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क्या ‘समता’ संवैधानिक है? यूजीसी विनियम और न्याय-दृष्टि की बदलती परिभाषा



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने “उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु” विनियम राजपत्र में प्रकाशित किए। 29 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने इन विनियमों पर अंतरिम रोक लगा दी और अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 के लिए निर्धारित की। यह घटनाक्रम स्वयं संकेत देता है कि मामला केवल प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक और वैचारिक भी है।

यदि 2012 की यूजीसी गाइडलाइंस को 2026 के विनियम के साथ रखकर पढ़ा जाए तो अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। 2012 का ढाँचा “Equal Opportunity” पर केंद्रित था — समान अवसर केंद्र, भेदभाव-निवारण तंत्र, शिकायत-प्रक्रिया। उसका उद्देश्य अवसरों में भेदभाव न होने देना था। 2026 में “समता” शब्द औपचारिक रूप से आया। समता समिति, समता दूत, इक्विटी स्क्वॉड, जनसांख्यिकीय संरचना की अर्धवार्षिक रिपोर्टिंग, राष्ट्रीय निगरानी समिति — यह केवल शिकायत-निवारण नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर सामाजिक वर्गीकरण और निरंतर समीक्षा का ढाँचा है।

संविधान का मूल पाठ देखें तो “समानता” शब्द है, “समता” नहीं। अनुच्छेद 14, 15, 16 विधिक समानता और अवसर-संतुलन की बात करते हैं। संविधान सभा ने विशेष प्रावधानों को अनुमति दी ताकि ऐतिहासिक अन्याय सुधारे जा सकें, पर स्थायी सामाजिक बाइनरी को संवैधानिक सिद्धांत नहीं बनाया। यदि “समता” को परिणाम-संतुलन या संरचनात्मक संतुलन के रूप में पढ़ा जाता है, तो यह समानता से भिन्न वैचारिक दिशा है। यही वह बिंदु है जहाँ बहस गहरी होती है।

2023 में एनसीईआरटी ने “National Guidelines and Implementation Framework on Equitable and Inclusive Education” जारी किया। वहाँ Equity, Inclusion, Diversity, Access, Dignity जैसे शब्द केंद्रीय थे। शिक्षा को केवल ज्ञान-संस्थान नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं के पुनर्संतुलन का माध्यम माना गया। 2026 के यूजीसी विनियम में वही शब्दावली भारतीय संदर्भ में “समता” के रूप में संस्थागत दिखाई देती है। यह क्रमिक वैचारिक प्रवाह है, अचानक परिवर्तन नहीं।

अगस्त 2025 में दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में संसदीय स्थायी समिति ने अनुच्छेद 15(5) के क्रियान्वयन और निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण पर रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में प्रतिनिधित्व बढ़ाने, डेटा-संग्रह और शिकायत-निवारण तंत्र की सिफारिशें थीं। रिपोर्ट में किसी वर्ग को जन्मजात शोषक घोषित करने जैसी भाषा नहीं थी। यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि सार्वजनिक विमर्श में कई बार रिपोर्ट से परे व्याख्याएँ जुड़ जाती हैं।

अब वैचारिक शृंखला को पीछे ले चलें। 1848 में मार्क्स ने आर्थिक वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत दिया। 20वीं सदी में एंटोनियो ग्राम्शी ने सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणा दी। 1923 में फ्रैंकफर्ट में “Institute for Social Research” स्थापित हुआ; 1937 में “Critical Theory” व्यवस्थित रूप में सामने आई। आगे अमेरिका में “Critical Legal Studies” और 1980–90 के दशक में “Critical Race Theory” विकसित हुई। नस्ल को केवल सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि संरचनात्मक शक्ति-संबंध के रूप में पढ़ा गया। 1990 के दशक में Diversity, Equity, Inclusion — और आगे चलकर DEIA — मॉडल विकसित हुए। Equality से Equity की ओर झुकाव हुआ — अवसर-समानता से परिणाम-संतुलन की ओर।

अमेरिका में DEIA कार्यक्रम विश्वविद्यालयों से निकलकर कॉर्पोरेट HR नीतियों का हिस्सा बने। प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रयास हुआ, पर सामाजिक ध्रुवीकरण भी बढ़ा। “Privilege” और “Systemic Bias” की भाषा ने संवाद को तीखा किया। कुछ राज्यों में इन कार्यक्रमों पर पुनर्विचार भी हुआ। यह एक जटिल अनुभव है।

भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग है। 1817 में जेम्स मिल की History of British India ने भारतीय समाज को स्थायी दमनकारी ढाँचे के रूप में चित्रित किया। औपनिवेशिक जनगणनाओं ने जाति को कठोर प्रशासनिक श्रेणी बनाया। 1871 का Criminal Tribes Act कुछ समुदायों को जन्मजात अपराधी घोषित करता है। निकोलस डिर्क्स की Castes in Mind बताती है कि औपनिवेशिक शासन ने जाति को राजनीतिक पहचान में बदला। धर्मपाल की The Beautiful Tree दिखाती है कि औपनिवेशिक हस्तक्षेप से पहले भारतीय शिक्षा-संरचना अधिक स्थानीय और बहुस्तरीय थी।

यह भी सत्य है कि भारतीय समाज में अस्पृश्यता और सामाजिक अन्याय थे। पर सुधार भीतर से भी हुए — भक्ति आंदोलन, मंदिर-प्रवेश आंदोलन, 1933 में वीर सावरकर का पतित पावन मंदिर, 1969 की उडुपी धर्म संसद का अस्पृश्यता-विरोधी प्रस्ताव, अनेक सामाजिक संगठनों के प्रयास। संविधान ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष प्रावधान दिए। यह ऐतिहासिक भूलों को सुधारने का प्रयास था।

1979 में मंडल आयोग बना। 1980 में रिपोर्ट आई। आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर OBC आबादी का अनुमान लगभग 52% लगाया, जो 1931 की जनगणना पर आधारित था। 1990 में लागू होने के बाद प्रतिनिधित्व बढ़ा, पर पहचान-आधारित राजनीति स्थायी हो गई। सामाजिक सुधार और स्थायी वर्ग-चेतना के बीच तनाव बना रहा।
अब प्रश्न यह नहीं कि सामाजिक न्याय आवश्यक है या नहीं। प्रश्न यह है कि उसका ढाँचा क्या हो।

क्या हम अवसर-संतुलन के माध्यम से समाज को आगे बढ़ाएँगे, या परिणाम-संतुलन की स्थायी संरचना बनाएँगे? क्या विश्वविद्यालय संवाद के स्थल रहेंगे, या पहचान-आधारित वर्गीकरण की निरंतर प्रयोगशाला बनेंगे?

अंत में मुझे यह बात स्पष्ट रूप से कहनी ही होगी कि न्याय की जो आधुनिक “सोशल जस्टिस” वाली व्याख्या हमारे यहाँ प्रचलित की जा रही है, वह भारतीय न्याय-दृष्टि से भिन्न है। भारतीय परंपरा में न्याय जन्म के आधार पर तय नहीं होता, कर्म के आधार पर होता है। हमारे यहाँ किसी व्यक्ति के पूर्वज ने यदि कोई गलती की हो, तो उसका दंड उसकी संतानों को नहीं दिया जाता। दंड उसी को मिलता है जिसने अपराध किया है।
गीता स्पष्ट कहती है — “गुणकर्मविभागशः।” अर्थात व्यवस्था का आधार गुण और कर्म है, जन्म नहीं। पाँचवें अध्याय में “पण्डिताः समदर्शिनः” कहकर यह बताया गया कि ज्ञानी व्यक्ति सबमें समान आत्मतत्त्व देखता है। वहाँ स्थायी जन्माधारित नैतिक श्रेणियाँ नहीं हैं।

महाभारत में भी दंड व्यक्ति के अधर्म पर आधारित है, उसके वंश पर नहीं। शांति पर्व में भी आचरण को जन्म से ऊपर रखा गया है। स्मृतियों में दंड-विधान व्यक्तिगत अपराध पर आधारित है। न्याय दर्शन कहता है कि किसी पर आरोप प्रमाण के बिना नहीं लगाया जा सकता।
अब प्रश्न यह है — यदि हमारी परंपरा कर्माधारित उत्तरदायित्व की है, तो आज यह धारणा क्यों बन रही है कि एक पूरा वर्ग जन्म से “शोषक” है? यदि सामाजिक न्याय के नाम पर एससी, एसटी और ओबीसी को स्थायी रूप से “पीड़ित” और सामान्य वर्ग या ब्राह्मण को स्थायी रूप से “शोषक” की श्रेणी में रखा जाएगा, तो यह सुधार नहीं, स्थायी बाइनरी होगी।

संविधान ने विशेष प्रावधान इसलिए दिए कि ऐतिहासिक अन्याय सुधर सकें। पर संविधान ने किसी जाति या वर्ग को जन्मजात अपराधी घोषित नहीं किया। सुधार का उद्देश्य अवसर-संतुलन था, स्थायी नैतिक दोष नहीं।
इतिहास में आक्रमण हुए, औपनिवेशिक शासन ने आर्थिक क्षति पहुँचाई, सामाजिक ढाँचे टूटे। पर आधुनिक न्याय यह नहीं कहता कि वर्तमान पीढ़ियाँ अतीत के सभी ऐतिहासिक अपराधों की सामूहिक उत्तराधिकारी हैं। यदि ऐसा सिद्धांत अपनाया जाए तो वह सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए — पर ऐसा नहीं होता।

यही मूल प्रश्न है। क्या सामाजिक न्याय का अर्थ अवसर देना है, या स्थायी नैतिक वर्गीकरण करना?
भारतीय दृष्टि स्पष्ट है — न्याय कर्माधारित है, जन्माधारित नहीं। समदर्शिता हमारी परंपरा का मूल है, स्थायी वर्ग-संघर्ष नहीं।

यदि हम इस मूल सिद्धांत को भूल जाएँगे, तो न्याय की भाषा समाज को जोड़ने के बजाय बाँटने का माध्यम बन सकती है।

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