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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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।। ॐ।।
*1000 वर्ष का सतयुग आ रहा है, सावधान! युग बदल रहा है ....*
भाग- ८
डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल
अखिल विश्व गायत्री परिवार का साप्ताहिक अखबार 'प्रज्ञा अभियान' (16 जनवरी से 1 फरवरी 2026) के अंक में पृष्ठ क्रमांक -2 पर 'युग अवतार'- 'कल्कि अवतार' भारत व विश्व भवितव्य्ता के संदर्भ में एक लेख छपा है जिसका शीर्षक -
*" नवयुग का प्रज्ञावतार "*
युगऋषि पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने 19 वे नवीन पुराण 'प्रज्ञा पुराण' ( चार खंडो में ) की संरचना की है। इसमें उन्होंने भारत की अवतार परंपरा के अंतर्गत इस युग को बदलने के लिए चल रहे 'प्रज्ञावतार' के लीला संदोह, उसके उद्देश्य और प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी दी है। उनके द्वारा प्रतिपादित प्रज्ञा पुराण के प्रथम खंड के कुछ श्लोक की टीका प्रस्तुत है।
" इन दिनों सर्वत्र अनास्था का दौर है। अदूरदर्शिता ग्रस्त हो जाने से लोग मानवीय गरिमा को भूल गए हैं। अचिंत्य चिंतन और अनुपयुक्त आचरण में संलग्न हो रहे हैं,फलत: रोग ,शोक ,कलह ,भय और विनाश का वातावरण बन रहा है। भीषण विभीषिकाएं निरंतर धरती के अस्तित्व तक को चुनौती दे रही हैं। (अध्याय- 1/ 18 /20 )
इन दिनों मनुष्यों ने आंतरिक वरिष्ठता गवा दी है। फलत: अपने तथा सबके लिए संकट उत्पन्न कर रहे हैं। (अध्याय-1/24/26 )
' जब मनुष्य अपने बल -बूते दल-दल से उबर नहीं पता तो मुझे अवतार लेकर परिस्थितियां सुधारनी पड़ती हैं। इस बार सुविधा साधन रहते हुए भी मनुष्यों को जिस विनाश विभीषिका में फंसना पड़ रहा है, उसका मूल कारण आस्था संकट ही है। उसके निवारण हेतु मुझे इस अस्थिर समय में इस बार प्रज्ञा अवतार के रूप में अवतरित होना है। पिछले तेईस बार की तरह इस बार भी बिगड़े संतुलन को फिर से संभालना है। ( अध्याय- 1/27/30 )
( प्रज्ञा अवतार के प्रभाव से) वह दिन दूर नहीं जब समय बदल चुका होगा। मनुष्यों की चिंतन, चरित्र में भारी हेर- फेर उत्पन्न होगा। वे निकृष्टता से विमुख होकर उत्कृष्टता के ढांचे में ढ़लेंगे। संकीर्ण स्वार्थपरता घटेगी तो सतप्रवृतियां अनायास ही बढ़ती चली जाएगी।.... विषमता मिटेगी और एकता उत्पन्न होगी। समस्त मनुष्य एक राष्ट्र बना कर रहेंगे ,एक भाषा बोलेंगे। विश्व धर्म और मानवी संस्कृति को सभी प्रेम पूर्वक स्वीकार करेंगे। मनुष्य देवता जैसे दिखने लगेंगे और धरती के कोने- कोने में सुख शांति का स्वर्गीय वातावरण बन जाएगा। प्रज्ञायुग को भूतकाल के सतयुग से भी अधिक श्रेष्ठ समझ जाएगा और इसे ही वरिष्ठता का श्रेय प्राप्त होगा।
(अध्याय- 7/47/55 )
प्रज्ञायुग सर्वश्रेष्ठ युग होगा। उसे धरती पर उतारने वाले प्रज्ञा पुत्र श्लाघ्य हैं। उनकी भागीरथ जैसी भूमिका का उत्साहवर्धक वर्णन अगली पीडियों के लोग युगों- युगों तक करते रहेंगे। सुनने वाले इन युग सृजेताओं के भाग्य की सराहना करते हुए सोचेंगे, काश! हम उन दिनों रहे होते और कार्यरत बने होते तो कितने भाग्यवान कहलाते हैं। "
( अध्याय- 7/56 /63 )
क्रमशः .....
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