सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सनातन नववर्ष और हमारा कालबोध




✍️दीपक कुमार द्विवेदी

आज सनातन नववर्ष के इस पावन अवसर पर यह केवल एक तिथि का परिवर्तन नहीं है, बल्कि अपने मूल कालबोध, अपने दर्शन और अपनी पहचान को पुनः समझने का अवसर है। यह वह क्षण है जब हमें स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि हम समय को किस दृष्टि से देखते हैं—और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह कि क्या हम अपने ही सनातन धर्म को उसकी अपनी सनातन दृष्टि से समझ रहे हैं या किसी बाहरी, विशेषतः आब्राह्मिक दृष्टिकोण से उसे परिभाषित करने का प्रयास कर रहे हैं।

समस्या यहीं से प्रारम्भ होती है। आब्राह्मिक परम्पराओं में काल को एक सीधी रेखा के रूप में देखा गया है—एक निश्चित समय पर सृष्टि की उत्पत्ति और एक निश्चित समय पर उसका अन्त। बाइबिल में सृष्टि को लगभग छह हजार वर्ष पूर्व उत्पन्न बताया गया है और उसके साथ एक अंतिम न्याय-दिवस की अवधारणा जुड़ी हुई है। इस्लाम और यहूदी परम्पराओं में भी इसी प्रकार की रेखीय काल-दृष्टि विद्यमान है। जब इस प्रकार की सीमित समय-रेखा को सत्य मान लिया जाता है, तब सम्पूर्ण सृष्टि, मानव इतिहास और अस्तित्व को उसी सीमित ढाँचे में बाँध दिया जाता है।

आधुनिक विज्ञान भी इस प्रभाव से पूर्णतः मुक्त नहीं रह सका। डार्विन का विकासवाद मनुष्य को वानर से विकसित बताता है और जीवन को एक रेखीय जैविक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। यह अपने स्थान पर भौतिक स्तर की एक व्याख्या हो सकती है, किन्तु जब इसे सम्पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तब यह चेतना, आत्मा और सृष्टि के गहन आयामों को अनदेखा कर देता है। यहाँ भी मूल में वही रेखीय सोच कार्य कर रही होती है—एक प्रारम्भ, एक क्रम और एक निष्कर्ष।

किन्तु सनातन धर्म की दृष्टि इससे सर्वथा भिन्न है। यहाँ काल को न कभी आरम्भ माना गया है, न कभी अन्त; इसे अनादि और अनन्त माना गया है। सृष्टि, स्थिति और प्रलय का क्रम निरन्तर चलता रहता है। यह सृष्टि न पहली बार बनी है, न अंतिम बार समाप्त होगी। यह अनवरत प्रवाहित होने वाला चक्र है, जिसमें ब्रह्माण्ड बार-बार उत्पन्न होते हैं, विकसित होते हैं और पुनः लय को प्राप्त होते हैं।

इस चक्रीय काल-दृष्टि को हमारे शास्त्र अत्यन्त व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करते हैं। सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि—ये चार युग मिलकर एक चतुर्युग बनाते हैं। ऐसे 71 चतुर्युग मिलकर एक मन्वन्तर होता है। 14 मन्वन्तर मिलकर ब्रह्मा का एक दिन अर्थात् एक कल्प बनाते हैं, जिसकी अवधि लगभग 4.32 अरब वर्ष कही गई है। ब्रह्मा की एक रात्रि भी उतनी ही दीर्घ होती है, जिसमें सृष्टि का लय होता है। फिर पुनः सृष्टि का आविर्भाव होता है। यह क्रम अनन्त काल से चल रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा।

यह केवल गणितीय संरचना नहीं है, बल्कि एक गहन दार्शनिक सत्य का प्रतिपादन है—कि अस्तित्व चक्रीय है, रेखीय नहीं।

इसी सत्य को हमारे पुराणों में “कल्प-भेद” के रूप में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। एक ही कथा विभिन्न कल्पों में भिन्न-भिन्न रूपों में वर्णित मिलती है। कहीं घटनाओं का क्रम थोड़ा अलग है, कहीं पात्रों के स्वरूप में भिन्नता है। यह विरोधाभास नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि सृष्टि एक ही बार नहीं हुई, बल्कि बार-बार होती है। “कल्पभेद हरि चरित सुहाए, नाना भाँति मुनि गाए”—यह कथन स्पष्ट करता है कि विभिन्न कल्पों में ईश्वर की लीलाएँ विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं, किन्तु उनका तात्त्विक सत्य एक ही रहता है।

विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण और अन्य ग्रन्थों में सृष्टि के बार-बार उत्पन्न होने और प्रलय को प्राप्त होने का विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीमद्भागवत में हजारों ब्रह्माण्डों का उल्लेख है—यह बताता है कि यह सृष्टि केवल एक ब्रह्माण्ड तक सीमित नहीं है। योगवसिष्ठ में तो इससे भी आगे बढ़कर असंख्य ब्रह्माण्डों की चर्चा की गई है—एक प्रकार से आज जिसे “मल्टी यूनिवर्स” कहा जाता है, उसका अत्यन्त प्राचीन दार्शनिक स्वरूप वहाँ विद्यमान है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड का अपना काल-चक्र, अपनी सृष्टि और अपना प्रलय है।

कागभुशुण्डि का प्रसंग इस विषय को और अधिक सजीव बना देता है। वे अमर माने गए हैं और अनेक कल्पों के साक्षी हैं। योगवसिष्ठ में स्पष्ट उल्लेख मिलता है—
“राक्षसक्षतये विष्णोर्महीमवतरिष्यतः। अधुना एकादशं जन्म रामनाम्नो भविष्यति॥”

अर्थात् भगवान विष्णु ग्यारहवीं बार राम के रूप में अवतरित हो रहे हैं। इसी प्रकार—
“वसुदेवगृहे विष्णुर्भुवो भारनिवृत्तये। अधुना षोडशं जन्म भविष्यति मुनीश्वर॥”

अर्थात् भगवान विष्णु सोलहवीं बार कृष्ण के रूप में अवतरित हो रहे हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि रामायण और महाभारत जैसे घटनाक्रम एक बार नहीं, बल्कि अनेक बार घटित हो चुके हैं। इसी आधार पर कहा जाता है कि कागभुशुण्डि ने 11 बार रामायण और 16 बार महाभारत के चक्रों को देखा है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि काल के चक्रीय स्वरूप का प्रत्यक्ष संकेत है।

रामचरितमानस में भी यह भाव आता है—“हरि प्रेरणा जेहिं कल्प जोइ…”—अर्थात् प्रत्येक कल्प में रावण जैसे पात्र उत्पन्न होते हैं और भगवान राम उनके विनाश के लिए अवतरित होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कथा का तत्त्व एक ही रहता है, किन्तु उसका प्राकट्य चक्रों में होता रहता है।

सनातन दर्शन सृष्टि को केवल भौतिक नहीं मानता। यह उसे आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों स्तरों पर देखता है। साथ ही सत्त्व, रजस् और तमस्—ये तीन गुण सम्पूर्ण प्रकृति के संचालन का आधार हैं। आत्मा और ब्रह्म का सिद्धान्त इसी व्यवस्था का केन्द्र है। आत्मा नित्य है, अविनाशी है, और शरीर के नष्ट होने पर भी समाप्त नहीं होती। वह अपने कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म लेती है।

पुनर्जन्म और कर्म सिद्धान्त सनातन दर्शन की रीढ़ हैं। प्रत्येक कर्म का फल है, और वह फल एक ही जीवन में सीमित नहीं है। यह अनेक जन्मों में परिपक्व होता है। यदि काल को रेखीय मान लिया जाए, तो यह सम्पूर्ण व्यवस्था ही असंगत हो जाती है।

मनुष्य के लिए ज्ञान, कर्म और भक्ति—ये तीन मार्ग बताए गए हैं। ज्ञान से आत्मा और ब्रह्म का बोध होता है, कर्म से जीवन शुद्ध होता है, और भक्ति से ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित होता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ जीवन को संतुलित दिशा देते हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था मनुष्य के जीवन को क्रमिक रूप से विकसित करने की व्यवस्था है—ब्रह्मचर्य से संन्यास तक।
यह सब एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, और इन सबका आधार वही चक्रीय काल-दृष्टि है। यदि इस आधार को हटा दिया जाए, तो सम्पूर्ण सनातन ढाँचा ही असंतुलित हो जाता है।

समस्या यह नहीं है कि हमारे शास्त्र जटिल हैं; समस्या यह है कि हम उन्हें गलत दृष्टि से देखने लगे हैं।

अतः आज, इस सनातन नववर्ष के पावन अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने सनातन धर्म को उसी की मूल दृष्टि से समझेंगे। हम अपने कालबोध को पुनः स्थापित करेंगे और यह स्वीकार करेंगे कि यह सृष्टि अनादि है, अनन्त है और चिरन्तन चक्र में प्रवाहित हो रही है।

यह सृष्टि केवल छह हजार वर्ष पूर्व उत्पन्न नहीं हुई, न ही यह किसी एक अंतिम क्षण में समाप्त होने वाली है। मनुष्य भी इस पृथ्वी पर पहली बार नहीं आया—वह इस अनन्त चक्र का एक सतत् अंश है।
इसी सत्य को समझना ही वास्तविक ज्ञान है, यही कालबोध है, और यही सनातन नववर्ष का वास्तविक संदेश है।

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