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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
कभी-कभी मुझे लगता है कि हम अपने ही इतिहास को किसी और की आँखों से पढ़ रहे हैं। और जब आप अपनी सभ्यता को अपनी दृष्टि से नहीं, बल्कि अपने शासक की दृष्टि से देखते हैं, तो धीरे-धीरे आप अपने ही समाज को दोष की स्थायी कहानी में बदल देते हैं। जाति-विमर्श के साथ ठीक यही हुआ है।
आज जो कथन सामान्य हो गया है—“3000 वर्षों तक कुछ जातियों ने कुछ जातियों का शोषण किया”, “ब्राह्मण शाश्वत शोषक हैं”, “सामान्य वर्ग ऐतिहासिक अपराधी है”, “जाति ही हिंदू समाज की सबसे बड़ी समस्या है”—इन वाक्यों की जड़ें केवल समकालीन राजनीति में नहीं हैं। इनकी बौद्धिक पृष्ठभूमि औपनिवेशिक लेखन, मिशनरी रणनीति, एंग्लिसिस्ट इतिहास, जनगणना-आधारित वर्गीकरण और आधुनिक वामपंथी बाइनरी सिद्धांतों में निहित है।
सबसे पहले उस तथ्य को सामने रखूँ जिसे जानबूझकर पीछे धकेल दिया गया। 1816 में फ्रांसीसी मिशनरी अब्बे जाँ आंत्वान डुबोआ (Abbé J. A. Dubois) ने अपनी पुस्तक Description of the Character, Manners and Customs of the People of India में स्पष्ट लिखा कि जाति-व्यवस्था हिंदू विधान की “chef-d’oeuvre”—अर्थात् उसकी श्रेष्ठतम कृति—है, और इसी व्यवस्था के कारण भारत अराजकता में नहीं डूबा। उन्होंने यह माना कि जातिगत अनुशासन ने सामाजिक संगठन को स्थिर रखा।
ध्यान दीजिए—यह कथन किसी सनातनी दार्शनिक का नहीं, बल्कि एक यूरोपीय मिशनरी का है, जो मतांतरण के उद्देश्य से भारत आया था। इसका अर्थ है कि प्रारंभिक बाहरी दृष्टि में जाति को केवल दमन-तंत्र के रूप में नहीं देखा गया।
फिर दृष्टि बदली।
1857 के बाद अंग्रेजों ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत को नियंत्रित करने के लिए केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं है; समाज को वर्गीकृत करना होगा।
यहीं से“नृवंशविज्ञानिक राज्य” की परिकल्पना जन्म लेती है।1872 की पहली अखिल भारतीय जनगणना ने जाति को स्थायी प्रशासनिक श्रेणी बना दिया। हजारों स्थानीय और लचीली पहचानों को कठोर सांख्यिकीय खाँचों में बाँध दिया गया। आगे चलकर एच. एच. रिस्ले (H. H. Risley) ने 1901 की जनगणना में जाति को नस्लीय सिद्धांतों से जोड़ने का प्रयास किया—नाक की लंबाई, कपाल की बनावट तक को आधार बनाया गया।
यहीं जाति एक जीवंत सामाजिक संरचना से अधिक औपनिवेशिक नियंत्रण का उपकरण बनती है।
इसी काल में मिशनरी विमर्श ने दूसरा आयाम जोड़ा। अनेक मिशनरियों ने स्पष्ट कहा कि ब्राह्मण ईसाई मतांतरण की सबसे बड़ी बाधा हैं। एम. ए. शेरिंग (M. A. Sherring) ने लिखा कि जाति ब्राह्मणों की रचना है। ब्राह्मण को योजनाबद्ध रूप से “षड्यंत्रकारी”, “कुटिल”, “तानाशाही” सिद्ध किया गया।
यहाँ दानवीकरण (demonization) की प्रक्रिया स्पष्ट दिखती है। जब किसी एक समुदाय को समस्त सामाजिक दोष का प्रतीक बना दिया जाता है, तो समाज की नैतिक संरचना टूटती है।
जेम्स मिल (James Mill) ने अपनी History of British India में मनुस्मृति को पूरे हिंदू समाज का प्रतिनिधि विधान मानकर यह स्थापित किया कि भारतीय समाज दमनकारी है और राजनीतिक रूप से दुर्बल है। इस कथा ने अंग्रेजी शासन को नैतिक औचित्य दिया—“हम तुम्हें सभ्य बनाने आए हैं।”
यहाँ से एट्रोसिटी लिटरेचर की धारा बहती है—ऐसा साहित्य जिसमें भारतीय समाज को सहस्राब्दियों से स्थायी अत्याचार-तंत्र के रूप में चित्रित किया गया।
अब दार्शनिक पक्ष पर विचार करें। भारतीय चिंतन का मूल कथन है—सृष्टि त्रिगुणात्मक है। सत्त्व, रजस् और तमस् के विविध अनुपात से व्यक्तियों के गुण और प्रवृत्तियाँ निर्मित होती हैं। जब सृष्टि ही विविध है, तब समाज को पूर्ण समानता के एकरूप साँचे में ढालने का आग्रह प्रकृति-विरोधी है।
भिन्नता अन्याय नहीं है। अन्याय तब है जब गरिमा और अवसर छीन लिए जाएँ।
भारतीय सामाजिक संगठन का मूल भाव कर्तव्य-विभाजन और परस्पर निर्भरता था। यदि यह केवल दमन-तंत्र होता, तो सहस्राब्दियों तक सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक स्थिरता संभव न होती।
अब आधुनिक “सामाजिक न्याय” की अवधारणा को देखें। आज कहा जाता है कि 3000 वर्षों का शोषण हुआ। प्रश्न है—क्या इतिहास रेखीय और एकरूप है? क्या हर क्षेत्र, हर कालखंड, हर परिस्थिति में वही शक्ति-संबंध रहे?
जिनके साथ अन्याय हुआ, वे अब जीवित नहीं हैं। जिन्होंने अन्याय किया, वे भी नहीं हैं। यदि आज हम समुदायों को स्थायी दोषी और स्थायी पीड़ित घोषित करते हैं, तो हम व्यक्ति-आधारित न्याय को छोड़कर सामूहिक दोषारोपण की अवधारणा स्वीकार कर रहे हैं।
यही आधुनिक बाइनरी ढाँचे की विशेषता है—स्थायी शोषक बनाम स्थायी शोषित।
अमेरिका में नस्लीय इतिहास की विशिष्ट पृष्ठभूमि में विकसित क्रिटिकल रेस थ्योरी को भारतीय संदर्भ में लागू कर दिया गया। वहाँ “श्वेत बनाम अश्वेत” का ढाँचा था; यहाँ “ब्राह्मण/सामान्य बनाम शेष” का ढाँचा बना दिया गया।
यहाँ एक असंभव लक्ष्य निर्धारित किया गया—“ऐतिहासिक अन्याय का पूर्ण प्रतिशोधन।”
ऐतिहासिक अन्याय को पूर्णतः सुधारना असंभव है, क्योंकि मूल पीड़ित और मूल दोषी दोनों अब इस संसार में नहीं हैं। यदि समुदायों को स्थायी इकाइयों के रूप में परिभाषित किया जाए, तभी यह दावा संभव है।
और जब लक्ष्य असंभव हो, तो संघर्ष स्थायी रहता है।
अब स्वतंत्रता के बाद की स्थिति को देखें। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण ऐतिहासिक वंचनाओं की स्वीकृति था। परंतु “अन्य पिछड़ा वर्ग” (OBC) की अवधारणा ने स्थिति को जटिल बना दिया।
भारत सरकार की केंद्रीय ओबीसी सूची (Central OBC List) में वर्तमान समय में लगभग 2600 से अधिक जाति/समुदाय प्रविष्टियाँ दर्ज हैं। परंतु यदि हम सभी राज्यों की अपनी-अपनी ओबीसी सूचियों को जोड़ें, तो यह संख्या बहुत अधिक हो जाती है। विभिन्न राज्यों की सूचियों को समेकित करने पर कुल प्रविष्टियाँ लगभग 5000 से 5500 के बीच पहुँचती हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह सूची स्थिर नहीं है। समय-समय पर नए समुदायों को “सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन” के आधार पर जोड़ा जाता रहा है।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य है—ओबीसी केवल हिंदू जातियों तक सीमित नहीं है। विभिन्न राज्यों में मुस्लिम समुदायों की अनेक जाति-समान सामाजिक इकाइयाँ (जैसे अंसारी, कुंजड़ा, धुनिया, रंगरेज़ आदि) भी ओबीसी सूची में सम्मिलित हैं। कुछ राज्यों में ईसाई समुदायों की उपजातियाँ भी ओबीसी श्रेणी में आती हैं।
अर्थात् यह श्रेणी सिद्धांततः “वर्ग-आधारित” (सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन) है, परंतु व्यवहार में यह जाति-आधारित सूची के माध्यम से लागू होती है।
यहीं से वैचारिक जटिलता शुरू होती है।
यदि लगभग 5000 से अधिक जातियाँ “पिछड़ा वर्ग” में सम्मिलित हों, और वे मिलकर समाज की बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व करें, तो प्रश्न उठता है—क्या यह वास्तव में सामाजिक संरचना की वास्तविकता है, या वर्गीकरण की राजनीति?
दुनिया के किसी भी समाज में ऐसा उदाहरण दुर्लभ है जहाँ बहुसंख्यक आबादी स्वयं को “पिछड़ा” या “वंचित” घोषित श्रेणी में रखे।
यहाँ दार्शनिक प्रश्न भी जुड़ता है। भारतीय दृष्टि कहती है—सृष्टि त्रिगुणात्मक है। विविधता स्वाभाविक है। सभी व्यक्ति समान गुण, समान स्वभाव, समान भूमिका लेकर नहीं आते। भिन्नता अन्याय नहीं है।
परंतु आधुनिक सामाजिक न्याय की राजनीति—विशेषकर क्रिटिकल रेस थ्योरी से प्रभावित बाइनरी ढाँचा—समाज को स्थायी श्रेणियों में बाँटता है: शोषक बनाम शोषित।
जब ओबीसी श्रेणी में हजारों जातियाँ सम्मिलित होती जाती हैं, तब “पिछड़ेपन” की परिभाषा राजनीतिक रूप से विस्तृत होती है। कई क्षेत्रीय रूप से सशक्त, आर्थिक रूप से प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से प्रभुत्वशाली जातियाँ भी इस श्रेणी में आती हैं।
परिणामस्वरूप “पिछड़ापन” सामाजिक-आर्थिक स्थिति से अधिक राजनीतिक पहचान बन जाता है।
आज कुछ नेता कहते हैं—“जाति समाप्त हो जाए तो हिंदू एक हो जाएँगे।” यह कथन सुनने में सरल है, परंतु दार्शनिक रूप से अधूरा है। विविधता को समाप्त करके एकता नहीं आती। सृष्टि में भेद है; समाज में भी रहेगा।
एकता तब आती है जब विविधता का सम्मान हो, न कि जब उसे मिटाने का आग्रह हो।
ब्राह्मण या तथाकथित “सामान्य वर्ग” को 3000 वर्षों के शोषण का प्रतीक घोषित कर देना न्याय नहीं, सामूहिक दोषारोपण है। और सामूहिक दोषारोपण समाज को संगठित नहीं करता, उसे विभाजित करता है।
सामाजिक विकृतियों का सुधार आवश्यक है। अस्पृश्यता अन्याय थी, और उसका उन्मूलन धर्म और संविधान दोनों की दृष्टि से आवश्यक था।
परंतु संपूर्ण सभ्यता को स्थायी अपराध-कथा में बदल देना न तो सत्य है और न समाधान।
हिंदू समाज की एकता जाति-निषेध के नारे से नहीं, समरसता के अभ्यास से आएगी।
इतिहास का संतुलित पुनर्पाठ आवश्यक है—न अंध-निंदा, न अंध-स्तुति।
सृष्टि त्रिगुणात्मक है। विविधता उसका स्वभाव है।
समाज में भिन्न भूमिकाएँ होंगी—यह स्वाभाविक है।
प्रश्न यह है—क्या हम उस विविधता को संतुलन में बदलते हैं या संघर्ष में?
समाधान संघर्ष की स्थायी कथा में नहीं, सत्य की संतुलित स्वीकृति में है।
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