सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

रंग पंचमी : सृष्टि के रंग और सनातन जीवन का उत्सव



फाल्गुन की हवा में कुछ ऐसा होता है जो भीतर तक पहुँचता है। गेहूँ की बालियाँ झुकने लगती हैं, आम के बौर महकने लगते हैं, और शाम को दूर से ढोल की थाप सुनाई देती है। हमारे यहाँ ऋतु बदलती है तो मन भी बदलता है। यही कारण है कि हम मौसम के साथ जीते हैं, मौसम के साथ उत्सव मनाते हैं।

हमारे समाज की सबसे बड़ी पहचान यही है कि यहाँ जीवन सूना नहीं रहता। कहीं ढीह बाबा का स्थान है, कहीं संन्यासी बाबा की कथा। कोई अपने कुलदेवता के आगे माथा टेकता है, कोई चौरा माई के चौरे पर दीप जलाता है। शारदा माई, विंध्यवासिनी, काली, दुर्गा नाम अनेक हैं। कोई सूर्य को अर्घ्य देता है, कोई गोवर्धन को अन्न अर्पित करता है, कोई नदी को प्रणाम करता है। ऊपर से देखने वाला कहेगा इतने रूप क्यों? पर भीतर से देखने वाला जानता है ये सब एक ही जीवन-दृष्टि के रूप हैं।

हमारे यहाँ धर्म किसी एक किताब की पंक्ति में कैद नहीं है। वह लोक में बहता है। वह घर-आँगन में है, खेत में है, चौपाल में है। यहाँ रोज़ कहीं-न-कहीं भंडारा है। कहीं मानस का पाठ, कहीं सुंदरकांड, कहीं सत्यनारायण की कथा। जन्म से लेकर विवाह तक, गृहप्रवेश से लेकर श्राद्ध तक हर पड़ाव पर कोई-न-कोई संस्कार। यह सब जीवन को अर्थ देता है।

वर्ष का चक्र देखिए। सावन में शिवालय भर जाते हैं। रक्षाबंधन पर बहनें राखी बाँधती हैं। नवरात्रि में शक्ति की आराधना, विजयदशमी पर विजय का स्मरण, दीपावली पर दीपों की पंक्ति। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी, फिर होली। और होली के पाँच दिन बाद रंग पंचमी। वर्ष में चार नवरात्रि। सच पूछिए तो ऐसा कोई महीना नहीं जब कोई पर्व न हो।

रंग पंचमी को यदि केवल होली का विस्तार समझ लिया जाए तो उसके अर्थ को छोटा कर देंगे। होली में रंग उछलते हैं, लोग खुलकर खेलते हैं। रंग पंचमी में वही रंग जैसे ठहरते हैं। यह दिन थोड़ा संयत, थोड़ा गंभीर भी होता है।

लोक में इसे “देव पंचमी” कहा जाता है। मान्यता है कि त्रेतायुग के प्रारम्भ में भगवान विष्णु ने रंगों से ब्रह्मांड को भर दिया। आगे चलकर वामन, परशुराम और राम के रूप में अवतार लिया। इस कथा को यदि प्रतीक की तरह देखें तो उसका आशय स्पष्ट है सृष्टि स्वयं रंगों से भरी है, और मनुष्य उसी सृष्टि का अंश है।

हमारे गांव में लोग इतना ही कहते हैं होलिका में जो मन में जमा है, उसे जला दो। खटास हो, ग़ुस्सा हो, मन का बोझ हो आग में छोड़ आओ। पाँच दिन बाद जब रंग पंचमी आती है तो जैसे मन को खाली जगह में रंग भरने का मौका मिल जाता है।

जब किसी के चेहरे पर गुलाल लगाते हैं तो बात सिर्फ रंग की नहीं होती। हाथ बढ़ता है तो सामने वाला भी मुस्कुरा देता है। साल भर की औपचारिकता उस एक पल में थोड़ी ढीली पड़ जाती है। जो आदमी दूर-दूर रहता है, वह भी उस दिन पास आ जाता है।

कई घरों में उस सुबह हल्दी डालकर नहा लेते हैं। कोई गंगाजल छिड़क देता है। आँगन में छोटा-सा दीप जला लिया। कोई बड़ी तैयारी नहीं, बस मन में यही कि घर ठीक रहे, सब स्वस्थ रहें।

मालवा में रंग पंचमी अलग ही दिखती है। सुबह से ही शहर का रंग बदलने लगता है। लोग सफेद कपड़े पहनकर निकलते हैं, जानते हुए कि थोड़ी देर में सब रंग जाएंगे। ढोल की आवाज़ पास आती है और लोग रुकते नहीं।

इंदौर की गैर में तो बस भीड़ चलती रहती है। एक टोली आती है, दूसरी जुड़ जाती है। गुलाल उड़ता है। फिर फायर ब्रिगेड की गाड़ी से रंग मिला पानी ऊपर से गिरता है। एक पल के लिए सब कुछ धुँधला हो जाता है। जब आँख खुलती है तो सामने वाले का चेहरा पहचान में आए या न आए, उसकी हँसी पहचान में आ जाती है। दुकानदार भी भीग रहा है, ग्राहक भी। कोई हिसाब नहीं, बस रंग।

महाराष्ट्र में रंग पंचमी का ढंग थोड़ा घर जैसा है। होली के बाद पाँच दिन तक हल्का-सा रंग बना रहता है। पहले सूखा गुलाल, फिर पानी। घरों में पूरणपोली बनती है। लोग बैठते हैं, खाते हैं, बातें करते हैं।
इसी बीच कई घरों में शादी की बात भी शुरू हो जाती है। सब बैठे हैं, माहौल हल्का है, बात निकल आती है। कोई कह देता है तिथि देख लें। और बात आगे बढ़ जाती है।
बस इतना ही। रंग हैं, लोग हैं, और कुछ घंटे जो बाकी दिनों से अलग होते हैं।

पुष्टिमार्ग में रंग पंचमी का एक अलग स्वरूप है।

श्रीनाथजी के साथ रंगार्चन, पिचवाइयों की सजावट यह दिखाता है कि रंग यहाँ भक्ति का अंग हैं। गोकुलनाथजी की कथा यह सिखाती है कि तिथि से अधिक भावना महत्वपूर्ण है।

रंग पंचमी का एक आर्थिक पक्ष भी है। रंग बनाने वाले कारीगर, फूल बेचने वाले, मिठाई वाले, ढोलक बजाने वाले इन सबकी आजीविका इन पर्वों से जुड़ी है। छोटे शहरों और कस्बों में यह दिन बाजार को जीवंत कर देता है।

हमारी परम्परा सृष्टि को त्रिगुणात्मक मानती है सत्त्व, रज और तम। जीवन इन्हीं के बीच संतुलन है। हमारे पर्व उसी संतुलन का अभ्यास हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ जीवन के चार आयाम हैं। धर्म दिशा देता है, अर्थ स्थिरता देता है, काम आनंद देता है, और मोक्ष अंततः शांति देता है।

रंग पंचमी हमें याद दिलाती है कि यदि रंग केवल चेहरे पर रह जाएँ और मन में कटुता रह जाए तो उत्सव अधूरा है। यदि रंग के साथ हँसी भी रह जाए, अपनापन भी रह जाए, तो वही सच्चा उत्सव है।

हमने कई बार इस दिन को केवल रंगों का खेल समझ लिया। पर यदि थोड़ा ठहरकर देखें तो यह दिन हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। क्या हम सचमुच मन से हल्के हैं? क्या हम मतभेद को मनभेद नहीं बनने देते?
रंग धुल जाएँगे। कपड़े बदल जाएँगे। पर यदि उस दिन की स्मृति में एक मिठास रह जाए, तो समझिए रंग पंचमी सफल हुई। यही उसका सार है सृष्टि के रंगों को अपने मन तक पहुँचाना। यही हमारी सनातन परम्परा की पहचान है रूप अनेक, पर जीवन एक।

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