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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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।।ॐ।।
*
- डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल
अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख *डॉ. प्रणव पण्ड्या* अपने ग्रंथ ' *क्रांति की करवट'* में भारत व विश्व के भविष्य के बारे में पृष्ठ- 28 पर लेख- *"कैसी होगी अगली क्रांति ?"* में लिखते हैं कि -
" *वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्भुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाशी प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंड़ता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगे भी उछल रही हैं। विनाश और विकास एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं,तो भी उनका एक ही समय में अपनी -अपनी दिशा में चल सकना संभव है। इन दिनों आकाश में सघन तमिस्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्ममुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है।"*
( *-परम पूज्य गुरुदेव: पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य* , अपनों से अपनी बात- "प्राणवान प्रतिभाओं की खोज" , अखंड ज्योति अक्टूबर- 1988, पृष्ठ, 42- 43 )
" *भयावह ध्वंस के साथ सकारात्मक सृजन को मैं स्पष्ट अनुभव कर रहा हूं।* यह बात अर्नाल्ड जोसेफ टायनबी ने अपनी पत्नी श्रीमती वेरोनिका एम. बौल्टर से कहीं। श्रीमती वेरोनिका उनकी पत्नी होने के साथ उनके शोध सहायिका भी थी। इस समय वह अपने पति अर्नाल्ड के साथ अपने ही घर के पुस्तकालय में बैठी हुई थी। उनके साथ टायनबी के विश्वासपात्र सहयोगी विलियम रॉजर्स भी थे। इस समय टॉयनबी अपनी आयु के 85 वर्ष पूरा कर रहे थे। उनके अध्ययन एवं अनुभव की समूचे विश्व में चर्चा होती रहती थी। उनके द्वारा लिखा गया ग्रंथ -" *ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री" - 12 खंडो में प्रकाशित हुआ था।* इसे विश्व भर के सभी विश्वविद्यालयों एवं विशेषज्ञों ने सराहा था। इसके अलावा उनकी रचनाएं 'सिविलाइजेशन ऑन ट्रायल' , -ईस्ट टू वेस्ट' एवं 'हेलेनिज्म' भी बहु प्रसंसित रही।
' *अर्नाल्ड टॉयनबी* ' विश्व इतिहास के पारखी विद्वान थे। विश्व भर के सभी देशों की सभ्यताओं, संस्कृतियों एवं उनके इतिहास पर उनकी सूक्ष्म पकड़ थी। ब्रिटेन की सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर हमेशा उनकी सलाह लेती थी। अपने जीवन में समय-समय पर उन्होंने अनेकों महत्वपूर्ण दायित्व निभाए थे। विश्व के सभी इतिहास विशेषज्ञ व राजनीतिक विश्लेषक उनकी किसी भी टिप्पणी को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते थे। *विद्वान होने के साथ वह उच्च कोटि के तपस्वी, साधक थे। लंदन में उनका जीवन भारत के प्राचीन ऋषियों की भांति था। दैवी विभूति के रूप में उन्हें भविष्य दर्शन की अपूर्व क्षमता प्राप्त थी।* तभी तो सुप्रसिद्ध ' *टाइम' पत्रिका ने उन्हें 'अंतर्राष्ट्रीय संत' की उपाधि दी* थी।
*इस समय भी वह अनुभव की चर्चा कर रहे थे। यह ऐसा अनुभव था जो उन्होंने ध्यान की गहराइयों में पाया था। साथ ही उनका संपूर्ण ऐतिहासिक व राजनीतिक ज्ञान इसे सहित ठहरा रहा था।* वह कह रहे थे- वेरोनिका! मैंने दो महायुद्धों को अपने सामने होते हुए देखा है। इन महायुद्दौं में हुई विभिषिकाँएं और त्रासदी मैंने अपने सामने प्रत्यक्ष घटित होते देखी है। इसमें से द्वितीय महायुद्ध में तो एक प्रकार से मेरी भागीदारी ही रही है। मैंने स्वयं जाकर हिटलर का इंटरव्यू लिया था। इस दूसरे महायुद्ध से संबंधित अनेको शांति वार्ताओं में मेरा महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसा कहते हुए उन्होंने पुस्तकालय से बाहर खिड़की की ओर झांका और चुप हो गए।
बाहर हल्की बूंदा-बांदी के साथ बर्फ गिर रही थी। हल्की बूंदो के साथ झरते बर्फ के श्वेत कण ऐसा लग रहा था कि पुस्तकालय के बाहर अहाते में लगे पेड़ स्नान करने के साथ अपना श्रंगार कर रहे हों । उन्हें इस तरह चुप देखकर वेरोनिका उठी और घर के अंदर से तीन कप काफी बना लाई। उन्होंने एक कप काफी अर्नाल्ड के सामने और एक कप रोजर्स के सामने रखी तीसरा कप स्वयं अपने हाथों में ले लिया। अर्नाल्ड को इस तरह चुप देखकर रोजर्स ने वेरोनिका की ओर देखा, फिर धीरे से कहा- क्या सोचने लगे सर? रोजर्स की इस बात पर उन्होंने *गंभीर स्वर से कहा - इस बार का ध्वंस पहले हुए सभी ध्वंसात्मक रूपों से अधिक भयावह और अधिक व्यापक होगा। लेकिन इसमें सबसे आश्चर्य पूर्ण बात यह है कि इसके साथ सकारात्मक सृजन की गतिविधियां भी चलती रहेगी।* जो *ध्वंस होगा उसमें प्रकृति निर्मित एवं मानव निर्मित सभी ढांचे ढ़हेंगे। साथ ही सृजन के नए सूत्र और सत्य उभर कर सामने आएंगे।*
टॉयनबी की यह बात थोड़ी अटपटी सी थी, जो वेरोनिका एवं रोजर्स को कम समझ में आयी। इसलिए उन दोनों ने लगभग एक साथ कहा- इसे थोड़ा और स्पष्ट करें । इस पर वह हल्के से हंसे और कहने लगे - प्रकृति निर्मित ढांचा है- पर्यावरण, जलवायु, मौसम इसी के साथ प्रकृति का सहज दृश्य रूप जैसे कि जंगल ,नदियां, पर्वत आदि । *सो अगले दिनों प्रकृति में ऐसी विचित्र लहरें उठेंगी की यह सब का सब परिवर्तित होता नजर आएगा।* भूकंप,समुद्री तूफान ,अतिवृष्टि, अनावृष्टि और भी ऐसे अनेक प्राकृतिक कारण इसके लिए जिम्मेदार होंगे।
*इसी तरह मानव निर्मित ढांचे भी ढ़हेंगे। अब मानव के द्वारा बनाए गए ढांचे हैं- राजनीतिक ढांचा, सामाजिक ढांचा, आर्थिक ढांचा, वैचारिक ढांचा ,शैक्षणिक ढांचा यहां तक की जीवन शैली का ढांचा। विचित्र और क्रांतिपूर्ण घटना क्रम इतनी तेजी से घटित होंगे कि पुराना सब कुछ टूटता - ढ़हता बिखरता चला जाएगा।* इसी के साथ मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह सभी किसी मानवीय प्रयास से नहीं होगा। *यह सब तो प्रकृति व परमेश्वर स्वयं करेंगे, इंसान तो व्यक्ति के रूप में व राष्ट्र के रूप में बस माध्यम बनता चला जाएगा।* बड़ी अजीबो-गरीब स्थिति बनेगी। *आमूल -चूल परिवर्तन करने वाली ऐसी संपूर्ण क्रांति घटित होने जा रही है, इसके संचालक स्वयं परमेश्वर होंगे।*
इतना कहकर वह शांत हुए और उन्होंने अपने हाथ की काफी समाप्त कर बड़ी गहरी सांस ली। फिर बोले- यह सत्य कहने में, स्वीकार करने में थोड़ी असहजता तो लगती है *फिर भी सत्य तो यही है कि पश्चिम ने जो भी ढांचे बनाए हैं, विनाश के जो भी सरंजाम जुटाये हैं, वह सभी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगे। और इसमें आश्चर्य की बात यह होनी है कि सर्वनाशी विश्वयुद्ध की स्थितियां बनते हुए भी विश्वयुद्ध नहीं होगा। महाशक्ति कहलाने वाला सोवियत रूस अपने स्वयं के कारणों से अपने महाशक्ति होने का दर्जा खो देगा। दूसरी महाशक्ति जिसे कहा समझा जाता है, वह अमेरिका इधर-उधर टकराकर, उलझकर स्वयं को कमजोर कर लेगा।*
टायनबी की यह बातें चकित करने वाली थी। इसे सुनकर विलियम रॉजर्स तो उठकर खड़े ही हो गए और कहने लगे- सर! *इस अगले महायुद्ध को रोकेगा कौन ? उत्तेजित मत हो रोजर्स! बैठ जाओ - इस महायुद्ध को रोकेगा- भारत देश से उठता आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रचंड प्रवाह । इसी प्रेरक प्रवाह से नव सृजन के सभी सूत्र उभरेंगे । इन्हीं सूत्रों से भविष्य के प्राकृतिक एवं मानवीय ढांचों को जाना समझा जाएगा।* इतना कहकर वह थोड़ा रुके फिर गंभीर स्वर में बोले- यह स्पष्ट हो चुका है कि *जिस अध्याय की शुरुआत पश्चिम से की गई है इसका समापन भारत से करना होगा, यदि अंत को मानव जाति के लिए आत्मघाती होने से बचाना है। इतिहास के इस खतरनाक मोड़ पर मनुष्यता के लिए उद्दार का एकमात्र उपाय भारतीय तौर- तरीके और भारतीय जीवन शैली में निहित हैं। ऐसा या तो विश्वमानवता स्वयं कर लेगी अथवा परमेश्वर उसे ऐसा करने के लिए विवश कर देंगे। होना यही है कैसे भी हो, भारतीय जीवन शैली की ओर सभी की वापसी निश्चित है। "*
क्रमशः .....
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