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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
समाज जीवन में आज एक चिंताजनक प्रवृत्ति तेजी से दिखाई देने लगी है कि कुछ लोगों की भावनाएँ अत्यंत शीघ्र आहत हो जाती हैं। बिना किसी विषय को ठीक से देखे-समझे, बिना तथ्य और संदर्भ को जाने ही लोग भावनाओं के आवेग में बहकर तुरंत टिप्पणी करने लगते हैं। सामाजिक माध्यमों के इस युग में यह प्रवृत्ति और भी बढ़ गई है। किसी घटना का छोटा-सा वीडियो, किसी समाचार का अधूरा अंश या किसी कथन का संदर्भ से कटा हुआ भाग सामने आते ही लोग उसे अंतिम सत्य मान लेते हैं और बिना विचार किए प्रतिक्रिया देने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि सत्य पीछे छूट जाता है और भ्रम तथा दुष्प्रचार तेजी से फैलने लगता है।
इस पूरे प्रकरण में राज्य सरकार ने त्वरित संज्ञान लिया। इसी प्रकार दरोगा भर्ती परीक्षा के प्रश्नपत्र में “पंडित” शब्द को लेकर भी विवाद उत्पन्न हुआ। शनिवार को आयोजित परीक्षा में एक प्रश्न पूछा गया जिसमें “अवसर के अनुसार बदल जाने वाले व्यक्ति” के विकल्पों में “पंडित” शब्द दिया गया था। इस प्रश्न को लेकर सामाजिक माध्यमों पर विवाद प्रारंभ हो गया। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इस पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की और तत्काल जांच के निर्देश दिए। बदलापुर से भारतीय जनता पार्टी के विधायक रमेश मिश्र तथा भाजपा के प्रदेश मंत्री अभिजात मिश्रा ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस विषय में कार्रवाई की मांग की।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस प्रकरण को गंभीरता से लिया और सख्त निर्देश जारी किए। उन्होंने प्रदेश के सभी भर्ती आयोगों और बोर्डों के अध्यक्षों को स्पष्ट निर्देश दिया कि किसी भी प्रश्नपत्र में किसी व्यक्ति, जाति, पंथ, संप्रदाय या आस्था के विषय में कोई भी अमर्यादित टिप्पणी या संकेत किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग और बोर्ड के अध्यक्ष इस विषय में तुरंत संज्ञान लेते हुए सभी पेपर सेटर्स को निर्देशित करें तथा इस प्रकार की त्रुटि को आदतन अपराध की श्रेणी में मानते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था करें। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यह विषय प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों के साथ होने वाले एमओयू का भी हिस्सा बनाया जाए। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में वर्तमान समय में छहप्रमुख भर्ती आयोग और बोर्ड कार्यरत हैं जो विभिन्न विभागों के लिए परीक्षाएँ आयोजित करते हैं और प्रश्नपत्र तैयार कराते हैं।
इन दोनों प्रकरणों वाराणसी में धार्मिक चिह्नों से संबंधित विवाद और दरोगा भर्ती परीक्षा के प्रश्नपत्र से संबंधित विवाद में राज्य सरकार द्वारा त्वरित कार्रवाई की गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार इन विषयों को लेकर संवेदनशील है और किसी भी प्रकार की अमर्यादित टिप्पणी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
इसके बावजूद इन घटनाओं को आधार बनाकर यह प्रचार करने का प्रयास किया गया कि उत्तर प्रदेश की सरकार ब्राह्मण विरोधी है या तथाकथित रूप से ठाकुरवादी है। यह विमर्श नया नहीं है। वास्तव में इसकी पृष्ठभूमि वर्ष 2020 से ही दिखाई देती है। 10 जुलाई 2020 को कुख्यात अपराधी विकास दुबे का पुलिस मुठभेड़ में अंत हुआ था। इसके बाद से ही कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूहों द्वारा यह प्रचार प्रारंभ किया गया कि योगी सरकार ब्राह्मण विरोधी है। यह अभियान वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव तक लगातार चलाया गया।
इस प्रचार का एक आधार यह भी बनाया गया कि योगी आदित्यनाथ संन्यास ग्रहण करने से पूर्व जिस परिवार में जन्मे थे उसे आधार बनाकर उन्हें ठाकुर सिद्ध किया जाए और यह कहा जाए कि शासन किसी विशेष जाति के प्रभाव में संचालित हो रहा है। जबकि सनातन धर्म की परंपरा में संन्यास ग्रहण करने के पश्चात व्यक्ति की कोई जाति नहीं रहती। संन्यासी अपने पारिवारिक और जातिगत बंधनों का त्याग कर व्यापक आध्यात्मिक जीवन का अंग बन जाता है। इसलिए किसी संन्यासी को उसकी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर परिभाषित करना सनातन परंपरा की मूल भावना के विपरीत माना जाता है।
दरअसल समाज में जातिगत संघर्ष और वैमनस्य का वातावरण बनाने के लिए एक वैचारिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है जिसे कल्चरल मार्क्सवाद कहा जाता है। इस पद्धति का मूल सिद्धांत यह है कि समाज के भीतर दो विरोधी ध्रुव खड़े किए जाएँ। कहीं शोषक बनाम शोषित का विमर्श खड़ा किया जाता है, कहीं ब्राह्मण बनाम दलित, कहीं ब्राह्मण बनाम ठाकुर, कहीं सामान्य वर्ग बनाम अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति-अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रश्न उठाया जाता है। इसी प्रकार सांस्कृतिक प्रतीकों को भी वैचारिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है जैसे राम बनाम रावण या दुर्गा बनाम महिषासुर। उद्देश्य यही होता है कि समाज के भीतर विभाजन की रेखाएँ गहरी हों और लोग अपने-अपने समूहों में बँटकर एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो जाएँ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी जातिगत विमर्शों का प्रभाव देखने को मिला। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की कुल 80 सीटें हैं। वर्ष 2019 में भारतीय जनता पार्टी को यहाँ 62 सीटें प्राप्त हुई थीं, किंतु वर्ष 2024 के चुनाव में यह संख्या घटकर लगभग 33 सीटों तक रह गई, जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को लगभग 43 सीटें प्राप्त हुईं। चुनाव के दौरान कई स्थानों पर यह प्रचार किया गया कि भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ठाकुर विरोधी हैं। इस प्रकार के जातिगत विमर्शों ने चुनावी वातावरण को प्रभावित किया।
अब वही प्रयोग पुनः किए जाने का प्रयास दिखाई दे रहा है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ब्राह्मण बनाम ठाकुर का विमर्श फिर से खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। छोटी-छोटी घटनाओं को चुनकर उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि मानो सरकार ब्राह्मण जाति के विरुद्ध कार्य कर रही हो।
इसी क्रम में गौसंरक्षण और गोवध के प्रश्न को लेकर भी विवाद खड़े किए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में 9 जून 2020 को उत्तर प्रदेश गोवध निवारण (संशोधन) अध्यादेश लागू किया गया, जिसने 1955 के मूल कानून को और अधिक कठोर बना दिया। इस संशोधन के अंतर्गत गोहत्या के लिए तीन वर्ष से दस वर्ष तक के कठोर कारावास तथा तीन लाख रुपये से पाँच लाख रुपये तक के आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया। यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया। यदि कोई व्यक्ति गोवंश को गंभीर शारीरिक क्षति पहुँचाता है या उसका अंगभंग करता है तो उसके लिए सात वर्ष तक की सजा और तीन लाख रुपये तक के दंड का प्रावधान किया गया। गोतस्करी के मामलों में गैंगस्टर अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई करने की व्यवस्था की गई तथा दोषियों की संपत्ति कुर्क करने तक का प्रावधान किया गया। कुछ मामलों में अपराधियों के नाम और पते सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की व्यवस्था भी की गई। पुनरावृत्ति की स्थिति में दंड और अधिक कठोर हो सकता है।
इसके बावजूद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग को लेकर आंदोलन चलाया जा रहा है। हाल ही में लखनऊ में योगी सरकार के विरोध में एक राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। बताया गया कि इस कार्यक्रम के लिए लगभग पाँच हजार कुर्सियाँ लगाई गई थीं, किंतु वहाँ लगभग चार सौ लोग ही उपस्थित हुए। उनमें से लगभग अस्सी व्यक्ति टेंट और साउंड व्यवस्था से जुड़े लोग थे। लगभग बीस लोग अलंकार अग्निहोत्री के साथ आए थे। लगभग बीस लोग कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के साथ थे। लगभग साठ से सत्तर लोग अविमुक्तेश्वरानंद के चेले, सहयोगी, ड्राइवर, खलासी और सुरक्षा से जुड़े लोग थे। शेष लोगों की व्यवस्था समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा द्वारा की गई बताई जाती है। यह भी बताया गया कि जिन लोगों को बुलाया गया था उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जो इस आंदोलन के मूल उद्देश्य से जुड़े नहीं थे।
यदि हम वर्ष 2017 से पहले के उत्तर प्रदेश को याद करें तो उस समय की स्थिति बिल्कुल भिन्न थी। उस समय राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर व्यापक असंतोष था और लोगों के बीच यह धारणा बन गई थी कि प्रदेश में जंगलराज जैसी स्थिति है। प्रत्येक जिले में एक-एक माफिया का प्रभाव था। राजनीति, प्रशासन और अपराध का गठजोड़ खुलकर दिखाई देता था। उस समय समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान यादव और मुस्लिम समीकरण को लेकर राजनीति की चर्चा होती थी और कई स्थानों पर यह आरोप लगाया जाता था कि प्रशासनिक तंत्र में भी उसी आधार पर प्रभाव दिखाई देता है। प्रत्येक जिले के स्तर पर गुंडा और माफिया तत्वों का इतना प्रभाव था कि सामान्य नागरिक अपने आप को असुरक्षित महसूस करता था। व्यापारियों से रंगदारी, भूमि कब्जा, अवैध खनन और संगठित अपराध की घटनाएँ आम बात थीं। अनेक स्थानों पर एक-एक माफिया पूरे जिले की राजनीति और प्रशासन पर प्रभाव डालता था।
वर्ष 2017 में जब योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नई सरकार बनी तो कानून-व्यवस्था को लेकर कठोर नीति अपनाई गई। अपराध और माफिया के विरुद्ध व्यापक कार्रवाई प्रारंभ हुई। अनेक कुख्यात अपराधियों की संपत्तियाँ जब्त की गईं, अवैध कब्जों को हटाया गया और संगठित अपराध के विरुद्ध विशेष अभियान चलाए गए। धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश की छवि में परिवर्तन दिखाई देने लगा।
इसी अवधि में राज्य में आधारभूत संरचना और निवेश के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई दिया। वर्ष 2016-17 में उत्तर प्रदेश की सकल राज्य घरेलू उत्पाद लगभग 13.30 लाख करोड़ रुपये थी। वर्ष 2024-25 तक यह बढ़कर 30.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई। वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की अर्थव्यवस्था के लगभग 36 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान व्यक्त किया गया है। अर्थात लगभग आठ-नौ वर्षों के भीतर राज्य की अर्थव्यवस्था दोगुनी से भी अधिक हो गई है। रोजगार के क्षेत्र में भी सुधार दिखाई दिया है और वर्ष 2026-27 के आकलनों के अनुसार राज्य में बेरोजगारी दर लगभग 2.24 प्रतिशत है , जो देश में सबसे कम दरों में से एक मानी जाती है।
आज उत्तर प्रदेश को केवल गुंडाराज के लिए नहीं बल्कि निवेश, उद्योग और सुशासन के लिए भी जाना जाने लगा है। सड़क, एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डों और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण राज्य में विकास की चर्चा बढ़ी है। इसलिए यह भी कहा जाता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण समाज में विभिन्न प्रकार के विमर्श खड़े किए जाते हैं ताकि सामाजिक विभाजन उत्पन्न किया जा सके।
ऐसी परिस्थितियों में समाज के प्रत्येक सजग नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह किसी भी समाचार या वीडियो को देखकर तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचे। पहले तथ्य को समझे, संदर्भ को जाने और उसके बाद ही कोई मत बनाए। यदि हम भावनाओं के आवेग में बहकर प्रतिक्रिया देंगे तो समाज में अनावश्यक विभाजन उत्पन्न होगा और उसका दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि हम संयम, विवेक और धैर्य के साथ परिस्थितियों का मूल्यांकन करें तथा दुष्प्रचार और अफवाहों से सावधान रहें। यही समाज की एकता और राष्ट्र के भविष्य के लिए आवश्यक है।
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