सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

वैवाहिक बलात्कार बहस या परिवार व्यवस्था पर वैचारिक हमला?



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत में “वैवाहिक बलात्कार” को अपराध घोषित करने की माँग को केवल महिला अधिकारों की बहस के रूप में प्रस्तुत करना वास्तविकता को सीमित कर देना है। यह विषय एक बड़े वैचारिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पैटर्न का हिस्सा बन चुका है, जहाँ परिवार संस्था को लक्ष्य बनाकर समाज की संरचना बदलने का प्रयास दिखाई देता है। इस पूरे विमर्श को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि कैसे ग्लोबल मार्केट फोर्सेज, वामपंथी वैचारिक समूह, अंतरराष्ट्रीय फंडिंग नेटवर्क, मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म मिलकर एक “कॉकटेल मॉडल” के रूप में कार्य करते हैं।

सबसे पहले ग्लोबल मार्केट फोर्सेज की भूमिका समझनी होगी। वैश्विक पूंजी का मूल सिद्धांत है जितना अधिक व्यक्ति, उतना अधिक उपभोग। संयुक्त परिवार व्यवस्था इस मॉडल के विपरीत है। संयुक्त परिवार में एक घर, एक रसोई, साझा वाहन, साझा संसाधन होते हैं। लेकिन जब परिवार टूटते हैं, तो हर व्यक्ति अलग घर, अलग संसाधन, अलग जीवन शैली अपनाता है।

McKinsey Global Institute की रिपोर्ट “The Rise of Single Person Households” में यह स्पष्ट किया गया है कि अकेले रहने वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ने से उपभोक्ता खर्च तेजी से बढ़ता है। Deloitte की उपभोक्ता रिपोर्ट में भी छोटे परिवारों को भविष्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख चालक बताया गया।
इसका अर्थ स्पष्ट है परिवार जितना टूटेगा, बाजार उतना बढ़ेगा।

दूसरी ओर वामपंथी विचारधारा लंबे समय से परिवार व्यवस्था को सामाजिक नियंत्रण की इकाई मानती रही है। कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने परिवार को पूँजीवादी संरचना की इकाई बताया। एंटोनियो ग्राम्शी ने संस्थानों के माध्यम से समाज को बदलने की रणनीति दी। फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों हर्बर्ट मार्क्यूज़, थियोडोर एडोर्नो ने सांस्कृतिक संस्थाओं को बदलने की बात की।

इसी से “कल्चरल मार्क्सवाद” की अवधारणा विकसित हुई

धर्म को कमजोर करो
परिवार को कमजोर करो
संस्कृति बदलो
यहीं ग्लोबल मार्केट और वामपंथी विचारधारा का गठजोड़ बनता है।

एक आर्थिक कारणों से परिवार तोड़ना चाहता है
दूसरा वैचारिक कारणों से अब यह गठजोड़ कैसे काम करता है?

पहला चरण — अंतरराष्ट्रीय फंडिंग
दूसरा चरण — एनजीओ नेटवर्क
तीसरा चरण — अकादमिक विमर्श
चौथा चरण — मीडिया नैरेटिव
पाँचवाँ चरण — मनोरंजन उद्योग
छठा चरण — न्यायिक सक्रियता

उदाहरण के रूप में अंतरराष्ट्रीय फंडिंग नेटवर्क देखें
Ford Foundation

Open Society Foundations (George Soros)

Bill & Melinda Gates Foundation

UN Women

Oxfam

इन संस्थाओं द्वारा दुनिया भर में “Gender Justice”, “Reproductive Rights”, “Family Reform” जैसे कार्यक्रमों के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।
भारत में भी कई एनजीओ इन संस्थाओं से फंड प्राप्त करते हैं।

उदाहरण

RIT Foundation
All India Democratic Women’s Association
Jagori
Breakthrough India
ये संगठन “मैरिटल रेप” को अपराध घोषित करने की माँग को आगे बढ़ा रहे हैं।
यहाँ पैटर्न स्पष्ट होता है—
अंतरराष्ट्रीय फंडिंग
एनजीओ अभियान
मीडिया विमर्श
शैक्षणिक बहस
वेब सीरीज / फिल्म
न्यायालय

अब देखें सनातन हिंदू विवाह की अवधारणा क्या है।

भारत में विवाह एक संस्कार है, अनुबंध नहीं। सनातन हिंदू परंपरा में विवाह जन्मों का बंधन है, परिवार निर्माण का आधार है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की संयुक्त यात्रा का माध्यम है। यहाँ “काम” को पाप नहीं बल्कि जीवन के चार पुरुषार्थों में स्थान दिया गया है। प्रकृति-पुरुष की अवधारणा स्त्री और पुरुष को परस्पर पूरक मानती है। विवाह केवल शारीरिक संबंध नहीं, बल्कि परिवार, संतति, सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार है। यही कारण है कि हिंदू समाज में संयुक्त परिवार व्यवस्था हजारों वर्षों तक बनी रही और समाज की सबसे मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनी।

ऋग्वेद में कहा गया—
“सम्राज्ञी श्वशुरे भव”
अथर्ववेद—
“सखा सप्तपदा भव”
मनुस्मृति
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”
सनातन परंपरा में “काम” को पुरुषार्थ माना गया—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।

यह वह सांस्कृतिक दृष्टि है जिसमें स्त्री और पुरुष परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं। परिवार केवल निजी व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक स्थिरता का आधार है।

 

इसके विपरीत, ईसाई मज़हबी परंपरा में लंबे समय तक स्त्री को द्वितीयक स्थान दिया गया। बाइबिल में स्त्री को पुरुष की पसली से उत्पन्न बताया गया और स्त्री को पुरुष के अधीन रहने का निर्देश दिया गया। “स्त्री पुरुष के लिए बनाई गई है” जैसे विचार लंबे समय तक सामाजिक व्यवस्था का आधार बने रहे। ईसाई मज़हबी परंपरा में लंबे समय तक यौन संबंधों को पाप माना गया। मध्यकालीन यूरोप में शरीर और भोग को पाप से जोड़ा गया। सेंट ऑगस्टीन जैसे मज़हबी विचारकों ने यौन संबंधों को केवल संतति-उत्पत्ति तक सीमित माना। ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ बताया गया। परिणामस्वरूप, स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर यूरोप में अस्वाभाविक सामाजिक संरचना विकसित हुई।

इतिहास साक्षी है कि यूरोप में स्त्रियों पर अमानवीय अत्याचार हुए। 15वीं से 17वीं शताब्दी के बीच “विच हंट” के नाम पर हजारों महिलाओं को जिंदा जला दिया गया। इतिहासकार ब्रायन लेवैक के अनुसार यूरोप में लगभग 40,000 से 60,000 महिलाओं को जादूगरनी बताकर मार दिया गया।

इंग्लैंड में “Coverture Laws” के तहत विवाह के बाद स्त्री की कानूनी पहचान समाप्त हो जाती थी। विवाह के बाद स्त्री संपत्ति की मालिक नहीं रह सकती थी। महिलाओं को मतदान अधिकार भी बहुत देर से मिले—ब्रिटेन में 1928 में, फ्रांस में 1944 में, स्विट्ज़रलैंड में 1971 में।

यानी जिन समाजों में स्त्रियों को मूल अधिकार भी देर से मिले, वही समाज अब नारीवाद के नाम पर दुनिया को दिशा देने का दावा कर रहे हैं।

यूरोप और अमेरिका में विवाह संस्था धीरे-धीरे कमजोर हुई। 1960 के दशक के बाद तलाक दर में तेज वृद्धि हुई। विवाह के बाहर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। फ्रांस, स्वीडन और अन्य यूरोपीय देशों में आज 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे विवाह के बाहर जन्म लेते हैं। अमेरिका में भी एकल अभिभावक परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ी।

इसी कालखंड में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने का अभियान शुरू हुआ। 1970 के दशक में नारीवादी आंदोलनों के दबाव में अमेरिका में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किया गया और 1993 तक सभी राज्यों में इसे लागू कर दिया गया। इसके बाद विवाह संस्था और अधिक संविदात्मक बनती गई। पति-पत्नी संबंध विश्वास आधारित संस्था से कानूनी जोखिम वाले संबंध में बदलने लगे ।

इन परिवर्तनों के साथ वैश्विक बाजार संरचना भी बदली। संयुक्त परिवार व्यवस्था में उपभोग सीमित होता है, जबकि एकल परिवारों में उपभोक्तावाद बढ़ता है। McKinsey और अन्य वैश्विक रिपोर्टों में छोटे परिवारों की संख्या बढ़ने को उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के विस्तार से जोड़ा गया। जब व्यक्ति परिवार से अलग होता है, तो वह अधिक उपभोक्ता बनता है—अलग घर, अलग वाहन, अलग उपभोग।

यूरोप और अमेरिका में परिवार व्यवस्था टूट गई 

फ्रांस — 60% बच्चे विवाह के बाहर जन्म
स्वीडन — 55%

अमेरिका — Single Parent Families बढ़े
इसी समय वैवाहिक बलात्कार कानून लागू हुआ।
अब भारत में यही मॉडल लागू करने का प्रयास हो रहा है।

आज भारत में वैवाहिक बलात्कार का विमर्श इसी एजेंडे का हिस्सा बनता दिखाई देता है। इस प्रक्रिया में वामपंथी विचारधारा से जुड़े समूह सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इन समूहों को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से वित्तीय सहायता मिलती है। कई एनजीओ वैश्विक फंडिंग से संचालित होते हैं और वही एजेंडा भारत में लागू करने का प्रयास करते हैं।

यह एक कॉकटेल मॉडल की तरह कार्य करता है—ग्लोबल मार्केट फोर्सेज, वामपंथी विचारधारा, एनजीओ नेटवर्क, मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म—सभी मिलकर एक नया सामाजिक नैरेटिव तैयार करते हैं।

इसी क्रम में अभी JioHotstar पर प्रदर्शित वेब सीरीज “चिरैया” सामने आती है। इस श्रृंखला में कमलेश (दिव्या दत्ता) को आदर्श बहू के रूप में दिखाया गया है, जो अपने देवर अरुण को पुत्रवत पालती है। लेकिन अरुण की शादी पूजा से होने के बाद कहानी बदलती है। पूजा आरोप लगाती है कि अरुण उसकी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाता है। पूजा आवाज उठाती है और परिवार में संघर्ष शुरू होता है।

श्रृंखला का केंद्रीय संदेश यह स्थापित करता है कि पारंपरिक परिवार व्यवस्था के भीतर भी उत्पीड़न छिपा होता है और विवाह संस्था संदिग्ध है। इस प्रकार की कथा केवल मनोरंजन नहीं बल्कि वैचारिक प्रोपेगंडा का हिस्सा बनती है।

आज वैवाहिक बलात्कार को कानूनी मान्यता देने की माँग न्यायालयों से लेकर वेब सीरीज तक हर स्तर पर आगे बढ़ाई जा रही है। यह केवल महिला अधिकारों का प्रश्न नहीं बल्कि हिंदू परिवार व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास है।

जब परिवार व्यवस्था कमजोर होती है, तो व्यक्ति अकेला होता है। जब व्यक्ति अकेला होता है, तो वह उपभोक्ता बनता है। यही ग्लोबल मार्केट मॉडल है।

यदि भारत में वैवाहिक बलात्कार कानून लागू होता है

परिवार मुकदमों में बदलेंगे
तलाक दर बढ़ेगी
संयुक्त परिवार टूटेंगे
व्यक्ति अकेला होगा
उपभोक्तावाद बढ़ेगा
यही ग्लोबल मार्केट मॉडल है।

इसलिए वैवाहिक बलात्कार का विमर्श केवल कानूनी बहस नहीं
यह ग्लोबल मार्केट फोर्सेज और वामपंथी विचारधारा के कॉकटेल का हिस्सा है
जिसका लक्ष्य है हिंदू परिवार व्यवस्था को कमजोर कर भारतीय समाज को उपभोक्ता आधारित समाज में बदलना।

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