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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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'वोकल फॉर लोकल' की संकल्पना मजबूत, आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा, संकल्प है। स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन व प्रयोग द्वारा हम राष्ट्र को मजबूत ,समृद्ध ,आत्मनिर्भर बना सकते हैं। सुबह जागरण से लेकर सोने तक की प्रत्येक व्यवहार में आने वाली वस्तु हमारी स्वयं के द्वारा निर्मित हो हमारे खान-पान, वेशभूषा, उपकरण, भाषा इत्यादि सभी कुछ स्वयं का स्वदेशी हो, अपने देश में बना हुआ हो तभी हम भारत को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। विदेशी वस्तुओं, ब्रांडेड वस्तुओं से परहेज एवं अपने देश की वस्तुओं से प्रेम हो तभी हम स्वदेशी राष्ट्र को शक्तिशाली ,आत्मनिर्भर बना सकते हैं; क्योंकि विश्व शक्ति 'वर्ल्ड पावर', जगतगुरु ,महाशक्ति के रूप में यदि हम भारतवर्ष को देखना चाहते हैं तो हमें (प्रत्येक भारतवासी को) अपने मन ,वचन, कर्म में राष्ट्र प्रेम की अभिव्यक्ति स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के रूप में करना चाहिए। वर्तमान समय में यह देखने में आता है कि हम जय तो भारत माता की बोलते हैं किंतु वस्तुएं 'मेड इन चाइना' , 'मेड इन यू.एस.ए.' , ' मेड इन जापान' कोरिया की खरीदते हैं। इसे दोगलापन नहीं कहेंगे तो क्या? व्यवहार में दोहरापन राष्ट्र राष्ट्रभक्ति का प्रतीक नहीं कहलाता है और ऐसा व्यवहार राष्ट्र को पतन ,विनाश ,कमजोरी की ओर ले जाता है अतः इससे बचना चाहिए और आत्म चिंतन करते हुए हमारे गुण, कर्म ,स्वभाव में राष्ट्रभक्ति स्वदेशी के रूप में अभिव्यक्त होनी चाहिए अन्यथा फिर सब बकवास है, दिखावा है।
प्रसिद्ध विद्वान शिवखेड़ा का कथन है कि- " यदि हम समाधान का हिस्सा नहीं है, तो हम ही समस्या हैं।"
अर्थात व्यक्ति के चिंतन ,चरित्र, व्यवहार से स्वदेशी के रूप में देश प्रेम झलकना चाहिए क्योंकि "व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण " होता है अतः
व्यक्ति -व्यक्ति में जगाएं, राष्ट्र चेतना।
तन-मन संस्कारित करें,यही साधना।।
साधना, अखंड साधना,
साधना नित्य साधना।....
प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र की इकाई, यूनिट, घटक है । प्रत्येक व्यक्ति के चिंतन- चरित्र से समाज व राष्ट्र के राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होता है, वही उस राष्ट्र की संस्कृति कहलाती है अतः जैसे देश के लोगों की प्रकृति होती है, जैसे हम हैं वैसा हमारा राष्ट्र है; यदि हम आत्मनिर्भर, शक्तिशाली होंगे तो हमारा राष्ट्र शक्तिशाली- परम वैभव को प्राप्त करेगा। क्योंकि वैसाखियों के बल पर कोई मैदान नहीं जीतता है ,न ही योद्धा बनता है। अपना पराक्रम साहस दिखा कर ही कोई विजेता कहलाता है अतः अपने आपको सशक्त स्वदेशी बनाना यानी राष्ट्र को शक्तिशाली व समृद्ध बनाना है।
" बिना ग्रामोत्थान -नहीं राष्ट्रोत्थान"
गांव राष्ट्र की एक इकाई है अतः गांव को हम आत्मनिर्भर ,स्वदेशी का मॉडल बनाएं। गांव में गोपालन को प्राथमिकता दें ,गौ उत्पादन दूध ,दही ,घी, गोबर खाद ,गोमूत्र से कीटनाशक दवाइयां इत्यादि में वृद्धि ही मात्र न करें वरन् इन उत्पादों की क्रांति करें।
*" गोधन्ं राष्ट्र वर्धनम "*
प्राचीन काल में भारत गौ माता के अनुदानों से आप्लावित था। गौ आधारित कृषि का मॉडल होने से भारत समृद्ध था। भारतीय संस्कृति में गौ को विश्व की माता कहा गया है।
" *गावो विस्वस्य मातर:* "
गौ माता संपूर्ण पृथ्वी की मानव जाति की मां है। वह हमारा पोषण करती है। भगवान श्रीकृष्ण ने गौ माता का पालन करके व गोवर्धन की पूजा करके यही संदेश दिया था कि रे! मानव तू गौ माता का सम्मान, संरक्षण, पालन करना किंतु कलयुगी मनुष्य है भगवान का संदेश भूल गया और कृतिमता ,भौतिकता, विदेशियत को अपनाकर बर्बाद होता चला गया। सारी धरती को प्रदूषण पापाचार ,मिलावट खोरी, प्लास्टिक , कचरे से भर दिया। नदियाँ,पर्यावरण, वायु ,मिट्टी को दूषित कर दिया, धरती को नर्क बना दिया। आज सारी समस्याओं की जड़ मनुष्य का भारतीय संस्कृति से दूर जाना व पश्चिम का अनुकरण करना, भौतिकतावाद क्षणिकवाद ,विज्ञानवाद ही तो है। भारतीय संस्कृति तो संतुलित विकास, त्याग्वाद ,अध्यात्मवाद, मानवतावाद,सर्वे भवंतु सुखिन: की अवधारणा पर आधारित है किंतु समाज ने जब से पश्चिम मॉडल (भोगवाद) को अपनाया तभी से बंटाधार होना प्रारंभ हुआ। हम विनाश की ओर बढ़ते चले गए । हमें ज्ञान ही नहीं रहा की हम यह कहां जा रहे हैं ? इसका भविष्य क्या होगा?
कहते हैं कि -" सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते।"
अभी यदि मानव जाति को सद्बुद्धि आ जाती है तो वह संपूर्ण विनाश से बच सकती है क्योंकि पश्चिमी मॉडल विनाश की ओर ही ले जा रहा है अंत: महा विनाश ही उसकी नियति है अतः बुद्धिमानी इसी में है कि हम चेतें एवं चिंतन करें कि आखिर जिस पथ पर आज हम चल रहे हैं उसका अंत कितना भयावह है, भारतीय संस्कृति कहती है कि-
" जियो और जीने दो"
"माता भूमि पुत्रोस्यां पृथिव्य:"
"कृणवन्तो विश्वा मार्यम "
" त्येन त्यक्तेन भुन्जिथ:"
" मातृवत पर्दरेसूु पर दृव्येसु लोष्टवत्त "
' आत्मवत सर्व भुतेषू "
" ईशावास्य मिद्ं सर्व्ं यत्किंचित जगत्यां जगत "
"राष्ट्र देवो भव:" - "राष्ट्र प्रथम:"
यदि मानव जाति भारतीय संस्कृति से जीवन जीना आरंभ करती है तो वह भविष्य में संकटों से समाधान प्राप्त करेगी अन्यथा विनाश सुनिश्चित है; क्योंकि भारतीय संस्कृति में ही समाधान के सूत्र, विचार मौजूद हैं। यह मानवीय, दैवी ,वैश्विक Global culture संस्कृति है । इसी ने प्राचीन काल में विश्व वसुधा को सतयुगी वातावरण ,सुख ,शांति ,प्रेम से और ओत-प्रोत किया था। व मानवता निहाल हुई थी पुन: वही मार्ग हमारे सामने है अतः " भारत जगेगा तो विश्व जगेगा " भारत के कल्याण में ही विश्व का कल्याण है, इसी बात की पुष्टि योगीराज महर्षि अरविंद ने भी की है - " भारत अपने लिए नहीं उठ रहा है वह तो संपूर्ण मानवता की कल्याण के लिए बढ़ रहा है। परमात्मा ने जो दिव्य ज्योति भारत को सौंपी है,भारत संपूर्ण विश्व पर उसके प्रकाश को फैलाएगा और संपूर्ण मानवता का भविष्य उज्जवल होगा।"
अतः भारत का अभ्युदय निकट है। भारत का अभ्युदय भारतवासियों के जागरण, श्रेष्ठ चिंतन व श्रेष्ठ कर्म से होगा। यानी कि प्रत्येक भारतवासी स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत के मार्ग पर बढ़ता चले तभी " एक भारत -श्रेष्ठ भारत " व "एक विश्व- श्रेष्ठ विश्व " की संकल्पना साकार होगी और तभी "21वीं सदी उज्जवल भविष्य का उद्घोष साकार होगा।"
हम सभी भारतवासी स्वदेशी के मंत्र का गायन अपने मन ,वचन, कर्म से करें।
" हम करें राष्ट्र आराधन, तन से,मन से,धन से ।
तन-मन-धन जीवन से , हम करें राष्ट्र आराधन।
अंतर से मुख से कृर्ति से, निश्चल हो निर्मल मति से।
श्रद्धा से मस्तक नत से, हम करें राष्ट्र आराधन।।
अपने अतीत को पढ़कर, अपना इतिहास उलटकर।
अपना भवितव्य समझकर, हम करें राष्ट्र आराधन।।....
हम बदलेंगे -युग बदलेगा।
हम सुधरेंगे -युग सुधरेगा।
अब यही एकमात्र उज्जवल भविष्य का मंत्र है।
वन्देमातरम!
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