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यूजीसी विनियम, रोहित वेमुला विधेयक और चल रहा वैचारिक संघर्ष





✍️दीपक कुमार द्विवेदी

यूजीसी के विनियम जिस दिन सामने आए, उसी दिन मैंने इस विषय पर एक विस्तृत आलेख लिखा था। इसके बाद इस विषय पर लगभग आठ से दस लेखों की एक श्रृंखला भी लिखी। उन लेखों में मैंने विस्तार से यह समझाने का प्रयास किया कि किस प्रकार DEIA (Diversity, Equity, Inclusion, Accessibility) और क्रिटिकल रेस थ्योरी जैसे विचार धीरे-धीरे प्रशासनिक और शैक्षणिक भाषा का हिस्सा बनते जा रहे हैं। यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है; इसके माध्यम से एक विशेष वैचारिक ढांचा स्थापित किया जा रहा है जिसमें हिंदू समाज को स्थायी रूप से “शोषक” और “शोषित” की दो स्थायी श्रेणियों में बाँटकर प्रस्तुत करने की कोशिश दिखाई देती है।

मैंने यूजीसी के इन विनियमों का विरोध किया है और आज भी मानता हूँ कि उनका विरोध होना चाहिए। परंतु इस पूरे विवाद में एक गंभीर विडम्बना दिखाई देती है। जिस विषय पर व्यापक और ठोस विरोध होना चाहिए, उस पर अपेक्षाकृत मौन है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार रोहित वेमुला एक्ट लाने की घोषणा कर चुकी है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने बजट भाषण में इसकी घोषणा की है और संभावना है कि यह विधेयक विधानसभा में लाकर कानून बनाया जाएगा।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। यूजीसी के विनियम केवल गाइडलाइंस हैं, कोई संसद द्वारा पारित कानून नहीं। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय ने 29 जनवरी को इन विनियमों पर स्थगनादेश (स्टे) दे दिया है और अगली सुनवाई 19 मार्च को होनी है। अर्थात अभी ये विनियम लागू नहीं हैं और पूरा विषय न्यायालय में विचाराधीन है।

इसके बावजूद जिस प्रकार का आंदोलन खड़ा किया गया, वह कई प्रश्न खड़े करता है। 8 मार्च को दिल्ली में रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन की तैयारी की गई। जब विषय न्यायालय में विचाराधीन है तो ऐसे आंदोलन की आवश्यकता क्या है? यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मुद्दे को केवल विरोध के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रकार के सामाजिक असंतोष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

जब इस पूरे घटनाक्रम को वैचारिक दृष्टि से देखा जाता है तो एक व्यापक रणनीति दिखाई देती है। सामान्य वर्ग के भीतर बच्चों के भविष्य को लेकर जो स्वाभाविक चिंता है, उसका उपयोग भावनात्मक उकसावे के रूप में किया जाता है। दूसरी ओर एससी, एसटी और ओबीसी समाज को इन प्रावधानों के समर्थन में खड़ा करने का प्रयास किया जाता है। परिणाम यह होता है कि समाज के भीतर दो विरोधी मनोवृत्तियाँ तैयार हो जाती हैं।

वामपंथी वैचारिक तंत्र की कार्यप्रणाली प्रायः यही रही है। पहले किसी संस्थागत या न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से विवादास्पद ढांचा स्थापित किया जाता है। उसके बाद जब समाज में प्रतिक्रिया होती है, तो उसी प्रतिक्रिया को एक बड़े सामाजिक संघर्ष में बदल दिया जाता है। “शोषक” और “शोषित” की स्थायी धारणा बनाकर समाज में वर्ग संघर्ष की स्थिति पैदा करना इस राजनीति का मूल उद्देश्य होता है।

यदि वास्तव में सामाजिक संतुलन की चिंता है तो प्रश्न उठता है कि रोहित वेमुला एक्ट पर वैसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखाई दे रही जैसी यूजीसी विनियमों पर दिखाई दी। क्योंकि यह एक ऐसा कानून होगा जिसे विधानसभा पारित करेगी और जिसका प्रभाव सीधे संस्थानों पर पड़ेगा। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनावों के घोषणापत्र में भी इस प्रकार के कानून का उल्लेख किया था। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का प्रयास भी किया जा सकता है।

इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी देखना आवश्यक है। पिछले कुछ दशकों में पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के विश्वविद्यालयों में एक विचारधारा विकसित हुई जिसे क्रिटिकल रेस थ्योरी (CRT) कहा गया। प्रारंभ में यह विधिशास्त्र का एक अकादमिक विमर्श था, परंतु धीरे-धीरे यह सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का आधार बन गया।
इस विचारधारा का मूल तर्क यह था कि समाज की सभी संस्थाएँ नस्लीय संरचना पर आधारित हैं और उनका उद्देश्य श्वेत वर्चस्व को बनाए रखना है। इसके आधार पर समाज को दो स्थायी वर्गों में विभाजित कर दिया गया—एक जन्मना शोषक और दूसरा जन्मना पीड़ित। इस ढांचे में व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और परिश्रम का महत्व कम हो जाता है और उसकी पहचान ही उसके मूल्यांकन का आधार बन जाती है।

इसके परिणामस्वरूप अमेरिका में शिक्षा और सामाजिक संबंधों में गहरा तनाव उत्पन्न हुआ। विश्वविद्यालयों में विविधता प्रशिक्षण, पहचान आधारित पाठ्यक्रम और एंटी-रेसिज़्म कार्यक्रम शुरू हुए। समाज में अपराधबोध और प्रतिशोध की दो अलग-अलग मनोवृत्तियाँ विकसित हुईं।

आज भारत में इसी विचारधारा का एक रूप दिखाई देता है जिसमें नस्ल के स्थान पर जाति को आधार बनाया जा रहा है। इस ढांचे में “सवर्ण” को संरचनात्मक शोषक और अन्य समुदायों को संरचनात्मक पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह वही मानसिक संरचना है जो पश्चिम में सामाजिक तनाव का कारण बनी।

रोहित वेमुला विधेयक इसी दिशा में एक कदम माना जा सकता है। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार यदि किसी छात्र द्वारा संस्थान में भेदभाव की शिकायत की जाती है तो संबंधित अधिकारी या शिक्षक के विरुद्ध संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध के अंतर्गत कार्यवाही संभव हो सकती है। यहाँ यह प्रश्न भी उठता है कि जब पहले से ही अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, आरक्षण व्यवस्था, छात्रवृत्तियाँ और अनेक संस्थागत व्यवस्थाएँ मौजूद हैं, तो ऐसे नए कानून की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।

इस पूरी रणनीति को समझने में एक और संदर्भ उपयोगी हो सकता है। अमेरिकी सामुदायिक आयोजक Saul Alinsky की पुस्तक Rules for Radicals में राजनीतिक संघर्ष की कुछ रणनीतियों का उल्लेख किया गया है। इनमें कुल तेरह सिद्धांत बताए गए हैं ।

1.शक्ति वही नहीं होती जो वास्तव में आपके पास है, बल्कि वह भी होती है जिसे विरोधी समझता है कि आपके पास है।

2.अपने समर्थकों के अनुभव और समझ की सीमा से बाहर मत जाओ।
यदि रणनीति उनके अनुभव से बाहर होगी तो वे असहज और असुरक्षित महसूस करेंगे।

3.जहाँ तक संभव हो, विरोधी के अनुभव की सीमा से बाहर जाओ।
इससे विरोधी अस्थिर और भ्रमित स्थिति में आ जाता है।

4.विरोधी को उसके अपने नियमों के अनुसार जीने के लिए बाध्य करो।
यदि वह अपने घोषित सिद्धांतों का पालन नहीं कर पाता तो उसकी नैतिक विश्वसनीयता कम हो जाती है।

5.उपहास (Ridicule) सबसे प्रभावी हथियार है।
इसका प्रतिकार करना कठिन होता है और यह विरोधी को असहज कर देता है।

6.ऐसी रणनीति अपनाओ जिसमें तुम्हारे समर्थकों को आनंद और उत्साह मिले।
आंदोलन तभी चलता है जब उसमें भाग लेने वालों को ऊर्जा और प्रेरणा मिलती रहे।

7.कोई भी रणनीति बहुत लंबी अवधि तक चलने पर बोझ बन जाती है।
इसलिए समय-समय पर नई रणनीतियाँ अपनानी चाहिए।

8.दबाव बनाए रखो।
निरंतर दबाव विरोधी को कमजोर करता है।

9.किसी संभावित खतरे का भय अक्सर वास्तविक खतरे से अधिक प्रभावी होता है।
मनोवैज्ञानिक दबाव कई बार वास्तविक स्थिति से अधिक प्रभाव डालता है।

10.मुख्य रणनीति यह है कि ऐसे अभियान चलाए जाएँ जो निरंतर दबाव बनाए रखें।
इसके लिए नए-नए मुद्दे और उपाय खोजे जाते हैं।

11.यदि किसी नकारात्मक स्थिति को लगातार आगे बढ़ाया जाए तो वह अंततः सकारात्मक अवसर में बदल सकती है।

12.किसी सफल हमले की कीमत एक रचनात्मक विकल्प भी देना होती है।
अर्थात केवल विरोध ही नहीं, बल्कि समाधान का प्रस्ताव भी रखना पड़ता है।

13.लक्ष्य चुनो, उसे स्थिर करो, व्यक्तिगत बनाओ और उसे अलग-थलग कर दो।
विरोध को किसी व्यक्ति या संस्था पर केंद्रित करने से आंदोलन को दिशा मिलती है।

इन सिद्धांतों से यह समझने में सहायता मिलती है कि किस प्रकार सामाजिक तनाव को राजनीतिक ऊर्जा में बदला जाता है।

ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि समाज केवल तात्कालिक प्रतिक्रियाओं में उलझने के बजाय इस पूरे विषय को व्यापक वैचारिक परिप्रेक्ष्य में समझे। यह केवल किसी एक नीति का विवाद नहीं है; यह विचारधाराओं का संघर्ष है।

सामान्य वर्ग के सामने भी एक अवसर है कि वह इस विषय को केवल विरोध की राजनीति तक सीमित न रखे, बल्कि एससी, एसटी और ओबीसी समाज के साथ संवाद स्थापित करे। सामाजिक समरसता और परस्पर विश्वास को मजबूत करना ही दीर्घकालिक समाधान का मार्ग हो सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज में फैलाए जा रहे अतिरंजित “एट्रोसिटी नैरेटिव” का तथ्यात्मक और वैचारिक प्रतिवाद किया जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो अनजाने में ही समाज का एक वर्ग उस वर्ग संघर्ष की राजनीति का उपकरण बन सकता है जिसका उद्देश्य समाज को जोड़ना नहीं बल्कि विभाजित करना है।
यह भी समझना आवश्यक है कि वैचारिक युद्ध केवल सड़कों पर नहीं जीते जाते। उन्हें धैर्य, विवेक और दीर्घकालिक बौद्धिक तैयारी से लड़ा जाता है। यदि समाज इस तथ्य को नहीं समझेगा तो विभिन्न राजनीतिक शक्तियाँ इस विभाजन का उपयोग अपने हित में करती रहेंगी और अंततः इसका लाभ उन शक्तियों को मिलेगा जो राष्ट्र और समाज की एकता को कमजोर करना चाहती हैं।

भारत की परंपरा संतुलन और समरसता की रही है। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी नए वैचारिक या विधायी प्रयोग को केवल तत्कालीन राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक सामाजिक प्रभावों को ध्यान में रखकर समझा जाए।


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