सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

राष्ट्र का स्वर और सांस्कृतिक स्मृति की पुनर्पुष्टि




✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

11 फरवरी 2026 यह तिथि भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में याद की जाएगी। आज के दिन भारत सरकार ने वन्दे मातरम् के सभी पदों के पूर्ण गायन का निर्णय लिया है। यह केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं है। यह उस ऐतिहासिक अध्याय का पुनर्लेखन है, जिसकी शुरुआत स्वतंत्रता से पहले की राजनीति में हुई थी। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लिया गया यह निर्णय एक प्रतीकात्मक घोषणा से अधिक है; यह सांस्कृतिक निरंतरता की पुनर्पुष्टि है।

वन्दे मातरम् का इतिहास समझे बिना इस निर्णय का अर्थ अधूरा रहेगा। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपने उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में रचा। यह कोई सामान्य गीत नहीं था; यह मातृभूमि को शक्ति, समृद्धि और ज्ञान की प्रतीक के रूप में देखने की दृष्टि थी। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे स्वर दिया। इसके बाद यह गीत राजनीतिक सभाओं, आंदोलनों और स्वतंत्रता संघर्ष का घोष बन गया। बंग-भंग आंदोलन के समय तो यह राष्ट्रीय अस्मिता का उद्घोष बन चुका था। क्रांतिकारियों के कंठ से लेकर जनसभाओं तक यही स्वर गूंजता था वन्दे मातरम्।
विवाद का आरम्भ तब हुआ जब मुस्लिम लीग के नेताओं ने इसके कुछ पदों पर आपत्ति जताई। विशेषकर वे पद, जिनमें भारतभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया गया था। उन्होंने इसे मज़हबी आधार पर अस्वीकार्य बताया। यहाँ से राष्ट्रीय प्रतीकों पर मज़हबी आपत्ति की राजनीति शुरू हुई।

1937 में प्रांतीय चुनावों के बाद कांग्रेस की सरकारें बनीं। उसी समय मुस्लिम लीग के दबाव के संदर्भ में कांग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि वन्दे मातरम् के केवल प्रारंभिक दो पद ही आधिकारिक रूप से गाए जाएँ। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में थे। यह निर्णय राजनीतिक संतुलन और सामंजस्य के नाम पर लिया गया। तर्क यह था कि राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए यह समझौता आवश्यक है।
परंतु इतिहास यह भी दर्ज करता है कि इस कटौती के बाद भी मुस्लिम लीग ने वन्दे मातरम् को स्वीकार नहीं किया। उनके मंचों पर यह गीत व्यापक रूप से नहीं गाया गया। 1940 में लाहौर प्रस्ताव आया, जिसमें पृथक राष्ट्र की मांग स्पष्ट की गई। 1946 में प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस की घटनाएँ हुईं, जिनमें व्यापक हिंसा हुई। 1947 में भारत का विभाजन हुआ।

विभाजन के कारण बहुआयामी थे — ब्रिटिश ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति, पृथक निर्वाचन प्रणाली, सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की राजनीति, सत्ता-हस्तांतरण की जटिलता पर राष्ट्रीय प्रतीकों पर बना अविश्वास उस व्यापक विघटन का एक स्पष्ट संकेत था। जब राष्ट्र के साझा प्रतीक ही विवाद का विषय बन जाएँ, तो सामूहिक पहचान कमजोर पड़ती है।

स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को निर्णय लिया कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्रीय गीत के रूप में समान सम्मान पाएगा। व्यवहार में इसके दो ही पद गाए जाते रहे। शेष पद सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रायः अनुपस्थित रहे।

आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने वन्दे मातरम् के सभी पदों के गायन का निर्णय लिया है, तो यह ऐतिहासिक क्रम में एक नई कड़ी है। संयोग से आज ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बलिदान दिवस भी है। 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर उनका निधन हुआ। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से थे और एकात्म मानववाद के प्रवर्तक के रूप में भारतीय राजनीतिक चिंतन को नई दिशा देने वाले व्यक्तित्व थे। उनके जीवन और विचारों में सांस्कृतिक आत्मबोध का विशेष स्थान था।

आज का निर्णय उस ऐतिहासिक क्रम की नवीन कड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय गीत को उसके पूर्ण रूप में सम्मान दिया जाएगा। यह निर्णय उस बहस को भी पुनर्जीवित करता है, जो दशकों से सांस्कृतिक पहचान और राज्य की भूमिका को लेकर चलती रही है।
वन्दे मातरम् के शेष पदों में भारतभूमि को शक्ति, ज्ञान और समृद्धि के रूप में चित्रित किया गया है। भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ मज़हबी पहचान से व्यापक है। मनुस्मृति में कहा गया — “धारणात् धर्म इत्याहुः।” महाभारत और गीता में धर्म का अर्थ कर्तव्य, संतुलन और लोक-व्यवस्था से जुड़ा है।

समय के साथ ‘धर्म’ और ‘मज़हब’ शब्दों के अर्थों को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया गया। राज्य ने स्वयं को ‘धर्मनिरपेक्ष’ घोषित किया, जिसका अर्थ मज़हबी निष्पक्षता था; पर कई बार इसे सांस्कृतिक विरक्ति के रूप में भी समझा गया। यही भ्रम अनेक विवादों का कारण बना।
आज का निर्णय उसी ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ में देखा जा रहा है। 1937 का निर्णय एक विशेष राजनीतिक परिस्थिति में लिया गया था। 2026 का निर्णय वर्तमान परिस्थिति में लिया गया है। इतिहास स्थिर नहीं रहता; वह निरंतर पुनर्पाठ और पुनर्विचार की प्रक्रिया है।

वन्दे मातरम् स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति है, सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है और राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। आज लिए गए निर्णय ने उस अध्याय को पुनः पूर्णता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

और अंत में वही स्वर, जो पीढ़ियों से इस भूमि की चेतना में गूंजता रहा है

राष्ट्र की जय चेतना का गान वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति प्रेरणा का गान वंदे मातरम्

बंसी के बहते स्वरोंका प्राण वंदे मातरम् झल्लरि झनकार झनके नाद वंदे मातरम् शंख के संघोष का संदेश वंदे मातरम् ॥१॥

सृष्टी बीज मंत्र का है मर्म वंदे मातरम् राम के वनवास का है काव्य वंदे मातरम् दिव्य गीता ज्ञान का संगीत वंदे मातरम् ॥२॥

हल्दिघाटी के कणोमे व्याप्त वंदे मातरम् दिव्य जौहर ज्वाल का है तेज वंदे मातरम् वीरोंके बलिदान का हूंकार वंदे मातरम् ॥३॥

जनजन के हर कंठ का हो गान वंदे मातरम् अरिदल थरथर कांपे सुनकर नाद वंदे मातरम् वीर पुत्रोकी अमर ललकार वंदे मातरम् ॥४॥

वंदे मातरम् ॥

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