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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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(किसी बड़े विषय को सोशल मीडिया ने हल्का किया है। ये काम ही देवदत्त पटनायक आदि ग्रन्थ लिख- कर रहे है।)
महाभारत को केवल एक धार्मिक आख्यान या पारिवारिक संघर्ष की कथा मान लेना उसके वास्तविक स्वरूप को अत्यंत सीमित कर देना है। वस्तुतः यह ग्रंथ राजनीति, कूटनीति, राज्यशास्त्र, नैतिकता और धर्म के जटिल संबंधों का एक कालजयी विश्वकोश है। इसमें केवल युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह बताया गया है कि सत्ता कैसे संचालित होती है, राज्य कैसे चलता है, न्याय कैसे स्थापित होता है और जब व्यवस्था विफल हो जाती है तो धर्म की रक्षा किस प्रकार की जाती है। इसलिए महाभारत को समझे बिना भारतीय राजनीतिक और नैतिक परंपरा को समझना लगभग असंभव है।
आज के समय में जब महाभारत के प्रसंगों को सोशल मीडिया की त्वरित भाषा में “पोलिटिकली करेक्ट बनाम सत्य” जैसे सरल वाक्यों में बाँध दिया जाता है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि उस व्यापक परिप्रेक्ष्य को पुनः सामने रखा जाए जिसमें यह महाकाव्य रचा गया था। द्रौपदी चीरहरण, अर्जुन का संशय और कृष्ण का मार्गदर्शन—इन सब घटनाओं को केवल “किसी के बोलने या न बोलने” की कहानी मान लेना महाभारत के राजनीतिक और दार्शनिक आयामों की अवहेलना है।
महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विमर्श शांति पर्व में मिलता है, जहाँ युद्ध के बाद भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म, राज्य संचालन और न्याय व्यवस्था के गहन सिद्धांत बताते हैं। भीष्म स्पष्ट कहते हैं कि राजा का सर्वोच्च कर्तव्य “लोकसंग्रह” है—अर्थात् प्रजा का संरक्षण और कल्याण। राजा को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा या परिवारिक पक्षपात से ऊपर उठकर शासन करना चाहिए। यह सिद्धांत आज की आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन भारत के लिए था।
महाभारत यह भी दिखाता है कि राजनीति केवल शक्ति का खेल नहीं है; यह नैतिकता और कूटनीति के संतुलन की कला भी है। इस संदर्भ में शकुनि और कृष्ण दो भिन्न प्रकार की राजनीतिक बुद्धियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। शकुनि की राजनीति कुटिलता, छल और स्वार्थ पर आधारित है। उसका उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना है, चाहे उसके लिए समाज का विनाश ही क्यों न हो। दूसरी ओर कृष्ण की कूटनीति धर्म की स्थापना के लिए प्रयुक्त होती है। वे परिस्थिति को समझते हैं, रणनीति बनाते हैं और आवश्यक होने पर कठोर निर्णय भी लेते हैं, परंतु उनका अंतिम उद्देश्य न्याय की स्थापना होता है।
यही अंतर राजनीति और कूटनीति के नैतिक आधार को स्पष्ट करता है। कूटनीति स्वयं में न तो पाप है न पुण्य; उसका स्वरूप उसके उद्देश्य से निर्धारित होता है। यदि नीति का उपयोग स्वार्थ और अधर्म के लिए किया जाए तो वह विनाशकारी बन जाती है, और यदि वही नीति धर्म की रक्षा के लिए प्रयुक्त हो तो वह समाज को स्थिरता प्रदान करती है।
महाभारत में राज्य की संरचना का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें बताया गया है कि एक राज्य केवल राजा से नहीं चलता। उसके कई अंग होते हैं—राजा, मंत्री, कोष, सेना, न्याय व्यवस्था और प्रजा। यदि इनमें से कोई भी अंग कमजोर हो जाए तो राज्य की स्थिरता संकट में पड़ जाती है। विदुर और भीष्म जैसे पात्र इसी संतुलित शासन के प्रतीक हैं। उनकी दूरदर्शिता, नीति निपुणता और तर्कशीलता इस बात का उदाहरण है कि एक सफल राजनीतिज्ञ केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि विवेकशील भी होना चाहिए।
इसी संदर्भ में द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग केवल व्यक्तिगत अपमान का प्रश्न नहीं था; वह पूरी राजनीतिक व्यवस्था की नैतिक विफलता का प्रतीक था। जब सत्ता के केंद्र में बैठे लोग न्याय स्थापित करने में असफल हो जाते हैं, तब व्यवस्था के भीतर असंतोष और विद्रोह की संभावना बढ़ जाती है। इस घटना ने महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की, क्योंकि उस समय धर्म की रक्षा के लिए स्थापित संस्थाएँ स्वयं निष्क्रिय हो चुकी थीं।
अर्जुन का युद्ध से पहले का संशय भी इसी व्यापक नैतिक संकट का संकेत है। वह केवल युद्ध से भयभीत नहीं था, बल्कि यह समझने का प्रयास कर रहा था कि धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है। यही कारण है कि कृष्ण उसे केवल युद्ध के लिए प्रेरित नहीं करते, बल्कि उसे कर्म, धर्म और आत्मज्ञान का गहन बोध कराते हैं। भगवद्गीता इसी संवाद का परिणाम है, जो मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक शिक्षाओं में से एक मानी जाती है।
महाभारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि जब नियम और परंपराएँ न्याय की रक्षा करने में विफल हो जाएँ, तब उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है। समाज की स्थिरता केवल परंपराओं के पालन से नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना से सुनिश्चित होती है। यदि व्यवस्था अन्याय को संरक्षण देने लगे, तो उसे बदलना ही धर्म का मार्ग बन जाता है।
यही कारण है कि महाभारत को केवल “धर्म बनाम अधर्म” की सरल कथा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस जटिल प्रक्रिया का चित्रण है जिसमें समाज, राजनीति और नैतिकता एक-दूसरे से संघर्ष करते हुए एक नई व्यवस्था को जन्म देते हैं।
आज के समय में जब सार्वजनिक जीवन में “पोलिटिकली करेक्ट” बने रहने की प्रवृत्ति कई बार सत्य को दबा देती है, तब महाभारत का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि केवल शिष्टाचार या औपचारिक नैतिकता पर्याप्त नहीं होती। वास्तविक धर्म वह है जो न्याय, संतुलन और लोककल्याण को सुनिश्चित करे।
इसी दृष्टि से कृष्ण की भूमिका केवल एक राजनीतिक रणनीतिकार की नहीं, बल्कि धर्म के दार्शनिक व्याख्याकार की है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि धर्म केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि परिस्थितियों में न्याय की स्थापना का विवेकपूर्ण प्रयास है।
अंततः महाभारत हमें यह सिखाता है कि राजनीति, नैतिकता और धर्म का संबंध अत्यंत गहरा है। जब राजनीति से नैतिकता समाप्त हो जाती है, तो सत्ता संघर्ष विनाश का कारण बनता है। परंतु जब राजनीति धर्म और लोककल्याण के साथ जुड़ती है, तब वही व्यवस्था समाज को स्थिरता और न्याय प्रदान करती है।
इसीलिए महाभारत केवल अतीत की कथा नहीं है। यह हर युग के लिए एक चेतावनी भी है और मार्गदर्शन भी—कि सत्ता का वास्तविक उद्देश्य प्रभुत्व नहीं, बल्कि न्याय और लोकमंगल की स्थापना होना चाहिए।
- कैलाश चंद्र
(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)
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