सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जिस देश की पहचान कभी व्यापार, शिल्प और उत्पादन थी, वहाँ आज सर्वोच्च सपना सरकारी नौकरी क्यों है?



✍️दीपक कुमार द्विवेदी

कल संघ लोक सेवा आयोग द्वारा सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। हर वर्ष की तरह इस बार भी परिणाम सामने आते ही देश में वही परिचित दृश्य देखने को मिला—समाचार पत्रों के पहले पृष्ठों पर सफल अभ्यर्थियों की तस्वीरें, टेलीविज़न चैनलों पर उनके संघर्ष की कहानियाँ, सोशल मीडिया पर बधाइयों की बाढ़ और समाज में एक प्रकार का उत्सव जैसा माहौल। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह परीक्षा कठिन है और इसमें सफल होने वाले युवाओं ने वर्षों का परिश्रम किया होता है। उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन इस पूरे माहौल के बीच एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या भारत में प्रतिभा का सर्वोच्च प्रमाण केवल सिविल सेवा में चयन ही है? क्या किसी प्रशासनिक सेवा में पहुँचना ही वह अंतिम उपलब्धि है जिसके आगे विज्ञान, शोध, उद्योग, उद्यमिता और तकनीकी नवाचार जैसे क्षेत्रों का महत्व कम हो जाता है?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज दुनिया का स्वरूप बदल चुका है। यह 19वीं या 20वीं सदी की दुनिया नहीं है। आज का समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत तकनीक, अनुसंधान, नवाचार और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का समय है। जो देश विज्ञान, तकनीक, शोध और उद्यमिता में आगे हैं वही विश्व अर्थव्यवस्था को दिशा दे रहे हैं। ऐसे समय में यदि किसी समाज की बड़ी प्रतिभा का लक्ष्य केवल सरकारी नौकरी बन जाए तो यह चिंता का विषय अवश्य है।
इतिहास की ओर देखें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। अंग्रेजों के भारत आने से पहले भारत केवल कृषि आधारित समाज नहीं था। वह विश्व का एक बड़ा व्यापारिक और विनिर्माण केंद्र था। बंगाल के सूती वस्त्र, गुजरात के कपड़े, दक्षिण भारत के महीन वस्त्र, वूट्ज़ स्टील, धातु शिल्प और जहाज निर्माण—ये सब भारत की पहचान थे। आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में विश्व के औद्योगिक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 23 प्रतिशत थी। भारतीय व्यापारी एशिया, अफ्रीका और यूरोप तक व्यापार करते थे। यह वह देश था जिसकी वस्तुओं की माँग दुनिया भर में थी।
लेकिन औपनिवेशिक शासन ने इस पूरी संरचना को धीरे-धीरे तोड़ दिया। ब्रिटिश शासन का उद्देश्य भारत का विकास नहीं बल्कि ब्रिटेन के उद्योगों को मजबूत करना था। भारतीय उद्योगों को कमजोर किया गया, स्थानीय उत्पादन को हतोत्साहित किया गया और ब्रिटिश वस्तुओं को यहाँ के बाजार में उतारा गया। इसी के साथ ब्रिटिश प्रशासनिक ढाँचे को अत्यंत शक्तिशाली बनाया गया। भारतीय सिविल सेवा (ICS) को ब्रिटिश साम्राज्य का “स्टील फ्रेम” कहा जाता था। यह वही वर्ग था जो पूरे उपनिवेश पर शासन करता था। धीरे-धीरे समाज में यह धारणा बनने लगी कि वास्तविक शक्ति और प्रतिष्ठा उसी के पास है जिसके पास प्रशासनिक अधिकार है।
स्वतंत्रता के बाद यह अपेक्षा थी कि भारत अपनी व्यापारिक और औद्योगिक परंपरा को पुनर्जीवित करेगा। लेकिन स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई आर्थिक नीतियों ने समाज को एक अलग दिशा में ढाल दिया। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने राज्य-नियंत्रित आर्थिक मॉडल अपनाया जिसे नेहरूवियन समाजवाद कहा जाता है। इस मॉडल में सार्वजनिक क्षेत्र को अत्यधिक महत्व दिया गया और निजी उद्योग पर अनेक प्रकार के नियंत्रण लगाए गए। उद्योग स्थापित करने के लिए लाइसेंस प्रणाली लागू की गई जिसे बाद में लाइसेंस-परमिट-क्वोटा राज कहा गया।
इस व्यवस्था में कोई भी उद्योग स्थापित करने के लिए अनेक सरकारी अनुमतियों की आवश्यकता होती थी। उत्पादन बढ़ाने से लेकर आयात-निर्यात तक हर चीज के लिए सरकारी अनुमति आवश्यक थी। परिणाम यह हुआ कि प्रशासनिक तंत्र अत्यंत शक्तिशाली बन गया और उद्यमिता कठिन होती चली गई। इससे समाज में यह मानसिकता और मजबूत होती गई कि सरकारी पद ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
समस्या केवल आर्थिक नीतियों तक सीमित नहीं रही। सांस्कृतिक और बौद्धिक क्षेत्र में भी एक विचारधारा का प्रभाव दिखाई दिया जिसे आज कई लोग कल्चरल मार्क्जिम के प्रभाव के रूप में देखते हैं। फिल्मों, साहित्य और सार्वजनिक विमर्श में व्यापारी और उद्योगपति को अक्सर लालची, भ्रष्ट या शोषक के रूप में चित्रित किया गया। दशकों तक हिंदी फिल्मों में “सेठ” या “व्यापारी” खलनायक की भूमिका में दिखाया जाता रहा जबकि सरकारी अधिकारी व्यवस्था के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किए जाते रहे। इससे धीरे-धीरे समाज में यह धारणा बनती चली गई कि व्यवसाय करना या धन कमाना किसी तरह संदिग्ध गतिविधि है।
राजनीतिक विमर्श ने भी इस मानसिकता को मजबूत किया। आज भी सार्वजनिक मंचों पर उद्योगपतियों को “चोर” कह देना सामान्य राजनीतिक भाषा का हिस्सा बन गया है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कई सभाओं में अडानी और अंबानी जैसे उद्योगपतियों पर तीखे आरोप लगाए हैं और उन्हें सार्वजनिक मंचों से कठघरे में खड़ा किया है। लोकतंत्र में आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन जब उद्यमिता और उद्योग को लगातार संदेह की दृष्टि से देखा जाता है तो उसका असर समाज की सोच पर भी पड़ता है।
इसके विपरीत वास्तविकता यह है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में उद्यमी और तकनीकी नवोन्मेषक ही विकास की असली शक्ति होते हैं। उदाहरण के लिए Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बु ने भारत में स्वदेशी सॉफ़्टवेयर पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने का प्रयास किया है। Zoho ने वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करते हुए अनेक सॉफ्टवेयर उत्पाद बनाए और ग्रामीण भारत में तकनीकी रोजगार सृजित करने की पहल की। लेकिन ऐसी उपलब्धियों को समाज में वह सम्मान नहीं मिलता जो प्रशासनिक सेवाओं को मिलता है।
भारत में वैज्ञानिकों के साथ भी कई चिंताजनक घटनाएँ हुई हैं। महान परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की 1966 में विमान दुर्घटना में मृत्यु हुई जिसके बारे में समय-समय पर कई सवाल उठते रहे हैं। इसके अलावा भारतीय वैज्ञानिकों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों को लेकर भी कई बार चर्चाएँ हुई हैं। 1994 में भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक नंबी नारायणन को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में यह साबित हुआ कि आरोप पूरी तरह झूठे थे। लेकिन उस घटना के कारण भारत का क्रायोजेनिक इंजन कार्यक्रम लगभग दो दशक पीछे चला गया। यह उदाहरण बताता है कि किस तरह एक वैज्ञानिक पर लगे झूठे आरोप पूरे देश के वैज्ञानिक कार्यक्रम को प्रभावित कर सकते हैं।
यदि हम आज भारत की शोध और नवाचार की स्थिति देखें तो तस्वीर मिश्रित दिखाई देती है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन अनुसंधान एवं विकास पर होने वाला खर्च अभी भी जीडीपी का लगभग 0.6 से 0.7 प्रतिशत ही है। इसके विपरीत अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे देश अपने जीडीपी का 2 से 4 प्रतिशत तक शोध और विकास पर खर्च करते हैं। पेटेंट फाइलिंग और गहरे वैज्ञानिक अनुसंधान के मामलों में भी भारत अभी बहुत पीछे है। इसका एक कारण यह भी है कि समाज में शोध और नवाचार को उतना सामाजिक महत्व नहीं मिला जितना प्रशासनिक सेवाओं को मिला।
आज सिविल सेवा का आकर्षण केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण नहीं है। इसके साथ एक बड़ा कोचिंग उद्योग भी जुड़ चुका है। दिल्ली के मुखर्जी नगर से लेकर प्रयागराज, जयपुर और पटना तक हजारों कोचिंग संस्थान इस परीक्षा की तैयारी कराते हैं। लाखों विद्यार्थी कई-कई वर्ष तक तैयारी करते रहते हैं जबकि चयन का प्रतिशत अत्यंत कम होता है।
दुनिया का आर्थिक ढाँचा तेजी से बदल रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीकों के आने से कौशल आधारित कामों की मांग बढ़ रही है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने 29 दिसंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा था कि आने वाले समय में पारंपरिक कॉलेज डिग्रियों का महत्व कम हो सकता है और उनकी जगह एआई आधारित कौशल और व्यावहारिक ज्ञान अधिक महत्वपूर्ण होगा। उनका संकेत स्पष्ट था—भविष्य का युग कौशल, नवाचार और तकनीकी दक्षता का होगा।
ऐसे समय में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या भारत के युवाओं को अपनी सबसे ऊर्जावान आयु केवल सरकारी सेवाओं की तैयारी में लगा देनी चाहिए? आज एक कुशल सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डेटा वैज्ञानिक या तकनीकी विशेषज्ञ वैश्विक बाजार में उस आय से कई गुना अधिक कमा सकता है जो किसी सिविल सेवा अधिकारी को वेतन के रूप में मिलती है। एक उद्यमी न केवल स्वयं आर्थिक रूप से सफल होता है बल्कि हजारों लोगों के लिए रोजगार भी पैदा करता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि सिविल सेवा का महत्व है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या समाज को केवल उसी को प्रतिभा का सर्वोच्च प्रतीक मानना चाहिए। जिस देश की ऐतिहासिक पहचान व्यापार, शिल्प, विज्ञान और नवाचार की रही हो, वहाँ यदि उद्यमियों और व्यापारियों को “चोर” कहकर संबोधित किया जाए और प्रशासनिक सेवा को ही सर्वोच्च उपलब्धि बना दिया जाए तो यह निश्चित रूप से चिंतन का विषय है।
भारत की वास्तविक शक्ति उसके वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं, उद्यमियों और नवोन्मेषकों में निहित है। यदि भारत को इक्कीसवीं सदी में एक वास्तविक वैश्विक शक्ति बनना है तो उसे अपनी सामाजिक मानसिकता में संतुलन लाना होगा—जहाँ प्रशासन का सम्मान हो, लेकिन विज्ञान, शोध, नवाचार और उद्यमिता को उससे कम महत्व न दिया जाए। तभी वह देश जो कभी दुनिया का बड़ा विनिर्माण और व्यापारिक केंद्र था, फिर से अपनी वास्तविक क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ सकेगा।

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