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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
जय सनातन भारत – अतुल्य भारत, अखण्ड भारत समूह के तत्वावधान में दिनांक 14 मार्च 2026 को दोपहर 2:30 बजे DLG सिनेमा, कटनी में बहुचर्चित फिल्म “द केरला स्टोरी–2” की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की गई। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य समाज में व्यापक जन-जागरूकता उत्पन्न करना तथा विशेष रूप से युवतियों और मातृशक्ति को लव जिहाद जैसे गंभीर विषय के प्रति सजग करना था, जिससे समाज में सतर्कता, विचार-विमर्श और सामाजिक चेतना का वातावरण निर्मित हो सके।
इस कार्यक्रम की पृष्ठभूमि भी अत्यंत प्रेरक रही। दिनांक 12 मार्च 2026, गुरुवार प्रातः जय सनातन भारत – अतुल्य भारत – अखण्ड भारत समूह के संस्थापक एवं संयोजक ( बाल योगी )द्वारा समूह के व्हाट्सएप मंच पर “द केरला स्टोरी–2” फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित करने के संबंध में चर्चा प्रारंभ की गई। इस विषय पर समूह के सदस्यों के मध्य गंभीर विचार-विमर्श हुआ और अंततः सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि समाज में जागरूकता लाने के लिए इस प्रकार का कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए।
सदस्यों की सहमति के पश्चात कार्यक्रम की तैयारियाँ प्रारंभ की गईं। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए माधवेंद्र सिंह जी तथा राजीव गुप्ता जी से संपर्क स्थापित किया गया और उनके सहयोग से कार्यक्रम की रूपरेखा को अंतिम रूप प्रदान किया गया। विचार-विमर्श और समन्वय के उपरांत 14 मार्च 2026 की तिथि इस विशेष स्क्रीनिंग के लिए निर्धारित की गई।
कार्यक्रम के लिए कटनी नगर के दो विद्यालय एवं कन्या महाविद्यालय से संपर्क स्थापित किया गया तथा छात्राओं और उनकी माताओं को इस कार्यक्रम में सहभागी बनने हेतु आमंत्रित किया गया। समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद स्थापित कर उन्हें इस विषय की गंभीरता से अवगत कराया गया।
इस विशेष स्क्रीनिंग में कुल लगभग 270 लोगों को फिल्म दिखाई गई। इनमें से लगभग 210 छात्राएँ दो विद्यालय एवं कन्या महाविद्यालय से उपस्थित हुईं। उनके साथ उनके परिवारों की माताएँ तथा अन्य नागरिक भी उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त कटनी नगर के लगभग 20 गणमान्य नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की महत्ता को और अधिक बढ़ाया।
इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में माधवेंद्र सिंह जी, मनीष सिंह जी तथा राजीव गुप्ता जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके सहयोग, समन्वय और सक्रिय सहभागिता से यह आयोजन सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न हो सका। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला प्रचारक चंदन जी (भाईसाहब) की भी गरिमामयी उपस्थिति रही, जिसने कार्यक्रम को और अधिक प्रेरणादायक बना दिया।
इस आयोजन के लिए आवश्यक आर्थिक सहयोग जय सनातन भारत – अतुल्य भारत – अखण्ड भारत समूह के सदस्यों तथा कटनी नगर के कुछ गणमान्य नागरिकों द्वारा प्रदान किया गया, जिसके कारण यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सका।
द केरला स्टोरी–2 : स्वधर्म बोध, इतिहास बोध और समाज की चेतना
“द केरला स्टोरी–2” केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक और वैचारिक संकट की ओर संकेत करने का प्रयास भी है जिसे आज भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा महसूस किया जा रहा है। इस फिल्म की चर्चा के केंद्र में केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि वह प्रश्न है कि जब समाज की नई पीढ़ी अपने धर्म, अपने इतिहास, अपने परिवार और अपनी सांस्कृतिक चेतना से दूर हो जाती है तो वह किस प्रकार भ्रम, प्रलोभन और वैचारिक प्रभावों का शिकार हो सकती है।
बहुत से सामाजिक विचारकों का मत है कि भारत में लंबे समय से एक ऐसा वातावरण बनाया गया जिसमें इतिहास और समाज से जुड़े अनेक विषयों पर खुलकर चर्चा नहीं हो सकी। बार-बार यह कहा गया कि सभी मुसलमान एक जैसे नहीं होते—यह बात अपने स्थान पर सही है—लेकिन इसके साथ-साथ समाज को इतिहास, परिस्थितियों और सामाजिक चुनौतियों के प्रति सजग करने का प्रयास भी पर्याप्त रूप से नहीं हुआ।
इसी संदर्भ में भारतीय चिंतन में समाज की चेतना को समझने के लिए सात महत्वपूर्ण बोधों की चर्चा की जाती है—
स्वधर्म बोध
कर्तव्य बोध
शत्रु बोध
सौंदर्य बोध
इतिहास बोध
पुरखों का बोध
परिस्थिति बोध
जब समाज में ये सातों बोध जीवित रहते हैं तो समाज संतुलित, संगठित और सुरक्षित रहता है। किंतु जब ये बोध कमजोर पड़ जाते हैं, तब समाज भ्रम और विखंडन की स्थिति में पहुँच सकता है।
स्वधर्म बोध
स्वधर्म बोध का अर्थ है अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपने जीवन मूल्यों की समझ होना। भारतीय परंपरा में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि वह जीवन को संतुलित और अनुशासित बनाने वाली व्यवस्था है।
जब व्यक्ति को अपने धर्म और संस्कारों का ज्ञान नहीं होता, तब वह अपनी पहचान से दूर हो जाता है। “द केरला स्टोरी–2” की कहानी के संदर्भ में भी यह प्रश्न उठाया जाता है कि यदि युवतियों में अपने धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूकता कम हो जाए तो वे कई बार छल और प्रलोभन का शिकार हो सकती हैं।
कर्तव्य बोध
कर्तव्य बोध का अर्थ है अपने दायित्वों को समझना। भारतीय संस्कृति में अधिकारों से पहले कर्तव्यों की चर्चा की गई है। परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के कुछ कर्तव्य होते हैं।
माता-पिता का सम्मान, परिवार की मर्यादा, समाज के प्रति जिम्मेदारी और राष्ट्र के प्रति निष्ठा—ये सभी कर्तव्य बोध के ही अंग हैं।
शत्रु बोध
शत्रु बोध का अर्थ किसी समुदाय के प्रति घृणा करना नहीं है। इसका अर्थ है उन विचारों और प्रवृत्तियों की पहचान करना जो समाज के लिए हानिकारक हो सकती हैं। इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जब समाज अपने सामने खड़ी चुनौतियों को पहचानने में असफल रहा और उसका परिणाम गंभीर रूप में सामने आया।
सौंदर्य बोध
सौंदर्य बोध का अर्थ केवल बाहरी आकर्षण नहीं है। भारतीय संस्कृति में सौंदर्य का संबंध मर्यादा, संयम, शील और संस्कारों से है। जब समाज का सौंदर्य बोध केवल बाहरी आकर्षण तक सीमित रह जाता है, तब जीवन के गहरे मूल्य कमजोर होने लगते हैं ।
इतिहास बोध
इतिहास बोध समाज की सांस्कृतिक स्मृति है। इतिहास हमें यह बताता है कि समाज किन परिस्थितियों से गुज़रा और किन संघर्षों का सामना किया। भारत का इतिहास भी अनेक संघर्षों और परिवर्तनों से गुज़रा है। मध्यकालीन कालखंड में विदेशी आक्रमणों और सांस्कृतिक संघर्षों के अनेक उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। कई ऐतिहासिक स्रोतों में मंदिरों के विध्वंस और युद्धों का उल्लेख मिलता है, यद्यपि इन घटनाओं की संख्या को लेकर इतिहासकारों में मतभेद भी पाए जाते हैं।
पुरखों का बोध
पुरखों का बोध का अर्थ है अपने पूर्वजों के अनुभवों और परंपराओं से जुड़ाव होना। भारतीय समाज में पूर्वजों को केवल अतीत का हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें जीवन की निरंतरता का आधार माना गया है।
परिस्थिति बोध
परिस्थिति बोध का अर्थ है वर्तमान समय की परिस्थितियों को समझना। समाज निरंतर बदलता रहता है और नई चुनौतियाँ सामने आती रहती हैं। यदि समाज इन परिस्थितियों को समझने में असफल रहता है तो वह समय के अनुसार अपने निर्णय नहीं ले पाता।
इतिहास और सामाजिक संघर्ष एवं समकालीन घटनाएँ
भारत का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रहा है, किंतु इसके साथ-साथ संघर्षों का एक लंबा दौर भी इस देश ने देखा है। लगभग एक हजार वर्षों तक विदेशी इस्लामी आक्रमणों का कालखंड भारत के इतिहास में दर्ज है। अनेक इतिहासकारों ने इस काल में मंदिरों के विध्वंस और सांस्कृतिक केंद्रों पर हमलों का उल्लेख किया है। इतिहासकार रिचर्ड एम. ईटन ने अपने शोध में लगभग 80 प्रमुख मंदिर विध्वंस की घटनाओं का दस्तावेजी उल्लेख किया है, जबकि अन्य लेखकों ने इस संख्या को इससे अधिक बताया है।
मध्यकालीन इतिहास के संदर्भ में इतिहासकार के. एस. लाल ने अपनी पुस्तक Growth of Muslim Population in Medieval India में अनुमान व्यक्त किया कि 1000 से 1525 ईस्वी के बीच भारत की जनसंख्या में लगभग 6 से 8 करोड़ की कमी हुई, जिसे उन्होंने युद्धों, आक्रमणों और हिंसा से जोड़ा। हालांकि इस अनुमान को लेकर इतिहासकारों में मतभेद भी हैं, फिर भी यह चर्चा में अक्सर उद्धृत किया जाता है।
अंग्रेजों के आगमन के बाद जब धीरे-धीरे इस्लामी सल्तनतों का अंत हुआ, तब भी देश में सामाजिक तनाव समाप्त नहीं हुआ। विभिन्न शहरों में दंगों की घटनाएँ सामने आती रहीं। स्वतंत्रता के बाद भी यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
भारत के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक 1947 का विभाजन था। विभाजन के समय व्यापक हिंसा हुई। इतिहासकारों के अनुसार उस समय लगभग 10 से 20 लाख लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 1.4 से 1.5 करोड़ लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए। लाखों हिंदू और सिख पाकिस्तान से भारत आए, जबकि बड़ी संख्या में मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए।
विभाजन की वैचारिक पृष्ठभूमि में दो-राष्ट्र सिद्धांत की चर्चा होती है। इसके प्रमुख समर्थकों में से एक सर सैयद अहमद खान थे, जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में यह विचार व्यक्त किया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमें हैं वो एक साथ नहीं रह सकतीं हैं।
स्वतंत्रता के बाद भी देश ने कई बार सांप्रदायिक दंगों और आतंकवादी घटनाओं का सामना किया। 1969 के अहमदाबाद दंगे, 1989 का भागलपुर दंगा, 1992-93 के मुंबई दंगे, 2002 के गुजरात दंगे,2005 का मऊ दंगा, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे और 2020 के दिल्ली दंगे जैसी घटनाएँ आधुनिक भारत के इतिहास का हिस्सा हैं। इसके अतिरिक्त 1993 के मुंबई बम धमाके, 2001 का संसद हमला, 2008 का मुंबई 26/11 हमला और 2019 का पुलवामा हमला एवं कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में पिछले वर्ष 2025 में हुए पहलगाम में निहत्थे हिंदू पर्यटकों, जिसमें इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछकर 26 हिंदुओं की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस प्रकार की घटनाएँ समाज के भीतर भय और चिंता का वातावरण उत्पन्न करती हैं और यह प्रश्न खड़ा करती हैं कि कट्टरपंथ और आतंकवाद की समस्या से किस प्रकार निपटा जाए।
इसी प्रकार भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी समय-समय पर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के साथ हिंसा की घटनाएँ सामने आती रही हैं। कुछ माह पहले बांग्लादेश में इस्लामिक जिहादियों द्वारा दीपू दास नामक एक हिंदू युवक को जिंदा जला दिया गया था। इस घटना के बाद व्यापक आक्रोश उत्पन्न हुआ। इस प्रकार की घटनाएँ दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रश्न को बार-बार सामने लाती हैं।
देश के भीतर भी सामाजिक तनाव की कुछ घटनाएँ सामने आती रहती हैं। उदाहरण के लिए, 4 मार्च 2026 को होली के दिन दिल्ली में तरुण नामक युवक की हत्या की घटना का उल्लेख करना अति आवश्यक है। तरुण की बहन बालकनी में रंग खेल रही थी। उसी वक्त रंग से भरा एक गुब्बारा सड़क से निकल रही एक मुस्लिम महिला के कपड़ों पर गिर गया था, जिसके बाद उस महिला ने लगभग 40 लोगों को फोन करके बुलाया और तरुण खटिक नामक युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई।
ऐसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि समाज में आपसी विश्वास और संवाद की कमी होने पर छोटी-सी बात भी गंभीर संघर्ष का रूप ले सकती है। इसलिए आवश्यक है कि समाज में शांति, संवाद और कानून के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत किया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की हिंसा या कट्टरता को बढ़ावा न मिले।
इसी संदर्भ में कुछ मामलों ने समाज का ध्यान संगठित धर्मांतरण के आरोपों की ओर भी खींचा। उदाहरण के लिए इस्लामिक दावा सेंटर के संस्थापक मोहम्मद उमर गौतम के मामले में हजारों लोगों के धर्मांतरण के आरोप लगे और सितंबर 2024 में न्यायालय ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में रहने वाले छांगुर बाबा उर्फ जलालुद्दीन से जुड़े मामलों की जाँच आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) द्वारा की जा रही है। जाँच में धर्मांतरण से जुड़े नेटवर्क और विदेशी स्रोतों से आर्थिक सहायता मिलने की आशंका की भी पड़ताल की गई।
इन घटनाओं ने समाज के सामने कई प्रश्न खड़े किए हैं। क्या इन विषयों पर गंभीर और संतुलित चर्चा होनी चाहिए? क्या समाज को इतिहास और वर्तमान परिस्थितियों के प्रति अधिक सजग होना चाहिए? अक्सर देखा गया है कि ऐसे विषयों पर खुलकर चर्चा करने से बचा जाता है।
आधुनिक समाज की चुनौती
इसके साथ-साथ समाज के सामने एक और बड़ी चुनौती है परिवार व्यवस्था का कमजोर होना। संयुक्त परिवार धीरे-धीरे टूट रहे हैं और एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है और कई बार युवाओं को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। धर्म, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों के प्रति जागरूकता भी कम होती दिखाई देती है।
ऐसी स्थिति में समाज को केवल समस्याओं पर चर्चा करने के बजाय समाधान की दिशा में भी प्रयास करने होंगे। समाज को अपनी सकारात्मक परंपराओं को पुनर्जीवित करना होगा। साप्ताहिक हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ, सामाजिक मिलन और परिवार के साथ समय बिताने की परंपरा समाज को जोड़ने का कार्य कर सकती है। प्रत्येक परिवार को सप्ताह में कम से कम एक दिन ऐसा निर्धारित करना चाहिए जब परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर संवाद करें।
संयुक्त परिवार व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा और परिवार में मुखिया की भूमिका तथा उसकी मर्यादा को पुनः स्थापित करना होगा। इसी प्रकार ग्राम पंचायतों और सामाजिक संस्थाओं को भी मजबूत बनाना आवश्यक है ताकि समाज के भीतर संवाद और अनुशासन बना रहे। महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित ग्राम स्वराज और पंचायती व्यवस्था का मूल भाव भी यही था कि समाज स्वयं संगठित और सक्षम बने।
यदि समाज अपने संगठन, परिवार और सांस्कृतिक परंपराओं को मजबूत नहीं करेगा तो उपभोक्तावाद और भौतिकतावाद के इस दौर में संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाएगा। इसलिए समय की आवश्यकता है कि समाज अपने संस्कारों और मूल्यों को पुनः सुदृढ़ करे।
समाज की वास्तविक शक्ति उसके संगठन, उसके संस्कार और उसकी चेतना में होती है। जब व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक संतुलित व्यवस्था बनती है, तभी स्थायी परिवर्तन संभव होता है। भारतीय परंपरा में इसे “संभूय समुत्थान” कहा गया है—अर्थात मिलकर उठना और मिलकर आगे बढ़ना।
जय सनातन भारत – अतुल्य भारत – अखण्ड भारत समूह की ओर से यह एक छोटा-सा प्रयास है एक दीप जलाने का प्रयास। परंतु अपनी बहनों की सुरक्षा, परिवार व्यवस्था की सुदृढ़ता और जाति-कुल-वंश परंपरा की रक्षा करना प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है। यह प्रयास केवल फिल्म दिखाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज में छोटे-छोटे स्तर पर निरंतर चलते रहना चाहिए।
यदि हम अपने परिवार, कुटुंब, जाति, कुल और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा कर सके, तो यही सनातन हिंदू समाज और भारत की रक्षा का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होगा। यदि यह सुरक्षा कवच कमजोर हुआ, तो इतिहास हमें यह भी दिखाता है कि समाज के सामने गंभीर संकट खड़े हो सकते हैं।
इसलिए अभी समय है कि हम जागें, अपने घरों में धर्म और संस्कार का दीपक जलाएँ और आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ें।
भारतीय परंपरा का यह शाश्वत संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
“धर्मो रक्षति रक्षितः”
अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
जय सनातन। जय भारत।
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