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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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आज जिस विषय पर विमर्श आवश्यक है, वह केवल किसी एक घटना, व्यक्ति या वर्ग तक सीमित नहीं है। यह हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से में गहराई तक व्याप्त उस मानसिक प्रवृत्ति से जुड़ा है, जिसमें प्रत्येक समस्या के सामने आते ही सबसे पहले किसी एक दोषी की पहचान कर ली जाती है, परंतु समस्या के मूल कारणों, उसके निर्माण की प्रक्रिया और उसके समाधान की दिशा पर गंभीर चिंतन नहीं किया जाता।
सामान्यतः किसी भी सामाजिक, राजनीतिक या सांस्कृतिक संकट के संदर्भ में प्रश्न यह नहीं किया जाता कि समस्या उत्पन्न क्यों हुई, उसके पीछे कौन-कौन से कारक सक्रिय रहे, किन परिस्थितियों ने उसे आकार दिया और किस स्तर पर सुधार की आवश्यकता है। इसके स्थान पर चर्चा तुरंत दोषारोपण पर केंद्रित हो जाती है। कोई व्यक्ति, कोई संस्था, कोई विचारधारा या कोई कालखंड—किसी एक को दोषी ठहराकर संवाद समाप्त मान लिया जाता है।
यदि कोई इन प्रश्नों को उठाने का प्रयास करे, तो प्रायः उसे यह कहकर टाल दिया जाता है कि “यह तो चलता आ रहा है”, “इसे ऐसे ही चलने देना चाहिए”, या “अब इसमें कुछ किया नहीं जा सकता”। यह दृष्टि न केवल समस्या को स्थायी बनाती है, बल्कि समाधान की संभावना को भी प्रारंभ में ही निष्क्रिय कर देती है। जब समाधान की खोज का संकल्प ही न हो, तब सुधार की अपेक्षा करना स्वयं में एक भ्रम बन जाता है।
इस मानसिकता का प्रभाव केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहा है। इसके कारण हिंदू समाज बीते लगभग एक सहस्राब्दी के इतिहास में अपने लिए एक सुसंगत, वैकल्पिक और आत्मसंपन्न दृष्टिकोण स्थापित करने में बार-बार असफल रहा है। यह कहना कि हमारे पास कोई वैकल्पिक दृष्टि नहीं है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। वास्तव में हमारे पास जीवन, समाज, अर्थ, राजनीति और संस्कृति के संदर्भ में एक समृद्ध और व्यापक दृष्टिकोण विद्यमान है। समस्या उसका अभाव नहीं, बल्कि उस पर गंभीर शोध, अध्ययन और अनुसंधान के प्रति हमारी उदासीनता है।
हिंदू समाज के पास सृष्टि के आदि काल से लेकर आधुनिक युग तक का विस्तृत अनुभव-कोष है—सभ्यताओं के उत्थान-पतन का अनुभव, शासन-व्यवस्थाओं का अनुभव, सामाजिक संरचनाओं का अनुभव और सांस्कृतिक निरंतरता का अनुभव। इसके बावजूद इस अनुभव को व्यवस्थित रूप से समझने, उसका विश्लेषण करने और वर्तमान संदर्भ में उसका सृजनात्मक उपयोग करने की दिशा में अपेक्षित प्रयास नहीं दिखाई देते।
क्यों ऐसा हुआ, यह प्रश्न भी प्रायः अनुत्तरित रह जाता है। क्या यह केवल बाह्य आघातों का परिणाम है, या इसके भीतर आंतरिक वैचारिक शिथिलता भी उत्तरदायी रही है—इस पर गंभीर मंथन से प्रायः बचा जाता है। परिणामस्वरूप दोषारोपण तो होता है, पर आत्ममंथन नहीं; प्रतिक्रिया तो होती है, पर दिशा नहीं बनती।
समस्याएँ गिनाना अपेक्षाकृत सरल होता है, किंतु उन्हीं समस्याओं के समाधान खोजना, उनके लिए वैचारिक दिशा और संस्थागत ढाँचा निर्मित करना कहीं अधिक कठिन कार्य है। यदि पिछले लगभग एक सहस्राब्दी के पराधीनता कालखंड के इतिहास को गंभीरता से देखा जाए, तो यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आता है कि हिंदू समाज बार-बार संकटों की पहचान तो करता रहा, परंतु उनसे बाहर निकलने के लिए आवश्यक वैकल्पिक दृष्टि और संरचना विकसित नहीं कर पाया।
इस दीर्घ कालखंड में हम निरंतर ऐसे वैचारिक, सामाजिक और संस्थागत जालों में फँसते चले गए, जिनसे निकलने का मार्ग न तो खोजा गया और न ही खोजने का संगठित प्रयास किया गया। धीरे-धीरे एक प्रकार की बौद्धिक जड़ता हमारे चिंतन का स्थायी स्वभाव बन गई। हम बार-बार यह दोहराते रहे कि हम कभी महान थे, गुलामी कालखंड से पूर्व “सोने की चिड़िया” थे, विश्वगुरु थे, हमारे चक्रवर्ती सम्राटों का शासन दूर-दूर तक फैला था। इन कथनों में ऐतिहासिक सत्य का आधार अवश्य है, किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब अतीत का गौरव भविष्य की योजना का स्थान ले लेता है।
हम यह कहते हैं कि हम फिर से विश्वगुरु बनेंगे, परंतु यह प्रश्न लगभग अनुपस्थित रहता है कि विश्वगुरु बनने की प्रक्रिया क्या होगी, उसका शैक्षिक, बौद्धिक और संस्थागत आधार क्या होगा। इस संदर्भ में शिक्षा व्यवस्था सबसे निर्णायक और केंद्रीय प्रश्न बनकर सामने आती है।
अंग्रेजों ने सनातन भारतीय गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था को किसी एक आदेश से नष्ट नहीं किया। उन्होंने उसे योजनाबद्ध और क्रमिक ढंग से अप्रासंगिक बनाया। 1835 में थॉमस मैकाले द्वारा प्रस्तुत शिक्षा नीति का घोषित उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा था, किंतु उसका वास्तविक लक्ष्य भारतीय ज्ञान-परंपरा, समाजाधारित शिक्षा और स्थानीय संस्थाओं को धीरे-धीरे समाप्त करना था। अंग्रेज़ ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहते थे जो जन्म से भारतीय हो, परंतु सोच, दृष्टि और मूल्यबोध से अंग्रेज़ हो। इसके लिए अंग्रेज़ी माध्यम, केंद्रीकृत पाठ्यक्रम, मानकीकृत परीक्षाएँ और सरकारी प्रमाण-पत्र को शिक्षा का आधार बनाया गया। गुरुकुलों को सीधे प्रतिबंधित नहीं किया गया, बल्कि उन्हें वैधानिक मान्यता, राज्य संरक्षण और आर्थिक सहयोग से वंचित कर दिया गया, जिससे वे स्वाभाविक रूप से समाप्त होते चले गए।
स्वतंत्रता के बाद यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि भारत इस औपनिवेशिक शिक्षा ढाँचे का पुनर्मूल्यांकन करेगा और अपनी सभ्यतागत आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करेगा। किंतु व्यवहार में इसके विपरीत हुआ। सत्ता का हस्तांतरण तो हुआ, परंतु शिक्षा के क्षेत्र में मानसिक दासता बनी रही। जिन लोगों के हाथों में शासन आया, वे स्वयं औपनिवेशिक ढाँचे में प्रशिक्षित थे और सनातन परंपरा, समाजाधारित शिक्षा तथा भारतीय ज्ञान-व्यवस्था की मूल संरचना की उन्हें गहरी समझ नहीं थी।
जवाहरलाल नेहरू और उनके बाद गांधी परिवार के शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा व्यवस्था को समाप्त करने के स्थान पर उसे और अधिक केंद्रीकृत कर दिया गया। स्वतंत्र भारत ने शिक्षा के लिए जिस मॉडल को अपनाया, वह मुख्यतः सोवियत संघ से प्रेरित समाजवादी-कम्युनिस्ट ढाँचा था। इस मॉडल की मूल धारणा यह थी कि शिक्षा पूर्णतः सरकार के अधीन होनी चाहिए। सरकार विद्यालय चलाएगी, पाठ्यक्रम तय करेगी, परीक्षाएँ लेगी, प्रमाण-पत्र देगी और वही नियामक संस्था भी बनेगी। इसी सोच के अंतर्गत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय एवं राज्य शिक्षा बोर्ड तथा उच्च शिक्षा की कठोर नियामक संरचनाएँ विकसित की गईं।
इसका पहला गंभीर परिणाम यह हुआ कि शिक्षक और आचार्य ज्ञान-निर्माता नहीं, बल्कि पाठ्यक्रम-पालक बनकर रह गए। शोध और अनुसंधान का स्थान रटंत शिक्षा प्रणाली ने ले लिया। विश्वविद्यालयों का उद्देश्य मौलिक चिंतन, नवाचार और स्थानीय समस्याओं के समाधान के बजाय डिग्री वितरण तक सीमित होता चला गया। इतिहास लेखन भी इसी वैचारिक ढाँचे के अधीन चला गया, जिसमें भारतीय सभ्यता, गुरुकुल व्यवस्था, मंदिर-केंद्रित शिक्षा और समाजाधारित ज्ञान-प्रणालियों को या तो उपेक्षित किया गया या विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया।
आज स्थिति यह है कि विश्व की शीर्ष सौ विश्वविद्यालयों में भारत की कोई भी विश्वविद्यालय स्थायी स्थान नहीं बना पाती। सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता और नामांकन लगातार गिरते जा रहे हैं। निजी विद्यालयों की बढ़ती फीस सर्वविदित है। शिक्षा इतनी महँगी हो चुकी है कि सामान्य नागरिक के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वहन करना कठिन होता जा रहा है। निजी विद्यालयों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी माध्यम का है, किंतु वे भी CBSE, राज्य बोर्ड या तथाकथित अंतरराष्ट्रीय बोर्ड जैसे केंद्रीकृत ढाँचों के अधीन ही संचालित होते हैं। माध्यम बदल गया, परंतु नियंत्रण की संरचना वही बनी रही।
उच्च शिक्षा की स्थिति और अधिक चिंताजनक है। व्यावहारिक प्रशिक्षण, कौशल-विकास और उद्योग-आधारित अनुसंधान के स्थान पर सैद्धांतिक रटंत प्रणाली हावी हो गई। इसी शून्य को भरने के लिए कोचिंग उद्योग एक समानांतर शिक्षा तंत्र के रूप में उभरा। मेडिकल, इंजीनियरिंग और प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी औपचारिक शिक्षा से बाहर स्थानांतरित हो चुकी है। कोचिंग माफिया का विस्तार इस बात का प्रमाण है कि औपचारिक शिक्षा अपनी मूल भूमिका निभाने में विफल रही है।
इन सभी समस्याओं के मूल में एक केंद्रीय तथ्य स्पष्ट दिखाई देता है—हम सनातन दृष्टि पर आधारित कोई वैकल्पिक, समाज-केंद्रित और कौशल-आधारित शिक्षा मॉडल खड़ा नहीं कर पाए। जबकि ऐतिहासिक रूप से ऐसा मॉडल भारत में विद्यमान था। आचार्य धर्मपाल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Beautiful Tree में औपनिवेशिक अभिलेखों के आधार पर यह प्रमाणित किया है कि अठारहवीं शताब्दी के अंत तक भारत के लगभग प्रत्येक गाँव में शिक्षा की स्थानीय व्यवस्था थी। गुरुकुल, पाठशालाएँ और अन्य शिक्षण संस्थाएँ समाज द्वारा संचालित होती थीं। राज्य का कार्य नियंत्रण नहीं, बल्कि संरक्षण और अनुदान देना था। पाठ्यक्रम निर्धारण, मूल्यांकन और प्रमाण-पत्र देने का अधिकार आचार्यों और शिक्षण संस्थानों के पास होता था। शिक्षा जीवन, उत्पादन और संस्कृति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई थी।
आज जब तक पाठ्यक्रम तय करने, परीक्षा लेने और प्रमाण-पत्र देने का अधिकार पुनः शिक्षक और शिक्षण संस्थानों को नहीं दिया जाएगा, तब तक कोई भी वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ नहीं हो सकती। इसी उद्देश्य से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा भारतीय शिक्षा बोर्ड का गठन किया गया था, ताकि एक भारतीय, समाज-आधारित और स्वायत्त शिक्षा ढाँचा विकसित किया जा सके। किंतु यह भी तथ्य है कि अब तक इस बोर्ड से बहुत सीमित संख्या में ही विद्यालय जुड़े हैं। विशेष रूप से यह प्रश्न उठता है कि विद्या भारती जैसी संस्था, जिसके पास देशव्यापी विद्यालय नेटवर्क है और जो स्वयं को सनातन शिक्षा दृष्टि से जोड़ती है, वह भी भारतीय शिक्षा बोर्ड से नहीं जुड़ी। इसके बिना समाज-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था का पुनर्निर्माण संभव नहीं हो पाता।
जब शिक्षा व्यवस्था इस प्रकार राज्य-नियंत्रित, रटंत-प्रधान और आयातित विचारधाराओं पर आधारित होगी, तब शोध, अनुसंधान और कौशल-विकास में पिछड़ना स्वाभाविक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जहाँ कुशल मानव संसाधन, ऊर्जा, दुर्लभ पृथ्वी तत्व और उन्नत तकनीकी अनुसंधान निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं, वहाँ हमारे पास न तो पर्याप्त शैक्षणिक आधार दिखाई देता है और न ही कोई स्पष्ट दीर्घकालिक योजना।
इसके स्थान पर शिक्षा व्यवस्था को शोषक-शोषित जैसे कृत्रिम वैचारिक विभाजनों में उलझा दिया गया है। आरक्षण की राजनीति ने अकादमिक अनुशासन और योग्यता-आधारित प्रगति को कमजोर किया है। चिकित्सा और तकनीकी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में न्यूनतम मानकों से समझौता, तथा IIT-IIM जैसे संस्थानों से शिक्षित युवाओं का विदेश पलायन—ये सभी एक गहरे बौद्धिक और राष्ट्रीय क्षरण की ओर संकेत करते हैं।
जब तक हम आयातित विचारधाराओं पर आधारित इस केंद्रीकृत शिक्षा व्यवस्था से बाहर निकलकर अपनी सनातन, समाज-केंद्रित और कौशल-आधारित शिक्षा प्रणाली स्थापित नहीं कर पाते, तब तक “विश्वगुरु” बनने की आकांक्षा केवल स्मृतियों और घोषणाओं तक ही सीमित रहेगी।
यह कहानी केवल शिक्षा व्यवस्था की नहीं है। यही संरचनात्मक विफलता स्वतंत्र भारत के आर्थिक मॉडल में भी लगभग उसी रूप में दिखाई देती है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने जो आर्थिक दिशा चुनी, वह भारतीय समाज की ऐतिहासिक आर्थिक परंपराओं से नहीं, बल्कि 20वीं शताब्दी के मध्य में प्रभावी सोवियत संघ के केंद्रीकृत समाजवादी मॉडल से प्रेरित थी।
1947 के बाद भारत में राज्य को आर्थिक गतिविधियों का केंद्रीय संचालक मान लिया गया। 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर 1989 तक की योजनाओं में यह धारणा बनी रही कि उत्पादन, निवेश, मूल्य निर्धारण और संसाधनों का वितरण राज्य ही बेहतर ढंग से कर सकता है। 1956 की औद्योगिक नीति में “कमांडिंग हाइट्स” को पूरी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के अधीन घोषित किया गया। इस नीति के अंतर्गत इस्पात, कोयला, बिजली, भारी उद्योग, बैंकिंग, बीमा और परिवहन जैसे क्षेत्र लगभग पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में चले गए।
इस मॉडल का प्रत्यक्ष परिणाम आर्थिक जड़ता के रूप में सामने आया। 1950 से 1980 के बीच भारत की औसत वार्षिक विकास दर लगभग 3 से 3.5 प्रतिशत रही। इसी कालखंड में दक्षिण कोरिया, ताइवान और बाद में चीन जैसे देशों ने 7 से 9 प्रतिशत की दर से वृद्धि की। यह अंतर संसाधनों का नहीं, नीति-दृष्टि का था। 1950 में भारत का वैश्विक निर्यात में हिस्सा लगभग 2 प्रतिशत था, जो 1990 आते-आते घटकर लगभग 0.5 प्रतिशत रह गया।
कृषि क्षेत्र में भी यही स्थिति बनी। भूमि सुधार, मूल्य नियंत्रण, सरकारी खरीद, उर्वरक सब्सिडी और मंडी-आधारित बिक्री ने किसान को बाजार से नहीं, बल्कि राज्य से जोड़ दिया। आज तथ्य यह है कि भारत की लगभग 45 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, जबकि कृषि का योगदान GDP में 15 प्रतिशत से भी कम है। यह असंतुलन किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक संकट का संकेत होता है।
1980 के दशक के अंत तक यह मॉडल पूरी तरह असफल हो चुका था। 1990–91 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना गिर गया कि केवल 2–3 सप्ताह के आयात के लिए ही शेष था। उस समय भारत को लगभग 47 टन सोना विदेशी बैंकों के पास गिरवी रखना पड़ा। यह कोई वैचारिक आरोप नहीं, बल्कि भारतीय रिज़र्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय अभिलेखों में दर्ज तथ्य है।
इसके बाद 1991 में आर्थिक सुधारों की घोषणा की गई। किंतु यह सुधार भी किसी स्पष्ट वैकल्पिक आर्थिक दर्शन पर आधारित नहीं थे। साम्यवादी ढाँचे को पूरी तरह छोड़ा नहीं गया और मुक्त बाजार को भी अधूरा अपनाया गया। परिणाम यह हुआ कि भारत एक ऐसे मिश्रित आर्थिक मॉडल में फँस गया, जिसमें न तो उत्पादन-आधारित विकास को प्राथमिकता मिली और न ही सामाजिक संतुलन की स्पष्ट व्यवस्था बनी।
तुलना के लिए चीन का उदाहरण महत्त्वपूर्ण है। चीन ने 1978–79 के बाद कृषि में सामूहिक नियंत्रण हटाया, विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए, विदेशी निवेश को स्पष्ट नियमों के साथ आमंत्रित किया और निर्यात को नीति का केंद्र बनाया। आज चीन का वार्षिक निर्यात 3.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है, जबकि भारत का कुल निर्यात लगभग 750–800 बिलियन डॉलर के आसपास है। चीन वैश्विक विनिर्माण का केंद्र बना, जबकि भारत सेवा-क्षेत्र आधारित अर्थव्यवस्था बनकर रह गया।
सेवा क्षेत्र से आय अवश्य बढ़ी, परंतु उससे व्यापक रोजगार, तकनीकी आत्मनिर्भरता और औद्योगिक अनुसंधान का ढाँचा नहीं बन पाया। यही कारण है कि भारत आज भी मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और उन्नत तकनीक के लिए आयात पर निर्भर है।
राज्यों की वित्तीय स्थिति भी इसी असंतुलन को दर्शाती है। RBI और वित्त आयोग की रिपोर्टों के अनुसार कई राज्यों का कर्ज़ उनके GSDP के 30–40 प्रतिशत के आसपास पहुँच चुका है। बड़ी मात्रा में बजट वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में चला जाता है। उत्पादन और पूँजी निर्माण पर अपेक्षित निवेश नहीं हो पाता। मुफ्तखोरी आधारित योजनाएँ अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो देती हैं, परंतु दीर्घकालिक आर्थिक सशक्तिकरण नहीं करतीं।
इसके साथ-साथ आम नागरिक भी ऋण-आधारित उपभोग में फँसता जा रहा है। RBI के आँकड़ों के अनुसार भारत में household debt पिछले एक दशक में तेज़ी से बढ़ा है। EMI, क्रेडिट कार्ड और उपभोक्ता ऋण ने परिवारों की आर्थिक स्थिरता को कमजोर किया है। यह केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक समस्या भी है।
अब यहाँ यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जिस सनातन आर्थिक मॉडल की चर्चा होती है, वह वास्तव में है क्या।
सनातन आर्थिक मॉडल कोई सरकारी योजना या बजटीय शब्द नहीं है। यह एक सभ्यतागत ढाँचा है, जिसके ठोस ऐतिहासिक उदाहरण उपलब्ध हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से लेकर भारत की श्रेणी-व्यवस्था, ग्राम-आधारित उत्पादन और कुटीर उद्योग इसका प्रमाण हैं।
इस मॉडल का पहला आधार एकात्म मानव दृष्टि है, जिसमें अर्थव्यवस्था को व्यक्ति, समाज और प्रकृति से अलग नहीं देखा जाता। उत्पादन का उद्देश्य केवल GDP बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज का संतुलित पोषण होता है।
दूसरा आधार धर्माधारित आर्थिक अनुशासन है। यहाँ लाभ को अस्वीकार नहीं किया गया, लेकिन असीम संचय और शोषण को मर्यादित किया गया। यही कारण था कि भारत में लंबे समय तक व्यापारी वर्ग सशक्त भी था और सामाजिक रूप से उत्तरदायी भी।
तीसरा आधार औचित्य और न्याय का सिद्धांत है। मूल्य, मजदूरी और कर-व्यवस्था केवल बाजार की ताकतों पर नहीं छोड़ी जाती थी, बल्कि सामाजिक संतुलन भी उसका मानक था।
चौथा आधार विकेंद्रीकरण है। ग्राम, कुटुंब, श्रेणी और स्थानीय समुदाय आर्थिक इकाइयाँ थीं। उत्पादन स्थानीय था, विनिमय व्यापक। यही कारण था कि भारत सदियों तक वैश्विक व्यापार का केंद्र रहा।
पाँचवाँ आधार पुरुषार्थ-चतुष्टय है—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यहाँ अर्थ साध्य नहीं, साधन था। अर्थ पर धर्म का नियंत्रण था, न कि लालच का।
समस्या यह नहीं है कि यह मॉडल अस्पष्ट है। समस्या यह है कि स्वतंत्र भारत में इसे न तो नीति-स्तर पर परिभाषित किया गया, न विश्वविद्यालयों में इसका अध्ययन हुआ, न कृषि, उद्योग और वित्त नीति में इसका प्रयोग किया गया। इसके स्थान पर हम कभी पूर्ण समाजवाद, कभी अधूरे पूंजीवाद और कभी केवल उपभोग-प्रधान विकास के बीच झूलते रहे।
इसी कारण शिक्षा, अर्थव्यवस्था, परिवार और संस्कृति—चारों क्षेत्रों में एक ही असंतुलन अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।
तीसरा विषय हिंदू समाज के उस सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा है, जिसे पिछले लगभग दो सौ वर्षों से योजनाबद्ध ढंग से कमजोर किया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया का मूल लक्ष्य समाज को शोषक और शोषित की स्थायी बाइनरी में बाँटना है, ताकि वह निरंतर आपस में उलझा रहे और अपने राष्ट्र, संस्कृति तथा सभ्यता के समग्र उत्थान पर एकजुट होकर विचार न कर सके। इस बाइनरी का वैचारिक आधार वह एट्रोसिटी लिटरेचर है, जो औपनिवेशिक काल में विकसित हुआ—जिसका सनातन धर्म की शास्त्रीय परंपरा, भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना और जीवनानुभव से कोई स्वाभाविक संबंध नहीं दिखता। यह साहित्य अंग्रेज़ी सत्ता और ईसाई मिशनरी नेटवर्क की “फूट डालो और शासन करो” नीति के अनुरूप तैयार हुआ, ताकि समाज में स्थायी अपराधबोध, परस्पर अविश्वास और अंतहीन वर्ग-संघर्ष बना रहे।
इस वैचारिक परियोजना को प्रशासनिक वैधता औपनिवेशिक जनगणनाओं के माध्यम से दी गई। 1871–72 की जनगणना में तथाकथित “अस्पृश्य” आबादी लगभग 2.5 प्रतिशत दर्ज की गई। 1931 तक यही अनुपात लगभग 17 प्रतिशत दिखाया गया। स्वतंत्रता के बाद पहचान-आधारित राजनीति, आरक्षण-केंद्रित शासन और अकादमिक विमर्श के विस्तार के साथ 1990 के दशक तक आते-आते यही श्रेणियाँ सामाजिक-राजनीतिक कथानक में 60 प्रतिशत से अधिक के रूप में प्रस्तुत होने लगीं। यह वृद्धि किसी प्राकृतिक सामाजिक परिवर्तन का परिणाम नहीं थी, बल्कि श्रेणीकरण के विस्तार, परिभाषाओं के पुनर्गठन और सत्ता-संचालित विमर्श का नतीजा थी। विश्व इतिहास में शायद ही कोई उदाहरण हो, जहाँ किसी समाज की बहुसंख्यक आबादी को योजनाबद्ध ढंग से “ऐतिहासिक शोषक” सिद्ध कर दिया गया हो और शोषण का आरोप उन्हीं पर लगाया गया हो, जिन पर समाज सदियों तक आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से आश्रित रहा।
यदि भारतीय इतिहास को सृष्टि-आदि से लेकर मध्यकाल तक देखें, तो किसी भी वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य या ऐतिहासिक ग्रंथ में ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि हिंदू समाज दो स्थायी वर्गों में बँटकर सामूहिक रूप से एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध करता रहा हो। ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच किसी “वर्ग-युद्ध” का उल्लेख न शास्त्रों में है, न रामायण–महाभारत की परंपरा में। आधुनिक काल का “ब्राह्मण बनाम चर्मकार” जैसा संघर्ष भी ऐतिहासिक अभिलेखों में नहीं मिलता। इसके विपरीत भारत में नौ दर्शनों की परंपरा विकसित हुई—जहाँ सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त के साथ-साथ चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन को भी स्थान मिला। ब्राह्मण और श्रमण परंपराओं के बीच तर्क-वितर्क, वाद–संवाद और तत्वबोध का समृद्ध इतिहास रहा। आचार्य शंकर का चांडाल प्रसंग, राजा जनक–अष्टावक्र का ब्रह्मज्ञान, बौद्ध–जैन परंपराओं के साथ शास्त्रार्थ—ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय समाज का मूल स्वभाव सह-अस्तित्व और बौद्धिक स्वतंत्रता रहा है, न कि स्थायी वर्ग-संघर्ष।
इसके बावजूद औपनिवेशिक और मिशनरी एजेंडे के विस्तार के लिए भारतीय समाज को एससी, एसटी, ओबीसी और तथाकथित सवर्ण—चार स्थायी खाँचों में बाँट दिया गया, ताकि समाज सदा आपस में लड़ता रहे और अपने सभ्यतागत पुनर्निर्माण पर विचार न कर सके। संगठित और आत्मविश्वासी हिंदू समाज पश्चिमी शक्तियों के लिए चुनौती रहा है; इसी कारण सभ्यतागत राष्ट्रों को वैचारिक रूप से उपनिवेश बनाने की रणनीति अपनाई गई। चीन में कम्युनिज़्म के नाम पर उसकी सांस्कृतिक–धार्मिक जड़ों को नष्ट किया गया; ईरान में भू-राजनीतिक कारणों से कट्टरपंथी इस्लाम को प्रश्रय दिया गया; और भारत में लोकतंत्र, समाजवाद, पूँजीवाद, सेकुलरिज़्म, राष्ट्रवाद, राइट–लेफ्ट–सेंटर जैसे पश्चिमी खाँचों में समाज को बाँट दिया गया—जिनका सनातन हिंदू सभ्यता की मूल संरचना से कोई स्वाभाविक संबंध नहीं था।
इस पूरे विमर्श में एक मूलभूत बिंदु जानबूझकर या अज्ञानवश छिपा दिया जाता है—और वह है धर्म और अधर्म के बीच का मौलिक अंतर। सनातन परंपरा में संघर्ष का आधार कभी भी मनुष्य बनाम मनुष्य या समाज बनाम समाज नहीं रहा। यहाँ संघर्ष सदैव धर्म और अधर्म के बीच रहा है। यही कारण है कि राम–रावण, कृष्ण–कंस या अर्जुन–अधर्म की सेनाएँ—इन कथाओं में युद्ध किसी जाति, वर्ग या समुदाय से नहीं, बल्कि अधर्म से होता है। सनातन दृष्टि मनुष्य को शत्रु नहीं मानती; वह केवल अधर्म को चुनौती देती है। जब आधुनिक विमर्श समाज को शोषक और शोषित के स्थायी वर्गों में बाँट देता है, तो वह इस मूल सनातन सिद्धांत को ही उलट देता है।
सनातन धर्म का दार्शनिक आधार त्रिगुणात्मक सृष्टि सिद्धांत है—सत्त्व, रजस और तमस। ये तीनों गुण सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं और प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समाज तथा प्रत्येक काल में इनका अनुपात बदलता रहता है। कोई भी व्यक्ति या वर्ग जन्म से सत्त्वगुणी या तमोगुणी नहीं होता। आचरण, संस्कार, शिक्षा और परिस्थितियाँ—इनसे गुणों की प्रधानता तय होती है। इसी कारण सनातन परंपरा में “जन्मजात अपराधी”, “जन्मजात शोषक” या “जन्मजात पीड़ित” जैसी अवधारणाएँ अस्वीकार्य हैं। यह सोच न केवल मानव स्वभाव के विरुद्ध है, बल्कि स्वयं सृष्टि के गुण-परिवर्तनशील स्वरूप का निषेध भी है। सनातन समाधान संघर्ष बढ़ाने में नहीं, बल्कि रजस और तमस से ग्रस्त चेतना को सत्त्व की ओर उन्नत करने में देखता है।
इसके साथ ही सनातन दर्शन सृष्टि को केवल भौतिक ढाँचे के रूप में नहीं देखता। वह सृष्टि को तीन स्तरों में समझता है—आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। आधुनिक आयातित विचारधाराएँ—चाहे वे राइट, लेफ्ट, सेंटर, सेकुलरिज़्म, नेशनलिज़्म या समाजवाद हों—अधिकतम आधिभौतिक स्तर तक सीमित रहती हैं। वे समाज को केवल आर्थिक, सत्ता-संरचना या अधिकार–वंचना के चश्मे से देखती हैं। सनातन धर्म इससे आगे जाकर आधिदैविक स्तर पर प्रकृति, व्यवस्था और संतुलन को तथा आध्यात्मिक स्तर पर चेतना, संस्कार और आत्मोन्नति को जोड़ता है। यही कारण है कि सनातन धर्म किसी एक राजनीतिक या वैचारिक खाँचे में नहीं बँधता—क्योंकि वह स्वयं में समग्र है।
राइट–लेफ्ट–सेंटर, सेकुलरिज़्म या नेशनलिज़्म जैसी अवधारणाएँ ऐतिहासिक रूप से पश्चिमी समाजों की विशिष्ट परिस्थितियों से जन्मी हैं—जहाँ चर्च बनाम राज्य, पूँजी बनाम श्रमिक या नस्ल बनाम नस्ल जैसे संघर्ष मौजूद थे। भारतीय सभ्यता में ऐसा कोई स्थायी द्वंद्व कभी रहा ही नहीं। यहाँ राजा और राज्य दोनों धर्माधीन थे; समाज का संगठन अधिकारों से नहीं, कर्तव्यों से चलता था। धर्म यहाँ “रिलिजन” नहीं था—न एक पुस्तक, न एक पैगंबर, न एक संहिता—बल्कि वह जीवन को धारण करने वाला शाश्वत नियम था। जब राज्य स्वयं को धर्मनिरपेक्ष घोषित करता है, तो सनातन दृष्टि में उसका अर्थ धर्मविहीन नहीं, बल्कि धर्म-सापेक्ष होना है—अर्थात् अधर्म से दूरी और धर्म के संरक्षण की जिम्मेदारी।
इसी बिंदु पर आधुनिक वर्ग-संघर्ष का पूरा नैरेटिव असंगत हो जाता है। जब संघर्ष धर्म–अधर्म के स्थान पर मनुष्य–मनुष्य के बीच खड़ा कर दिया जाता है, तब समाज स्थायी तनाव में फँस जाता है। सनातन परंपरा ने कभी भी समाज को युद्ध का अखाड़ा नहीं बनाया; उसने समाज को सह-अस्तित्व, संवाद और आत्मोन्नति की प्रयोगशाला माना। इसलिए हिंदू समाज की समस्या कभी विविधता नहीं रही, समस्या तब उत्पन्न होती है जब इस विविधता को विदेशी आयातित विचारधाराओं के साँचे में जबरन ढालने का प्रयास किया जाता है।
इतिहास के तथ्य यहाँ निर्णायक हैं। इस्लामिक आक्रमण और शासनकाल (लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी) में भारत ने अत्यंत भीषण मानवीय क्षति झेली। इस काल में हुई हत्याओं की संख्या पर इतिहासकारों के आकलन अलग-अलग हैं—कुछ रूढ़ अनुमान करोड़ों तक जाते हैं, जबकि आधुनिक शोध अधिक सावधानी से लाखों से करोड़ों के बीच का दायरा बताता है—पर इस बात पर व्यापक सहमति है कि यह कालखंड विनाशकारी था। असंख्य नगर उजड़े, हजारों मंदिर और शिक्षा-केंद्र नष्ट किए गए, बड़ी संख्या में स्त्रियों की अस्मिता पर आघात पहुँचा और सामाजिक-आर्थिक ढाँचा गहरे स्तर पर टूटा। आधुनिक काल का सबसे बड़ा आघात 1947 का भारत-विभाजन था, जिसमें प्रचलित शोध के अनुसार लगभग 10–15 लाख लोग मारे गए और 1.4–1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए। औपनिवेशिक अंग्रेज़ी नीतियों से उत्पन्न अकालों—1770, 1876–78, 1896–97 और 1943—में इतिहासकारों के अनुसार लगभग 3–4 करोड़ भारतीयों की मृत्यु हुई। इसी अवधि में भारत की वैश्विक जीडीपी हिस्सेदारी लगभग 24 प्रतिशत से गिरकर 1–1.5 प्रतिशत रह गई और पारंपरिक उद्योगों के नष्ट होने से करोड़ों लोग बेरोज़गार हुए।
इन वास्तविक, प्रलेखित घावों के बावजूद प्रतिशोध का विमर्श उन शक्तियों के विरुद्ध केंद्रित नहीं होता, जिन्होंने ये आघात दिए, बल्कि अपने ही समाज के एक हिस्से की ओर मोड़ दिया जाता है। स्वतंत्रता के बाद आरक्षण लागू हुआ। आरक्षण ने प्रतिनिधित्व बढ़ाया—यह निर्विवाद है। किंतु आठ दशकों के बाद भी प्रश्न बना हुआ है कि समग्र सामाजिक-आर्थिक उन्नयन क्यों नहीं हुआ। आज एससी–एसटी–ओबीसी के लिए 280 से अधिक केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय कल्याण योजनाएँ चल रही हैं। विभिन्न बजटीय विश्लेषणों से स्पष्ट है कि इन योजनाओं पर होने वाला व्यय कई बार इसरो, डीआरडीओ और उच्च शिक्षा के संयुक्त अनुसंधान बजट के समकक्ष या उससे अधिक हो जाता है। इसके बावजूद यदि यही समाज स्थायी रूप से “शोषित” बताया जाता है—जबकि देश की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अनेक केंद्रीय मंत्री, कई राज्यों के मुख्यमंत्री और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी इन्हीं समुदायों से हैं—तो यह स्वयं में एक गंभीर विरोधाभास है। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि नीति-दृष्टि की है—जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल-निर्माण, उद्यमिता और संपत्ति-सृजन पर पर्याप्त बल नहीं दिया गया।
इसी रिक्तता को ढकने के लिए “मनुवाद से आज़ादी”, “ब्राह्मणवाद से आज़ादी”, “ब्राह्मण भारत छोड़ो” जैसे नारे गढ़े गए। जबकि संवैधानिक भारत में मनुस्मृति न तो कानून है, न प्रशासनिक आधार। आज कोई भी न्यायालय, विश्वविद्यालय या सरकारी संस्था मनुस्मृति के अनुसार संचालित नहीं होती। फिर भी 2026 में “ब्राह्मण विदेशी हैं” जैसे नारे उछाले जाना यह दर्शाता है कि वर्ग-संघर्ष को जीवित रखना कुछ वैचारिक समूहों की राजनीतिक आवश्यकता बन चुका है।
इसी संदर्भ में 13 जनवरी 2026 की यूजीसी गजट अधिसूचना को समझना होगा। उच्च शिक्षा में “इक्विटी” के नाम पर जन्माधारित पहचान को संस्थागत करने का यह प्रयास पश्चिमी विश्वविद्यालयों में विकसित DEIA एजेंडे और क्रिटिकल रेस थ्योरी से प्रेरित था, जिसमें समाज को जन्मसिद्ध पीड़ित और जन्मसिद्ध अपराधी में बाँटा जाता है। 29 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस अधिसूचना पर अंतरिम रोक और 19 मार्च 2026 की अगली सुनवाई यह संकेत देती है कि यह विषय केवल अकादमिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और सभ्यतागत है। प्रश्न यह है कि जब संविधान समान नागरिकता और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की बात करता है, तब विदेशी वैचारिक ढाँचों को आयात कर जन्माधारित अपराधबोध क्यों थोपा जा रहा है।
लोकतंत्र में जब समाज निरंतर आपस में लड़ता रहता है—कभी सरकार के नाम पर, कभी विपक्ष के नाम पर—तो मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। मूल प्रश्न यह है कि सनातन धर्म के सिद्धांतों के आधार पर भारत को आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महाशक्ति कैसे बनाया जाए; बीते हजार वर्षों के घावों का न्यायोचित, तथ्याधारित मूल्यांकन कैसे हो; और आयातित विचारधाराओं के स्थान पर सनातन दृष्टि से निकली वैकल्पिक व्यवस्थाएँ कैसे खड़ी हों। दोषारोपण समाधान नहीं देता। समाधान तभी संभव है, जब स्थायी वर्ग-संघर्ष से बाहर निकलकर समग्र, संतुलित और धर्माधारित सामाजिक तंत्र की ओर लौटा जाए।
जय श्री हरि।
जय भारत।
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