर्म कुरुते।”
जैसा मनुष्य का संकल्प होता है, वैसा ही उसका कर्म होता है।
यहाँ संकल्प—यानी मानसिक अवस्था—को कर्म से पहले रखा गया है। कर्म भौतिक है, पर उसका जन्म मानसिक है।
बृहदारण्यक उपनिषद इससे भी आगे जाकर कहता है—
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।
यह कथन केवल व्यक्तिगत मोक्ष की बात नहीं करता। यह सामाजिक और ऐतिहासिक सत्य भी है। कोई समाज पहले मन से बंधता है, फिर शरीर से; पहले मन से मुक्त होता है, फिर परिस्थितियों से।
यही कारण है कि भारतीय दर्शन में मन को केवल मस्तिष्क की क्रिया नहीं माना गया। मन एक सूक्ष्म सृष्टि है, जो बाहरी सृष्टि को दिशा देती है। पुराणों में इसे “मानस लोक” या “मानस क्षेत्र” कहा गया। ब्रह्मा की सृष्टि को भी दो भागों में बताया गया—मानसी सृष्टि और भौतिक सृष्टि। पहले विचार उत्पन्न होते हैं, फिर रूप।
श्रीमद्भगवद्गीता इस सिद्धांत को अत्यंत व्यावहारिक रूप में रखती है। श्रीकृष्ण कहते हैं—
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।” (गीता का भावार्थ, उपनिषदों से संगत)
और आगे स्पष्ट करते हैं—
“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।”
मनुष्य स्वयं अपने मन से उठता है और स्वयं उसी मन से गिरता है।
यहाँ मन को किसी रहस्यमय तत्त्व की तरह नहीं, बल्कि एक कार्यकारी शक्ति की तरह देखा गया है। गीता का पूरा कर्मयोग इसी आधार पर खड़ा है—कर्म से पहले मन की स्थिति को शुद्ध करो।
पुराणों में मानसिक सृष्टि को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में समझाया गया है। भागवत पुराण में कहा गया है कि जब सृष्टि में तमस बढ़ता है, तो अज्ञान, भय और हिंसा बढ़ती है। जब रजस बढ़ता है, तो सत्ता, भोग और स्पर्धा बढ़ती है। और जब सत्त्व बढ़ता है, तो विवेक, करुणा और संतुलन आता है। यह त्रिगुण केवल व्यक्ति के नहीं, पूरे युग के गुण होते हैं।
यानी युग का स्वरूप पहले मन में बनता है। कलियुग कोई कैलेंडर की तारीख़ नहीं है, बल्कि एक मानसिक अवस्था है—जहाँ तमस प्रधान हो जाता है। यही कारण है कि एक ही समय में कोई समाज पतन की ओर जा रहा होता है और कोई उसी समय साधना की ऊँचाई पर होता है।
स्वतंत्रता के बाद जब देश अपने नये स्वरूप को गढ़ रहा था, तब बहुत से निर्णय जल्दबाज़ी में लिए गए। उन निर्णयों में एक निर्णय यह भी था कि भारत का “राष्ट्रीय पंचांग” कौन-सा होगा। उस समय इसे एक साधारण प्रशासनिक विषय मान लिया गया—जैसे तारीख़ लिखने की सुविधा तय की जा रही हो। लेकिन वास्तव में यह विषय कहीं अधिक गहरा था। यह तय हो रहा था कि राज्य किस समय में चलेगा और समाज किस समय में।
शक संवत को राष्ट्रीय पंचांग घोषित करने के पीछे जो तर्क दिए गए, वे सतही थे—इसे अधिक “वैज्ञानिक” बताया गया, अधिक “तटस्थ” कहा गया। लेकिन यह प्रश्न किसी ने नहीं पूछा कि क्या यह संवत देश के जीवन में वास्तव में चलता भी है। क्या इससे हमारे पर्व तय होते हैं? क्या इससे किसान बोआई करता है? क्या विवाह, संस्कार, तीज-त्यौहार इससे जुड़े हैं? इन सभी प्रश्नों का उत्तर साफ़ था—नहीं।
इसके उलट विक्रम संवत सदियों से समाज के साथ चलता आया है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, भारत के अधिकांश हिस्सों में जीवन की लय इसी संवत से जुड़ी रही है। ऋतु परिवर्तन, धार्मिक पर्व, सामाजिक संस्कार और पंचांग—सब इसी पर आधारित रहे हैं। इसके बावजूद इसे “निजी आस्था” का विषय मानकर हाशिए पर डाल दिया गया और एक ऐसा पंचांग चुना गया, जो न समाज की स्मृति में था, न उसके व्यवहार में।
यह केवल एक कैलेंडर बदलने का निर्णय नहीं था। यह राज्य और समाज के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी करने का निर्णय था। राज्य का समय अलग होगा, समाज का समय अलग। यही वही मानसिकता थी, जो औपनिवेशिक काल में बनी थी—अपना ज्ञान घर के लिए है, शासन के लिए नहीं। दुर्भाग्य यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद भी इस मानसिकता को तोड़ा नहीं गया।
यहीं हिंदू समाज के साथ सबसे बड़ा छल हुआ। उसे बताया गया कि उसकी परंपरा सम्मान के योग्य नहीं, केवल सहन करने योग्य है।
उसके समयबोध को “अप्रासंगिक” कहकर सरकारी दायरे से बाहर रखा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो गया, लेकिन सांस्कृतिक रूप से असमंजस में फँसा रहा।
विक्रम संवत को राष्ट्रीय पंचांग बनाने की बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल तारीख़ों का सवाल नहीं है। यह इस बात का प्रश्न है कि राष्ट्र अपनी पहचान को किस आधार पर खड़ा करता है। विक्रम संवत किसी एक संप्रदाय की पहचान नहीं है। यह उस सभ्यता की स्मृति है, जो प्रकृति के साथ तालमेल में जीती रही है। यह चंद्र और सूर्य दोनों की गति को ध्यान में रखता है, इसीलिए ऋतु और जीवन एक-दूसरे से कटते नहीं।
दुनिया के अन्य देश आधुनिक भी हैं और अपनी परंपरा के प्रति स्पष्ट भी। जापान आज भी अपने शाही कालबोध को बनाए हुए है। यहूदी समाज अपने धार्मिक संवत के साथ चलता है। चीन ने आधुनिक प्रशासन अपनाया, लेकिन अपने सांस्कृतिक समय को छोड़ा नहीं। भारत ही ऐसा देश है, जो आधुनिक बनने के नाम पर अपने समय से दूरी बनाए बैठा है।
विक्रम संवत को राष्ट्रीय पंचांग बनाना आधुनिकता से पीछे जाना नहीं होगा। यह यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिकता का अर्थ जड़ों से कटना नहीं होता। प्रशासनिक स्तर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर चलता रह सकता है—जैसा दुनिया के कई देशों में होता है। लेकिन राष्ट्रीय पंचांग के रूप में विक्रम संवत को मान्यता देना यह स्पष्ट करेगा कि इस देश की आत्मा किस समय में सांस लेती है।
आख़िरकार यह सवाल पंचांग का नहीं, स्वराज का है।
स्वराज केवल सत्ता अपने हाथ में लेने से पूरा नहीं होता।
स्वराज तब पूरा होता है, जब राष्ट्र अपने समय, अपनी स्मृति और अपनी दृष्टि को भी अपना कह सके।
विक्रम संवत को स्वीकार करना किसी अतीत में लौटना नहीं है।
यह अपने वर्तमान को आत्मविश्वास के साथ जीने का निर्णय है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें