सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिन्दू समाज की एकता पर बढ़ता वैचारिक संकट


✍️दीपक कुमार द्विवेदी

आज हिन्दू समाज के सामने जो स्थिति निर्मित हो रही है, वह केवल सामान्य सामाजिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि गहरे स्तर का वैचारिक और सांस्कृतिक संकट है। यह संकट अचानक उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय से सुनियोजित रूप से तैयार किया गया है। विशेष रूप से “अम्बेडकरवाद” के नाम पर जो नवबौद्ध आन्दोलन खड़ा किया जा रहा है, वह अब केवल सामाजिक न्याय या आत्मसम्मान का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि अनेक स्थानों पर यह ब्राह्मण-विरोध, वैदिक परम्परा-विरोध और सनातन धर्म के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का रूप लेता दिखाई दे रहा है। यह स्थिति समाज में एक प्रकार का असंतोष, अविश्वास और वैचारिक अशांति उत्पन्न कर रही है, जिसे आज स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम लेकर जिस प्रकार की वैचारिक धारा विकसित की जा रही है, वह स्वयं डॉ. अम्बेडकर की मूल भावना से भी भिन्न दिखाई देती है। डॉ. अम्बेडकर ने सामाजिक सुधार और सम्मान की बात की थी, किन्तु आज नवबौद्ध आन्दोलन के अनेक मंचों पर हिन्दू धर्म, वैदिक परम्परा और विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के प्रति घृणा आधारित विमर्श को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस आन्दोलन में एक और चिंताजनक पक्ष यह है कि इसमें वामपंथी विचारधारा, इसाई मिशनरी नेटवर्क और इस्लामी कट्टरपंथी समूहों के साथ वैचारिक समानता और सहयोग दिखाई देता है। यह एक प्रकार का वैचारिक कॉकटेल बन चुका है, जिसका साझा लक्ष्य सनातन वैदिक परम्परा को कमजोर करना प्रतीत होता है।

इतिहास में भी इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ देखी गई हैं। दक्षिण भारत में पेरियार ई.वी. रामास्वामी के नेतृत्व में चले द्रविड़ आन्दोलन ने ब्राह्मण समाज और वैदिक परम्परा के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया। रामायण का विरोध किया गया, भगवान राम को अपमानित करने के कार्यक्रम हुए, मूर्तियों के विरुद्ध आन्दोलन चलाए गए और ब्राह्मणों को सामाजिक शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया गया। “आर्य बनाम द्रविड़” का सिद्धान्त खड़ा कर समाज को विभाजित करने का प्रयास किया गया। कई स्थानों पर ब्राह्मणों के सामाजिक बहिष्कार की घटनाएँ भी सामने आईं। यह आन्दोलन धीरे-धीरे सामाजिक तनाव का कारण बना। आज उसी प्रकार की प्रवृत्ति नवबौद्ध आन्दोलन के माध्यम से उत्तर और मध्य भारत में भी दिखाई देने लगी है।

सबसे बड़ा संकट यह है कि हिन्दू समाज स्वयं अपनी पहचान से दूर हो गया है। आज बच्चों से पूछिए कि हिन्दू क्यों हैं, तो स्पष्ट उत्तर नहीं मिलेगा। बड़े-बुजुर्ग भी इसका उत्तर देने में कठिनाई अनुभव करते हैं। इसका कारण यह है कि हम अपनी मूल वैदिक व्यवस्था से पूरी तरह कट चुके हैं। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है “वेदोऽखिलो धर्ममूलम्” अर्थात वेद ही धर्म का मूल हैं। महाभारत में भी श्रुति अर्थात वेद को धर्म का प्रमाण माना गया है। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, स्वामी दयानंद सरस्वती सभी आचार्यों ने वेदों को ही सनातन धर्म का आधार स्वीकार किया। इस दृष्टि से हिन्दू वही है जो वेदों को प्रमाण माने, आत्मा और ब्रह्म को स्वीकार करे, कर्म और पुनर्जन्म को माने, निराकार और साकार दोनों रूपों में ईश्वर की उपासना को स्वीकार करे और मूर्ति पूजा को साधना का माध्यम माने। यही सनातन वैदिक परम्परा की पहचान है।

भारतीय समाज हजारों वर्षों तक इसी व्यवस्था पर चलता रहा। अंग्रेजों के आने से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था समाज आधारित थी। प्रत्येक गांव में गुरुकुल होते थे। ब्राह्मण वेदों का अध्ययन-अध्यापन करते थे और समाज उनके भरण-पोषण का दायित्व उठाता था। ब्राह्मण निःशुल्क शिक्षा देते थे। समाज उन्हें अन्न, वस्त्र और सम्मान देता था।

धर्मपाल जी की प्रसिद्ध पुस्तक The Beautiful Tree में ब्रिटिश अधिकारी विलियम एडम की रिपोर्ट का उल्लेख है, जिसमें बताया गया है कि भारत के अधिकांश गांवों में स्थानीय शिक्षा व्यवस्था थी।
अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से समाप्त किया। 1835 में मैकाले की शिक्षा नीति लागू की गई। मैकाले ने स्पष्ट लिखा कि हमें ऐसा वर्ग तैयार करना है जो भारतीय हो लेकिन सोच से अंग्रेज हो। इसके बाद गुरुकुल व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त होती गई। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान से हटकर नौकरी बन गया। कौशल आधारित शिक्षा समाप्त होने लगी। परम्परागत व्यवसाय समाप्त होने लगे।

स्वतंत्रता के बाद भी स्थिति नहीं सुधरी। नेहरू काल में शिक्षा और अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सरकार स्कूल चलाएगी, सरकार पाठ्यक्रम तय करेगी, सरकार शिक्षक नियुक्त करेगी—इस व्यवस्था ने समाज आधारित शिक्षा को समाप्त कर दिया। आचार्य पीठों और ब्राह्मण समाज की भूमिका समाप्त हो गई। शिक्षा का उद्देश्य नौकरी बन गया। सरकारी नौकरी योग्यता का पैमाना बन गई।

आज स्थिति यह है कि ब्राह्मण होना ही अपराध जैसा बना दिया गया है। फिल्मों, मीडिया और राजनीतिक विमर्श में ब्राह्मण को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ब्राह्मण शब्द को अपमानजनक बना दिया गया है। यदि कोई ब्राह्मण वेद पाठ करना चाहता है तो उसके लिए आर्थिक आधार नहीं है। विवाह समारोहों में लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन ब्राह्मण को उचित दक्षिणा देने में संकोच किया जाता है। नाचने वालों पर हजारों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन ब्राह्मण को 500 रुपये देने में भी अपमान किया जाता है।

आज एक पुजारी नवरात्रि में रात-रात जागकर पाठ करता है, फिर भी परिवार चलाना कठिन हो जाता है। उसकी बेटी की 47 हजार रुपये फीस भरना भी चुनौती बन जाता है। ऐसी स्थिति में ब्राह्मण भागवत कथा करने को विवश होता है। यदि वह केवल वेद पाठ करे तो परिवार चलाना मुश्किल हो जाएगा।

इसके विपरीत अन्य समुदायों में धार्मिक शिक्षा मजबूत है। बच्चे कम उम्र से धार्मिक शिक्षा प्राप्त करते हैं। मौलाना घर-घर जाकर कुरान पढ़ाते हैं। धार्मिक शिक्षा सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है। हिन्दू समाज में यह व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है।
आज माता-पिता बच्चों को परम्परागत व्यवसाय सिखाना चाहते हैं तो उन्हें पिछड़ा कहा जाता है। महंगी शिक्षा व्यवस्था ने परिवारों को आर्थिक संकट में डाल दिया है। स्किल डेवलपमेंट की शिक्षा भी व्यावहारिक नहीं है। बच्चे न पूरी शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं और न कौशल सीख पा रहे हैं।

आज जो व्यावहारिक समस्याएँ खड़ी हुई हैं, उनका समाधान सरल नहीं है क्योंकि वर्तमान व्यवस्था वैदिक परम्परा के विरुद्ध विकसित हुई है। इसे सुधारने के लिए व्यापक बौद्धिक पुरुषार्थ और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है। हिन्दू समाज को अपनी पहचान पुनः स्थापित करनी होगी, वैदिक शिक्षा को पुनर्जीवित करना होगा, आचार्य पीठों को सक्रिय करना होगा और समाज को अपने दायित्व को समझना होगा। अन्यथा वैचारिक विघटन और गहरा होगा। यह केवल धर्म का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और भविष्य का प्रश्न है।

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