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प्रवासी मजदूर और भारत की आर्थिक चुनौतियां





✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत में प्रवासी मजदूरों की समस्या को केवल गरीबी या बेरोज़गारी के रूप में देखना वास्तविकता को अधूरा समझना है। यह समस्या भारत की आर्थिक नीतियों, शिक्षा व्यवस्था, उद्यमिता के दमन और केंद्रीकृत समाजवादी मॉडल के दीर्घकालिक प्रभाव का परिणाम है। आज जो लाखों लोग बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से निकलकर महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं, यह किसी प्राकृतिक स्थिति का परिणाम नहीं बल्कि नीति आधारित आर्थिक संरचना का परिणाम है।

भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से व्यवसायी और कौशल आधारित समाज रहा है। हर गांव उत्पादन की इकाई था और हर परिवार आर्थिक संस्था के रूप में कार्य करता था। बंगाल में जूट उद्योग, कपड़ा उद्योग, धातु उद्योग और बंदरगाह आधारित व्यापार सक्रिय था। उत्तर प्रदेश में कपड़ा, कांच, पीतल, लकड़ी और हस्तशिल्प उद्योग विकसित थे। बिहार में चीनी मिलें, कृषि आधारित उद्योग और खनिज आधारित गतिविधियाँ थीं।

18वीं शताब्दी में भारत विश्व अर्थव्यवस्था का लगभग 23 से 24 प्रतिशत हिस्सा रखता था, जबकि इंग्लैंड का हिस्सा 2 से 3 प्रतिशत के आसपास था। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की अर्थव्यवस्था स्थानीय उद्योग और उद्यमिता पर आधारित थी। अंग्रेजों ने इस संरचना को व्यवस्थित रूप से तोड़ा।

अंग्रेजों ने भारतीय उद्योगों पर भारी कर लगाए और ब्रिटेन से मशीन निर्मित वस्तुएँ भारत में सस्ते दाम पर भेजीं। उदाहरण के लिए, बंगाल का कपड़ा उद्योग, जो विश्व प्रसिद्ध था, ब्रिटिश नीतियों के कारण कमजोर हुआ। भारतीय कारीगरों को कच्चा माल महंगा और तैयार माल सस्ता मिलने लगा। परिणामस्वरूप स्थानीय उद्योग धीरे-धीरे समाप्त होते गए।

लेकिन इसके बावजूद स्वतंत्रता के समय भारत में स्थानीय उद्योग पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में अभी भी छोटे और मध्यम उद्योग मौजूद थे। स्वतंत्रता के बाद भारत के पास इन उद्योगों को मजबूत करने का अवसर था।

लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत ने समाजवादी आर्थिक मॉडल अपनाया, जो सोवियत संघ से प्रभावित था। राज्य ने उद्योगों पर नियंत्रण बढ़ाया और निजी उद्यमिता को सीमित किया। लाइसेंस-परमिट राज लागू किया गया। 1951 के औद्योगिक विकास और विनियमन अधिनियम के तहत उद्योग स्थापित करने के लिए सरकारी अनुमति आवश्यक हो गई। इससे छोटे उद्यमियों के लिए उद्योग शुरू करना कठिन हो गया।

1956 की औद्योगिक नीति में भारी उद्योगों को राज्य के नियंत्रण में रखा गया। बैंक, बीमा, कोयला, स्टील, तेल और कई उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया। 1969 में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। 1970 के दशक में बीमा और कोयला उद्योग का भी राष्ट्रीयकरण हुआ।

इन नीतियों का परिणाम यह हुआ कि समाज आधारित उद्यमिता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। समाज उत्पादनकर्ता से नौकरी तलाशने वाला समाज बन गया। एक पढ़ा-लिखा मजदूर वर्ग तैयार हुआ, लेकिन उद्यमी वर्ग कमजोर होता गया।

इसी दौरान कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव कई औद्योगिक राज्यों में बढ़ा। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में 1960 और 1970 के दशक में श्रमिक आंदोलनों, हड़तालों और औद्योगिक संघर्षों में वृद्धि हुई। कई उद्योगपतियों ने अपने उद्योग बंद किए या उन्हें गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में स्थानांतरित कर दिया। कोलकाता, जो कभी भारत का औद्योगिक केंद्र था, धीरे-धीरे औद्योगिक गतिविधियों से खाली होने लगा।
बिहार और उत्तर प्रदेश में भी औद्योगिक विकास कमजोर हुआ। निवेश कम हुआ, उद्योग बंद हुए और रोजगार के अवसर घटते गए। परिणामस्वरूप इन राज्यों से मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ।
भारत में प्रवासी मजदूर समस्या का एक बड़ा कारण शिक्षा व्यवस्था का राष्ट्रीयकरण भी है। स्वतंत्रता के बाद शिक्षा को सरकारी ढांचे में केंद्रीकृत किया गया। शिक्षा का उद्देश्य कौशल आधारित प्रशिक्षण के बजाय डिग्री आधारित रोजगार बन गया।

पहले परिवार आधारित कौशल व्यवस्था थी। लोहार का पुत्र लोहार बनता था, बढ़ई का पुत्र बढ़ई बनता था, किसान का पुत्र खेती सीखता था। यह व्यवस्था रोजगार सुनिश्चित करती थी।

लेकिन बाल श्रम कानूनों और शिक्षा के केंद्रीकरण ने इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया। बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम 1986 और उसके बाद के संशोधनों ने पारिवारिक व्यवसायों में बच्चों की भागीदारी को सीमित कर दिया। इसका उद्देश्य शोषण रोकना था, लेकिन इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि पारंपरिक कौशल हस्तांतरण कमजोर हो गया।

आज स्थिति यह है कि
लाखों डिग्रीधारी बेरोजगार हैं
कौशल आधारित श्रमिकों की कमी है
स्थानीय उद्योग कमजोर हैं

यह स्थिति प्रवासी मजदूर समस्या को और बढ़ाती है।
भारत में प्रवासन का पैटर्न स्पष्ट है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा से मजदूर महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और दक्षिण भारत के राज्यों में जाते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 45.6 करोड़ आंतरिक प्रवासी हैं। इनमें से करोड़ों लोग रोजगार के लिए प्रवास करते हैं।

2020 के लॉकडाउन के दौरान लाखों मजदूरों का पैदल अपने घर लौटना इस समस्या की गंभीरता का स्पष्ट उदाहरण था। यह पहली बार था जब देश ने प्रवासी मजदूरों की वास्तविक स्थिति देखी।

भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय तुलना में और स्पष्ट होती है। चीन ने 1978 में आर्थिक सुधार शुरू किए। लगभग 45 वर्षों में चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। 1985 के आसपास भारत और चीन की GDP लगभग समान स्तर पर थी। लेकिन आज चीन मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक में भारत से बहुत आगे है।
सिंगापुर 1965 में स्वतंत्र हुआ और संसाधनों के बिना भी विश्व के सबसे समृद्ध देशों में शामिल हो गया। जापान परमाणु हमलों के बाद पूरी तरह नष्ट हो गया था, लेकिन उसने उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था विकसित कर ली।
इसके विपरीत भारत ने आर्थिक सुधार 1991 में शुरू किए। इससे पहले समाजवादी नीतियों के कारण उद्योगों का विकास सीमित रहा। परिणामस्वरूप भारत सेवा आधारित अर्थव्यवस्था बन गया, जबकि रोजगार सृजन के लिए मैन्युफैक्चरिंग आवश्यक था।

आज चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जबकि भारत का हिस्सा बहुत कम है। यही कारण है कि चीन में स्थानीय रोजगार उपलब्ध हैं और भारत में प्रवासी मजदूर बढ़ रहे हैं।
भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यदि भारत केवल बाजार बनकर रह गया और उत्पादन केंद्र नहीं बना, तो यह स्थिति टिकाऊ नहीं होगी। यदि भारत मैन्युफैक्चरिंग में 20 से 25 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल नहीं करता, तो सेवा आधारित अर्थव्यवस्था लंबे समय तक स्थिर नहीं रह पाएगी।

प्रवासी मजदूर समस्या का समाधान केवल रोजगार योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए आर्थिक संरचना को बदलना होगा। भारत को पुनः उद्यमिता आधारित समाज बनाना होगा।
स्थानीय उद्योगों को बढ़ाना होगा, कौशल आधारित शिक्षा को मजबूत करना होगा और समाज आधारित आर्थिक मॉडल अपनाना होगा।

सनातन आर्थिक मॉडल यही सिखाता है कि समाज उत्पादन करे और राज्य मार्गदर्शन करे। विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था, कौशल आधारित समाज और उद्यमिता का सम्मान ही प्रवासी मजदूर समस्या का स्थायी समाधान है।
जब तक भारत पुनः उद्यमिता आधारित समाज नहीं बनेगा, तब तक प्रवासी मजदूर समस्या लगातार बढ़ती रहेगी। यही आज भारत के सामने सबसे बड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौती है।

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