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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
हिंदू समाज की जीवंतता और जीवटता को देखकर कई बार मन में एक प्रश्न उठता है आख़िर यह समाज किस शक्ति के सहारे हजारों-लाखों वर्षों से खड़ा है? इतिहास में कितनी ही सभ्यताएँ आईं और चली गईं। कुछ समय तक वे अत्यंत शक्तिशाली दिखीं, फिर धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गईं। मिस्र, सुमेर, बेबीलोन, माया—इन सबकी अपनी महानता थी, पर आज वे केवल पुरातात्विक स्मृतियाँ हैं। इसके विपरीत भारत का सनातन समाज है, जो बार-बार आघात सहता है, संकटों से गुजरता है, पर समाप्त नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता है कि यह समाज केवल एक ऐतिहासिक समुदाय नहीं है, बल्कि सृष्टि की उस चिरंतन व्यवस्था का अंग है जो काल के साथ निरंतर चलती रहती है।
भारतीय शास्त्र सृष्टि को किसी एक बार की घटना नहीं मानते। हमारे यहाँ सृष्टि का विचार चक्रीय है। विष्णु पुराण में कहा गया है
“सृष्टिस्थितिलयानां यो हेतुर्भूतः सनातनः।
स एव विष्णुरित्युक्तः सर्वकारणकारणम्॥”
अर्थात सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—इन सबका जो सनातन कारण है वही भगवान विष्णु हैं। वही समस्त कारणों के भी कारण हैं।
पुराणों में सृष्टि के चक्र को समझाने के लिए एक सरल उदाहरण दिया गया है—जैसे हमारे जीवन में दिन और रात्रि का क्रम चलता है, वैसे ही ब्रह्मांड में सृष्टि और प्रलय का क्रम चलता रहता है। सृष्टि प्रकट होती है, फिर प्रलय में उसी परम तत्व में लीन हो जाती है, और फिर उसी से नई सृष्टि का आरंभ होता है।
इस दृष्टि से देखें तो न जाने कितनी बार सृष्टि बनी और न जाने कितनी बार वह परम तत्व में लीन हुई। पर हर बार धर्म की चेतना फिर प्रकट होती है और उसी चेतना के साथ यह सनातन समाज फिर खड़ा दिखाई देता है।
अब प्रश्न उठता है कि मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई।
शास्त्र बताते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में दो प्रकार की सृष्टि हुई मानस सृष्टि और मैथुनिक सृष्टि। प्रारंभ में ब्रह्मा ने अपने मन से संतानों को उत्पन्न किया। इसे मानस सृष्टि कहा गया। ब्रह्मा के मन से सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार जैसे ऋषि प्रकट हुए। उसके बाद अनेक प्रजापति उत्पन्न हुए।
लेकिन इस प्रकार सृष्टि का विस्तार सीमित था। तब मैथुनिक सृष्टि का आरंभ हुआ। इसी क्रम में स्वायंभुव मनु और शतरूपा प्रकट हुए। पुराणों में वर्णन मिलता है कि मानव वंश की परंपरा इन्हीं से आगे बढ़ी। इसी कारण “मनुष्य” शब्द “मनु” से जुड़ा माना जाता है।
इसके बाद सप्तऋषियों की परंपरा आती है कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज। इन ऋषियों से अनेक गोत्र और वंश आगे बढ़े।
इसी कारण भारतीय समाज में गोत्र व्यवस्था का महत्व है। गोत्र बताता है कि हम किस ऋषि परंपरा से जुड़े हैं। इसी प्रकार कुल और वंश परंपरा समाज की स्मृति को जीवित रखती है। हर कुल का अपना कुलदेवता या कुलदेवी होता है। यह केवल पूजा की परंपरा नहीं है, बल्कि उस वंश की आध्यात्मिक पहचान है।
भारतीय समाज की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ विचारों की अद्भुत विविधता है। यहाँ केवल एक ही परंपरा नहीं है। यहाँ ब्राह्मण परंपरा भी है और श्रमण परंपरा भी। ब्राह्मण परंपरा वेद, उपनिषद, यज्ञ और दर्शन की परंपरा है। श्रमण परंपरा तप, ध्यान, योग और संन्यास की परंपरा है। इसी श्रमण धारा से आगे चलकर बौद्ध और जैन परंपराएँ विकसित हुईं।
इसी भूमि पर 4 वेद, 108 उपनिषद, 18 पुराण और 9 दर्शन की परंपरा विकसित हुई। इसी भूमि पर तंत्र साधना की परंपरा विकसित हुई। इसी भूमि से बौद्ध, जैन और सिख परंपराएँ भी निकलीं। यहाँ तक कि चार्वाक जैसे भौतिकवादी मत भी इसी बौद्धिक परंपरा के भीतर चर्चा में आए।
इतनी विविधता के बाद भी यह समाज एक साथ खड़ा है। इसका कारण केवल शास्त्र नहीं हैं, बल्कि वह आंतरिक चेतना है जिसे भारतीय चिंतन में “चिति” कहा गया है।
चिति का अर्थ है समाज की वह आत्मचेतना, वह आंतरिक शक्ति, जो उसे जीवित रखती है। यही चिति धर्म के रूप में समाज को दिशा देती है। यही चिति पीढ़ियों के माध्यम से लोकजीवन में प्रवाहित होती रहती है।
इसी कारण धर्म केवल ग्रंथों में नहीं है, वह जीवन के व्यवहार में भी है। गाँव की वह दादी जिसने कभी वेद नहीं पढ़े, वह भी सूर्य को अर्घ्य देती है। वह चींटियों को आटा डालती है। पहली रोटी गाय के लिए और अंतिम रोटी कुत्ते के लिए निकालती है। गर्मी में पक्षियों के लिए पानी रखती है। यह सब किसी विद्यालय ने नहीं सिखाया। यह सब उसी चिति के कारण पीढ़ियों से चलता आया है।
इसी चिति का एक अद्भुत दृश्य हमें प्रयागराज महाकुंभ में दिखाई देता है। पिछले महाकुंभ में लगभग ६७ करोड़ लोग पहुँचे। इतनी बड़ी संख्या किसी आदेश से नहीं आती। यह आस्था का प्रवाह है। लोग कठिनाइयाँ झेलते हैं, भीड़ सहते हैं, परन्तु फिर भी वहाँ पहुँचते हैं। मैं स्वयं प्रयागराज महाकुंभ गया था। मैंने वहाँ देखा कि लोग थके हुए थे, परन्तु उनके चेहरे पर संतोष था।
मीडिया में उस समय अनेक नकारात्मक बातें कही गईं अव्यवस्था है, दुर्घटनाएँ हो रही हैं परन्तु इसके बावजूद लोगों की आस्था कम नहीं हुई।
इसी तरह का एक क्षण 22 जनवरी 2024 को भी देखने को मिला। जब अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो रही थी, उस दिन का वातावरण कुछ अलग ही था। ऐसा लग रहा था मानो सदियों की प्रतीक्षा का कोई क्षण सामने आ गया हो।
मैंने अपनी आँखों से यह दृश्य देखा है। लोग अपने आँसू रोक नहीं पा रहे थे। केवल आस्तिक ही नहीं, कई ऐसे लोग भी थे जो स्वयं को नास्तिक कहते हैं, वे भी उस समय भावुक हो उठे थे। किसी की आँखें नम थीं, कोई चुपचाप खड़ा था, पर सबके भीतर कुछ चल रहा था।
वह केवल भावुकता का क्षण नहीं था। वह उस चिति का अपने आराध्य से मिलन था, जो इस समाज के भीतर सदियों से जीवित रही है।
हमारे पर्व भी इसी चेतना के विस्तार हैं। होली, नवरात्रि, रामनवमी, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, विजयदशमी, दीपावली ये केवल उत्सव नहीं हैं। इनमें जीवन का दर्शन छिपा हुआ है। यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
यदि हम इतिहास को देखें तो धर्म और अधर्म का संघर्ष निरंतर दिखाई देता है। पुराणों में 14 देवासुर संग्राम का वर्णन मिलता है। फिर रामायण में राम और रावण का युद्ध हुआ। उसके बाद महाभारत का भीषण युद्ध हुआ।
आज भी यह संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। पहले यह संघर्ष देव और दानव के बीच था। महाभारत में यह संघर्ष एक परिवार के भीतर था। आज वही संघर्ष समाज और विचारों के स्तर पर दिखाई देता है।
आज हमें इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, वामपंथ और अनेक वैचारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पर यदि हम काल के चक्र को समझ लें तो भय समाप्त हो जाता है।
हमारे शास्त्र बताते हैं कि सतयुग में धर्म चार पादों पर रहता है, त्रेता में तीन पर, द्वापर में दो पर और कलियुग में धर्म केवल 1 पाद पर रह जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म समाप्त हो गया है। इसका अर्थ केवल इतना है कि धर्म की शक्ति क्षीण हो जाती है।
इसीलिए हमारा कर्तव्य केवल इतना है कि हम धर्मरूपी चिति के बीज का संरक्षण करें।
इतिहास बताता है कि बड़े परिवर्तन हमेशा अल्पसंख्या के जाग्रत लोगों ने ही किए हैं। यदि समाज में केवल 1% धर्मनिष्ठ सनातनी भी खड़े हो जाएँ तो वही समाज की दिशा बदलने के लिए पर्याप्त होते हैं।
हमें भीड़ नहीं चाहिए। हमें केवल बीज बचाना है। क्योंकि जब बीज सुरक्षित रहता है तो समय आने पर वही बीज वटवृक्ष बन जाता है।
और यही सनातन समाज की वास्तविक शक्ति है धर्मरूपी चिति, जो हर संकट के बाद फिर खड़ी हो जाती है और समाज को पुनः खड़ा कर देती है।
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