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यूजीसी के नए नियम और उसके पीछे की वैचारिक पृष्ठभूमि: औपनिवेशिक विमर्श से आधुनिक विश्वविद्यालयों तक






✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

यूजीसी के हाल के विनियमों को लेकर देश में जो विवाद उत्पन्न हुआ है, उसे केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में समझना इस पूरे विषय को बहुत सीमित कर देना होगा। 13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने कुछ नए विनियम जारी किए। उसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध हुआ और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन विनियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी और आगे की सुनवाई के लिए 19 मार्च की तिथि निर्धारित की गई। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि यह केवल यूजीसी का एक साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं था।

इसकी पृष्ठभूमि सुप्रीम कोर्ट में चल रही उस न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी थी जो रोहित वेमुला और पायल तड़वी से जुड़े मामलों के कारण प्रारंभ हुई थी। इन दोनों मामलों में संबंधित परिवारों की ओर से अदालत के सामने लगभग दस बिंदुओं का एक विस्तृत ढाँचा प्रस्तुत किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं बिंदुओं के आधार पर दिशा-निर्देशों की आवश्यकता व्यक्त की और उसके बाद यूजीसी को विनियम तैयार करने पड़े। इन मामलों में याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता के रूप में इंदिरा जयसिंह उपस्थित थीं और अदालत में प्रस्तुत किए गए बिंदुओं का प्रारूप भी उनके मार्गदर्शन में तैयार किया गया था। इतने जटिल प्रशासनिक और नीतिगत बिंदुओं का प्रारूप किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा तैयार नहीं किया जा सकता। इससे स्पष्ट है कि यह पूरा ढाँचा पहले से तैयार एक वैचारिक मॉडल के आधार पर बनाया गया था जिसे बाद में संस्थागत रूप दे दिया गया।

यहाँ एक व्यापक प्रश्न सामने आता है। भारत में कई बार वैचारिक एजेंडे सीधे सरकारों के माध्यम से लागू नहीं किए जाते बल्कि न्यायालयों, आयोगों, नियामक संस्थाओं और अन्य संस्थागत तंत्रों के माध्यम से लागू होते हैं। जब किसी विचार को सीधे राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से लागू कराना कठिन होता है तब वही विचार न्यायिक आदेशों या संस्थागत निर्देशों के माध्यम से लागू कराया जाता है। यूजीसी के इन विनियमों का प्रकरण उसी प्रक्रिया का उदाहरण है। जो कार्य किसी सरकार से सीधे नहीं कराया जा सकता, उसे अदालतों या नियामक संस्थाओं के माध्यम से लागू कराने का प्रयास किया जाता है। इस पूरे विवाद में एक और तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आया। वही वामपंथी राजनीतिक और बौद्धिक समूह जो लगभग हर विषय पर वर्तमान सरकार को फासीवादी या हिंदुत्ववादी कहकर उसका विरोध करते हैं, वही इन विनियमों का समर्थन करते हुए दिखाई दिए और उन्हें तुरंत लागू करने की माँग भी करने लगे। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि इन विनियमों को उसी वैचारिक दिशा का विस्तार माना जा रहा था जिसे लंबे समय से विश्वविद्यालयों और बौद्धिक संस्थानों में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। भारत में कई महत्वपूर्ण सामाजिक और कानूनी परिवर्तन न्यायालयों के माध्यम से लागू हुए हैं जिनकी वैचारिक दिशा पर लंबे समय से बहस होती रही है। सबरीमाला मंदिर से संबंधित निर्णय इसका एक उदाहरण है। इसी प्रकार भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निरस्त करने का निर्णय, समलैंगिक संबंधों की वैधता को मान्यता देना, लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी संरक्षण देने वाले कई निर्णय—ये सभी ऐसे उदाहरण हैं जिनमें सामाजिक संरचना से जुड़े प्रश्नों पर न्यायालयों के माध्यम से परिवर्तन लागू हुए।

इसी के समानांतर कई नीतियाँ सीधे सरकारों के माध्यम से भी लागू कराई गईं जिनकी वैचारिक पृष्ठभूमि वामपंथी आर्थिक और सामाजिक सिद्धांतों से जुड़ी रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत में जिस समाजवादी आर्थिक नीति को अपनाया गया, वह सोवियत संघ के प्रभाव से प्रेरित थी। उसी दौर में शिक्षा व्यवस्था को व्यापक रूप से सरकारी नियंत्रण में लाया गया। विश्वविद्यालयों, पाठ्यक्रमों और इतिहास लेखन की दिशा भी उसी वैचारिक दृष्टिकोण से प्रभावित हुई। इतिहास लेखन में भारतीय समाज को पिछड़ा, दमनकारी और असभ्य सिद्ध करने वाली धारणाएँ लंबे समय तक स्थापित की गईं।

इसी क्रम में कई योजनाएँ भी लागू हुईं जिन पर व्यापक बहस होती रही है। उदाहरण के लिए मनरेगा जैसी योजना को ग्रामीण रोजगार की योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन यह भी तथ्य है कि इस प्रकार की योजनाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संरचना पर गहरा प्रभाव डाला और अनेक अर्थशास्त्रियों ने यह तर्क दिया कि इससे ग्रामीण उत्पादकता की परंपरागत संरचना कमजोर हुई।

इन सभी घटनाओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि भारत में नीतिगत और वैचारिक परिवर्तन केवल चुनावी राजनीति के माध्यम से ही नहीं होते। न्यायालय, विश्वविद्यालय, नियामक संस्थाएँ और प्रशासनिक ढाँचे भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से विश्वविद्यालयों और मानविकी विभागों में लंबे समय से एक विशेष वैचारिक दृष्टिकोण प्रभावी रहा है जिसमें समाज को स्थायी रूप से शोषक और शोषित वर्गों में विभाजित करके देखा जाता है।

यदि इस पूरे प्रश्न की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखें तो इसकी जड़ें औपनिवेशिक काल तक जाती हैं। प्रारंभिक यूरोपीय लेखकों के बीच भारतीय समाज के बारे में एकरूप दृष्टिकोण नहीं था। उदाहरण के लिए फ्रांसीसी मिशनरी Jean-Antoine Dubois ने 1816 में प्रकाशित अपनी पुस्तक Description of the Character, Manners and Customs of the People of India में लिखा कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज की एक ऐसी संरचना है जिसने भारतीय समाज को लंबे समय तक अराजकता से बचाए रखा। लेकिन इसके कुछ ही समय बाद औपनिवेशिक लेखन की दिशा बदलती दिखाई देती है। 1817 में James Mill ने अपनी पुस्तक History of British India लिखी। मिल कभी भारत आए भी नहीं थे, फिर भी उन्होंने भारतीय समाज के बारे में व्यापक निष्कर्ष प्रस्तुत किए और उसमें भारतीय समाज को पिछड़ा, असभ्य और दमनकारी सिद्ध करने का प्रयास किया। उनके लेखन में यह धारणा बार-बार दिखाई देती है कि भारतीय समाज बौद्धिक रूप से जड़ है और इसका कारण ब्राह्मणों का प्रभुत्व है। इस प्रकार का चित्रण औपनिवेशिक शासन के लिए उपयोगी था क्योंकि इससे यह कहा जा सकता था कि ब्रिटिश शासन भारत को सभ्य बनाने के लिए आवश्यक है।

उसी समय ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ भी बढ़ रही थीं। उनका उद्देश्य धर्मांतरण था, किंतु उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही थी। मिशनरी लेखनों में यह स्वीकार किया गया कि हिंदू समाज में धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं के संरक्षण में ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका है और धर्मांतरण की प्रक्रिया में सबसे बड़ी वैचारिक बाधा वही बनते हैं। इसलिए मिशनरी साहित्य में ब्राह्मणों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।ब्राह्मणवाद के विरोध का व्यवस्थित इतिहास विशेष रूप से 1857 के बाद दिखाई देता है। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने भारतीय समाज को नियंत्रित करने और विभाजित रखने की नीति अपनाई। उसी काल में ब्राह्मणों और वैदिक परंपरा को लक्ष्य बनाकर एक संगठित वैचारिक अभियान चलाया गया। मिशनरियों के लिए यह आवश्यक था कि वे ईसाई धर्म को हिंदू परंपरा से श्रेष्ठ सिद्ध करें और धर्मांतरण को वैचारिक आधार दें। प्रारंभ में यह आक्रमण हिंदू शास्त्रों और ब्रह्म की दार्शनिक अवधारणा पर था, क्योंकि ईसाई पादरियों को यीशु को अंतिम सत्य के रूप में स्थापित करना था। किंतु समय के साथ यह विमर्श “एंटी-ब्रह्म” से “एंटी-ब्राह्मण” में परिवर्तित हो गया। भारतीय भाषाओं में जब इन अवधारणाओं का अनुवाद हुआ तो ब्रह्म और ब्राह्मण के बीच भ्रम उत्पन्न किया गया और धीरे-धीरे ब्राह्मणों को ही हिंदू समाज की सभी समस्याओं का कारण बताया जाने लगा।

मिशनरी लेखकों ने यह तर्क स्थापित करना शुरू किया कि भारत की सभी सामाजिक समस्याओं का कारण ब्राह्मण हैं और हिंदू समाज की पूरी संरचना एक दमनकारी “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” पर आधारित है। इसी विचार को बाद में औपनिवेशिक इतिहास लेखन का आधार बनाया गया। इसी से वह साहित्य विकसित हुआ जिसे बाद में “एट्रोसिटी लिटरेचर” कहा गया। इस साहित्य का मूल तर्क यह था कि भारतीय समाज हजारों वर्षों से शोषण, अत्याचार और अंधविश्वास पर आधारित रहा है और उसका मुख्य कारण ब्राह्मणों द्वारा निर्मित सामाजिक व्यवस्था है।

उदाहरण के लिए मिशनरी लेखक Matthew Atmore Sherring ने 1872 में प्रकाशित अपनी पुस्तक Hindu Tribes and Castes में लिखा कि जाति व्यवस्था ब्राह्मणों की रचना है और इसे उन्होंने अपने सामाजिक प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए बनाया। इसी प्रकार औपनिवेशिक प्रशासक Herbert Hope Risley ने 1901 की जनगणना में जाति को नस्लीय सिद्धांतों से जोड़ने का प्रयास किया। इतिहासकार Nicholas Dirks ने अपनी पुस्तक Castes of Mind में लिखा है कि औपनिवेशिक शासन ने जाति को भारतीय समाज की केंद्रीय पहचान बना दिया।

औपनिवेशिक और मिशनरी साहित्य में भारतीय समाज को बर्बर, अंधविश्वासी और पिछड़ा सिद्ध करने का एक व्यापक अभियान चलाया गया। हिंदू समाज को “साँप-सपेरों का देश”, “जंगली समाज” और “अराजक सभ्यता” जैसी छवियों में प्रस्तुत किया गया ताकि यह कहा जा सके कि अंग्रेज भारत को सभ्य बनाने आए हैं।
लेकिन यदि पश्चिमी इतिहास को देखा जाए तो वहाँ अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जो इसके विपरीत चित्र प्रस्तुत करते हैं। यूरोप में मध्यकाल के दौरान हजारों महिलाओं को डायन बताकर जिंदा जला दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार 15वीं से 17वीं शताब्दी के बीच यूरोप में लगभग 40,000 से 60,000 महिलाओं को “विच” या डायन कहकर जला दिया गया। वैज्ञानिक विचार रखने वाले लोगों को भी ईसाई रिलिजन के विरुद्ध बोलने पर दंडित किया गया। उदाहरण के लिए 1600 में दार्शनिक जियोर्डानो ब्रूनो को जिंदा जला दिया गया क्योंकि उन्होंने ब्रह्मांड के बारे में चर्च के सिद्धांतों से भिन्न विचार प्रस्तुत किए थे।

अमेरिका में यूरोपीय उपनिवेशवाद के दौरान रेड इंडियन समुदाय की सभ्यता लगभग समाप्त कर दी गई। कई अध्ययनों में उल्लेख मिलता है कि यूरोपियों के आगमन के बाद वहाँ की मूल आबादी का लगभग 90 प्रतिशत नष्ट हो गया। कई लेखों में यह संख्या करोड़ों में बताई जाती है और कुछ आकलनों में लगभग 20 करोड़ तक की जनसंख्या नष्ट होने की बात कही जाती है। अफ्रीका में भी औपनिवेशिक हस्तक्षेप और मिशनरी गतिविधियों के कारण अनेक पारंपरिक समाज टूट गए और आज तक कई क्षेत्रों में वर्ग संघर्ष जारी है।

इसके विपरीत भारत से औपनिवेशिक काल में भारी आर्थिक लूट हुई। कई आर्थिक अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति बाहर ले जाई गई। इस आर्थिक लूट के लिए न तो ब्रिटिश साम्राज्य ने औपचारिक रूप से क्षमा माँगी और न ही उसकी क्षतिपूर्ति की गई।

इसके बावजूद औपनिवेशिक काल में तैयार किया गया वह नैरेटिव स्वतंत्रता के बाद भी समाप्त नहीं हुआ। स्वतंत्र भारत में भी उसी विचार को विभिन्न माध्यमों से आगे बढ़ाया गया कि भारत की सभी समस्याओं का मूल कारण “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” है। इतिहास लेखन, साहित्य, मीडिया, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और फिल्मों के माध्यम से यह विचार धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुँचाया गया। इसी “एट्रोसिटी लिटरेचर” पर आधारित कथा को आधुनिक सामाजिक विमर्श का आधार बना दिया गया।

इसी के समानांतर पश्चिमी विश्वविद्यालयों में विकसित वैचारिक सिद्धांतों का प्रभाव भी भारत में आने लगा। अमेरिका और यूरोप के विश्वविद्यालयों में “क्रिटिकल रेस थ्योरी” और “कल्चरल मार्क्सवाद” जैसी अवधारणाएँ विकसित हुईं। इन्हीं से आगे चलकर “DEIA” अर्थात Diversity, Equity, Inclusion और Accessibility का मॉडल सामने आया। पहले यह विश्वविद्यालयों में लागू हुआ और बाद में कॉर्पोरेट संस्थानों तक फैल गया।
भारत में भी इसका प्रभाव दिखाई देने लगा। वर्ष 2023 में National Council of Educational Research and Training द्वारा “National Guidelines and Implementation Framework on Equitable and Inclusive Education” शीर्षक से लगभग 57 पृष्ठों का दस्तावेज़ जारी किया गया। इसमें Diversity, Equity, Inclusion, Access और Rights जैसे शब्दों को शिक्षा व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया गया। विशेष रूप से विश्वविद्यालयों के मानविकी विभागों के माध्यम से इस वैचारिक मॉडल को भारत में स्थापित किया जा रहा है।

इसी वैचारिक वातावरण में समाज को स्थायी रूप से शोषक और शोषित वर्गों में विभाजित करके देखने का दृष्टिकोण विकसित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप अनारक्षित या सामान्य वर्ग को कई बार जन्म से विशेषाधिकार प्राप्त और शोषक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और उसके भीतर अपराधबोध उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है। विश्वविद्यालय परिसरों में “ब्राह्मण विदेशी हैं” या “ब्राह्मण भारत छोड़ो” जैसे नारे सुनाई देना इसी वैचारिक वातावरण का परिणाम है।

इसी के साथ “मूलनिवासी बनाम विदेशी” का विमर्श, “90 बनाम 10” जैसी राजनीतिक भाषा, निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँग और संपत्ति के पुनर्वितरण की चर्चा भी उसी दिशा की ओर संकेत करती है जिसमें समाज को स्थायी वर्ग संघर्ष की ओर ले जाया जाता है। 2024 के आम चुनावों के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपने चुनाव घोषणापत्र और सार्वजनिक सभाओं में “वेल्थ डिस्ट्रीब्यूशन” अर्थात संपत्ति के पुनर्वितरण की बात कही थी और उसके बाद भी इस प्रकार की बातें सामने आती रही हैं।

इस पूरी पृष्ठभूमि में यूजीसी के हाल के विनियमों को समझना आवश्यक है। यह विवाद केवल किसी एक प्रशासनिक निर्णय का विवाद नहीं है, बल्कि उस दीर्घकालिक वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें औपनिवेशिक काल में निर्मित सामाजिक व्याख्याओं, मिशनरी साहित्य और आधुनिक वामपंथी सिद्धांतों को नए रूप में भारत की शिक्षा व्यवस्था और संस्थागत ढाँचों के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। जब तक इस पूरी ऐतिहासिक और वैचारिक प्रक्रिया को समझकर समस्या की जड़ पर विचार नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे विवाद बार-बार सामने आते रहेंगे और समाज में वैचारिक विभाजन और गहरा होता जाएगा।


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