सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

समानता नहीं, समरसता : भारतीय चिंतन की दृष्टि




✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

समानता का विचार आधुनिक युग में सबसे अधिक आकर्षक नारे के रूप में सामने आया है, परंतु यह समझना आवश्यक है कि समानता का अर्थ क्या है। क्या समानता का अर्थ सबको एक जैसा बना देना है, या सबको अपने स्वभाव, गुण और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर देना है? भारतीय चिंतन इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्ट रूप से देता है। भारतीय दृष्टि में समानता का अर्थ सबको एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार सम्मान और अवसर देना है।

यदि हम सृष्टि को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रकृति का मूल नियम समानता नहीं, बल्कि विविधता है। कोई दो मनुष्य समान नहीं हैं, एक ही परिवार में जन्मे दो भाई भी स्वभाव में अलग होते हैं। प्रकृति में देखें — पर्वत और नदी समान नहीं हैं, सूर्य और चंद्र समान नहीं हैं, वटवृक्ष और तुलसी समान नहीं हैं। पशु जगत में शेर और गाय समान नहीं हैं, घोड़ा और हाथी समान नहीं हैं, कौआ और हंस समान नहीं हैं। यदि प्रकृति ने विविधता बनाई है, तो मनुष्य समाज को एक समान बनाने का आग्रह प्रकृति के विरुद्ध है।

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में समाज को विराट पुरुष के रूप में चित्रित किया गया — “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः, ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।” इसका अर्थ स्पष्ट है कि समाज में विभिन्न प्रवृत्तियों और कार्यों वाले लोग आवश्यक हैं। मुख विचार और ज्ञान का प्रतीक है, भुजा शक्ति और रक्षा का, जंघा उत्पादन और व्यापार का, और चरण सेवा और श्रम का प्रतीक हैं। जैसे शरीर में कोई अंग छोटा-बड़ा नहीं होता, वैसे ही समाज में भी सभी आवश्यक हैं।
भारतीय परंपरा में वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित रही, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। परिवार में जन्म लेने के साथ व्यक्ति को एक विशेष प्रकार का संस्कार और शिक्षा का वातावरण मिलता था। ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाला बालक वैदिक अध्ययन के वातावरण में बढ़ता था, क्षत्रिय परिवार में जन्म लेने वाला युद्ध और शासन की शिक्षा पाता था, वैश्य परिवार में व्यापार और उत्पादन की शिक्षा मिलती थी, और शूद्र परिवार में सेवा और कौशल आधारित कार्यों का अभ्यास होता था। यह सामाजिक व्यवस्था स्थिरता और परंपरा को बनाए रखने का माध्यम भी थी।

लेकिन साथ ही भारतीय परंपरा में यह भी स्वीकार किया गया कि तप, तपस्या, साधना और आचरण के माध्यम से वर्ण परिवर्तन संभव है। महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय थे, लेकिन कठोर तपस्या से ब्रह्मर्षि बने। वाल्मीकि प्रारंभ में सामान्य जीवन जीते थे, परंतु तपस्या के माध्यम से ऋषि बने और रामायण जैसे महाकाव्य के रचयिता बने। वेदव्यास मिश्रित वंश में जन्मे, लेकिन उन्होंने वेदों का विभाजन किया और महाभारत की रचना की।
छांदोग्य उपनिषद में सत्यकाम जाबाल का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब सत्यकाम ने गुरु गौतम से शिक्षा की इच्छा व्यक्त की, तो उनसे उनके कुल के बारे में पूछा गया। उन्होंने सत्य कहा कि उन्हें अपने पिता का ज्ञान नहीं है। उनकी सत्यनिष्ठा देखकर गुरु ने कहा कि सत्य बोलने वाला ही ब्राह्मण है और उन्हें शिक्षा का अधिकारी बनाया। यह स्पष्ट करता है कि गुण और आचरण के आधार पर परिवर्तन संभव था।

महाभारत में विदुर का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। दासीपुत्र होने के बावजूद उनकी नीति और बुद्धि के कारण उन्हें अत्यंत सम्मान मिला। भागवत पुराण में प्रह्लाद असुर कुल में जन्म लेकर भी महान भक्त बने। राजा जनक राजकुल में रहते हुए भी ज्ञानी और योगी कहलाए। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भारतीय समाज में गुण और कर्म को महत्व दिया गया।

गीता में भी श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः"। यहाँ जन्म की नहीं, बल्कि गुण और कर्म की बात कही गई है। सात्विक, राजस और तामस ये तीनों गुण प्रकृति के मूल तत्व हैं। गीता के चौदहवें अध्याय में इन तीनों गुणों का विस्तार से वर्णन है। कोई व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति वाला होता है ज्ञान और संयम की ओर प्रवृत्त। कोई राजस प्रवृत्ति वाला होता है कर्म, परिश्रम और नेतृत्व की ओर उन्मुख। कोई तामस प्रवृत्ति वाला होता है — सेवा, श्रम और स्थूल कार्यों में दक्ष। यह भेद ही समाज को संतुलित रखता है। यदि सब केवल चिंतन करें, तो कार्य कौन करेगा? यदि सब केवल शासन करें, तो उत्पादन कौन करेगा? यदि सब केवल श्रम करें, तो दिशा कौन देगा? विविधता ही समाज का संतुलन बनाती है

षड्दर्शन सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त सभी में प्रकृति की विविधता को स्वीकार किया गया है। सांख्य दर्शन प्रकृति को त्रिगुणात्मक बताता है सत्त्व, रज और तम। योग दर्शन कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति की वृत्ति और संस्कार अलग-अलग होते हैं, इसलिए साधना का मार्ग भी भिन्न होता है। वेदान्त विविधता में एकत्व की बात करता है ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" का अर्थ यह नहीं कि जगत असत्य है, बल्कि यह कि विविधता के पीछे एक ही चेतना कार्य कर रही है।

पुराणों में भी अनेक कथाएँ इस तथ्य को स्पष्ट करती हैं। भागवत पुराण में प्रह्लाद का उदाहरण है — असुर कुल में जन्म लेकर भी वे महान भक्त बने। राजा जनक राजकुल में रहते हुए भी ज्ञानी और योगी कहलाए। ध्रुव बालक होकर भी तपस्या से दिव्य स्थान प्राप्त करता है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जन्म अंतिम निर्धारक नहीं था, बल्कि गुण, कर्म और साधना का महत्व था।

भारतीय समाज में समय, काल और परिस्थिति के अनुसार नए व्यवसाय बने और उनसे नई जातियाँ बनीं। लोहार, कुम्हार, बुनकर, बढ़ई, स्वर्णकार — ये सभी व्यवसाय आधारित जातियाँ थीं। समाज में विविधता थी, लेकिन व्यापक वर्ग संघर्ष नहीं हुए। भारत में हजारों जातियाँ होने के बावजूद यूरोप की तरह रक्तरंजित संघर्ष नहीं हुए।
यूरोप का इतिहास वर्ग संघर्षों से भरा हुआ है। फ्रांसीसी क्रांति में लाखों लोग मारे गए। रूस में साम्यवादी क्रांति के दौरान व्यापक हिंसा हुई। चर्च और राज्य के संघर्ष, सामंत और किसान के संघर्ष, पूंजीपति और मजदूर के संघर्ष — इन सबने यूरोप को लंबे समय तक हिंसा में डुबोए रखा। जर्मनी में नाजीवाद और इटली में फासीवाद भी इसी असंतुलन के परिणाम थे।

भारत में ऐसी व्यापक हिंसक क्रांतियाँ नहीं हुईं। इसका कारण यह था कि भारतीय समाज का आधार केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक था। धर्म समाज को जोड़ने वाला तत्व था।
आधुनिक समय में समानता, समता और समाजवाद के नाम पर सबको एक समान बनाने का आग्रह किया गया। लेकिन यह विचार प्रकृति के विरुद्ध है। सभी को समान अवसर दिया जा सकता है, लेकिन सबको समान बनाना संभव नहीं है। कोई बुद्धि में श्रेष्ठ होता है, कोई श्रम में, कोई नेतृत्व में, कोई कला में।

आधुनिक समय में भी हम देखते हैं कि समानता का अर्थ सबको एक जैसा बना देना नहीं है। संविधान भी समान अवसर की बात करता है, समान परिणाम की नहीं। शिक्षा, रोजगार और अवसरों में समानता का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन सभी व्यक्तियों की क्षमता, रुचि और योग्यता अलग-अलग रहती है। कोई विज्ञान में दक्ष होता है, कोई कला में, कोई व्यापार में, कोई प्रशासन में। यही विविधता समाज को आगे बढ़ाती है।
प्रकृति स्वयं इस सत्य को स्पष्ट करती है। जंगल में शेर, हाथी, हिरण और पक्षी — सभी की भूमिका अलग है। नदी, पर्वत, वन और मरुस्थल — सभी प्रकृति का हिस्सा हैं। यदि सब कुछ एक समान हो जाए, तो सृष्टि का संतुलन समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार समाज में भी विविधता आवश्यक है।

एकत्व का बोध व्यक्ति के भीतर आत्मा और ब्रह्म के संबंध से उत्पन्न होता है। उपनिषद कहते हैं — "अहं ब्रह्मास्मि" और "तत्त्वमसि"। इसका अर्थ है कि सभी में एक ही चेतना है। यह आंतरिक समानता है, बाहरी समानता नहीं। बाहरी विविधता बनी रहती है, लेकिन भीतर एकत्व का अनुभव होता है।

जब समाज इस दृष्टि को समझता है, तब वह विविधता को स्वीकार करता है और एकत्व को अनुभव करता है। धर्म इसी संतुलन का नाम है। धर्म का अर्थ किसी विशेष पंथ या मत नहीं, बल्कि वह शाश्वत नियम है जो सृष्टि को संतुलित रखता है। महाभारत में कहा गया है "धारणात् धर्म इत्याहुः" — जो धारण करे, वही धर्म है। धर्म ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को जोड़ने वाला तत्व है।

वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में एक विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर समानता की बात की जाती है, दूसरी ओर जाति के आधार पर स्थायी वर्गीकरण भी किया गया है। जो व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, वही उसकी स्थायी पहचान बन जाती है। वर्ण व्यवस्था में तप और साधना के माध्यम से परिवर्तन संभव था, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में जाति परिवर्तन लगभग असंभव है।

पिछले लगभग 80 वर्षों में समानता के नाम पर किए गए प्रयासों से समाज में समरसता बढ़ने के बजाय कई स्थानों पर वैमनस्यता बढ़ी है। विभिन्न समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की भावना उत्पन्न हुई है। समानता का आग्रह यदि प्रकृति के विरुद्ध होगा, तो उसका परिणाम असंतुलन ही होगा।

भारतीय दृष्टि समता नहीं, समरसता की बात करती है। समरसता का अर्थ है — विविधता के भीतर सम्मान और सामंजस्य। प्रत्येक व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव का सम्मान करना। किसी को हेय दृष्टि से न देखना। सभी में परब्रह्म का अंश देखना।

उपनिषद कहते हैं — “ईशावास्यमिदं सर्वम्” — सबमें वही परम तत्व है। जब यह दृष्टि आती है, तब समाज में वास्तविक समरसता उत्पन्न होती है। किसान, सैनिक, शिक्षक, व्यापारी, श्रमिक — सभी समाज के आवश्यक अंग बन जाते हैं।

घोड़ा गाय नहीं बन सकता, सियार सिंह नहीं बन सकता। इसी प्रकार मनुष्य भी एक समान नहीं हो सकते। समानता का अर्थ सबको एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि सबको उनके स्वभाव के अनुसार सम्मान देना है।
जब समाज इस सत्य को स्वीकार करेगा, तब वास्तविक समरसता स्थापित होगी। विविधता बनी रहेगी, लेकिन वैमनस्यता समाप्त होगी। यही भारतीय चिंतन की मूल भावना है विविधता में एकता, भिन्नता में सम्मान और धर्म के आधार पर समरस समाज।

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