सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जिन्होंने भारतीय संस्कृति को नूतन गति दी - गुरुजी म. स. गोलवलकर




  डॉ. नितिन सहारिया , महाकौशल


युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ( संघ के द्वितीय सरसंघचालक) के विषय में लिखते हैं कि - 
                        प्रस्तावित द्विराष्ट्र के सिद्धांत के समय से ही ,विभाजन के पूर्व से ही पंजाब और बंगाल में हिंदुओं पर अमानुषिक अत्याचार किए जाने लगे थे। सन 1947 के मार्च महीने में तो स्थिति इतनी भीषण हो गई थी कि केवल अमृतसर में ही लूटमार, आगजनी और हत्याओं के 994 मामले दर्ज कराए गए। करोड़ों की संपत्ति नष्ट कर दी गई और रावलपिंडी, लाहौर ,गुजरांवाला आदि स्थानों पर हिंदुओं के मोहल्ले जला दिए गए। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं के स्वयंसेवकों ने पीड़ित जनों को यथासंभव सुरक्षा की। उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने से लेकर अन्न- वस्त्र, दवाइयां आदि देने के लिए स्वयंसेवकों के जत्थे के जत्थे गए। आग बुझाने के लिए अग्निशामक दल बनाए गए और लोगों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया गया।
     10 अगस्त, 1947 को विभाजन की जब विधिवत घोषणा कर दी गई। पाकिस्तान में हिंदुओं पर किए जाने वाले नृशंस अत्याचारों ने और भी विभत्स रूप धारण कर लिया। उस समय उपलब्ध सभी स्वयंसेवकों को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए झोंक दिया गया। कहना नहीं होगा कि उन्माद ग्रस्त सांप्रदायिक तत्वों के हाथों कई स्वयंसेवक भी वीरगति को प्राप्त हुए।
    उन्हीं दिनों कश्मीर का वातावरण भी बिगडा । पाकिस्तान का निर्माण होते ही कई कवाईली कश्मीर में घुस आए। रियासत में इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि वह कबायलियों का सामना कर सके। ऐसे समय में संघ के स्वयंसेवक आगे आए और उन्होंने पाकिस्तानी आक्रमणों का सामना किया। कश्मीर की सरकार ने मदद मांगी और भारतीय सेना ने जम्मू कश्मीर की सहायता का निश्चय किया। भारतीय सेना के विमान जम्मू के जिस अड्डे पर उतरते थे,वहां हवाई अड्डा बहुत छोटा था और वहां विमान उत्तर नहीं सकते थे अतः संघ के 500 स्वयंसेवकों ने रात-दिन एक कर बिना कुछ लिए केवल 7 दिन में ही विमान अड्डे को विमान उतरने योग बना दिया। स्वयंसेवकों की इस सेवा लगन को भारत सरकार के एजेंट जनरल कुंवर दिलीप सिंह ने मुक्त कंठ से सराहा।
       कश्मीर को कबायलियों के आक्रमण और पाकिस्तानी शिकन्जो से मुक्त कराने में सैकड़ो स्वयंसेवक शहीद हुए। इसके अतिरिक्त सन 1947 में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने गुरुजी के निर्देश पर दिल्ली में भी सराहनीय सेवाएं की। पूर्वी पंजाब का बंटवारा तो हो ही चुका था। ' *लीगी' तत्व इसके बाद दिल्ली में भी गड़बड़ी फैलाना चाहते थे, उन्होंने इसके लिए षड्यंत्रकारी योजनाएं बनाई पर संघ के स्वयंसेवकों ने उसका पर्दाफाश ही नहीं किया उन सारे यंत्रों को विफल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कहा जाता है उस समय पाकिस्तान का इरादा दिल्ली के लाल किले पर हरा झंडा फहराने का था यदि स्वयं सेवकों ने षड्यंत्र का भंडाफोड़ न किया होता तो कहा नहीं जा सकता कि आज भारत की क्या तस्वीर होती ?* राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से यह सूचना सरदार पटेल को दी गई जिससे भारत सरकार समय पर सतर्क हो गई।
     30 जनवरी ,1948 ई को दिल्ली के बिरला भवन में सायंकाल प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गांधी जी को किसी ने गोली मार दी। उस समय गुरुजी मद्रास में थे तुरंत वह वहां से नागपुर पहुंचे और देशभर में फैली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखों को 13 दिन तक बंद रखकर शोक मनाने का आदेश दिया। महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान काल के सर्वाधिक आदरणीय महान विभूति की ऐसी नृशंस हत्या असाधारण पाशविक घटना है। मुझे इससे असह्य दुख हुआ है और यह बात तो और भी शर्मनाक है कि ऐसा कुक्रत्य करने वाला व्यक्ति हमारा ही देशबंधु है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का सर इस स्थिति में शोकाकुल अवस्था में लज्जा से झुक जाएगा।
       इस हत्या का संबंध संघ से जोड़ा गया और तरह-तरह के भ्रामक समाचार फैलाए गए। गुरु जी ने देशभर की शाखों को ऐसी स्थिति में शांत रहने के लिए तार द्वारा संदेश भेजा । गुंडा तत्व इस हत्या का संबंध संघ से जोड़कर स्वयंसेवकों पर अत्याचार करने लगे। गुरुजी स्वयंसेवकों को शांति तथा धैर्यपूर्वक यह सब सहन करने के लिए कहते रहे।
       लेकिन देशभक्त और राष्ट्रवादी तत्वों को विस्मय में तो उस समय हुआ जब एक दिन रात को 12:00 बजे गुरु जी के नाम पर वारंट जारी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय कुछेक स्वयंसेवक ही उनके साथ थे जिनसे गुरु जी ने कहा "घबराने की कोई बात नहीं है। कुछ दिनों में ही संदेह का यह पटल गल जाएगा और हम लोग निष्कलंक बाहर आएंगे। तब तक हम पर अनेक अत्याचार होंगे, पर हमें उन्हें धैर्य और शांति के साथ सहना है। हमें पूरे संयम से रहना है और तभी हम स्वयंसेवक की कसौटी पर खरे उतरेंगे।"
        गुरुजी को महात्मा गांधी की हत्या के एक अभियुक्त के रूप में कारागार में डाल दिया गया। जिस दिन उन्हें गिरफ्तार किया गया उसके दूसरे दिन ही संघ को अवैध घोषित कर दिया गया । इसका कारण यह बताया गया था कि संघ हिंसा में विश्वास रखने वाली एक फासिस्ट संस्था है। उसकी हिंसा वृत्ति के शिकार अनेक व्यक्ति हुए हैं। संघ की इसी वृत्ति के कारण देश से महात्मा गांधी के नेतृत्व का साया उठ गया है।
       इस घोषणा के बाद भी गुरु जी ने कानून और सरकार में आस्था व्यक्त करते हुए जेल से ही एक वक्तव्य दिया जिसका सारांश इस प्रकार है- " सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अवैध घोषित कर उस पर प्रतिबंध लगा दिया है अत: प्रतिबंध हटाए जाने तक मैं संघ को विसर्जित करता हूं। लेकिन सरकार ने संघ पर जो आरोप लगाए हैं, उन्हें में अस्वीकार करता हूं।"
       गुरुजी का यह वक्तव्य सर्वप्रथम एक पाकिस्तानी अखबार ने छापा था। कुछ दिनों बाद सरकार ने गुरु जी पर लगाया गया वह अभियोग वापस ले लिया जिसमें उन्हें गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र में भागीदार माना था और उन्हें नागपुर जेल में नजर बंद कर दिया था। जेल में गुरुजी और सरदार पटेल तथा पंडित नेहरू के बीच पत्र व्यवहार चला। गुरुजी की ओर से लिखे गए पत्रों में संघ पर लगाए प्रतिबंध को अनुचित सिद्ध किया गया था लेकिन इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ *वस्तुत पंडित नेहरू और सरदार पटेल चाहते थे कि संघ का कांग्रेस में विलय हो जाए। इस आशय के पत्र पटेल ने लिखे भी थे। पर गुरु जी का कहना था कि संघ किसी राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए काम नहीं कर रहा है, उसका उद्देश्य तो भारतीय जनता में राष्ट्रीयता की भावनाओं का विकास करना और उन्हें सुदृढ बनाना है।* परंतु बात इस प्रकार बनती न देख गुरु जी ने लिखा , " संघ पर लगाए गए आरोप झूठे हैं- यह सिद्ध हो चुका है। या तो उन्हें वापस लेकर संघ पर से प्रतिबंध हटाया जाना चाहिए अथवा उन आरोपों को न्यायालय में सिद्ध करना चाहिए। सरकार इस प्रस्ताव को भी टल गई वार्तालाप और विचार विनिमय की सभी पहल विफल हुई और गुरु जी को एक बार पुनः 'बंगाल प्रिजनर्स एक्ट' के अनुसार नागपुर जेल में कैद कर दिया गया।"
       अब गुरुजी ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन की योजना बनाई और सत्याग्रह का आवाहन हुआ। इस आवाहन को सुनकर शहरों और गांव के स्वयंसेवक अपना घर- परिवार तथा निजी काम-काज छोड़कर, पढ़ाई लिखाई त्याग कर सत्याग्रह आरंभ होने की तिथि की घोषणा का इंतजार करने लगे। जब तिथि की घोषणा हुई तो हजारों स्वयंसेवक अपने ही देश में सत्याग्रह के समरांगण में कूद पड़े ।बताया जाता है कि उस समय कोई 80000 स्वयंसेवक गिरफ्तार हुए । उन्हें कड़ाके की सर्दी में नदियों में फेंका गया और तरह-तरह की यातनाएं दी गई। सत्याग्रहियों ने इसका विरोध करने के लिए भूख हड़ताल की।
      आम जनता ने भी संघ पर लगा प्रतिबंध हटाने के पक्ष में आंदोलन किया और कई नगरों में बड़े-बड़े जुलूस निकाले। लेकिन यह सब इतने शांत, अनुशासन और व्यवस्थित ढंग से होता था कि संघ की विचारधारा से मतभेद रखने वाले प्रख्यात सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण ने भी कहा - " राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुशासन प्रियता, चारित्र्य दृढ़ता और प्रेम सचमुच ही प्रशंसनीय है। संघ ने समाज के लिए पर्याप्त ठोस काम किया है, इसलिए वह अभी तक टिका हुआ है। कानून से हम उसे बंद नहीं कर सकेंगे।"
     *कांग्रेस के ही एक वयोवृद्ध नेता डॉक्टर भगवान दास ने संघ पर लगी पाबंदी को हटाने की मांग की थी। यही नहीं इसके लिए उन्होंने एक पत्र छपवाकर बाँटा भी था।* 
        प्रख्यात नेताओं की राय,जनता की मांग और सत्याग्रह के परिणाम स्वरूप संघ और सरकार के बीच समझौते के प्रयत्न होने लगे। इन प्रयत्नो के आरंभ होते ही संघ की ओर से आंदोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी गई। कई नेताओं की मध्यस्थता और लंबी समझौता *वार्ताओं के परिणाम स्वरुप 11 जुलाई 1949 को संघ पर लगाया प्रतिबंध हटा* दिया गया। अगले दिन गुरुजी बैतूल जेल से रिहा हुए। पत्रकारों ने उनसे सरकार के पिछले रवैये के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि- मेरा विश्वास सही निकला जिस सत्ता ने प्रतिबंध लगाया था उसी ने उसे वापस भी ले लिया। इसके आगे 18 माह तक भोगी जेल यात्राओं के संबंध में बिना कोई कटुता व्यक्त किए बोले , " *संघबंदी के इस मामले को यहीं समाप्त कर दीजिए। दांत यदि जीव को काट ले या टांग, टांग से लड़ जाए तो हम न दांत को तोड़ देते हैं और न टांगों को काट डालते हैं। जिन्होंने हम पर अन्याय किया है, वे अपने ही तो हैं और एक घर में रहने वाले सदस्यों में क्या कभी मन-मुटाव नहीं होता।"* 
     कितना उदार था उनका दृष्टिकोण और कितनी उच्च थी उनकी भावनाएं। 18 महीने की जेल यात्रा के बाद जब भी नागपुर स्टेशन पर उतरे तो 30000 लोगों ने उनका स्वागत किया और भी कई अन्य स्थानों पर उनका अभिनंदन हुआ। *सरदार पटेल ने उन्हें अपनी शुभकामनाएं भेजते हुए लिखा- " संघ से प्रतिबंध हटा लेने पर मुझे कितनी प्रसन्नता हुई, इसका अनुमान वही लोग लगा सकते हैं, जो उस समय मेरे पास थे। मैं अपनी शुभकामनाएं भेजता हूं।"* 
        इन्हीं दिनों गुरुजी का दिल्ली आना हुआ। पंडित नेहरू गुरुजी की उस प्रतिक्रिया से बड़े प्रभावित हुए थे जो उन्होंने जेल से छूटने के बाद पत्रकारों के पूछने पर व्यक्त की थी । उनकी दृष्टि में गुरु जी का स्थान काफी ऊंचा हो गया था अत: वे गुरुजी से दो बार मिले और इन दोनों मुलाकातों में गुरुजी तथा पंडित नेहरू ने देश की समस्याओं पर विचार -विमर्श किया तथा एक दूसरे के दृष्टिकोण को समझा।
         *अंग्रेजों के राज्य में गाय कटती थी यह तो इतना आपत्तिजनक नहीं था, क्योंकि उन्हें हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं से लेना -देना ही क्या ? पर वही परंपरा स्वतंत्र भारत में भी चलती रहे यह अनुचित ही कहा जाना चाहिए । इस विषय की ओर गुरु जी ने सर्वप्रथम ध्यान आकर्षित किया ।* गुरु जी ने और अन्य हिंदू नेताओं ने मिलकर सरकार से निवेदन किया तो उत्तर मिला कि भारत सरकार धर्मनिरपेक्ष है और वह इस विषय में कुछ नहीं कर सकती।
          अस्तु आंदोलन का निश्चय करना पड़ा वस्तुत: *गुरुजी के मुख से धर्मप्राण हिंदू जनता की वाणी इन शब्दों में मुखर हुई थी, " गौवंश की रक्षा न केवल आर्थिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण है ,वरन् यह हमारे देश की सांस्कृतिक थाती और राष्ट्रीय एकता का भी प्रतीक है।"* सरकार तक इस आवाज को पहुंचाने के लिए हस्ताक्षर आंदोलन चलाने का निर्णय किया गया। एक कदम गोपाष्टमी से उठाया गया। लगभग एक माह के भीतर करोड़ों लोगों के हस्ताक्षर एकत्र किए गए। इसके लिए जनमत जगाने हेतु स्थान- स्थान पर प्रदर्शन किए गए, जुलूस निकाले और गांव-गांव संदेश भेजे गए। इस अभियान का व्यापक प्रभाव हुआ परंतु विरोध भी कम नहीं हुआ।
       देश भर के विभिन्न क्षेत्रों से एकत्र किए गए हस्ताक्षर जब राष्ट्रपति जी को दिए गए तो उन्होंने सरकार को सहानुभूति पूर्ण रवैया अपनाने की सलाह देने का आश्वासन दिया। कुछ प्रदेशों में तो गौ हत्या बंद हो गई फिर भी गौबधवन्दी आंदोलन को स्थगित नहीं किया गया।
         *1954 ई. में प्रयाग के कुंभ मेले में भी पं नेहरू को लाखों व्यक्तियों के हस्ताक्षरों से युक्त यह मांग पत्र दिया गया* कि लोकतांत्रिक पद्धति से हम यह मांग करते हैं कि *संसद में प्रस्तुत 'गौहत्या बंदी विधेयक' का आप समर्थन करें। गोवध की अनुमति देने वाला व्यक्ति हमारा प्रतिनिधि नहीं हो सकता।*

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