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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
समाज में जब लव जिहाद, परिवार के विखंडन, अंतर्जातीय विवाह तथा जातिगत वैमनस्य जैसी समस्याओं पर चर्चा होती है, तब प्रायः लोग त्वरित रूप से किसी न किसी पर दोषारोपण करने लगते हैं। कभी इसके लिए युवाओं को उत्तरदायी ठहराया जाता है, कभी माता-पिता को, कभी परिवार के मुखिया को, तो कभी शासन, प्रशासन अथवा साधु-संतों को दोष दिया जाता है। किंतु दुर्भाग्यवश इन चर्चाओं में समस्या के मूल कारणों पर गंभीरतापूर्वक विचार कम ही किया जाता है।
किसी भी समाज की स्थिरता केवल भावनाओं या आदर्शों पर ही निर्भर नहीं होती, अपितु उसके पीछे अनुशासन, मर्यादा और दंड-विधान की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारतीय समाज में प्राचीनकाल से वर्णाश्रम व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। इस व्यवस्था को केवल जातीय विभाजन के रूप में देखना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देना होगा। वस्तुतः इसके साथ एक सुदृढ़ सामाजिक और पारिवारिक ढाँचा भी जुड़ा हुआ था।
प्रत्येक जाति अथवा समुदाय की अपनी एक कुटुंब-प्रणाली होती थी, जिसमें परिवार और समाज की मर्यादाओं को बनाए रखने के लिए एक प्रकार का सामुदायिक अनुशासन विद्यमान रहता था। कुटुंब अथवा समाज का एक मुखिया होता था, जो सामाजिक व्यवस्था और आचार-विचार की मर्यादाओं का ध्यान रखता था। यदि कोई व्यक्ति इन मर्यादाओं का उल्लंघन करता, तो उसके लिए दंड का विधान भी था। अनेक अवसरों पर ऐसे व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार भी किया जाता था।
इसके कारण अंतर्जातीय विवाह नहीं होते थे, तो अंतरधार्मिक विवाह तो दूर की कौड़ी हुआ करते थे। आज क्या हो गया है कि मुस्लिम हमारी लड़कियों को शिकार बना रहे हैं, हमारी लड़कियाँ लव जिहाद की शिकार हो रही हैं। वहीं दूसरी ओर जातिगत विभेद समाप्त करने के नाम पर तथाकथित शोषित-वंचित समाज के द्वारा ब्राह्मण लड़कियाँ माँगी जाती हैं।
इस तरह की समस्या पिछले 100 वर्षों में कैसे उत्पन्न हो गई? क्योंकि हजार वर्षों के कालखंड में कुल मिलाकर लगभग 10 से 15 प्रतिशत लोग ही मुस्लिम बने थे। लेकिन पिछले 100 वर्षों में मुस्लिम और क्रिश्चियन आबादी तेजी से बढ़ी है, और हिंदू-मुस्लिम-क्रिश्चियन संख्या का अनुपात बदलकर लगभग 30 प्रतिशत के आसपास पहुँच गया है।
एक उदाहरण के लिए नागालैंड को देख सकते हैं। सन् 1941 की जनगणना में वहाँ 41 प्रतिशत क्रिश्चियन थे, जबकि आज यह संख्या लगभग 98 प्रतिशत हो गई है। यही स्थिति अन्य राज्यों में भी अलग-अलग रूप में दिखाई देती है। मुस्लिम आबादी भी लगातार बढ़ रही है। विभाजन के बाद भारत में लगभग 9 प्रतिशत मुस्लिम थे, जबकि आज यह संख्या 18 प्रतिशत से ऊपर बताई जाती है।
यह सब कैसे हो रहा है?
इन तथ्यों के आलोक में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि समाज की संरचना और जनसंख्या के स्वरूप में इतने तीव्र परिवर्तन किन कारणों से हो रहे हैं। इस विषय पर भावनाओं के स्थान पर गंभीर, संतुलित और तथ्याधारित विमर्श की आवश्यकता है, ताकि समाज की वास्तविक समस्याओं को समझा जा सके और उनके समाधान की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा सकें।
यह प्रश्न भी गंभीर विचार का विषय है कि भारतीय समाज की वह कौन-सी विशेषताएँ थीं, जिनके कारण इस देश ने शताब्दियों तक बाहरी आक्रमणों का सामना किया और फिर भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखा। लगभग आठ सौ वर्षों तक विभिन्न इस्लामी सल्तनतों और साम्राज्यों का शासन रहा, उसके पश्चात औपनिवेशिक काल में ईसाई मिशनरी गतिविधियाँ भी बढ़ीं। इन सबके बावजूद भारत की मूल सांस्कृतिक संरचना पूर्णतः समाप्त नहीं हुई। भाषा, परंपरा, परिवार व्यवस्था और धार्मिक आचरण की अनेक धारणाएँ समाज में बनी रहीं। इतिहासकारों का एक मत यह भी है कि भारतीय समाज की विकेन्द्रित सामाजिक संरचना—ग्राम व्यवस्था, जाति-आधारित पेशागत संगठन और स्थानीय पंचायतें—इस स्थायित्व का एक महत्वपूर्ण कारण थीं।
परंतु पिछले लगभग सौ वर्षों में सामाजिक संरचना में कई परिवर्तन आए हैं। आधुनिक राज्य व्यवस्था के साथ न्याय और प्रशासन की शक्तियाँ धीरे-धीरे केंद्रीकृत होती चली गईं। परंपरागत सामाजिक संस्थाएँ, जैसे जाति या समुदाय आधारित पंचायतें, जो पहले सामाजिक अनुशासन और विवाद-निपटान का कार्य करती थीं, उनका प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया।
ऐतिहासिक अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि भारत के अधिकांश गाँवों में पंचायत व्यवस्था बहुत पुरानी थी। गाँव के सम्मानित व्यक्तियों या पंचों का एक समूह स्थानीय विवादों का समाधान करता था। विभिन्न क्षेत्रों में इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता था—कहीं “पंच”, कहीं “सभा”, कहीं “खाप”, तो कहीं अन्य स्थानीय नाम प्रचलित थे। इन पंचायतों का अधिकार औपचारिक न्यायालयों जैसा नहीं था, किंतु सामाजिक प्रभाव इतना प्रबल था कि उनके निर्णयों को सामान्यतः समुदाय स्वीकार कर लेता था।
इन पंचायतों के पास सामाजिक दंड की व्यवस्था भी होती थी। यदि कोई व्यक्ति समुदाय की स्वीकृत मर्यादाओं का उल्लंघन करता, तो उसे चेतावनी, दंड या कभी-कभी सामाजिक बहिष्कार तक का सामना करना पड़ सकता था। इस प्रकार का सामाजिक नियंत्रण एक प्रकार का अनौपचारिक अनुशासन बनाए रखता था।
भारतीय साहित्य और परंपरा में भी अनुशासन और दंडनीति की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है।
रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई—
“विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥”
अर्थात् केवल विनम्र निवेदन से ही व्यवस्था नहीं चलती; कभी-कभी अनुशासन के लिए कठोरता भी आवश्यक हो जाती है।
पुराने समय में अधिकांश छोटे विवाद—जैसे भूमि की सीमाएँ, पारिवारिक मतभेद या आपसी झगड़े—गाँव या समुदाय स्तर पर ही सुलझा लिए जाते थे। गंभीर अपराध, जैसे हत्या, डकैती या अन्य जघन्य अपराध, ही शासक अथवा राज्य के न्यायालय तक पहुँचते थे। इससे न्यायिक प्रक्रिया अपेक्षाकृत सीमित और त्वरित रहती थी।
आधुनिक भारत में संविधान और विधि-व्यवस्था के तहत न्याय का अधिकार राज्य के अधीन है। परिणामस्वरूप अधिकांश विवाद औपचारिक न्यायालयों या पुलिस तंत्र के माध्यम से ही सुलझाए जाते हैं। कई बार छोटे-छोटे विवाद भी न्यायालयों तक पहुँच जाते हैं, जिससे मुकदमों की संख्या बढ़ती है और न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो जाती है।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्य ने सामाजिक न्याय की दृष्टि से विभिन्न कानून और नीतियाँ भी लागू कीं। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए विशेष कानून बनाए गए, जिनमें Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 एक महत्वपूर्ण अधिनियम है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना था।
इन परिवर्तनों के कारण समाज की पारंपरिक संरचना और आधुनिक राज्य व्यवस्था के बीच एक नया संतुलन बनने की प्रक्रिया चल रही है। कहीं-कहीं इस परिवर्तन के कारण सामाजिक तनाव भी दिखाई देते हैं, क्योंकि पुरानी परंपराएँ और नई कानूनी व्यवस्थाएँ एक साथ कार्य कर रही हैं।
अतः आवश्यक है कि इन विषयों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के स्थान पर ऐतिहासिक और सामाजिक तथ्यों के आधार पर विचार किया जाए। समाज की स्थिरता और समरसता तभी संभव है जब न्याय, अनुशासन और पारस्परिक सम्मान के सिद्धांतों को संतुलित रूप में समझा और लागू किया जाए।
यदि किसी समाज के पास अपने भीतर न्याय करने की सामुदायिक शक्ति ही न रहे, तो वह समाज धीरे-धीरे असहाय और दिशाहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में सामाजिक अनुशासन कमजोर पड़ने लगता है, परिवारों में विघटन बढ़ता है और विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य भी जन्म लेने लगता है। आज जो अनेक सामाजिक समस्याएँ दिखाई देती हैं—जैसे परिवारों का टूटना, जातिगत तनाव या आपसी अविश्वास—उनकी पृष्ठभूमि में सामाजिक नियंत्रण की कमजोर होती परंपराएँ भी एक कारण के रूप में देखी जा सकती हैं।
कुछ दशक पहले तक भारतीय समाज में संयुक्त परिवार की परंपरा अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित थी। परिवार में प्रायः एक बुजुर्ग या मुखिया होता था, जिसकी बात को परिवार के सदस्य सम्मानपूर्वक स्वीकार करते थे। यह केवल अधिकार का प्रश्न नहीं था, बल्कि अनुभव और उत्तरदायित्व पर आधारित व्यवस्था थी। अनेक घरों में बड़े भाई या पिता के निर्णय को अंतिम माना जाता था, और परिवार के अन्य सदस्य उसी के अनुसार अपने आचरण को संयमित रखते थे। यही पारिवारिक अनुशासन लंबे समय तक परिवार की एकता का आधार बना रहा।
समय के साथ सामाजिक जीवन में कई परिवर्तन आए। शहरीकरण, रोजगार के नए अवसर, शिक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती भावना ने परिवार की संरचना को भी बदल दिया। संयुक्त परिवारों का स्थान धीरे-धीरे एकल परिवारों ने लेना प्रारंभ किया। इसके साथ ही पारिवारिक निर्णयों की सामूहिक परंपरा भी कमजोर होने लगी। परिणामस्वरूप कई बार प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने वाला मानने लगा, जिससे पारिवारिक समन्वय की परंपराएँ भी प्रभावित हुईं।
सामाजिक संगठनों की भूमिका को समझने के लिए अन्य समुदायों की संरचनाओं का भी उदाहरण दिया जाता है। विभिन्न धार्मिक समुदायों में विवाह, तलाक या सामाजिक अनुशासन से जुड़े कुछ धार्मिक या सामुदायिक संस्थान होते हैं, जिनका समुदाय के भीतर प्रभाव माना जाता है। इन संस्थाओं का उद्देश्य अपने अनुयायियों को धार्मिक और सामाजिक मर्यादाओं के भीतर रखने का प्रयास करना होता है।
भारतीय समाज में भी कभी ग्राम पंचायत और जातिगत पंचायतों जैसी संस्थाएँ सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। महात्मा गांधी ने भी ग्राम-आधारित स्वशासन की कल्पना को महत्व दिया था। वे “ग्राम स्वराज” की अवधारणा के माध्यम से ऐसे समाज की कल्पना करते थे जिसमें गाँव आत्मनिर्भर हों और स्थानीय स्तर पर सामाजिक समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकें। इसी सोच से आगे चलकर पंचायती राज व्यवस्था को भी प्रोत्साहित किया गया।
फिर भी यह प्रश्न कई लोगों के मन में उठता है कि क्या आज की सामाजिक चुनौतियों—जैसे परिवारों का विखंडन, सामाजिक अविश्वास या सांस्कृतिक तनाव—का समाधान केवल सरकारी व्यवस्था से संभव है, या इसके लिए समाज को भी अपने स्तर पर प्रयास करने होंगे। अनेक सामाजिक चिंतक मानते हैं कि यदि समाज के भीतर संवाद, नैतिक अनुशासन और पारिवारिक संस्कारों की परंपरा सुदृढ़ होगी, तो अनेक समस्याएँ स्वयं कम हो सकती हैं।
इसके लिए कुछ लोग यह सुझाव भी देते हैं कि परिवारों को पुनः संवाद की परंपरा विकसित करनी चाहिए—जैसे सप्ताह में एक दिन परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर चर्चा करें, धार्मिक या सांस्कृतिक पाठों का सामूहिक पाठ करें, अथवा सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से आपसी संबंधों को मजबूत बनाएँ। ऐसे प्रयास सामाजिक निकटता और विश्वास को बढ़ा सकते हैं।
भारतीय समाज की संरचना पर विदेशी पर्यवेक्षकों ने भी समय-समय पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत आए फ्रांसीसी मिशनरी Abbé Jean‑Antoine Dubois ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Description of the Character, Manners and Customs of the People of India में भारतीय समाज की जाति-आधारित संरचना का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने लिखा कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था का यह ढाँचा अत्यंत संगठित है और इसी कारण समाज लंबे समय तक स्थिर बना रहा। उन्होंने इसे फ्रांसीसी शब्द chef-d’œuvre—अर्थात् “श्रेष्ठ कृति”—कहकर संबोधित किया।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि यह टिप्पणी किसी भारतीय परंपरावादी चिंतक की नहीं, बल्कि एक यूरोपीय मिशनरी की थी, जो बाहरी दृष्टि से भारतीय समाज का अध्ययन कर रहा था। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रारंभिक यूरोपीय पर्यवेक्षकों ने भी भारतीय सामाजिक संरचना को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि उसके संगठनात्मक पक्ष को भी समझने का प्रयास किया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज अपने इतिहास और परंपराओं का संतुलित अध्ययन करे। न तो अतीत को पूरी तरह आदर्श मान लेना उचित है और न ही उसे पूर्णतः अस्वीकार कर देना। विवेकपूर्ण दृष्टि यही है कि जो तत्व समाज में अनुशासन, समरसता और पारस्परिक सम्मान को बढ़ाते हैं, उन्हें आधुनिक संदर्भों में पुनः समझा और सुदृढ़ किया जाए। तभी समाज अपने सामने उपस्थित चुनौतियों का संतुलित और स्थायी समाधान खोज सकेगा।
इतिहास पर यदि शांत मन से दृष्टि डाली जाए तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि भारतीय समाज की स्थिरता का आधार केवल राजसत्ता नहीं था, बल्कि उसकी अपनी सामाजिक संरचना थी। यहाँ समाज की शक्ति कुल, वंश, कुटुंब, कुलदेवता और कुलदेवी की परंपराओं में निहित रहती थी। व्यक्ति स्वयं को केवल एक स्वतंत्र इकाई नहीं मानता था; वह अपने कुल, अपने समाज और अपनी परंपरा का अंग समझता था। इसी भावना ने समाज को लंबे समय तक संगठित और अनुशासित बनाए रखा।
इस व्यवस्था के कारण व्यक्ति अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रखता था। वह यह समझकर जीवन जीता था कि उसका आचरण उसके कुल, उसके समाज और उसकी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण था कि समाज में अनुशासन भी था और मर्यादा भी।
जब इन संस्थाओं को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया जाता है, तब उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। कभी जाति समाप्त करने के नाम पर, कभी नारी सशक्तिकरण और स्वतंत्रता की नई व्याख्याओं के नाम पर, कभी समाजवाद और राष्ट्रीयकरण की नीतियों के कारण पारंपरिक व्यवसायों और कौशल को कमजोर किया गया। जिन कार्यों में पीढ़ियों की दक्षता और उद्यमिता थी, वे धीरे-धीरे समाप्त होने लगे।
इसी के साथ धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं का भी कई बार उपहास किया गया। सेकुलरिज़्म की कुछ व्याख्याओं के अंतर्गत समाज की धार्मिक मान्यताओं को पिछड़ेपन से जोड़कर देखा जाने लगा। जब किसी समाज की आस्था पर लगातार प्रश्न उठते हैं, तब धीरे-धीरे उस समाज के भीतर हीनता और अपराधबोध की भावना भी उत्पन्न होने लगती है।
आज सामाजिक विमर्श में यह भी देखने को मिलता है कि समाज के एक बड़े वर्ग को शोषित और पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उसी समाज के दूसरे वर्ग को जन्मजात शोषक के रूप में चित्रित किया जाता है। ऐसी धारणाएँ समाज के भीतर संतुलन नहीं बनातीं, बल्कि आपसी संघर्ष को जन्म देती हैं। परिणाम यह होता है कि समाज का बड़ा वर्ग आपस में ही उलझ जाता है और वास्तविक समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं।
स्वतंत्रता का विस्तार भी एक बड़ा विषय है। स्वतंत्रता आवश्यक है, परंतु जब स्वतंत्रता और सामाजिक अनुशासन के बीच संतुलन समाप्त हो जाता है, तो अव्यवस्था की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। विवाह संस्था, पारिवारिक मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों पर भी नए प्रकार की बहसें सामने आई हैं। कुछ लोग इसे सामाजिक परिवर्तन का संकेत मानते हैं, तो कुछ इसे सामाजिक संतुलन के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं।
भारतीय समाज में अनुशासन का स्तर इतना था कि यदि कोई व्यक्ति अपने धार्मिक और सामाजिक कर्तव्यों का पालन नहीं करता, तो उसके प्रति सामाजिक अस्वीकृति भी व्यक्त की जाती थी। यहाँ धर्म धारण करने का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं था, बल्कि धर्म के दस लक्षणों का पालन करना था—धैर्य, क्षमा, संयम, सत्य, शुचिता, इन्द्रियनिग्रह आदि।
इसी कारण यहाँ साधारण व्यक्ति को भी अपने स्वधर्म के पालन की प्रेरणा दी जाती थी। भारतीय जीवन व्यवस्था
में एक क्रम माना गया
स्वधर्म → कुलधर्म → जातिधर्म → समाजधर्म → राजधर्म → राष्ट्रधर्म → सृष्टिधर्म।
अर्थात व्यक्ति अपने जीवन से प्रारम्भ कर धीरे-धीरे व्यापक समाज और अंततः समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व को समझता है। इसी भावना का विस्तार हमारी प्रार्थनाओं में दिखाई देता है—
“धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो,
प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।”
भारतीय दर्शन में व्यक्ति और समाज के संबंध को लेकर भी गहन चिंतन हुआ है। ईशोपनिषद् का मंत्र कहता है—
अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्यां रताः॥
अर्थात जो केवल व्यक्तिवाद में डूब जाते हैं, वे अंधकार में गिरते हैं; और जो केवल बाहरी सामूहिकता में उलझ जाते हैं, वे भी सही मार्ग से भटक सकते हैं।
इसके बाद अगला मंत्र संतुलन का मार्ग बताता है—
संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्याऽमृतमश्नुते॥
अर्थ यह है कि जो व्यक्ति व्यक्तित्व और समष्टि—दोनों का संतुलन समझता है, वही जीवन का सही मार्ग पाता है।
इसी विचार को भारतीय परंपरा में “संभूय समुत्थान” कहा गया है—अर्थात संगठित होकर उठना। व्यक्ति अकेला सीमित होता है, परंतु समाज संगठित हो तो वह स्थायी शक्ति बन सकता है।
इसलिए हिंदू समाज के समक्ष जो वर्तमान चुनौतियाँ खड़ी हैं, उनका समाधान हिंदू समाज को स्वयं ही खोजना होगा। इन समस्याओं से केवल किसी व्यक्ति, किसी संस्था या किसी साधु-संत पर दोषारोपण करके बाहर नहीं निकला जा सकता। समाधान हमें अपने समाज के भीतर ही ढूँढ़ना होगा।
आज लव जिहाद, ग्लोबल मार्केट फोर्सेज द्वारा पोषित वामपंथी विचारधारा के माध्यम से परिवार विखंडन का षड्यंत्र, तथा जातिगत वैमनस्यता—ये सब गंभीर चुनौतियाँ बनकर सामने खड़ी हैं। इन सबका समाधान तभी संभव है जब हिंदू समाज अपनी प्राचीन सामाजिक व्यवस्थाओं को पुनः स्थापित करने का प्रयास करे।
इसके लिए समाज में कुछ ठोस सामाजिक परंपराओं को पुनर्जीवित करना होगा—जैसे साप्ताहिक हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ, साप्ताहिक सामाजिक मिलन, तथा परिवार के साथ समय बिताने की परंपरा। प्रत्येक परिवार को सप्ताह में कम से कम एक दिन साथ बैठकर 24 घंटे परिवार के साथ बिताने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें परिवार के सभी सदस्यों की बात सुनी जाए। इससे परिवारों में संवाद और विश्वास बढ़ेगा।
संयुक्त परिवार व्यवस्था को मजबूत करना होगा और परिवार में मुखिया की भूमिका तथा उसकी मर्यादा को पुनः स्थापित करना होगा। इसी प्रकार ग्राम पंचायतों और जातिगत पंचायतों को भी सामाजिक स्तर पर मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि समाज के भीतर संवाद और अनुशासन बना रहे।
समाज को न्याय करने की शक्ति भी कुछ सीमा तक वापस देनी होगी। गांधी जी द्वारा ग्राम स्वराज और पंचायती व्यवस्था की जो कल्पना की गई थी, उसे व्यवहार में जीवंत करना आवश्यक है। जब समाज स्वयं संगठित और सक्षम होगा, तभी वह अपनी समस्याओं का समाधान कर सकेगा।
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो उपभोक्तावाद, भौतिकतावाद और बढ़ती सांस्कृतिक चुनौतियों के बीच समाज के लिए संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाएगा। इसलिए समय की आवश्यकता है कि समाज अपने संगठन, अपने परिवार और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को पुनः सुदृढ़ करे। यही भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है।
समाज की शक्ति उसके संगठन, उसके संस्कार और उसकी चेतना में होती है। जब व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र तक एक संतुलित व्यवस्था बनती है, तभी स्थायी परिवर्तन संभव होता है। यही संभूय समुत्थान का वास्तविक अर्थ है—मिलकर उठना और मिलकर आगे बढ़ना।
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