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सामाजिक न्याय या वैचारिक प्रत्यारोपण? विश्वविद्यालयों का बदलता चरित्र




✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

यूजीसी का प्रश्न केवल एक विनियम का प्रश्न नहीं है। यह उस दृष्टि का प्रश्न है जिसके माध्यम से आज भारतीय समाज को पढ़ा जा रहा है। शुरुआत में जब विश्वविद्यालयों में Equal Opportunity Centre, Equity Committee और Equity Squad जैसी संरचनाओं को अनिवार्य करने की बात आई, तो उसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया गया। 

संविधान स्वयं अनुच्छेद 15(4), 16(4) और 46 के माध्यम से राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अत्याचार निवारण कानून है, आरक्षण है, छात्रवृत्तियाँ हैं, आयोग हैं। यह सब इसलिए बना क्योंकि इतिहास में अन्याय हुए हैं, और उन्हें अनदेखा करना नैतिक रूप से असंभव है।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान विनियम उसी संवैधानिक भावना से प्रेरित हैं, या वे एक व्यापक वैश्विक वैचारिक परियोजना का हिस्सा हैं। Diversity, Equity, Inclusion और Accessibility—यह DEIA मॉडल अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विकसित हुआ। उसका बौद्धिक आधार Critical Race Theory में मिलता है। Derrick Bell ने 1973 में Race, Racism and American Law में यह प्रतिपादित किया कि संस्थाएँ तटस्थ नहीं होतीं; वे ऐतिहासिक सत्ता-संबंधों को पुनरुत्पादित करती हैं। Kimberlé Crenshaw ने Intersectionality की अवधारणा दी, जिसके अनुसार व्यक्ति की पहचान और दमन बहुस्तरीय होते हैं।

अमेरिका का संदर्भ नस्लीय दासता और विधिक भेदभाव का था। वहाँ “संरचनात्मक नस्लवाद” का सिद्धांत ऐतिहासिक अनुभव से निकला। परंतु भारत का ऐतिहासिक विकास भिन्न है। यहाँ जाति-संरचना जटिल रही है—क्षेत्रानुसार बदलती रही है, समयानुसार बदलती रही है। औपनिवेशिक काल में भारत के इतिहास को जिस रूप में लिखा गया, उसने इस बाइनरी को मजबूत किया। जेम्स मिल की पुस्तक History of British India (1817) में भारतीय समाज को एक स्थायी, दमनकारी और जड़ संरचना के रूप में चित्रित किया गया। बाद में औपनिवेशिक जनगणनाओं ने समाज को कठोर जातीय श्रेणियों में बाँटना शुरू किया। 1872 की प्रारंभिक जनगणना में तथाकथित “अस्पृश्य” आबादी लगभग 2.5% दर्ज हुई। 1931 की जनगणना तक यह आँकड़ा लगभग 17% तक पहुँच गया। यह परिवर्तन केवल सामाजिक वास्तविकता का नहीं, बल्कि प्रशासनिक वर्गीकरण का परिणाम भी था। पहचान को स्थिर और सांख्यिकीय श्रेणी बना देने से वह सामाजिक गतिशीलता से कट जाती है।H.H. Risley ने नस्लीय सिद्धांतों के आधार पर भारतीय समुदायों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया। Nicholas Dirks ने Castes of Mind में लिखा कि औपनिवेशिक शासन ने जाति को शासन-उपकरण के रूप में पुनर्गठित किया।

समाज को “शोषक बनाम शोषित” की स्थायी बाइनरी में बाँटना आधुनिक यूरोपीय वैचारिक परंपरा से निकला है। कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी में आर्थिक वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत प्रस्तुत किया—बुर्जुआ और सर्वहारा। बाद में इसी ढाँचे को नस्ल, लिंग और सांस्कृतिक पहचान पर लागू किया गया। अमेरिका में नस्लीय इतिहास के संदर्भ में क्रिटिकल रेस थ्योरी विकसित हुई, जिसमें यह कहा गया कि भेदभाव व्यक्तिगत व्यवहार का नहीं, बल्कि संस्थागत संरचना का परिणाम है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या भारत का इतिहास उसी रेखीय मॉडल से समझा जा सकता है?

यहाँ मैं एक बात स्पष्ट मानता हूँ—अस्पृश्यता ऐतिहासिक सत्य है। सामाजिक बहिष्कार भी सत्य है। डॉ. आंबेडकर की Annihilation of Caste इस पीड़ा का दस्तावेज़ है। परंतु क्या सम्पूर्ण भारतीय इतिहास को स्थायी “शोषक बनाम शोषित” की कथा में सीमित कर देना बौद्धिक ईमानदारी है?

यह भी सत्य है कि भारत लगभग एक हजार वर्षों तक विदेशी शासन के अधीन रहा। इस काल में राजनीतिक और आर्थिक संरचनाएँ बदलीं। इसलिए समूचे सामाजिक अन्याय को केवल एक आंतरिक जातीय षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास को सरल बना देना है।

संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को सुधारात्मक उपाय के रूप में स्वीकार किया। 75 वर्षों में इस नीति के परिणाम भी सामने आए। इस वर्ग से राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, मंत्री, न्यायाधीश, प्रशासनिक अधिकारी और शिक्षाविद बने। यह लोकतंत्र की सफलता है।

परंतु यदि इतने लंबे समय बाद भी वही वर्ग स्थायी रूप से “वंचित” की श्रेणी में प्रस्तुत हो, तो नीति की समीक्षा भी आवश्यक है। क्या लाभ समान रूप से पहुँचा? क्या आंतरिक असमानताएँ बनी रहीं? क्या क्रीमी लेयर का सिद्धांत पर्याप्त कठोर है?

यदि हम राजवंशों पर दृष्टि डालें तो भारतीय इतिहास बहुस्तरीय दिखाई देता है।

प्राचीन काल में नंद वंश (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) मगध में उभरा। परंपरागत क्षत्रिय वंश से भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि का उल्लेख अनेक ग्रंथों में मिलता है। उसके बाद मौर्य वंश—चंद्रगुप्त मौर्य से अशोक तक—ने उपमहाद्वीप के विशाल भूभाग पर शासन किया।

दक्षिण भारत में सातवाहन, चोल, पांड्य और चेर राजवंशों ने समुद्री व्यापार और प्रशासनिक संरचना विकसित की। चोल साम्राज्य (9वीं–13वीं सदी) दक्षिण-पूर्व एशिया तक प्रभाव रखता था।

मध्यकाल में देवगिरि के सेउना यादव (12वीं–14वीं सदी), काकतीय (तेलंगाना), होयसला (कर्नाटक) जैसे राजवंश उभरे। उत्तर भारत में जाट रियासतें, राजपूत रियासतें और बाद में मराठा शक्ति (17वीं–18वीं सदी) ने व्यापक राजनीतिक प्रभाव स्थापित किया।

मराठा महासत्ता ने 18वीं सदी में उत्तर से दक्षिण तक राजनीतिक संतुलन बदला। भरतपुर की जाट रियासत ने मुगल साम्राज्य को चुनौती दी।

इन राजवंशों की सामाजिक पृष्ठभूमि एक जैसी नहीं थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में शक्ति-संरचना स्थिर और एकरेखीय नहीं थी।

आर्थिक इतिहास भी इस सरल बाइनरी को चुनौती देता है। Angus Maddison के अनुसार 1700 में भारत का विश्व GDP में योगदान लगभग 23% था। 1820 में भी भारत विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख भाग था। औपनिवेशिक काल के अंत तक यह घटकर लगभग 3% रह गया। यह गिरावट औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों, औद्योगिक क्रांति और संसाधन-निकासी का परिणाम थी। यदि बहुसंख्यक समाज शताब्दियों से पूर्णतः निष्क्रिय और स्थायी दमन में होता, तो इतनी दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता संभव नहीं होती।

अब वर्तमान संरचना देखें। मंडल आयोग (1980) की सिफारिशों के आधार पर 27% OBC आरक्षण लागू हुआ। 1992 में सर्वोच्च न्यायालय (Indra Sawhney प्रकरण) ने OBC आरक्षण को वैध माना और “क्रीमी लेयर” की अवधारणा लागू की। आज OBC सूची में देशभर में 2600 से अधिक जातियाँ शामिल हैं।

यहाँ एक जटिलता है। OBC श्रेणी एक समान आर्थिक या सामाजिक समूह नहीं है। इसके भीतर अत्यंत संपन्न, राजनीतिक रूप से प्रभावशाली और बड़े कृषक समुदाय भी हैं, और अत्यंत गरीब, सीमांत किसान तथा श्रमिक भी। कृषि जनगणना 2015–16 और 2018–19 के आँकड़े बताते हैं कि भूमि स्वामित्व असमान है, पर यह असमानता केवल एक ही श्रेणी तक सीमित नहीं। कई राज्यों में मध्यम और बड़े जोत वाले कृषक समुदाय वही हैं जो OBC श्रेणी में आते हैं, पर उसी समुदाय के भीतर छोटे किसान भी हैं।

तमिलनाडु में कुल आरक्षण 69% है (राज्य सूची के आधार पर)। इसमें लगभग:

30% – OBC
20% – MBC (Most Backward Classes)
18% – SC
1% – ST

इस तरह लगभग 69% सीटें आरक्षित हैं। यह कहना कि “97% आबादी शोषित–पीड़ित–पिछड़ा” है, एक राजनीतिक नारा हो सकता है, पर प्रशासनिक तथ्य नहीं। राज्य में ब्राह्मणों की आबादी कम मानी जाती है (लगभग 2–3% के आसपास विभिन्न अनुमानों में), पर इसका अर्थ यह नहीं कि शेष 97% एक समान सामाजिक या आर्थिक स्थिति में हैं।

तमिलनाडु भारत के सबसे औद्योगिक और उच्च मानव विकास सूचकांक वाले राज्यों में है। यदि इतनी बड़ी आबादी वास्तव में स्थायी रूप से “शोषित” होती, तो राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग में शीर्ष पर नहीं होता।
अब दूसरा प्रश्न—क्या आरक्षण का लाभ कुछ संपन्न जातियाँ अधिक उठा रही हैं?

अब प्रश्न उठता है—यदि किसी राज्य में ब्राह्मण आबादी 2–3% है और 90% से अधिक आबादी आरक्षण श्रेणी में आती है, तो क्या 3% लोग 97% का स्थायी शोषण कर सकते हैं?

संख्या और संरचनात्मक शक्ति अलग विषय हैं। ब्रिटिश भारत में अंग्रेज 1% से कम थे, फिर भी शासन उन्हीं के हाथ में था। परंतु वर्तमान लोकतांत्रिक भारत में राजनीतिक सत्ता बहुसंख्यक प्रतिनिधित्व से संचालित होती है। तमिलनाडु में 1967 से लगातार गैर-ब्राह्मण दलों की सरकारें रही हैं। प्रशासनिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व व्यापक रूप से बदला है।

इसलिए आज का प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि अतीत में क्या था, बल्कि यह होना चाहिए कि 75 वर्षों की संवैधानिक व्यवस्था के बाद क्या नीति की समीक्षा आवश्यक है या नहीं।

यदि किसी समुदाय का एक बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम हो चुका है, शिक्षा और राजनीति में प्रतिनिधित्व पा चुका है, तो क्या आरक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः चलता रहना चाहिए? क्या “क्रीमी लेयर” की अवधारणा को और कठोरता से लागू नहीं किया जाना चाहिए? क्या बहुसंख्यक आबादी को स्थायी रूप से “पिछड़ा” घोषित करना मनोवैज्ञानिक रूप से भी उचित है?

आरक्षण समाप्त कर देना समाधान नहीं है। परंतु समीक्षा न करना भी समाधान नहीं है। संविधान ने आरक्षण को सुधारात्मक उपाय के रूप में स्वीकार किया था, न कि शाश्वत व्यवस्था के रूप में। समय-समय पर डेटा आधारित पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए—भूमि स्वामित्व, शिक्षा, आय, प्रतिनिधित्व, पीढ़ीगत प्रगति—इन सबके आधार पर।

यदि हम केवल नारे देंगे—“आरक्षण अभिशाप है” या “आरक्षण ही न्याय है”—तो समाधान नहीं निकलेगा। आवश्यकता है संतुलित, तथ्यात्मक और दीर्घकालिक विमर्श की। क्योंकि यदि वैचारिक तैयारी नहीं होगी, जातिगत जनगणना के बाद यदि जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व की माँग बढ़ती है, तो आरक्षण सीमा बढ़ाने का दबाव भी आएगा। फिर परिसीमन का प्रश्न उठेगा, निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँग उठेगी, संपत्ति-वितरण की बहस उठेगी। यह सब केवल संभावना नहीं, वैचारिक प्रवृत्ति है।

यदि हम उसे जटिलता के साथ समझेंगे, तो समाधान भी संतुलित होगा।
समाधान स्थायी वर्ग-संघर्ष नहीं, बल्कि डेटा-आधारित नीति समीक्षा, संवैधानिक ढाँचे का सम्मान और सामाजिक समरसता है। शिक्षा का उद्देश्य अपराधबोध नहीं, विवेक है। और समाज का उद्देश्य स्थायी संघर्ष नहीं, संतुलित सह-अस्तित्व होना चाहिए।

मेरा मूल प्रश्न यह है—क्या हम भारतीय समाज को स्थायी शोषक-शोषित खाँचों में बाँटकर आगे बढ़ सकते हैं? यदि बहुसंख्यक समाज को यह बताया जाए कि वह पीढ़ियों से पीड़ित है, तो आत्मविश्वास पर उसका क्या प्रभाव होगा? और यदि किसी अन्य समूह को यह बताया जाए कि वह ऐतिहासिक रूप से दोषी है, तो सामाजिक समरसता कैसे बचेगी?

विश्वविद्यालयों में DEIA आधारित निगरानी संरचना यदि हर संवाद को संभावित उत्पीड़न के रूप में देखने लगेगी, तो शैक्षणिक वातावरण प्रभावित होगा। विश्वविद्यालय विचार-विमर्श का स्थान है, अपराध-निगरानी का नहीं। John Stuart Mill ने On Liberty में चेतावनी दी थी कि विचारों का दमन ज्ञान को रोक देता है।

हमारा लक्ष्य समाज को वर्ग संघर्ष में धकेलना नहीं, बल्कि समरसता की दिशा में ले जाना होना चाहिए। समरसता का अर्थ समस्याओं को नकारना नहीं, बल्कि न्याय और संतुलन के साथ समाधान खोजना है। जन्म आधारित स्थायी दोष या स्थायी पीड़ित की मानसिकता दोनों ही समाज को दीर्घकालिक संघर्ष की ओर ले जाती हैं।

अब समय है कि कुछ बड़े प्रश्नों पर खुलकर चर्चा हो—
क्या आरक्षण की सीमा का पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए?
क्या लाभ पीढ़ीगत रूप से स्वतः जारी रहना चाहिए?
क्या आर्थिक मानदंड को अधिक महत्व मिलना चाहिए?
क्या “पिछड़ा” जैसी श्रेणी की समय-समय पर समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए?

इन प्रश्नों पर सकारात्मक विमर्श समाज के भीतर से उठना चाहिए। भावनात्मक प्रतिक्रिया से नहीं, तथ्य और तर्क से। यदि हम संयमित भाषा और स्पष्ट विचार के साथ चर्चा करेंगे, तो समाधान भी संतुलित निकलेगा।
समाज को स्थायी वर्ग संघर्ष की दिशा में नहीं, बल्कि समदर्शी और संगठित दिशा में ले जाना ही उद्देश्य होना चाहिए। यही वैचारिक तैयारी की वास्तविक कसौटी है।

क्या बहुसंख्यक आबादी को स्थायी “पिछड़ा” घोषित करना मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ है?
यूजीसी विनियमों के संदर्भ में मूल चिंता यही थी कि शिक्षा को स्थायी पहचान-संघर्ष का मंच न बनाया जाए। यदि विश्वविद्यालयों में यह धारणा स्थापित हो जाए कि कुछ समूह जन्म से संरचनात्मक दोष के वाहक हैं, तो शैक्षणिक वातावरण अविश्वास में बदल जाएगा।
आरक्षण समाप्त करने का नारा समाधान नहीं है। परंतु समीक्षा से बचना भी समाधान नहीं है।

भारतीय समाज को स्थायी शोषक और स्थायी पीड़ित की दो श्रेणियों में बाँटना खतरनाक सरलीकरण है। यह समाज सह-अस्तित्व, संघर्ष, सुधार और परिवर्तन की जटिल यात्रा रहा है। यहाँ भक्ति आंदोलन हुए, सुधार आंदोलन हुए, संविधान बना, प्रतिनिधित्व बदला।
यदि हम इतिहास को बाइनरी में बाँटेंगे, तो भविष्य भी बाइनरी में बँटेगा।

आज आवश्यकता है गंभीर, तथ्याधारित, संतुलित विमर्श की। आरक्षण पर चर्चा हो—पर आँकड़ों के साथ। क्रीमी लेयर पर चर्चा हो—पर शोध के साथ। DEIA पर चर्चा हो—पर भारतीय संदर्भ में। औपनिवेशिक इतिहास-लेखन की समीक्षा हो—पर स्रोतों के आधार पर।

मूल प्रश्न सत्ता परिवर्तन का नहीं, समाज संतुलन का है। यदि हम इस संतुलन को खो देंगे तो विश्वविद्यालय अखाड़ा बनेंगे, समाज खंडित होगा और नीति स्थायी तनाव का स्रोत बनेगी। यदि हम संतुलन बनाए रखेंगे तो सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता साथ चल सकते हैं।

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