सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिन्दू समाज दिग्भ्रमित नहीं है, दिग्भ्रमित हिन्दू राजनीतिक नेतृत्व है

✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

आज एक बात बार-बार सुनने को मिलती है हिन्दू समाज दिग्भ्रमित है। समाज जातियों में बँट गया है। समाज ही अपनी समस्या है। पर मैं साफ़ शब्दों में पूछना चाहता हूँ समाज दिग्भ्रमित है या वह नेतृत्व जो समाज को समझे बिना निर्णय लेता है?


यूजीसी के विनियमों को लेकर जो विवाद उठा, वह केवल कागज़ी प्रक्रिया नहीं थी। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचना आई। 29 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगा दी। निर्णय सरकार ने लिया, रोक न्यायालय ने लगाई। समाज कहाँ था इस प्रक्रिया में? पर असर समाज पर पड़ा।

दिल्ली विश्वविद्यालय में रुचि तिवारी जो यूजीसी विनियमों के समर्थन में प्रदर्शन को कवर करने गई थीं उन्हें वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े लोगों ने घेर लिया। वीडियो में साफ़ दिखता है कि उनके साथ धक्का-मुक्की हुई और उन्हें ब्राह्मण होने के कारण निशाना बनाया गया। स्वयं उन्होंने बयान दिया। यदि किसी व्यक्ति पर उसके ब्राह्मण होने के कारण हमला हो, तो यह वैचारिक बहस नहीं है। यह एक मानसिकता है जिसमें व्यक्ति को उसके जन्म से परिभाषित किया जाता है।


और फिर कहा गया समाज बँटा हुआ है।
पर ज़रा ठहरकर सोचिए क्या समाज ने 13 जनवरी की अधिसूचना बनाई? क्या समाज ने न्यायालय में जाकर रोक लगाई? क्या समाज शिक्षा-नीति बनाता है? क्या समाज पाठ्यक्रम तय करता है? क्या समाज नियामक निकायों में बैठा है?

स्वतंत्रता के बाद आर्थिक मॉडल कैसा था? लाइसेंस-राज, सार्वजनिक क्षेत्र का वर्चस्व, केंद्रीकृत नियोजन ये सब सोवियत प्रेरित समाजवादी ढाँचे से प्रभावित थे। क्या यह मॉडल समाज ने चुना था? शिक्षा-व्यवस्था दशकों तक वैचारिक रूप से एक ही दिशा में ढाली गई। इतिहास-लेखन से लेकर विश्वविद्यालयी विमर्श तक ढाँचा राजनीतिक नेतृत्व ने तय किया। परिवार, विवाह, उत्तराधिकार—इन सब पर कानून राज्य ने बनाए। पंचायतों की शक्ति सीमित हुई। गुरुकुल परंपरा समाप्त हुई। स्थानीय समाज की न्याय-शक्ति समाप्त हुई।

आज शिक्षा सरकार के हाथ में है। परीक्षा-प्रणाली सरकार के हाथ में है। नियामक निकाय सरकार के हाथ में हैं। आर्थिक नीति सरकार तय करती है। न्यायपालिका अंतिम निर्णय देती है। समाज के पास क्या है? केवल वोट। और वोट भी पाँच वर्ष में एक बार।
समाज को एक झुनझुना पकड़ा दिया गया—मतदान कर दो, बाकी सब हम संभाल लेंगे। फिर जब नीतियों के परिणाम सामने आते हैं, तो कहा जाता है—समाज दिग्भ्रमित है।


सनातन चिंतन सृष्टि को त्रिगुणात्मक मानता है—
“सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।”
समाज में धर्मनिष्ठ भी होंगे, अधर्मनिष्ठ भी, और एक बड़ा वर्ग प्रमादनिष्ठ जो परिस्थितियों से प्रभावित होता है। यह स्वाभाविक है। देव और दानव भी जन्म से नहीं होते। रावण ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी दानव प्रवृत्ति का प्रतीक बन सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि ब्राह्मणत्व दोष है; अर्थ यह है कि कर्म निर्णायक है।

गीता कहती है 
“नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।”
ईश्वर जन्म से पाप आरोपित नहीं करता।
और—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते।”
अधिकार कर्म पर है।

यह समग्र न्याय सिद्धांत है। इसके विपरीत यदि समाज को स्थायी शोषक और स्थायी शोषित की बाइनरी में बाँटा जाएगा, तो यह सनातन न्याय से विचलन है। क्रिटिकल रेस थ्योरी और डीईआईए जैसे ढाँचे पश्चिम के इतिहास से निकले हैं। वहाँ नस्लीय संदर्भ थे। उन्हें यहाँ ज्यों का त्यों लागू कर देना समाज को संघर्ष में धकेलता है।


1871 में अंग्रेजों ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लाया था—अनेक समुदायों को जन्म से अपराधी घोषित कर दिया। आज यदि किसी समूह को जन्म से संरचनात्मक शोषक बताया जाए, तो ढाँचा अलग नहीं है सिर्फ भाषा बदली है।


अब एक और तथ्य देखिए। यदि हिन्दू समाज दिग्भ्रमित होता, तो हजार वर्षों के आक्रमणों के बाद आज 110 करोड़ हिन्दू भारत में न होते। अनेक प्राचीन सभ्यताएँ विलीन हो गईं। पर सनातन परंपरा जीवित रही। यह समाज की स्मृति और चेतना का प्रमाण है।
1947 में विभाजन हुआ। वह समाज का निर्णय नहीं था; राजनीतिक नेतृत्व का निर्णय था। भूभाग खोया—समय, परिस्थितियाँ और नेतृत्व कारण थे। समाज ने अपनी परंपरा नहीं छोड़ी।


आज भी कुम्भ में करोड़ों लोग बिना सरकारी आदेश के पहुँचते हैं। परिवार व्यवस्था अभी भी जीवित है, चाहे कमजोर क्यों न हो। संस्कार अभी भी होते हैं। यदि समाज दिशाहीन होता, तो यह सब समाप्त हो चुका होता।


समस्या यह है कि नेतृत्व सनातन दर्शन की गहराई को समझे बिना नीति बना रहा है। समान अवसर और समान परिणाम में अंतर नहीं समझा गया। सामाजिक न्याय और स्थायी वर्ग-संघर्ष के बीच अंतर नहीं समझा गया। शिक्षा और आर्थिक मॉडल आयातित विचारों पर बने, पर समाज से संवाद नहीं हुआ।


फिर कहा जाता है समाज दिग्भ्रमित है।
समाज शक्तिहीन है। निर्णय लेने की शक्ति सरकार, न्यायपालिका और प्रशासन के पास है। समाज के पास न शिक्षा का नियंत्रण है, न आर्थिक ढाँचा, न विधायी अधिकार। फिर दिशा का प्रश्न समाज पर कैसे डाला जा सकता है?


हिन्दू समाज दिग्भ्रमित नहीं है। वह विविध है, जीवित है, स्मृतिशील है। दिग्भ्रमित वह नेतृत्व है जो सनातन समग्र न्याय सिद्धांत को छोड़कर संघर्ष-आधारित आयातित ढाँचों में उलझता है और फिर परिणामों के लिए समाज को दोष देता है।
समाज अभी भी जाग्रत है। दिशा वहाँ चाहिए जहाँ शक्ति है।

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