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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप आक्रमणों से लहूलुहान है, परेशान है। फॉर टू लॉन्ग बहुत लंबे अवधि तक मच ऑफ द कॉन्टिनेंट। इक्कादुक्का नहीं मच ऑफ द कॉन्टिनेंट हैड सफर्ड फ्रॉम इन्वजंस। मोदी जी तो इन्वेजन भारत पर ही बताते हैं। प्रोलोंग फाइटिंग एंड फॉरेन ऑक्यूपेशन बॉम्बिंग्स ऑफ टाउनस, फैक्ट्रीज, रोड्स एंड रेलवेज, शॉर्टेजेस ऑफ फूड एंड रॉ मटेरियल्स कॉज्ड बाय ब्लॉकेड एंड कॉल ऑफ मिलियंस ऑफ मैन एंड किलिंग ऑफ मिलियंस।
मैं थोडा सा पढ़ के सुना रही हूं। सुधी जनों के बहुत काम का होगा। एवर हायर टेरिफ बैरियर्स हैड सेपरेटेड सप्लायर्स फ्रॉम देयर मार्केट्स। गवर्नमेंट सब्वेंशन हैड केप्ट इनफिशिएंट फर्म्स एंड फार्मर्स प्रोजेक्टेड फ्रॉम प्रोटेक्टेड फ्रॉम फॉरेन कंपटीशन इनक्रीजिंगली लार्ज अमाउंट ऑफ नेशनल इनकम हैड बीन डिवोटेड टू आर्मामेंट स्पेंडिंग रादर देन कमर्शियल इंटरप्राइज।
1945 के पहले की यह कथा है। वे कह रहे है – दीर्घ काल तक यूरोपीय देश आक्रमणों से भीषण हानि सहते रहे है। अनेक देशों पर विदेशों का कब्जाे लम्बेद समय तक रहा है। दो महायुद्धों में भीषण विनाश हुआ है। दूसरे महायुद्ध में शहरों और कस्बोंर कारखानों और दुकानों, सड़कों और रेलवे पर बमबारिया हुई है। खाद्य पदार्थ और कच्चेऔ माल की चारों तरफ कमी हो गई क्यों कि आवागमन युद्ध में अवरूद हुआ, लाखों लोग मारे गये। जो रास्तेो खुले भी थे उनमें भारी चुंगी के कारण और अवरोधों के कारण आपूर्तिकर्ता बाजार तक पहुंच नहीं पाये। प्रतिस्परर्धा को देश झेल नहीं पाये। जो कुछ धन और संसाधन थे, वे मुख्यचत: युद्ध सामग्री, हथियारों और सेना पर खर्च होते रहे, उद्योगों के लिए धन संसाधन बचे नहीं।
इस भयंकर दलदल से यूरोप बाहर निकल आया। तभी हम उसकी उससे अभिभूत है और इसको बाहर निकालने हम भारतीय लोग नहीं गए थे। तो मोदी जी और भाजपा से पार पा लेना कितना छोटा काम है। पुस्तभक में कहा है – ‘इट वास दस इंपॉसिबल टू मैक्सिमाइज यूरोप्स इकोनमिक ग्रोथ इन दिस क्लाइमेट ऑफ ब्लक्स एंड अनारकी ऑफ इकोनॉमिक नेशनलिज्म एंड ऑफ गेनिंग बेनिफिट्स बाय हर्टिंग अदर्स। (अवरोधों और आर्थिक अराजकता की दशा में यूरोप की आर्थिक उन्नगति असंभव हो गई थी और दूसरों को क्षति पहुंचाकर लाभ पाने की सामर्थ्य भी बहुत अवरूद्ध हो गई थी) ।
1945 में यूरोप तबाह हो गया है। खंडहर हो गया। लेकिन 1950 के बाद घटनाएं ऐसे बदलती हैं। बहुत सारी हैं। यूरोप के लोग अपने उस भयंकर तबाही और विनाश के बाद एक बार दम लगाकर फिर खड़े होते हैं। तो क्या होता है? एक ही जनरेशन में यूरोप के लोगों की आमदनी उससे ज्यादा बढ़ जाती है जो पिछले 150 साल में बढ़ी थी। यानी पूरी 19वीं शताब्दी में और 20वीं शताब्दी के 45 साल में जितना यूरोप का के प्रति व्यक्ति की आमदनी नहीं बढ़ी थी 150 साल में वो एक जनरेशन 20 साल में बढ़ा यानी पुरुषार्थ करने से क्या संभव नहीं और इस भंगुर दुनिया में इस निरंतर उथल पुथल भरी दुनिया में आपदाएं आती हैं तो अवसर भी निरंतर आते हैं। और हम भारतीयों के साथ आज ऐसा कुछ नहीं है जो फर्स्ट और सेकंड वर्ल्ड वॉर में यूरोप के साथ था या माओ के समय या माओ के पहले के सिविल वॉर में या जापानीज ऑक्यूपेशन में चीन के साथ था या जापान के साथ हुआ। सेकंड वर्ल्ड वॉर, फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और पोस्ट सेकंड वर्ल्ड वॉर में जैपनीज ह्यूमिलिएशन की चर्चा मैं विस्तार से अलग से करूंगी। बाद में कभी।
भारत के साथ तो ऐसा आज के दिन कुछ नहीं है और सोवियत रूस में स्टालिन के राज्यक में जो 1990 तक हुआ और 1990 में जो टूटा यूएसएसआर उसका जो साइकोलॉजिकल इंपैक्ट हुआ वैसा साइकोलॉजिकल इंपैक्ट तो हम पर इस यूजीसी का नहीं है। यानी हमारे लिए इससे पार पा लेना सामान्यि बात है यदि, क्या निश्चित ही हम उत्साह से पुरुषार्थ से कार्य करें। समस्याएं जीवन में आती रहेंगी, पार पाते रहेंगे।
और रही बात नेताओं की तो इसी 20वीं शताब्दी ने स्टालिन को देखा है, माओ को देखा है, इदी अमीन को देखा है, पॉलपोट को देखा है। बहुत से 45 वाले नेताओं का नाम मुझे याद नहीं। हिटलर को देखा है, मुसोलनी को देखा है। हमारे मोदी जी तो क्रूरता में, दुष्टता में, नीचता में उनके पांव की धूल भी नहीं है। यह जो कर बैठे यह जानबूझकर मेरी समझ से नहीं किया। मैं पूरी तरह गलत हो सकती हूं। अपना इलेक्शन में और बड़ी विक्ट्री के लिए कर बैठे और अब स्वीकारने को तैयार नहीं है। करेक्ट करने को तैयार नहीं है। तो क्या हम भारतीय इस नन्ही सी आपदा से बाहर नहीं पा सकते? हम भारतीय जिनके वंशजों ने ऐसा प्रचंड पुरुषार्थ किया कि हमको पिछले 100 साल में 150 साल में ऐसा कुछ भी देखना ही नहीं पड़ा।
अब थोड़ा जर्मनी की कथा सुन लें। जर्मनी पता नहीं तीसरा कि चौथा दुनिया का सबसे बड़ा इकॉनमी है। तो यह जर्मनी सेकंड वर्ल्ड वॉर में हार गया। हारा तो पहले फर्स्ट वर्ल्ड वॉर मं भी हारा था और इतनी बुरी तरह हारा था कि ट्रीटी ऑफ वसाई में इसके ऊपर ऐसे शर्तें ला दी लाद दी गई थी कि लड़ाई में जो कुछ खर्च हुआ है दोनों तरफ का क्षति हुआ है उसका पूर्ति अकेले जर्मनी करेगा। जर्मनी पिस गया उन शर्तों के तहत। तब हिटलर का उदय होता है और हिटलर के उदय में और सेकंड वर्ल्ड वॉर के शुरू होने में और खत्म होने में जर्मनी में लाखों लाखों लोग मारे गए और जर्मनी था कितना बड़ा? छ करोड़ का था शायद। लाखों मारे गए लाखों स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ लाखों स्त्रियां डिस्प्लेस्ड हुई बच्चे तक 14 साल के बच्चे तक युद्धभूमि में गए। विनाश है, अभाव है, यहूदियों की मारकाट है। बाद में वो न्यूरेमबर्ग ट्रायल जो वॉर क्रिमिनल्स का है और उसके बाद जो इन लोगों के मन में ग्लानि, हीनता। सब मामला है। थोड़ा इसको सुनिए पेज संख्या 426- ‘प्रसाइजली बिकॉज जर्मनी हैड बीन डिफिटेड एंड डिवाइडेड एंड बिकॉज इंटरनेशनल स्टेटस कंटिन्यूड टू बी रेगुलेटेड बाय ट्रीटी पावर्स’ ।
1945 के बाद जर्मनी को दो टुकड़े पर बांट दिया गया। एक हिस्साज राक्षस सोवियत रूस को दे दिया गया। उसने जो अकथनीय अत्याचार किए ईस्ट जर्मनी पर। और वेस्ट जर्मनी जो दुनिया का बादशाह होने का सपना देखता था, वो यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के रहमोकरम पर आ गया। वो 20 साल में 30 साल में यूरोप का सबसे पावरफुल देश फिर बन गया है। अवसर आए परिस्थितियां बदली किंतु पुरुषार्थ तो जर्मनी वालों ने किया। किन विकट परिस्थितियों में। जब उसको भी निशस्त्र किया गया। उसको भी आर्म्स रखने की पाबंदी थी। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद दुनिया भर की अपमानजनक शर्तें थी।
अब नाटो क्या है ? जो अमेरिका वालों ने बनाया एलाइड पावर के साथ। जर्मनी एलाइड तो था नहीं लेकिन इसको रखा गया नाटो में अमेरिका के छत्रछाया में। वेस्ट जर्मनी को। ईस्ट जर्मनी चला गया वारसा पैक्ट में रूस की छत्रछाया में। एक देश, दो टुकड़े और दोनों एक दूसरे को सांप नेवले की तरह खा जाने वालों के बीच में बट गया। तो इधर से झंझट है और उधर से झंझट है तो जरा भी अप डाउन टेंपरेचर का और इन दोनों की मौत है। इट हैड द लार्जेस्ट ट्रेड विद ईस्टर्न यूरोप एंड द यूएसएसआर। येट इट वास ऑब्वियसली इन द फ्रंट लाइन शुड अनदर वॉर ऑकर। पूर्वी जर्मनी का पूर्वी यूरोप और सोवियत संघ से सार्वधिक व्याुपार है परन्तु युद्ध की दशा में पहला निशाना वहीं होन वाला है या युद्ध की अग्रिम पंक्ति में सामने वही होगा।
1945 से आज तक। तीसरा युद्ध जैसा यूरोप के देशों में युद्ध हुआ नहीं। पर हर समय युद्ध द्वार पर उपस्थित था। इस 70 साल में। उसकी जो एंजायटी, जो नर्वसनेस, जो घबराहट और यह सब साइकोलॉजिकल फैक्टर जीवन में जो रिफ्लेक्ट कर रहे थे, वे इस यूजीसी वाले फैक्ट र से बहुत ज्यादा थे।
पुस्त क में आगे कहा है कि ‘इट (जर्मनी) फेल्ट गिल्टी टुवर्ड्स नेबर्स लाइक द पोल्स एंड द चेक्स वलनेरेबल टुवर्ड रशिया हेवली डिपेंडेंट अपॉन द यूनाइटेड स्टेट।‘ यानी जो बब्बर शेर था यूरोप का उसकी स्थिति क्या हो गई? अपने पड़ोसी चेकोस्लोडवाकिया और पोलैंड के प्रति गिल्टीद है क्योंकि अकथनीय अत्याचार और बर्बरता किया है, रूस के नजर के इशारे से हिल रहा है किसी दिन यह फिर झपट्टा मारेगा और पश्चिमी जर्मनी पूरी तरह निर्भर है यूनाइटेड स्टेट्स पर। किस पर? जिसने उसको हराया है। थोड़ा जर्मन लोगों की मन:स्थिति के बारे में सोचिए।‘ इट वेलकम्ड विद ग्रेटट्यूड द स्पेशल फ्रेंको जर्मन रिलेशनशिप ऑफर्ड बाय डिगॉल बट रेयरली फेल्ट एबल टू यूज़ इकोनॉमिक मसल टू कंट्रोल द मोर असर्टिव पॉलिसीज ऑफ द फ्रेंच’। डिगाल के नेतृत्व में दोस्ती तो हुई लेकिन जिस फ्रांस को 1870 में एक थप्पड़ से गिरा दिया था। फर्स्ट वर्ल्ड वॉर में एक थप्पड़ से गिरा दिया था। सेकंड वर्ल्ड वॉर में एक थप्पड़ से गिरा दिया था। उस फ्रांस के राष्ट्रपति डिगल की दोस्ती पर इसका भविष्य और वर्तमान निर्भर है।
बन तो गया बहुत बड़ा इकोनॉमिक पावर 1945 के बाद पर कैसे बन गया? वह कथा फिर कभी सुना दूंगी। मार्शल प्लान और बहुत कुछ किंतु उसमें जर्मन लोगों का पक्का हौसला दो बार टूटा। हार ऐसी भयंकर हार और वह हारना भारत चीन जैसा टाइप नहीं है। इसमें पूरी की पूरी जनता का जो तहस-नहस हुआ, बलात्कार से उत्पन्न बच्चे इसका रजिस्टर मेंटेन किया जा रहा है। स्त्रियों से पूछा जा रहा है तुमको कब कब किस तारीख को किस नेशनलिटी के किसने बलात्कार किया। बच्चा जो जन्मा वो किसका है इसका गणित कर रहे हैं, हिसाब कर रहे हैं डीएनए कर रहे हैं। वैसे बच्चे जब बच्चे किशोर हो रहे हैं, बच्चे हैं, एडल्ट हो रहे हैं उनकी साइकोलॉजी की आप लोग कल्पना कीजिए। मन: स्थिति की। इसके बावजूद लात खाए हुए फ्रांस से जरा तमीज से बात करना है। बड़ा भारी इकोनमिक पावर हो गया है। किंतु जरा तमीज से बोलो। उससे, जिसे तुमने दोनों बार एक झपट्टे में ही पीट दिया था। क्या बीत रही होगी जर्मनों पर ?
यह जो जर्मनी के लोग हैं इन लोगों का सबसे बड़ा युद्ध स्वयं के साथ हो रहा है कि यह क्या हुआ? 1870 के बाद जर्मन देश बना, बिस्मा र्क ने बनाया। हम इतने पावरफुल हुए। फर्स्ट वर्ल्ड वॉर, सेकंड वर्ल्ड वॉर और ऐसी दारुण यातना हम अन्यों को कैसे दे पाए? स्वयं को कैसे दे पाए? ऐसा बर्बर कृत्यड हम कैसे कर पाए? दुनिया के नजर में हम शर्मिंदा हैं। हमारे बड़े-बड़े नेता वॉर क्रिमिनल कहे जाते हैं। पूरा यूरोप जर्मनी को घृणा की दृष्टि से देख रहा है। उन लोगों की मन:स्थिति सोचिए।
हमारा तो दलदल छोटा है। और हमारे मोदी जी से पार पाना ऐसा कठिन तो नहीं। अभी और सुना रहे हैं। थोड़ा फ्रांस के बारे में सुनिए। फ्रेंच लोगों के बारे में सुनिए। सोचिए। सेकंड वर्ल्ड वॉर में बुरी तरह हारे। पहली लड़ाई में बुरी तरह हारे। इकॉनमी की हालत एकदम खस्ता। सबका रिवाइवल हो रहा है। लेकिन फ्रांस का इकोनॉमिक रिवाइवल उस जर्मनी की तुलना में भी कम है।
फ्रेंच लोगों ने अकथनीय नृशंस बलात्कार जो जर्मन स्त्रियों के साथ किए बच्चों के साथ किए और जिस घृणित ढंग से अपमानित करके किए उसके वीडियो आप देखेंगे तो बर्दाश्त ना कर पाएंगे। सामान्य स्त्रियों का नहीं जो नाक की बाल हैं इनका अपर क्लास है लेडी लोग हैं जो इनका बुर्जु क्लास है। उस अपमान की शर्मिंदगी के साथ।
सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद इंग्लैहण्डम अमेरिकन से सहायता ले रहा है मार्शल प्लान में। किस अमेरिका से? जिस अमेरिका वालों ने इंग्लैंड को तो दो कौड़ी की इज्जत दी फ्रांस को धकिया के बाहर कर दिया था।
तो भारत की तो ऐसी कोई स्थिति नहीं हुई है। यहां तो बुरी स्थिति मोदी जी और भाजपा तथा उनके समर्थक संगठन की ही हुई है। अब तो वह सामान्य लोगों के लिए उपहास और तिरस्कार के पात्र हो चुके हैं। तो मैं उनका नाम नहीं ले रही हूं। यूरोप की ये घटनाएं आर इतिहास शायद किसी को नहीं पता। हमारे यूनिवर्सिटी वालों को नहीं पता। नेता लोग को नहीं पता होना स्वाभाविक है। हमारे पत्रकारों को नहीं पता है। हमारे ब्यूरोक्रेट्स को नहीं पता है। हमारे जजेस को नहीं पता है। तो हमको क्या करना है? यह जो आपदा आई है यूजीसी वाली इसको अवसर में बदलकर हमको विद्या पर बल देना है। अध्ययनशीलता पर बल देना है। हमको अपने आसपास के संसार को जानना है। वह आपदाओं से कैसे निकलते हैं? वह घटिया देशभक्ति का ढोंग करते हुए स्वयं के स्वार्थ में लिप्त नेताओं से कैसे निपटते थे? कैसे पार पा लेते हैं? हमको यह सब जानना देखना है और उदास तो नहीं होना है। निराशा की तो खैर कोई बात नहीं।
हम लोग तो 1947 से 2014 तक चौपट अनपैट्रियोटिक सेल्फ सेंटर्ड लीडरशिप तो देखते ही रहे हैं निपटते ही रहे हैं और हम लोग इतना निपटे हैं कि 1990 के बाद वर्ल्ड बैंक आईएमएफ क्या चर्चा कर रहा है? कह रहा है कि भारत सुपर पावर बन रहा है। मैंने बहुत भाषणों में इस पर चर्चा की। मोदी जी तो कहीं नहीं थे। मोदी जी तो अभी गुजरात भी नहीं पहुंचे थे। 1990 में।
2002 में जब गुजरात पहुंचे हैं मोदी जी तब तक तो रॉबर्ट कॉपलॉन वगैरह चंपा की चर्चा कर रहे हैं। किताब छप गई है 2010-11 में। अभी मोदी जी दिल्ली आए नहीं है और कॉपलॉन कह रहे है कि भारत तो लाल सागर से लेकर चंपा तक है। यह कौन बात कर रहा है? यह अमेरिकन स्ट्रेटजिस्ट बात कर रहा है। तो यह किसका बल था? यह हम भारतीयों का बल था। 1947 से लेकर 2014 तक के सी क्लास केंद्रीय नेतृत्व के बावजूद।
2014 के बाद वर्तमान नेतृत्व ने अनेक क्षेत्रों में अभूतपूर्व कार्य किया। लेकिन इस क्षेत्र में ऐसा किया कि लगता है मानो कटप्पा ने अमरेंद्र बाहुबली के पीठ में या छाती में छुरा भोक दिया। तो ठीक है ऐसा होता रहता है। नेतृत्व सब ठीक कर देगा तो बड़ा बढ़िया है। चमत्कार होगा। मैं भी उनमें हूं जिसको ऐसा लगता था। मैंने बहुत बार बोला भी है। तो यह झटका है लेकिन यह झटका ऐसा तो नहीं है कि हम पैरालाइज फील करें या निराश फील करें। हालत यहां तक हो गई थी कि बहुत से फ्रेंच अपर क्लास के लोग स्विट्जरलैंड अपना धन जमा करने के लिए चल पड़े थे। फ्रांस के पास 70 के दशक में भी 4% जीएनपी बची थी। ब्रिटेन का भी 4% जीएनपी और चार-चार% जीएनपी लेके ये लोग कहां बैठे हुए थे? यूनाइटेड नेशंस में और सिक्योरिटी काउंसिल में परमानेंट सीट लेकर। तो हमको इनसे भी बहुत अभिभूत होने की जरूरत नहीं है। हमको सदा सदा याद रखने की जरूरत है।
हमारे वो अभूतपूर्व दैवी पूर्वज जिन्होंने कैसा प्रचंड पुरुषार्थ किया जिसकी कमाई हम आज तक खा रहे हैं। तो हम अपने समर्थ पूर्वजों के समर्थ वंशज ही सिद्ध हों। उन्हीं का खून है। उन्हीं की बुद्धि है। मैली हो गई है। बगीचा का जो पेड़ है उसमें फल छोटे हो गए हैं। खाद पानी नहीं मिला है। कुछ पेड़ सूख गए हैं। झाड़ जंगल हो गए हैं। लेकिन बगीचा तो है। हम क्या करेंगे? हम झाड़ जंगल साफ करेंगे। काहे का झाड़ जंगल ? अज्ञान का, मिस इनफॉरमेंशन का, डिस इनफॉरमेंशन का। यह झूठ बड़ा अत्याचारी है। यह प्रचार कि 1000 साल से हम गुलाम है। जब शासक इतना इल-इनफॉर्म्ड है, अनपढ़ है, मोटी बात नहीं जानता। यह कैसी भीषण दशा है। भारत का शासक भारत का सत्यड नहीं जानता। मेरा नरेंद्र तो नाम की साम्यता रह गयी। नरेंद्र का अर्थ जो राजन है वह तो नहीं बचा। मैं तो राजन के अर्थ में नरेंद्र नाम की साम्यता बुलाया करती थी। खैर इनको यही नहीं पता है कि हजार साल की गुलामी जैसी कहीं कोई चीज ही नहीं थी। ये इस निहायत अब्सर्ड बात को बोलते रहते है। अब नई बकवास शुरू हुई है। हजार साल से क्या हो रहा है? कोई भेदभाव हो रहा है। तुम्हारे बौद्धिक थे संघ में, उनमें क्या भागवत के पहले कभी ऐसे भेदभाव की चर्चा हुई? अभी चर्च से पैसा लिया है या जाने क्या किया है। अचानक बदल दिया है। बदल दिया है तो इतिहास के डस्टबिन में तुम्हारा स्थान रहेगा। मैं तो सोच रही थी नरेंद्र दामोदर दास मोदी का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा मेरी तो अभी भी यही कामना है लेकिन अगर डस्टबिन में ही आनंद है तो मैं क्या कर सकती हूं? मैं तो बहुत मामूली प्राणी हूं।
और बहुत सी चीजें बताने की है। अगली बार बताऊंगी। सार यह है कि इतने भयंकर उथलपुथल के बाद जापान का हम गुणगान करते हैं यानी जापानियों का। हम चीनियों का गुणगान करते हैं यानी चीनियों का। कोई मंगल ग्रह से तो वहां के लोग आए नहीं। हमारे ही ग्रह के है। यूरोप से हम अभिभूत है यानी उन्होंने पुरुषार्थ किया तो पुरुषार्थ का तो विकल्प नहीं है। हम सनातन धर्म के अनुयाई हिंदुओं को अद्भुत पुरुषार्थ करना पड़ेगा।
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