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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
महेन्द्र सिंह भदौरिया
को
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विश्व मातृभाषा दिवस: जब भाषा बचती है, तभी संस्कृति और राष्ट्र जीवित रहते हैं
आज जब हम विश्व मातृभाषा दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल एक औपचारिक दिवस नहीं है। यह वह दिन है जो हमें हमारी जड़ों की याद दिलाता है। वह जड़, जिससे हमारी पहचान बनी है। वह भाषा, जिसमें हमने पहली बार अपनी माँ को पुकारा, अपने भाव व्यक्त किए, अपने सपने देखे। मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, यह हमारी आत्मा की आवाज होती है।
आज का समय आधुनिकता का है। लोग आगे बढ़ना चाहते हैं, दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना चाहते हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन इस दौड़ में एक खतरनाक प्रवृत्ति भी दिखाई दे रही है। लोग अपनी ही मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। उन्हें लगने लगा है कि अपनी भाषा बोलना पिछड़ेपन की निशानी है। यही सोच सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि जब कोई समाज अपनी भाषा से दूर होता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी संस्कृति और अपनी पहचान से भी दूर हो जाता है।
विश्व मातृभाषा दिवस हमें यही चेतावनी देता है कि अगर हमें अपनी संस्कृति को जीवित रखना है, तो अपनी भाषा को जीवित रखना होगा। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, यह हमारी परंपराओं, हमारे ज्ञान और हमारे इतिहास की संरक्षक है।
भारत इस मामले में दुनिया का सबसे समृद्ध देश है। यहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। हर भाषा अपने भीतर हजारों वर्षों का ज्ञान और अनुभव समेटे हुए है। हिंदी, संस्कृत, गुजराती, तमिल, मराठी, बंगाली, पंजाबी — ये सभी केवल भाषाएं नहीं हैं, बल्कि भारत की आत्मा के अलग-अलग स्वर हैं।
हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो ज्ञान दिया, वह हमारी भाषाओं में ही दिया। वेद, उपनिषद, गीता — इन सबका ज्ञान हमारी अपनी भाषा में सुरक्षित है। यही कारण है कि पूरी दुनिया आज भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर आकर्षित हो रही है। लेकिन दुख की बात यह है कि हम स्वयं अपनी भाषाओं से दूर होते जा रहे हैं।
जब बच्चा अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करता है, तो वह अधिक तेजी से सीखता है। उसकी समझ अधिक गहरी होती है। उसका आत्मविश्वास मजबूत होता है। मातृभाषा व्यक्ति के मानसिक विकास का सबसे मजबूत आधार होती है।
दुनिया के कई विकसित देशों ने इस सत्य को समझा है। जापान, जर्मनी, फ्रांस, चीन — इन सभी देशों ने अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता दी है। उन्होंने अपनी भाषा को कभी नहीं छोड़ा। यही कारण है कि वे आज विश्व में अग्रणी हैं।
भारत को भी अगर विश्व गुरु बनना है, तो हमें अपनी मातृभाषाओं का सम्मान करना होगा। हमें अपनी भाषा पर गर्व करना होगा। क्योंकि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, यह आत्मसम्मान का आधार है।
आज कई युवा यह सोचते हैं कि अंग्रेजी बोलना ही सफलता की निशानी है। जबकि सच्चाई यह है कि सफलता का भाषा से कोई संबंध नहीं होता। सफलता का संबंध ज्ञान, मेहनत और आत्मविश्वास से होता है। और आत्मविश्वास अपनी पहचान से आता है, अपनी भाषा से आता है।
जिस व्यक्ति को अपनी भाषा पर गर्व होता है, उसे अपनी संस्कृति पर भी गर्व होता है। और जिस समाज को अपनी संस्कृति पर गर्व होता है, उसे कोई भी कमजोर नहीं कर सकता।
आज विश्व मातृभाषा दिवस पर हमें एक संकल्प लेना चाहिए। हमें अपनी भाषा का सम्मान करना चाहिए। हमें अपने बच्चों को अपनी भाषा सिखानी चाहिए। हमें अपनी भाषा में बात करने में गर्व महसूस करना चाहिए।
जब हम अपनी भाषा को बचाते हैं, तो हम केवल शब्दों को नहीं बचाते, हम अपनी संस्कृति को बचाते हैं। हम अपने इतिहास को बचाते हैं। हम अपनी पहचान को बचाते हैं।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, और हमारी भाषाएं इस विविधता का सबसे सुंदर रूप हैं। हर भाषा भारत माता की आवाज है। हर भाषा हमारी सभ्यता का एक हिस्सा है।
अगर हमें भारत को मजबूत बनाना है, तो हमें अपनी भाषाओं को मजबूत बनाना होगा। हमें अपनी मातृभाषा को सम्मान देना होगा।
क्योंकि जब भाषा जीवित रहती है, तभी संस्कृति जीवित रहती है। और जब संस्कृति जीवित रहती है, तभी राष्ट्र मजबूत रहता है।
आज का दिन हमें यही याद दिलाता है कि हमारी मातृभाषा ही हमारी असली पहचान है। इसे बचाना केवल हमारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य है।
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