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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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--रमेश शर्मा
रंगपंचमी त्यौहार बसंत ऋतु के समापन और ग्रीष्म के आगमन की मिलन तिथि है। यह वर्ष के उन महत्वपूर्ण दिवसों में से एक जब पृथ्वी, जल, अग्नि आकाश और वायु पाँचों तत्व समान अनुपात में होते हैं। इसीलिए इस तिथि पर मन में उमंग और उत्साह अपेक्षाकृत अधिक होता है। ऋषियों ने इस उत्सव आयोजन के प्रावधानों में आरोग्य की साधना, प्रकृति से संतुलन और सामाजिक समरसता के संदेश से भी होता है।
रंग पंचमी का त्यौहार होलिकोत्सव के पाँच दिन बाद चैत्रकृष्ण पक्ष की पंचमी को आता है। इस वर्ष यह तिथि रविवार आठ मार्च को पड़ रही है। त्यौहार मनाने की परंपरा के अनुरूप रंगपंचमी पर भी सूर्योदय के पूर्व उठकर स्वच्छ बहते हुये जल में स्नान और ऊषाकाल में सूर्य नमस्कार से जोड़ा है। इसके बाद भगवान लक्ष्मी-नारायण और राधा-कृष्ण की पूजन का निर्देश है। घर की पूजन के बाद मंदिर जाना फिर परिवार में परस्पर गुलाल लगाने और सामूहिक रूप से हवा में अबीर-गुलाल उड़ाने की परंपरा है। पूजन और पारिवारिक आयोजन के बाद मित्रों और परिचितों का आवागमन आरंभ होता है। आगुन्तकों के माथे पर भी अबीर गुलाल लगाने और घर में बने पकवान से उनका स्वागत होता है। दिन में चल समारोह निकलने की भी परंपरा है। सब एक दूसरे से गले मिलते हैं और परस्पर टीका लगाते हैं।
रंगपंचमी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार रंग पंचमी का संबंध भगवान शिव से है। देवताओं को भगवान शिव के पुत्र कुमार कार्तिकेय के अवतरण की प्रतीक्षा थी। लेकिन भगवान शिव तपस्या में रत थे। देवता गण चाहते थे कि भगवान शिव तपस्या से मुक्त होकर माता पार्वती के पास पहुँचे ताकि कुमार कार्तिकेय का अवतरण हो और दैत्यों का शमन हो सके। देवताओं ने देवाधिदेव महादेव को तपस्या से दूर करने का कार्य कामदेव को सौंपा। कामदेव भगवान भोलेनाथ के समक्ष जाकर मोहक नृत्य करने लगे। तप में विघ्न पड़ा तो महादेवजी ने कुपित होकर कामदेव को भस्म कर दिया। इससे कामदेव की पत्नि देवी रति दुखी हुईं। उन्होंने शिवजी से प्रार्थना की। भगवान शिवजी प्रसन्न हुये और उन्होंने कामदेव को अदेह रूप में सजीव कर दिया और यह वरदान भी दिया कि देह रूप में कामदेव द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। इससे समस्त देवतागण प्रसन्न हुये और सबने एक दूसरे को शुभकामनाएँ देकर उत्सव मनाया। पुष्पों की सुगंध और पुष्पों के सुगंधित रंग को हवा में बिखेरे। वह चैत्र कृष्ण पक्ष की पंचमी की तिथि थी। तब से देवलोक रंगपंचमी उत्सव मनाने की परंपरा आरंभ हुई। संसार में यह उत्सव भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के बाद आया। भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल में राधाजी के साथ पाँच दिनों तक होलिकोत्सव मनाया। इसका समापन रंग पंचमी को हुआ। तब से होलिकोत्सव और रंग पंचमी उत्सव एक दूसरे के पूरक हो गये।
सामाजिक- प्राकृतिक समन्वय और आरोग्य का संदेश
यह भारतीय चिंतन की विशेषता है कि समस्त तीज त्यौहार केवल पौराणिक संदर्भ के आधार पर ही सीमित नहीं हैं। पौराणिक संदर्भों को आधार बनाकर इन्हें प्राकृतिक रहस्यों और सामाजिक सरोकार से जोड़ा गया है। कोई त्यौहार किसी विशिष्ट तिथि पर आधारित हो अथवा किसी विशिष्ट घटना या संदर्भ पर आधारित हो, इन सबके आयोजन के विधान को प्रकृति संरक्षण, परिवार और समाज के बीच समन्वय और जीवन की सामूहिकता से जोड़ा गयाहै। जैसे रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, विजय दशमी आदि आयोजन तिथि मूलक होते हैं जबकि दीपावली, नवरात्र, पितृपक्ष, मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और रंग पंचमी आदि उत्सवों संबंध विशिष्ट संदर्भ पर आधारित हैं। लेकिन इन सभी के आयोजन का विधान व्यक्तित्व विकास, परिवार समन्वय, समाज की जागरुकता, आरोग्य संवर्धन और प्रकृति के साथ समन्वय से जोड़ा गया है। इसमें भारतीय चिंतन की वैज्ञानिकता, दूरदृष्टिता की अद्भुत झलक है। रंगपंचमी उत्सव के निर्धारण और इसके आयोजन विधान का आधार भी यही है।
रंगपंचमी के आयोजन परंपरा में आरोग्य संवर्धन, परिवार समन्वय, प्राकृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता का अनूठा संदेश है। भारतीय वाड्मय के अनुसार समस्त प्राणी देह और संसार के सभी दृश्यमान पदार्थ अग्नि, जल, धरती, आकाश और वायु से निर्मित माना गया है। तन और मन दोनों के स्वास्थ्य केलिये इन पांच तत्वों की ऊर्जा के संतुलन आवश्यक है। असंतुलन का प्रभाव प्रकृति और प्राणी के देह जीवन दोनों पर पड़ता है। भारतीय मौसम वैज्ञानिकों ने वर्ष को कुल छै ऋतुओं में विभाजित किया है। इन छै में पाँच ऋतुओं में इन पाँचों तत्वों में थोड़ा असंतुलन होता है। वर्षा ऋतु में जल तत्व अधिक होता है तो ग्रीष्म में अग्नि, शिशिर ऋतु में धरती तत्व अधिक होता है तो हेमन्त ऋतु में वायु तत्व प्रबल होता है। केवल बसंत ऋतु ऐसी है जिसमें अपेक्षाकृत पाँचों तत्वों में संतुलन होता है। इसमें भी चैत्र कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि वर्ष की उन विरली तिथियों में मानी जाती है जब इन पाँचों तत्वों में पूर्ण सन्तुलन और समन्वय होता है। पांचों तत्वों के समन्वय के दिन सूर्योदय पूर्व उठकर स्वच्छ और बहते जल में स्नान के बाद ऊषाकाल में सूर्य के सम्मुख "सूर्य नमस्कार" अर्थात व्यायाम करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। उसी के अनुरूप इस दिन भोजन का विधान है। जो आरोग्य की दृष्टि से विशिष्ट है। आधुनिक विज्ञान ने स्वीकार किया है कि प्रातः साढ़े चार बजे से छै बजे के बीच वातावरण में "ऑक्सीजन का लेवल" सबसे अधिक होता है। उस समय तेज तेज चलने से फेफड़े मजबूत होते हैं जो व्यक्ति का स्वास्थ्य और कार्य क्षमता दोनों की वृद्धि करते हैं। इसीलिए हरेक त्यौहार पर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्वच्छ बहते जल स्रोत तक जाने का निर्देश दिया गया है। और यही संदेश रंगपंचमी के लिये भी है। मन में यदि उमंग हो तो कयी बार भटकाव के विचार भी आते हैं जो किसी व्यक्ति को कुमार्ग पर भी ले जा सकते हैं। इसलिये रंग पंचमी पर प्रातः उठकर स्नान और भगवान के पूजन से जोड़ा और दिनचर्या का आरंभ परिवार एवं समाज जनों के सामूहिक रूप में ताकि मन में कोई कुविचार आये ही नहीं एक आदर्श भाव विचार ही उड़ान भरे। रंगपंचमी को उपयोग किया जाने वाला "गुलाल" लाल रंग के सूखे हुये फूलों की पत्तियों को संग्रहीत करके उनका चूर्ण बनाया जाता था। इस पुष्प चूर्ण में भीनी सुगंध होती है। इसी चूर्ण का टीका लगाया जाता है और इसी को हवा में उड़ाया जाता है। इससे संपूर्ण वातावरण मोहक बन जाता है और हल्की सुगंध से भर जाता है। फूल तोड़े नहीं जाते सूखे फूलों को संग्रहीत करके "गुलालम्" तैयार किया जाता है। यह आरोग्य के साथ प्रकृतिका संरक्षण भी है। यद्यपि कुछ लोग तर्क देते हैं कि "गुलाल" शब्द फारसी से आया है। यह भ्रामक प्रचार है। संस्कृत में "गल्" शब्द तत्व होता है। इसी से गला और गलना आदि शब्द बने हैं। आयुर्वेद में किसी पदार्थ के रस तत्व से बनाई जाने वाली औषधि को "गिलोय" कहते है। यह "गिलौय" शब्द भी "गल्" से बना है और इसी से शब्द "गुलालम्" बना। यही अपभ्रंश होकर गुलाल बना। हवा में उड़ाया गया यह पुष्प चूर्ण "गुलालम्" मन को आनंदित करता है, उमंग के भावों से शरीर थिरक उठता है। थिरकते हुआ समूह एक टोली के रूप में ढोलक लेकर निकल पड़ता है, सबके घरों में दस्तक देता है, प्रत्येक घर के द्वार पर इस टोली का स्वागत होता है। टीका लगाने का आदान प्रदान होता है। इस दिन संपूर्ण समाज एक रूप और एक भाव में होता है। यह सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण है।
समय के साथ यद्यपि रंगपंचमी त्यौहार में अनेक आयाम जुड़ गये। कहीं कहीं इसके नाम भी बदला और कहीं मनाने का प्रकार भी बदला लेकिन इसमें समाज के सामूहिक स्वरूप, सामाजिक समरसता और तन मन में उमंग जाग्रत करने वाला मूल भाव यथावत है।
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