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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
स्वतंत्रता के बाद राज्य ने हिंदू समाज को किस प्रकार नियंत्रित करने का प्रयास किया, इसे समझने के लिए सबसे पहले राष्ट्र, राज्य, देश और समाज के बीच का अंतर स्पष्ट करना आवश्यक है। आज जिस प्रकार शासन की ओर से राष्ट्रीयकरण, केंद्रीकरण और राज्य की सर्वोच्चता को राष्ट्रहित के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसके पीछे छिपी मानसिकता को समझना जरूरी है
अक्सर कहा जाता है कि यदि हम राष्ट्र के प्रति समर्पित हैं तो राज्य की हर नीति का समर्थन करना चाहिए। यही वह मूल भ्रम है जिसने स्वतंत्र भारत की नीतियों को प्रभावित किया। राष्ट्र और राज्य एक नहीं हैं, और इन्हें एक मान लेने से समाज की स्वाभाविक शक्ति कमजोर होती है।
राष्ट्र एक जीवमान इकाई है, जो शताब्दियों के अनुभव से निर्मित होती है। किसी निश्चित भूभाग में रहने वाला समाज जब उस भूमि के साथ तादात्म्य स्थापित करता है, समान परंपराएँ, समान स्मृतियाँ, समान जीवन मूल्य और साझा आकांक्षाएँ विकसित करता है, तब राष्ट्र का निर्माण होता है। राष्ट्र का जीवन केवल राजनीतिक नहीं होता, बल्कि सांस्कृतिक होता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र की इसी जीवन-शक्ति को “चित्ति” कहा। चित्ति राष्ट्र की आत्मा है, जो यह निर्धारित करती है कि समाज क्या स्वीकार करेगा और क्या अस्वीकार करेगा। राष्ट्र की शिक्षा, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संस्थाएँ और न्याय व्यवस्था सब कुछ चित्ति के अनुरूप विकसित होता है।
राज्य राष्ट्र की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्मित संस्था है। राज्य राष्ट्र का साधन है, राष्ट्र राज्य का नहीं। भारतीय परंपरा में समाज सर्वोपरि रहा है, राज्य नहीं। भारत में हजारों वर्षों तक समाज ने शिक्षा दी, न्याय दिया, आर्थिक व्यवस्था संचालित की और सामाजिक संतुलन बनाए रखा। ग्राम पंचायतें न्याय देती थीं, जातिगत पंचायतें सामाजिक संतुलन बनाए रखती थीं, खाप पंचायतें सामाजिक अनुशासन बनाए रखती थीं। मंदिर केवल धार्मिक संस्थाएँ नहीं थे, बल्कि शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सेवा के केंद्र थे। समाज स्वायत्त था और राज्य सीमित भूमिका में था।
लेकिन आधुनिक राज्य की जो नियंत्रणवादी अवधारणा भारत में आई, उसके मूल पश्चिमी विचारधारा में हैं, विशेषकर क्रिश्चियन मिशनरी और औपनिवेशिक मानसिकता में। यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों का मानना था कि एशिया और अफ्रीका के समाज असभ्य हैं और उन्हें सभ्य बनाने की आवश्यकता है। "Civilizing Mission" की यही अवधारणा औपनिवेशिक शासन की बुनियाद बनी। ब्रिटिश शासन ने भारत में भी इसी दृष्टिकोण से शासन किया कि भारतीय समाज पिछड़ा है और उसे आधुनिक बनाया जाना चाहिए। भारत में भी अंग्रेजों ने यही मानसिकता अपनाई। थॉमस मैकॉले ने 1835 में भारतीय शिक्षा प्रणाली को बदलने का प्रस्ताव दिया और कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अनुपयोगी है और अंग्रेजी शिक्षा से भारतीयों को सभ्य बनाया जाएगा। यही नियंत्रणवादी मानसिकता बाद में आधुनिक राज्य की अवधारणा में बदल गई।
स्वतंत्रता के बाद यह मानसिकता समाप्त नहीं हुई, बल्कि नई विचारधाराओं के साथ जारी रही। विशेष रूप से कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारा ने समाज को राज्य के नियंत्रण में लाने की अवधारणा को मजबूत किया। कम्युनिज्म का मूल सिद्धांत ही समाज को राज्य के माध्यम से नियंत्रित करना है। सोवियत संघ और चीन में राज्य को सर्वशक्तिमान बनाया गया, जहाँ समाज की स्वतंत्र संस्थाओं को समाप्त कर दिया गया।
जवाहरलाल नेहरू स्वयं समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे। उन्होंने 1927 में सोवियत संघ का दौरा किया और उसके बाद अपने लेखों में सोवियत मॉडल की प्रशंसा की। उनकी पुस्तक "Soviet Russia: Some Random Sketches and Impressions" में उन्होंने सोवियत व्यवस्था को आधुनिकता का मॉडल बताया। स्वतंत्रता के बाद नेहरू ने भारत में भी उसी प्रकार की केंद्रीकृत योजना आधारित अर्थव्यवस्था लागू की। 1950 में योजना आयोग की स्थापना हुई और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण बढ़ा दिया गया।
1950 में योजना आयोग की स्थापना हुई। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण बढ़ाया गया। 1956 की औद्योगिक नीति में भारी उद्योगों को सरकारी नियंत्रण में रखा गया। 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। 1956 में जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण कर LIC बनाई गई। 1973 में कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया गया। लाइसेंस-परमिट राज लागू किया गया। निजी उद्योग खोलने के लिए सरकारी अनुमति आवश्यक हो गई। इससे समाज की आर्थिक शक्ति कमजोर हुई और राज्य पर निर्भरता बढ़ी।
शिक्षा व्यवस्था में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई। 1956 में UGC की स्थापना हुई, 1961 में NCERT की स्थापना हुई। पाठ्यक्रम निर्धारण सरकार के हाथ में चला गया। इतिहास लेखन में वामपंथी विचारधारा से प्रभावित इतिहासकारों का प्रभाव बढ़ा। रोमिला थापर, इरफान हबीब, बिपन चंद्र, डी.एन. झा, सतीश चंद्र, रामशरण शर्मा जैसे इतिहासकारों ने इतिहास लेखन को प्रभावित किया। भारतीय इतिहास को सांस्कृतिक दृष्टिकोण से हटाकर वर्ग संघर्ष के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया।
1972 में Indian Council of Historical Research (ICHR) की स्थापना हुई, जिसमें लंबे समय तक वामपंथी इतिहासकारों का प्रभाव रहा। विश्वविद्यालयों में भी वामपंथी विचारधारा का प्रभाव बढ़ा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जादवपुर विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में वामपंथी छात्र संगठनों का प्रभाव रहा। SFI, AISF, AISA जैसे संगठनों ने बौद्धिक वातावरण को प्रभावित किया।
प्रशासनिक व्यवस्था में भी यही मानसिकता विकसित हुई। यूपीएससी की तैयारी के दौरान समाजवाद, केंद्रीकरण और राज्य की सर्वोच्चता को आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया। लाल बहादुर शास्त्री प्रशासन अकादमी में अधिकारियों को शासन-केन्द्रित दृष्टिकोण के अनुसार प्रशिक्षित किया गया। इससे प्रशासनिक अधिकारियों में यह मानसिकता विकसित हुई कि वे समाज को नियंत्रित करने वाले शासक हैं। यही कारण है कि प्रशासनिक व्यवस्था में वामपंथी झुकाव दिखाई देता है।
धीरे-धीरे समाज की पारंपरिक संस्थाओं को समाप्त किया गया। ग्राम पंचायतों के न्यायिक अधिकार समाप्त हुए। खाप पंचायतों और जातिगत पंचायतों को अस्वीकार्य बताया गया। मंदिरों के प्रबंधन पर राज्य नियंत्रण स्थापित किया गया। तमिलनाडु में लगभग 44,000 मंदिर सरकारी नियंत्रण में आए। आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में भी मंदिर सरकारी नियंत्रण में आए, जबकि अन्य धार्मिक संस्थाएँ स्वतंत्र रहीं।
राज्य ने स्वयं को समाज सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया। समानता, समाजवाद और समता के नाम पर नीतियाँ बनाई गईं। SC/ST आरक्षण लागू किया गया। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC आरक्षण लागू किया गया। बाद में सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए EWS आरक्षण लागू किया गया। समानता की यह अवधारणा प्रकृति के सिद्धांतों के विपरीत थी, क्योंकि प्रकृति में विविधता स्वाभाविक है।
इन नीतियों के परिणामस्वरूप समाज का बड़ा वर्ग सरकार को "माई-बाप" मानने लगा। समाज की स्वायत्त शक्ति कमजोर हुई। शिक्षा, अर्थव्यवस्था, न्याय और सामाजिक सुधार सब कुछ राज्य के नियंत्रण में चला गया।
जबकि भारतीय परंपरा में राज्य का कार्य समाज को नियंत्रित करना नहीं था। राज्य का कार्य सुरक्षा देना, शांति बनाए रखना और न्याय सुनिश्चित करना था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद राज्य सर्वशक्तिमान संस्था बन गया, जो समाज को नियंत्रित करने, सुधारने और समान बनाने का प्रयास करने लगा।
यह स्थिति भारतीय राष्ट्र की चित्ति के विपरीत है। भारत का राष्ट्र जीवन समाज आधारित रहा है। जब तक समाज की शक्ति वापस नहीं आएगी, तब तक राष्ट्र की चित्ति भी पूर्ण रूप से जागृत नहीं होगी। भारत को आर्थिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वतंत्रता और न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है। शिक्षा, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था समाज के हाथ में होनी चाहिए। राज्य मर्यादित हो और समाज सशक्त यही भारत की स्वाभाविक व्यवस्था है और यही भारत के पुनर्जागरण का मार्ग
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