सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

युग- चेतना के सूत्रधार : स्वामी रामकृष्ण परमहंस -२


।। ॐ।।


डॉ नितिन सहारिया ,महाकौशल

            
    *कामिनी और कंचन का पूर्ण त्याग*
                   संसार में मनुष्य को बंधन में डालने वाले दो ही पदार्थ हैं- कामिनी और कंचन, अन्य सब पदार्थ इन्हीं दोनों के अंतर्गत आ जाते हैं। इसलिए जो मनुष्य अध्यात्म- क्षेत्र में प्रगति करने का अभिलाषी हो उसे कामिनी और कंचन की वासना बिल्कुल त्याग देनी होगी। जिस समय श्री रामकृष्ण को दिव्य -ज्ञान हुआ उसी समय उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि सब वस्तुओं का सार ईश्वर ही है और उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिए।
            इसके पश्चात उन्होंने इस भावना को दृढ़ करने का अभ्यास करना आरंभ किया। उन्होंने ही एक हाथ में रुपया और दूसरे में मिट्टी का ढेला लिया और अपने मन को संबोधन करके कहने लगे - " हे मन, तू इसको रुपया कहता है, और इसको मिट्टी। रुपया चांदी का गोल टुकड़ा है जिस पर एक ओर रानी (विक्टोरिया) की तस्वीर छपी है। यह जड पदार्थ है, रुपया से चावल, कपड़ा ,घर, हाथी- घोड़ा आदि पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं। 10 -20 मनुष्यों को भोजन कराया जा सकता है, तीर्थ यात्रा, देवता और संतों की सेवा की जा सकती है। पर इसके द्वारा सच्चिदानंद की प्राप्ति नहीं हो सकती। क्योंकि इसके रहते हुए अहंकार सर्वथा नष्ट नहीं हो सकता और न मन आसक्तिहीन हो सकता है। देवता और साधु की सेवा आदि धर्म -कार्य किये जा सकते हैं पर वह भी मन में रजोगुण और तमोगुण ही उत्पन्न करता है और इस दशा में सच्चिदानंद की प्राप्ति नहीं हो सकती।"
        मिट्टी को देखकर वे कहते -" यह भी जड़ पदार्थ है, पर इससे अन्न उत्पन्न होता है जिससे मनुष्य के शरीर की रक्षा होती है। मिट्टी के द्वारा ही घर बनाया जाता है, देवी -देवताओं की मूर्ति भी बनाई जा सकती है। द्रव्य के द्वारा जो कार्य होते हैं वह मिट्टी द्वारा भी हो सकते हैं। दोनों एक ही श्रेणी की जड़ पदार्थ हैं और दोनों का परिणाम एक ही तरह का होता है। अरे मन! तू इन दोनों पदार्थों को लेकर तृप्त होगा अथवा सच्चिदानंद को प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा ! इस प्रकार कहकर उन्होंने नेत्र बंद कर लिए और ' रुपया- मिट्टी' 'रुपया- मिट्टी' इस प्रकार की ध्वनि करने लगे। अंत में उन्होंने रुपया और मिट्टी दोनों को गंगा जी में फेंक दिया।"
          इसी प्रकार उन्होंने स्त्री के संबंध में विचार किया कि उसकी वासना किसी भी प्रकार से क्यों न रखी जाए, उससे मस्तिष्क और मन दुर्बल ही होते हैं और परमात्म -चिंतन में बाधा पड़ती है। माना कि उसे लोग सुख के लिए ग्रहण करते हैं पर वह सुख क्षणिक ही रहेगा, कभी स्थाई नहीं हो सकता। वरन उसका अंतिम परिणाम सदैव हानिकारक ही होता है।

 *गुरु परीक्षा* 

                यद्यपि दक्षिणेश्वर मंदिर की संस्थापिका रानी रासमणि और उसके दामाद मथुरा बाबू को यह निश्चय हो गया कि श्री रामकृष्ण परमहंस सिद्ध पुरुष हैं और इस कारण वे उनके प्रति अत्यंत श्रद्धा रखते थे। उस समय परमहंस देव की आयु 24-25 वर्ष की थी, उनका शरीर बहुत बलवान था और सुंदरता को देखकर दर्शक तुरंत आकर्षित हो जाते थे। इस प्रकार उस समय वे पूर्ण युवक थे, पर लोग उनसे 5 वर्ष के बालक के समान व्यवहार किया करते थे। स्त्रियां उनके पास आने में जरा भी संकोच नहीं करती थीं। तो भी मनुष्य का मन ऐसा दुर्बल और अविश्वासी होता है कि अंत में इन लोगों ने परमहंस देव की परीक्षा ले ही डाली।
         कोलकाता के मछुआ बाजार में रहने वाली लक्ष्मीबाई नामक एक वैश्या से पहले सलाह करके मथुरा बाबू परमहंस देव को उसके घर ले गए। लक्ष्मीबाई ने 15 -16 सुंदर युवती वेश्याओं को अर्धनग्न अवस्था में एक कमरे में इकट्ठा कर रखा था। परमहंस देव को उस कमरे में ले जाकर मथुरा बाबू धीरे से दूसरे कमरे में चले गए। परमहंस देव इन दिनों बिल्कुल नग्न अवस्था में रहते थे, शरीर को ऊपर से केवल एक चादर से ढक लेते थे। ऐसी युवतियों के रूप- लावण्य और हाव -भावों से योगियो के मन में भी विकार उत्पन्न हो जाता है। फिर आज तो वे परमहंस देव की परीक्षा के लिए तरह-तरह की युक्तियां कर रही थीं । श्री रामकृष्ण जैसे ही कमरे में पहुंचे उन्होंने उनके बीच में खड़े होकर 'मां आनंदमयी - मां आनंदमयी' कहकर मस्तक नवाया और यही शब्द बार-बार उच्चारण करते-करते समाधि अवस्था में पहुंच गए। उनके नेत्रों से लगातार प्रेमाश्रू बह रहे थे। उनकी ऐसी अवस्था देखकर वैश्याएं भयभीत हो गई और कोई उनकी हवा करने लगी और कोई अपना अपराध समझकर क्षमा मांगने लगी। यह दृश्य देखकर मथुरा बाबू अत्यंत लज्जित हुए और उस दिन से उनकी भक्ति परमहंस देव के प्रति और भी दृड़ हो गई।
             एक बार रानी रासमणि ने भी उनकी परीक्षा लेनी चाहिए । इस संबंध में परमहंस देव ने एक बार कहा था - " मैं अपनी कोठरी में सो रहा था कि दो स्त्रियों मेरे पास आई पहले तो उन्होंने मुझे इधर-उधर की कुछ बातें की और फिर खुल्लम-खुल्ला मेरे अंग का स्पर्श करके काम चेष्टा करने लगी। मैं 'माँ- माँ' पुकार उठा और वेसुध हो गया। जब मुझे चेत हुआ तो देखा कि वे स्त्रियां मेरे चरण पड़कर रो रही थी। मैंने तुरंत अपने चरण खींच लिए और 'मां ! आनंदमयी' कहकर नमस्कार किया। इसके बाद वे बार-बार क्षमा मांगकर चली गई।"
           परमहंस देव नारी मात्र को जगदंबा का अंश समझकर 'माता' ही कहते थे। वे काली की मूर्ति के सम्मुख खड़े होकर प्रार्थना करते थे - मां! अविधा भी तू है, ग्रहस्त की कुलवधू भी तू है ,मछुआ बाजार की वेश्या भी तू है। माँ! दोनों रूपों में तू मेरी माता है- मैं तेरी संतान हूं। "
       इस प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति का ही परिणाम था कि उस समय के बड़े-बड़े नव शिक्षित भी इस अनपढ़ साधु को 'भगवान' कहकर पूजने लग गए थे।
       *संपत्ति से विराग*
       कुछ समय पश्चात परमहंस देव के त्याग और तपस्या की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई और बहुसंख्यक लोग उनके दर्शनों को आने लगे। इनमें लक्ष्मी नारायण नामक व्यक्ति गीता और भागवत का विशेष प्रेमी था। वह परमहंस देव से धर्मशास्त्र के संबंध में अधिक तर्क-वितर्क किया करता था और प्राय: दक्षिणेश्वर जाकर उनके उपदेश सुनने का नियम बना लिया।
          एक दिन लक्ष्मीनारायण ने परमहंस देव के बिस्तर पर फटी चादर को देखकर कहा- " आपके बिछाने की चादर फट गई है ,इसे बदल क्यों नहीं लेते ? उन्होंने उत्तर दिया- " वह अभी काम देने लायक है ,जब अधिक फट जाएगी तो मंदिर के स्वामी दूसरी भेज देंगे।" लक्ष्मी नारायण कहने लगा - " यह कायदा तो ठीक नहीं। कपड़ा फटकार चिथडा हो जाए उसके पहले ही नया वस्त्र दे देना चाहिए । अगर साधु को जीवन निर्वाह की चिंता करनी पड़े तो उसके भजन -साधन में विघ्न पड़ता है। इसलिए मेरी इच्छा है कि आपके नाम से ₹10000 के प्रॉमिससरी नोट खरीद दूं। उनका ब्याज कम से कम ₹40 महीना आ जाएगा जिससे आपका सब खर्च भली प्रकार चलता रहेगा।"
           यह बात सुनते ही परमहंस देव बड़े असंतुष्ट हो गए और पुकार कर कहने लगे- " क्यों मुझे धन का लोभ दिखाकर अनर्थ के कुएं में धकेलते हो ? धन तो परमार्थ के मार्ग में कंटक स्वरूप है और वह मनुष्य को उत्तम पद से नीचे गिरा देता है । तुम यह बतलाओ कि क्या धन के द्वारा 'सच्चिदानंद' प्राप्त हो सकता है ? नहीं , नहीं, कभी नहीं। धन तो जड़ पदार्थ है, उससे जो कुछ प्राप्त होगा वह भी जड़ ही होगा। जड़ पदार्थ की भी आवश्यकता होती है, यह ठीक है। शरीर की रक्षा के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। पर मेरा काम काली माता की कृपा से स्वछतापूर्वक चल जाता है। इसलिए धन इकट्ठा करके रखने का कोई कारण मुझे दिखाई नहीं देता। मैं रासमणि के मंदिर में रहता हूं, इससे वही मुझे भोजन देती है ऐसा तुम समझते होंगे ? अज्ञानी ऐसा ही विचार करते हैं, पर क्या यह सत्य है ? रासमणि को द्रव्य किसने दिया है? जिस समय उसका जन्म हुआ वह अपने साथ द्रव्य नहीं लाई थी और मरते समय भी साथ में कुछ नहीं ले जा सकेगी। इसलिए यह तो केवल बाहरी प्रपंच ही है, इस प्रपंच को मैं नमस्कार करता हूं। चैतन्य के साथ उसका केवल आधार- आधेय का ही संबंध रह सकता है। चैतन्य के साथ उसका कोई साक्षात संबंध जान नहीं पड़ता। तब हम क्यों चैतन्य के साथ जड़ पदार्थ का संबंध जोड़ने की चेष्टा करें ? "
        यह सुनकर लक्ष्मीनारायण ने कहा - " मैं आपकी इस बात का पूरी तरह अनुमोदन नहीं कर सकता। अपने संबंध में आपने जो विचार प्रकट किए वे ठीक नहीं हैं । आप कौन हैं, यह मैंने समझ लिया है और इसी कारण यह प्रस्ताव किया था। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि आपका मन विषयों से बिल्कुल अलग हो गया है। तेल जैसे पानी पर तैरता रहता है वैसे ही आपका मन विषयों पर तैरता रहेगा।"
            परमहंस देव ने उत्तर दिया - " तेल और पानी एक साथ मिल तो नहीं सकते, पर जल में तेल की गंध अवश्य आ जाती है और ज्यादा दिन बीत जाने पर तेल और जल की संयुक्त स्थान पर चीकट जम जाती है, उसमें से दुर्गंध निकलने लगती है। इसी प्रकार विषयों के साथ मन का स्ंयोग होने से पहले विषयों में से दुर्गंध निकलने लगेगी और फिर मन विकृत हो जाएगा।"
       लक्ष्मी नारायण ने फिर बड़े आग्रह से कहा - " आपको यह रुपया तो अवश्य लेना पड़ेगा। जब मैं यह रुपया आपको दान करने का निश्चय कर लिया है, तब मैं उसे हरगिज वापस नहीं ले सकता। आपकी जैसी इच्छा हो वैसा उसका उपयोग करो।"
         लक्ष्मीनारायण की यह बात सुनते ही परमहंस देव बालकों की तरह रोने लग गए - " मां , ऐसे लोगों को मेरे पास क्यों लाती है ? मां ! जो लोग मुझे तुझसे अलग करना चाहते हैं वे तो मेरे साथ शत्रुता करते हैं, मां! " ऐसा कहते- कहते वे समाधिष्त हो गए।
       इस प्रकार रामकृष्ण परमहंस देव ने कहा की साधु कहलाने वाले को अपने पास धन कभी नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे अहंकार की उत्पत्ति होती है। हमारा योग- क्षेम तो भगवान के हाथ में ही रहता है।
क्रमशः .....

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