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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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।। ॐ।।
*विश्ववन्ध संत - जिन्हे पाकर वसुधा धन्य हुई, युग चेतना के सूत्रधार - स्वामी रामकृष्ण परमहंस* - १
-डॉ. नितिन सहारिया ,महाकौशल
पतन और उत्थान संसार का अटल नियम है। यह केवल व्यक्तियों पर ही नहीं वरन देश ,राष्ट्र, समाज ,जाति सभी छोटी-बड़ी संस्थाओं पर लागू होता है। जो जातियां किसी समय संसार की स्वामिनी बनी हुई थीं वे ही कुछ समय पश्चात अवनति के गर्त में गिरी हुई दिखाई पड़ती है। हमारा देश भी जो महाभारत काल तक चक्रवर्ती पद पर अधिष्ठित था, तत्पश्चात पारस्परिक वेमनस्य के फल से पतन के मार्ग पर चलने लगा और एक समय ऐसा आया जब वह सब प्रकार से ध्वस्त और त्रस्त होकर विदेशियों का मुकापेक्षी बन गया। पर भारतीय संस्कृति को यहां के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने ऐसे सुदृण धार्मिक आधार पर स्थापित किया है कि पत्नोन्मुख हो जाने पर भी उसे किसी न किसी रूप में दैवी सहायता प्राप्त होती रहती है, जिससे वह फिर संभल कर उत्थान की दिशा में अग्रसर होने लगती है।
इस उद्देश्ये की पूर्ति के लिए पिछले सौ -डेढ़ सौ वर्षो में अनेक दैवीशक्ति संपन्न आत्माओं का प्रादुर्भाव हुआ है। ऐसे युग- परिवर्तनकारी महापुरुषों की कई श्रेणियां होती हैं। उनमें बुद्ध और महावीर जैसे राजवंशी भी पाए जाते हैं और कबीर और रविदास जैसी छोटी जाति के माने जाने वाले भी होते हैं। जिस प्रकार श्रीकृष्ण जैसे सर्वकला- विशारद, शंकराचार्य तथा चैतन्य जैसे प्रकांड विद्वानों का आविर्भाव हुआ, वैसे ही नामदेव ,ज्ञानेश्वर ,तुकाराम ,मीराबाई आदि अल्प शिक्षित संतों ने भी अपूर्व कार्य करके दिखाएं। इस दृष्टि से विद्या, वैभव, पदवी आदि को महापुरुषों की पहचान समझना भूल है। कोई नहीं कह सकता कि ईश्वर का विशिष्ट तेज कब, किस जीवात्मा में प्रकट हो उठेगा ? श्रीरामकृष्ण परमहंस के चरित्र से इस कथन की सत्यता पूरी तरह सिद्ध होती है।
श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म सन 1836 पिता श्री खुदीराम चट्टोपाध्याय कामारपुकुर गांव के रहने वाले गरीब व्यक्ति थे। पर वह ऐसे ईस्वर -भक्त और सेवाभावी थे कि स्वयं भून्खे रहकर दीन-दु:खी और अतिथियों की सेवा करने को सदैव प्रस्तुत रहते थे। उनकी पत्नी चंद्रादेवी भी बिल्कुल उन्हीं के स्वभाव की थी। जिससे इस प्रकार के परोपकारी जीवन में उनको सब तरह की सहायता मिलती थी। श्री रामकृष्ण बाल्यावस्था से ही बड़े आकर्षण युक्त थे। जिससे परिचित- अपरिचित सभी उनसे प्रेम करते थे। नामकरण संस्कार के समय पंडितों ने उनका नाम रामकृष्ण रखा था, पर पास-पड़ोस के सब लोग प्रेम से उनको 'गदाधर' या 'गदाई' कहा करते थे। गांव में एक धर्मशाला थी जिसमें प्राय: साधु- सन्यासी आकर ठहरा करते थे। गदाई उन लोगों के पास घंटो बैठकर धार्मिक कथा -वार्ता सुना करते थे। 5 वर्ष की आयु हो जाने पर उनको पाठशाला भेजा गया, पर वे इस अवस्था में भजन- कीर्तन में इतने तल्लीन रहने लगे थे कि उनको पढ़ना- लिखना कुछ न आ सका। वे कहा करते थे कि- "पढ़ना -लिखना सीख कर तो मुझे पुरोहिताई का धंधा करना पड़ेगा,दाल, चावल, आटा बांधकर लाना पड़ेगा। मुझे ऐसी विधा की आवश्यकता नहीं है। ऐसा अन्न तो मेरे खेत में ही पैदा हो जाता है।"
*दक्षिणेश्वर में निवास*
जब श्री रामकृष्ण परमहंस की अवस्था 14-15 वर्ष की हुई तो वे अपने भाई श्री रामकुमार के पास कोलकाता चले आए, जो वहां एक संस्कृत पाठशाला में विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। कुछ समय बाद जानबाजार निवासी रानी रासमणि ने दक्षिणेश्वर में एक बहुत बड़ा मंदिर बनवाया इसमें कई देवताओं के अलग-अलग मंदिर थे। पंडित रामकुमार को उसमें पूजा करने को नियुक्त किया गया। श्री रामकृष्ण भी उनके साथ वहीं रहने लगे। पहले तो उन्होंने अपने भाई के इस काम का विरोध किया किंतु रानी रासमणि जाति की कैवर्त ( मल्लाह) थी, पर धीरे-धीरे उनका मन वहां लग गया और वे रानी की तरफ से कालीदेवी के पुजारी नियत कर दिए गए। वे इस कार्य को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ किया करते थे और प्राय: प्रार्थना किया करते थे " माँ ,मुझे दर्शन दे । " उनकी दशा उन्मत्त कि सी हो जाती थी और वह अपने शरीर का ज्ञान भूल कर घंटे माँ- माँ चिल्लाया करते थे। उनकी ऐसी अवस्था बहुत समय तक चलती रही और उस समय वे मंदिर में प्राय: ऐसे उलटे- सीधे कार्य किया करते थे जिससे लोग उनको सचमुच पागल समझने लगे।
इस प्रकार आंतरिक भक्ति ,श्रद्धा और वैराग्य द्वारा वे आध्यात्मिक मार्ग में निरंतर उन्नति करते गए। जब वे ध्यान करने बैठते तो उनको शीग्र ही समाधि -सी लग जाती थी और वह बड़ी देर तक पत्थर की मूर्ति की तरह बैठे रहते थे, जो कोई उनको देखता वह भी उनसे प्रभावित हुए बिना न रहता। उनकी साधना की बात दूर-दूर तक फैल गई और सैकड़ो व्यक्ति उनके दर्शनों को आने लगे। वे लोग बहुत तरह की भेंट भी चढ़ाते थे, पर वे उसे छूते भी न थे। उन्होंने साधना द्वारा रूपए पैसे से ऐसी घ्रणा पैदा करली थी कि सोना चांदी छूने से उनको जलन सी होने लगती थी। बड़े-बड़े पदविधारी उनकी स्तुति प्रार्थना करते पर उस तरफ भी उनका ध्यान नहीं जाता था। लोगों का विश्वास था कि उनको कालीदेवी का प्रत्यक्ष दर्शन होता था और वह प्रत्येक कार्य उनसे पूछ कर ही करते थे।
*आध्यात्मिक विवाह का अनुपम उदाहरण*
श्री रामकृष्ण परमहंस का विवाह अपने जन्मस्थान के समीप ही जयराम वाटी नामक गांव की श्रीमती शारदामणी देवी से हुआ था। विवाह के समय उनकी आयु 23 वर्ष की और वधू की 5 वर्ष की थी। सांसारिक दृष्टि से तो यह विवाह आपेक्षजनक जान पड़ता था पर श्री रामकृष्ण को इसका कुछ ध्यान न था। उनने केवल अपनी माता के आदेश को मानकर विवाह के लिए स्वीकृति दे दी थी। अब इसे आप चाहे स्ंयोग कहें अथवा दैवी विधान की माता शारदामणि भी बचपन से ही ईश्वर भक्त परायण और भजन- साधन की तरफ अनुरक्त थी। वह आरंभ से ही दीन- दुखियों की सहायता और घर वालों की सेवा करने में ही सुख मानती थी। उनका ऐसा मनोभाव देखकर अभिभावकों ने उनका विवाह एक अध्यात्म-मार्ग की पथिक के साथ करना उचित समझा। वे 13 वर्ष की उम्र होने तक दो-तीन बार श्री रामकृष्ण के घर कामारपुकुर में जाकर रहीं । वहां एक बार परमहंस जी भी तीन महीने तक उनके साथ रहे और उनको लौकिक तथा आध्यात्मिक शिक्षा देते रहे।
इसके कुछ समय बाद जब शारदा माता ने लोगों के मुख से सुना की परमहंस देव पागल हो गए हैं तो वे इसका ठीक पता लगाने दक्षिणेश्वर जाकर वहीं रहने लगी। उस समय उनकी आयु 16 वर्ष की थी और परमहंस जी की 35 वर्ष की। वे कुछ समय तक पति के साथ ही सोती रही और परमहंस देव रात में चाहे जब उठकर ध्यान करने लगते थे और समाधि की अवस्था में मृतक तुल्य जान पड़ते थे। इससे शारदा माता को भय जान पड़ता था तब परमहंस देव ने उनके सोने की व्यवस्था अपनी माता चंद्रादेवी जी के साथ कर दी, जो पास में ही एक कुटी में रहती थी । तब से लेकर परमहंस देव के अंत समय तक वे दक्षिणेश्वर की एक छोटी सी कोठरी में रहकर जहां तक बन सकता पति की सेवा करती रहीं ।
यह श्री रामकृष्ण परमहंस की असाधारण आत्मशक्ति का ही प्रभाव था कि वह अपनी युवती पत्नी के साथ एकांत में रहकर भी कामवासना से बचे रहे और कभी उनके हृदय में भोग विलास का भाव नहीं आया। उल्टा वे शारदा माता को जगदंबा का रूप समझकर कभी-कभी उनकी शोडशोपचार पूजा किया करते थे। जब कभी वह बीमार हुई तो उनकी दवा- दारू और परिचर्या में भी उन्होंने त्रुटि नहीं कि वह स्वयं धातु को छूते न थे पर शारदा माता के लिए उन्होंने कुछ स्वर्ण -आभूषण बनवा दिए थे, जिससे अन्य स्त्रियों को अलंकार धारण किए देखकर उनको दु:ख न हो। पर शारदा माता स्वयं भी ऊंचे दर्जे की आत्मज्ञान-निस्ट थीं और ऊपरी गहनों, कपड़ों को महत्व न देकर ईश्वर भक्ति को ही अपने जीवन का परम लक्ष्य मानती थीं। परमहंस देव के समाधिस्त हो जाने के पश्चात भी उन्होंने विधवा की तरह रहने का विचार नहीं किया, क्योंकि तब भी वे उनको प्रत्यक्ष दिखाई दिया करते थे और कहते थे कि-" मैं तो अमर हूं तुमको विधवा वेश धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं।" माता शारदा परमहंस देव के देहांत के पश्चात बहुत समय तक जीवित रही और सन 1920 में बैलूड़ मठ में उन्होंने अपनी लीला संवरण की। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के भक्त उनमें भी दैवी शक्ति के आविर्भाव का विश्वास रखते थे।
क्रमशः ....
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