सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

समाज से राज्य की ओर नहीं, राज्य से समाज की ओर लौटने का समय




✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

आज जिस विषय पर मैं बात कर रहा हूँ, वह केवल शासन प्रणाली का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यता, परंपरा और स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ से जुड़ा हुआ मूल प्रश्न है। आज भारत में लोकतंत्र है, चुनाव होते हैं, सरकारें बनती हैं और बदलती हैं, लेकिन क्या वास्तव में समाज शासन चला रहा है? या समाज केवल पाँच वर्ष में एक बार मतदान करके सत्ता को केंद्रीकृत करने का माध्यम बन गया है? वास्तविकता यह है कि आज की केंद्रीकृत लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज की भूमिका सीमित होकर रह गई है। समाज सरकार चुनता है, लेकिन शासन नहीं चलाता। नीति निर्माण, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था ये तीनों मूल स्तंभ सरकार के नियंत्रण में हैं, जबकि इन्हें समाज के पास होना चाहिए।

भारतीय सभ्यता का मूल स्वरूप राज्य-प्रधान नहीं बल्कि समाज-प्रधान रहा है। भारत हजारों वर्षों तक बिना केंद्रीकृत राज्य व्यवस्था के भी संगठित और समृद्ध रहा। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, स्मृतियों और श्रुति-स्मृति परंपरा में समाज आधारित व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। भारतीय व्यवस्था का मूल सिद्धांत रहा है — धर्म आधारित सामाजिक व्यवस्था, जिसमें समाज स्वयं अपने जीवन के प्रमुख क्षेत्रों का संचालन करता था और राज्य की भूमिका सीमित रहती थी।

ऋग्वेद में “संगच्छध्वं संवदध्वं” का मंत्र सामूहिक निर्णय की भावना को प्रकट करता है। अथर्ववेद में सभा और समिति का उल्लेख मिलता है, जो समाज आधारित निर्णय प्रणाली का संकेत है। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और नारद स्मृति में स्थानीय न्याय व्यवस्था, पंचायत और समुदाय आधारित निर्णय प्रणाली का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन भारत में शिक्षा समाज द्वारा संचालित थी। गुरुकुल व्यवस्था राज्य के अधीन नहीं थी। आचार्य अपने आश्रम चलाते थे। छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। समाज उस व्यवस्था को सहयोग देता था। नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय राज्य द्वारा संचालित नहीं थे। विद्वान चलाते थे। राजाओं का कार्य संरक्षण देना था, नियंत्रण करना नहीं। यह बौद्धिक स्वतंत्रता का सर्वोच्च उदाहरण था।

इसी प्रकार आर्थिक व्यवस्था भी समाज आधारित थी। भारत में कारीगर, व्यापारी, कृषक, श्रेणियाँ और गिल्ड व्यवस्था के माध्यम से आर्थिक गतिविधियाँ संचालित होती थीं। राज्य का हस्तक्षेप सीमित था। यही कारण था कि भारत सदियों तक विश्व अर्थव्यवस्था में अग्रणी रहा। आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार 1700 तक भारत विश्व की लगभग 24 प्रतिशत अर्थव्यवस्था का हिस्सा था। यह तब संभव हुआ जब अर्थव्यवस्था समाज के हाथ में थी, सरकार के नियंत्रण में नहीं।

न्याय व्यवस्था भी समाज आधारित थी। गाँवों में पंचायतें न्याय करती थीं। विवाद स्थानीय स्तर पर सुलझाए जाते थे। ब्रिटिश अधिकारी चार्ल्स मेटकाफ ने भारतीय गाँवों को “लिटिल रिपब्लिक्स” कहा था। इसका अर्थ था कि भारत का समाज आत्मनिर्भर और स्वशासी था।
यह व्यवस्था न्यासिता के सिद्धांत पर आधारित थी। भारतीय परंपरा में संपत्ति को व्यक्तिगत उपभोग का साधन नहीं बल्कि समाज की न्यास संपत्ति माना गया। महाभारत, उपनिषद और स्मृतियों में यह विचार मिलता है कि व्यक्ति संपत्ति का मालिक नहीं बल्कि न्यासी है। यही विचार बाद में गांधी ने ट्रस्टीशिप के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन यह सिद्धांत भारतीय परंपरा में पहले से मौजूद था।

भारतीय सभ्यता में मूल सिद्धांत स्थिर रहे हैं, लेकिन समय के अनुसार कार्यप्रणाली बदलती रही है। समाज आधारित शिक्षा, समाज आधारित अर्थव्यवस्था और समाज आधारित न्याय व्यवस्था — यह भारतीय व्यवस्था का मूल स्वरूप रहा है।

यही वह व्यवस्था है जिसे महात्मा गांधी ने स्वीकार नहीं किया था। गांधी ने स्पष्ट कहा था कि अंग्रेजों को हटाकर यदि हम उसी केंद्रीकृत शासन प्रणाली को जारी रखेंगे, तो वास्तविक स्वराज नहीं आएगा। गांधी ने 1909 में ‘हिंद स्वराज’ में लिखा था कि केवल शासक बदलने से स्वराज नहीं आता, स्वराज तब आता है जब समाज स्वयं शासन करता है।

गांधी ने ग्राम स्वराज की अवधारणा दी। उनके अनुसार भारत की वास्तविक शक्ति गाँवों में है। गाँव आत्मनिर्भर हों, स्थानीय अर्थव्यवस्था हो, पंचायतें न्याय करें, शिक्षा समाज के हाथ में हो, शासन नीचे से ऊपर बने — यही गांधी का स्वराज था। गांधी ने कहा था कि “वास्तविक लोकतंत्र केंद्र में बैठे बीस लोगों से नहीं बल्कि हर गाँव के व्यक्ति से आता है।”

गांधी ने स्वतंत्र भारत के लिए रामराज्य की अवधारणा भी प्रस्तुत की थी। गांधी के रामराज्य का अर्थ मज़हबी या पंथ-आधारित राज्य नहीं था, बल्कि धर्म आधारित व्यवस्था था। भारतीय परंपरा में धर्म का अर्थ रिलिजन, मज़हब, मत या संप्रदाय नहीं होता, बल्कि धर्म का अर्थ है जिसे धारण किया जाए, जो जीवन और समाज को संतुलन में रखे। वेदों में इस धर्म का मूल आधार ऋत को माना गया है। ऋत अर्थात सृष्टि का शाश्वत नियम, प्राकृतिक और नैतिक व्यवस्था का सार्वभौमिक सिद्धांत। जब यही ऋत मानव जीवन और समाज द्वारा धारण किया जाता है, वही धर्म बनता है। इसलिए कहा गया है ऋत ही धर्म है।

भारतीय चिंतन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — ये चार पुरुषार्थ जीवन व्यवस्था के आधार माने गए हैं। इनमें धर्म को प्रथम स्थान दिया गया है, क्योंकि धर्म के बिना अर्थ अनियंत्रित हो जाता है, काम विकृत हो जाता है और मोक्ष की दिशा समाप्त हो जाती है। इसलिए रामराज्य की अवधारणा धर्म आधारित व्यवस्था की ही अवधारणा है।
गांधी के रामराज्य में शासन का आधार सत्ता नहीं बल्कि धर्म होता है। राज्य सर्वोच्च नहीं होता, धर्म सर्वोच्च होता है। रामराज्य में सबसे कमजोर व्यक्ति भी सुरक्षित रहता है, क्योंकि व्यवस्था धर्म आधारित होती है, सत्ता आधारित नहीं। गांधी के रामराज्य में शिक्षा समाज द्वारा संचालित होती, अर्थव्यवस्था स्थानीय और समाज आधारित होती, न्याय पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से होता और सत्ता विकेंद्रीकृत होती। शासन न्यूनतम होता और समाज अधिकतम शक्तिशाली होता। यही गांधी के रामराज्य की मूल अवधारणा थी।

लेकिन स्वतंत्रता के बाद जो व्यवस्था बनी, वह गांधी के ग्राम स्वराज और रामराज्य दोनों के विपरीत थी। गांधी के शरीर की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी, लेकिन गांधी की आत्मा और विचारों की हत्या स्वतंत्र भारत की नीतियों ने कर दी। कांग्रेस गांधी की विरासत की बात करती रही, गांधी के नाम पर राजनीति करती रही, लेकिन गांधी के विचारों को लागू नहीं किया गया। गांधी ग्राम स्वराज की बात करते थे, लेकिन केंद्रीकृत सत्ता बनाई गई। गांधी समाज आधारित शिक्षा की बात करते थे, लेकिन शिक्षा पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में ले ली गई। गांधी कुटीर उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था की बात करते थे, लेकिन भारी उद्योग आधारित सोवियत मॉडल अपनाया गया।

जवाहरलाल नेहरू पश्चिमी विचारों से प्रभावित थे। उनकी सोच पर समाजवाद और सोवियत संघ का स्पष्ट प्रभाव था। 1950 में योजना आयोग की स्थापना हुई और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से अर्थव्यवस्था को केंद्रीकृत किया गया। 1955 के अवाडी अधिवेशन में कांग्रेस ने सोशलिस्ट पैटर्न ऑफ सोसाइटी का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद लाइसेंस-परमिट राज शुरू हुआ। उद्योग खोलने के लिए सरकार की अनुमति आवश्यक हो गई।

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। 1970 के दशक में कई उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया। 1976 में संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद और सेकुलर शब्द जोड़े गए। यह संशोधन आपातकाल के दौरान किया गया जब लोकतंत्र सीमित कर दिया गया था।

शिक्षा के क्षेत्र में भी स्वतंत्रता के बाद पूरी व्यवस्था सरकार के अधीन कर दी गई। जबकि प्राचीन भारत में शिक्षा समाज आधारित थी। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय समाज द्वारा संचालित थे। धर्मपाल जी की पुस्तक “The Beautiful Tree” बताती है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में व्यापक समाज आधारित शिक्षा व्यवस्था थी।

क्या सरकार का काम व्यवसाय चलाना होता है?
क्या सरकार का काम सामान बेचना होता है?
क्या सरकार का काम लाइसेंस देना होता है?
क्या सरकार का काम स्कूल और कॉलेज चलाना होता है?
क्या सरकार का काम परीक्षा कराना होता है?
क्या सरकार का काम प्रमाण-पत्र देना होता है?
क्या सरकार का काम पाठ्यक्रम तय करना होता है?

मतलब पूरी तरह सरकार-अधीन व्यवस्था है। इसमें बौद्धिक स्वतंत्रता का कोई स्थान नहीं है। इस तरह की स्थिति अंग्रेजों के समय भी नहीं रही, जैसी स्वतंत्रता के बाद हुई।

आज स्थिति यह है कि राज्य और केंद्र सरकारें पाठ्यक्रम तय करती हैं। बोर्ड बनाए गए हैं। निजी स्कूल भी सरकारी नियमों के अधीन हैं। कोई स्वतंत्र विद्वान यदि शिक्षा देना चाहे, तो उसे सरकारी मान्यता की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ है कि बौद्धिक स्वतंत्रता सीमित है।

आर्थिक व्यवस्था 1991 के बाद काफी हद तक सरकारी नियंत्रण से मुक्त हुई। उदारीकरण के बाद भारत की आर्थिक वृद्धि दर बढ़ी। इससे स्पष्ट हुआ कि जब समाज को अवसर मिला तो विकास हुआ।

लेकिन शिक्षा और न्याय व्यवस्था आज भी केंद्रीकृत है। भारत में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। ग्राम पंचायतों को न्यायिक अधिकार नहीं हैं। जबकि पहले पंचायतें न्याय करती थीं।

न्याय व्यवस्था पूरी तरह केंद्रीकृत है। भारत में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। स्थानीय स्तर पर न्याय व्यवस्था प्रभावी नहीं है। ग्राम पंचायतों को वास्तविक न्यायिक अधिकार नहीं दिए गए हैं।

आज 21वीं सदी में भी भारत में शिक्षा, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था सरकार के नियंत्रण में हैं। यह स्थिति विकसित देशों से भी भिन्न है। अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में शिक्षा और अर्थव्यवस्था पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण नहीं है। वहाँ समाज, निजी संस्थान और स्वतंत्र संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत में स्थिति इसके विपरीत है। शिक्षा पूरी तरह नियामकीय नियंत्रण में है। अर्थव्यवस्था पर भी सरकारी हस्तक्षेप बना रहता है। न्याय व्यवस्था केंद्रीकृत है।
जब तक शिक्षा, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था समाज के हाथ में नहीं आएगी, तब तक पूर्ण स्वतंत्रता संभव नहीं है। समाज आधारित व्यवस्था ही वास्तविक लोकतंत्र है।
सरकार की भूमिका सीमित होनी चाहिए  सुरक्षा, विदेशी नीति, अंतरराज्यीय परिवहन, राजस्व, टैक्सेशन और नियमन तक।

शिक्षा, आर्थिक व्यवस्था और न्याय व्यवस्था समाज के पास होनी चाहिए।

भारत की सभ्यता का मूल यही रहा है। यही वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों और परंपरा का संदेश है। मूल सिद्धांत कभी नहीं बदलते, केवल समय के अनुसार कार्यप्रणाली बदलती है।

आज आवश्यकता है कि 21वीं सदी में भारत अपनी मूल समाज आधारित व्यवस्था को आधुनिक रूप में पुनर्स्थापित करे। यही वास्तविक स्वतंत्रता की दिशा है। यही भारतीय सभ्यता का मार्ग है। यही भारत के भविष्य का आधार है।

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