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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
2017 के चुनाव परिणाम आने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ जी। उस समय कहा गया कि एक भगवाधारी को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया गया? भगवाधारी का काम तो सिर्फ घंटी बजाना और मठ में रहना है। इस प्रकार की धारणा उस समय मीडिया के एक वर्ग द्वारा बनाई गई।
उस धारणा को तोड़ते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने ऐसे राज्य की कमान संभाली, जिसे लंबे समय से बीमारू राज्य कहा जाता था—जहाँ गुंडागर्दी चरम पर थी, अराजकता, हिंसा और दंगों के लिए प्रदेश जाना जाता था, जातिगत संघर्ष अपने उच्च स्तर पर थे। बहन-बेटियाँ घर से बाहर सुरक्षित रूप से नहीं निकल पाती थीं।
ऐसे अराजक वातावरण से उत्तर प्रदेश को निकालना किसी भी नेतृत्व के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। योगी जी ने 2017 से 2022 के अपने पहले कार्यकाल में कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देते हुए माफिया तंत्र और संगठित अपराध पर कठोर कार्रवाई की। उस समय स्थिति यह थी कि कोई भी व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए तथाकथित “गुंडा टैक्स” देना पड़ता था। छोटा मेडिकल स्टोर चलाने वाला हो या बड़ा उद्योगपति—लगभग हर व्यापारी पर दबाव था। लगभग प्रत्येक जिले में एक प्रभावशाली माफिया सक्रिय रहता था।
इसी कारण 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में निवेश की बात तो दूर, सामान्य व्यापार करने में भी लोग हिचकते थे। उस दौर से उत्तर प्रदेश को निकालने का प्रयास पहले कार्यकाल (2017-2022) में प्रारंभ हुआ। उसी कार्यकाल के परिणामस्वरूप 2022 में जनता ने पुनः प्रचंड बहुमत देकर योगी जी को सत्ता में लौटाया।
दूसरे कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की विकास गति और अधिक तीव्र हुई। आज उत्तर प्रदेश देश में ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस की रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर है। उत्तर प्रदेश वर्तमान में भारत की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (जीडीपी रैंकिंग) के रूप में स्थापित हो चुका है।
वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य की सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) लगभग ₹29.78 लाख करोड़ होने का अनुमान है। यह देश की कुल जीडीपी में लगभग 8 से 9 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है। महाराष्ट्र के पश्चात उत्तर प्रदेश ने तमिलनाडु और गुजरात को पीछे छोड़ते हुए यह स्थान प्राप्त किया है।
रैंकिंग: देश में दूसरा (2nd) सबसे बड़ा राज्य (अर्थव्यवस्था के आधार पर)।
जीडीपी: लगभग ₹29.78 लाख करोड़ (2024-25 अनुमानित)।
विकास दर: 2024-25 में लगभग 8.99 प्रतिशत (अनुमानित)।
प्रमुख क्षेत्रीय योगदान:
कृषि – 26.83 प्रतिशत
सेवाएँ – 47.26 प्रतिशत
उद्योग – 25.91 प्रतिशत
उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2027 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
उत्तर प्रदेश में “एक्सप्रेसवे मैन” के रूप में योगी जी को सही मायनों में देखा जा सकता है। इसका कारण यह है कि जब योगी जी ने कमान संभाली, तब कमजोर बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) भी एक बड़ी बाधा था। सड़कों की खस्ता हालत, अधूरी परियोजनाएँ और कनेक्टिविटी की कमी ने औद्योगिक विकास की राह में रोड़ा अटकाने का कार्य किया था।
योगी सरकार ने इस मोर्चे पर आक्रामक रणनीति अपनाई। एक्सप्रेसवे का जो व्यापक जाल बिछाने का कार्य प्रारंभ हुआ, उसने प्रदेश का नक्शा ही बदल दिया।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने न केवल आवागमन को सुगम बनाया, बल्कि औद्योगिक क्लस्टरों के विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया। हवाई अड्डों के विस्तार और नए एयरपोर्ट की योजनाओं ने प्रदेश को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर सुदृढ़ रूप से स्थापित करने का कार्य किया है।
गंगा एक्सप्रेसवे का कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है। योगी सरकार के कार्यकाल (2017 के बाद से) में उत्तर प्रदेश में 7 विश्वस्तरीय एक्सप्रेसवे क्रियाशील हैं, जिनमें से 5 नए निर्मित किए गए हैं, जिससे राज्य को “एक्सप्रेसवे प्रदेश” के रूप में पहचान मिली है।
इसके अतिरिक्त 3 एक्सप्रेसवे निर्माणाधीन हैं तथा 12 नए एक्सप्रेसवे प्रस्तावित हैं, जिनमें से 9 का प्रस्ताव 2025-26 के बजट में भी सम्मिलित है। भविष्य में इनकी कुल संख्या 22 तक पहुँचने की संभावना है।
प्रमुख क्रियाशील एक्सप्रेसवे (योगी सरकार के दौरान):
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे (341 किमी) — लखनऊ से गाज़ीपुर।
बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे (296 किमी) — चित्रकूट से इटावा।
गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे (2017 से पूर्व प्रारंभ, किंतु विस्तार एवं प्रबंधन वर्तमान सरकार द्वारा सुदृढ़)।
यमुना एक्सप्रेसवे।
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे।
नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे।
निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित:
गंगा एक्सप्रेसवे (594 किमी) — मेरठ से प्रयागराज (फरवरी 2026 तक पूर्ण होने का लक्ष्य)।
अन्य प्रस्तावित 12 एक्सप्रेसवे।
2017 से पहले उत्तर प्रदेश में केवल 2 संचालित एक्सप्रेसवे थे, जबकि वर्तमान सरकार ने 3000 किमी से अधिक के एक्सप्रेसवे नेटवर्क पर कार्य किया है।
इस दृष्टि से योगी जी को उत्तर प्रदेश का “एक्सप्रेसवे मैन” कहना अनुचित नहीं होगा। एक समय जिसे बीमारू राज्य कहा जाता था, वहाँ आज आधुनिक सड़क अवसंरचना का ऐसा विस्तार हुआ है।
इसके अतिरिक्त मेट्रो और रेल अवसंरचना का भी विस्तार हुआ है। मेरठ के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली-मेरठ नमो भारत रेल कॉरिडोर का उद्घाटन किया गया। 82 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर पूर्ण हो चुका है। पहले नमो भारत सेवा मेरठ साउथ से दिल्ली के न्यू अशोक नगर तक संचालित थी, अब न्यू अशोक नगर से सराय काले खाँ तक शेष लगभग 5 किलोमीटर का ट्रैक भी प्रारंभ हो चुका है।
नेशनल कैपिटल रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कनेक्टिविटी के लिए एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हो रहा है। सरकार की योजना ऐसे आठ रैपिड रेल कॉरिडोर विकसित करने की है।
स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में अवसंरचना का विकास केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धरातल पर व्यापक परिवर्तन के रूप में दिखाई दे रहा है।
इसके अतिरिक्त सनातन-आधारित मंदिर एवं तीर्थ-पर्यटन पर आधारित आर्थिक मॉडल को अपनाते हुए उत्तर प्रदेश ने जिस प्रकार स्वयं को रूपांतरित किया है, वह आठ-दस वर्ष पूर्व कल्पना से परे था। कुछ समय पूर्व तक वाराणसी, अयोध्या, प्रयागराज अथवा मथुरा—इन पावन नगरों की स्थिति व्यापक अव्यवस्था से ग्रस्त थी। तीर्थस्थलों की महिमा तो अक्षुण्ण थी, किंतु व्यवस्थागत दृष्टि से अनेक कमियाँ स्पष्ट दिखाई देती थीं।
इस अव्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में निर्णायक आरंभ काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के निर्माण से हुआ। उस समय इस परियोजना का तीव्र विरोध भी हुआ, किंतु जब यह पूर्ण होकर सामने आई, तब उसके परिणाम स्वयं बोलने लगे। वर्ष 2018 में वाराणसी में लगभग 65 लाख श्रद्धालु दर्शनार्थ आते थे; वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 7.5 करोड़ हो गई, जिन्होंने बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए। यह केवल आस्था का प्रवाह नहीं, अपितु व्यवस्थागत परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
अयोध्या की स्थिति भी इसी प्रकार परिवर्तित हुई। पूर्व में जहाँ लगभग 8 लाख श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते थे, वहीं श्रीराम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा उपरांत वर्ष 2024 में लगभग 16 करोड़ श्रद्धालुओं ने रामलला के दर्शन किए। प्रतिदिन लगभग 2 लाख श्रद्धालुओं का आगमन होने लगा।
मथुरा-वृंदावन में भी लगभग 7 करोड़ श्रद्धालुओं ने बाँके बिहारी जी के दर्शन किए। वर्ष 2025 का प्रयागराज महाकुंभ तो आधुनिक भारत के इतिहास का अभूतपूर्व अध्याय बन गया, जिसमें लगभग 67 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान किया। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टि से भी विराट घटना थी।
विशेषतः अयोध्या की अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक उछाल दृष्टिगोचर हुआ। भारतीय प्रबंध संस्थान लखनऊ की विस्तृत अध्ययन-रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात अयोध्या में पर्यटन, निवेश, रोजगार और राजस्व में व्यापक वृद्धि हुई। अध्ययन में मंदिर-निर्माण से पूर्व और पश्चात की आर्थिक परिस्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया।
मंदिर-निर्माण से पूर्व अयोध्या की पहचान मुख्यतः एक पवित्र तीर्थस्थान तक सीमित थी। प्राण-प्रतिष्ठा के उपरांत आर्थिक गतिविधियों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। पर्यटन-आधारित गतिविधियों से 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक कर-राजस्व प्राप्त होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। आतिथ्य, निर्माण, परिवहन एवं सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में तीव्र वृद्धि हुई है।
अध्ययन के अनुसार, श्रीराम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा से देशभर में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का व्यापारिक लेन-देन हुआ, जिसमें अयोध्या की महत्वपूर्ण भागीदारी रही। प्रतिदिन दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आगमन से आतिथ्य उद्योग को नई गति मिली। 150 से अधिक नए होटल एवं होम-स्टे स्थापित हुए। प्रतिष्ठित होटल शृंखलाओं ने भी अपने विस्तार की योजनाएँ प्रारंभ कीं। ऑनलाइन यात्रा मंचों पर बुकिंग में चार गुना तक वृद्धि दर्ज की गई।
स्थानीय हस्तशिल्प, धार्मिक स्मृति-चिह्नों एवं मूर्तियों की मांग में तीव्र वृद्धि से कारीगरों एवं स्थानीय उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हुआ। लगभग 6,000 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) स्थापित हुए। आगामी 4–5 वर्षों में पर्यटन, परिवहन एवं आतिथ्य क्षेत्रों में लगभग 1.2 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन का अनुमान है। छोटे दुकानदारों एवं रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों की दैनिक आय लगभग 2,500 रुपये तक पहुँचने लगी। अचल संपत्ति क्षेत्र में भी तीव्र वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 तक उत्तर प्रदेश में पर्यटन व्यय 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है, जिसमें अयोध्या की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। पर्यटन-आधारित कर-राजस्व 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है। साथ ही, अयोध्या ने राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक केंद्र के रूप में भी नई पहचान अर्जित की है, जहाँ प्रवासी भारतीय, शोधकर्ता तथा वैश्विक श्रद्धालु आकर्षित हो रहे हैं।
वास्तव में यह केवल अयोध्या की कथा नहीं है; यह संपूर्ण उत्तर प्रदेश के रूपांतरण की कथा है। मंदिर-आधारित सांस्कृतिक-आर्थिक व्यवस्था ने राज्य की छवि, संरचना और आर्थिक प्रवाह—तीनों को परिवर्तित कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में औद्योगिक क्रांति लाने वाला भगवाधारी नेतृत्व
यदि 2017 से पहले और आज के उत्तर प्रदेश की तुलना की जाए, तो अंतर केवल आँकड़ों में नहीं, वातावरण में दिखाई देता है। पहले निवेश की चर्चा होती थी, पर निवेशक आते नहीं थे। उद्योग लगाने की घोषणाएँ होती थीं, पर ज़मीन पर कारखाने कम दिखते थे।
2012 से 2017 के बीच राज्य में फैक्ट्रियों की संख्या 14,440 से बढ़कर 15,294 हुई। पाँच वर्षों में केवल 854 की वृद्धि। इतने बड़े राज्य के लिए यह संख्या बताती है कि औद्योगिक विस्तार की गति कितनी सीमित थी।
2017 के बाद परिस्थिति बदलनी शुरू हुई। सबसे पहले व्यवस्था और विश्वास को स्थापित करने का प्रयास हुआ। उद्योगपति किसी राज्य में केवल सस्ती ज़मीन देखकर निवेश नहीं करता; वह स्थिर नीति, सुरक्षित वातावरण और तेज़ प्रशासन देखता है।
निवेश सम्मेलनों को केवल औपचारिक आयोजन न रहने देने का प्रयास किया गया। प्रस्तावों को ज़मीन पर उतारने के लिए ग्राउंड ब्रेकिंग समारोहों की श्रृंखला चलाई गई। आज लगभग 15 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं का शिलान्यास हो चुका है। अनेक इकाइयाँ उत्पादन प्रारंभ कर चुकी हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 तक 6,847 नई फैक्ट्रियाँ जुड़ीं और कुल संख्या 22,141 तक पहुँची। यह वृद्धि अपने आप में संकेत है कि औद्योगिक गतिविधियाँ वास्तव में बढ़ी हैं। 2024-25 और 2025-26 के आँकड़े सामने आने पर यह संख्या और बढ़ने की संभावना है।
वर्ष 2025-26 में लगभग 8,000 नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना की दिशा में प्रगति दर्ज की जा रही है। यह अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे तीन बातें साफ़ दिखाई देती हैं।
पहली — “निवेश मित्र” जैसी सिंगल विंडो व्यवस्था। पहले जो फाइलें महीनों तक विभागों में घूमती थीं, अब डिजिटल प्रणाली से समयबद्ध निस्तारित हो रही हैं।
दूसरी — मजबूत अवसंरचना। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गंगा एक्सप्रेसवे ने दूरस्थ जिलों को मुख्य बाज़ारों से जोड़ा। लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आई। उद्योग के लिए परिवहन समय कम हुआ।
तीसरी — नीति में निरंतरता। निवेशक को यह भरोसा चाहिए कि नियम बार-बार नहीं बदलेंगे। पिछले वर्षों में यही स्थिरता देखने को मिली।
सेमीकंडक्टर, टेक्सटाइल, खाद्य प्रसंस्करण, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स — ये शब्द अब केवल नीति दस्तावेज़ों में नहीं हैं; इन क्षेत्रों में वास्तविक परियोजनाएँ आकार ले रही हैं। डिफेंस कॉरिडोर ने झाँसी, कानपुर, लखनऊ जैसे क्षेत्रों को नई औद्योगिक पहचान दी है।
रोजगार के क्षेत्र में भी परिवर्तन दिखाई देता है। 2017 से 2025 के बीच लगभग साढ़े पाँच लाख सरकारी नियुक्तियाँ हुईं। कौशल विकास और रोजगार मेलों के माध्यम से 13.6 लाख से अधिक अवसर उपलब्ध हुए। बेरोज़गारी दर, जो 2017 के आसपास लगभग 19 प्रतिशत आँकी जाती थी, 2026 के बजट में लगभग 2.24 प्रतिशत दर्ज की गई है।
राज्य की अर्थव्यवस्था 2017 में लगभग 12.88 लाख करोड़ रुपये थी। 2026 में यह लगभग 31 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुकी है। यह वृद्धि केवल प्राकृतिक विस्तार नहीं है; यह औद्योगिक सक्रियता और निवेश के विस्तार का परिणाम है।
कभी उत्तर प्रदेश को केवल जनसंख्या और राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में देखा जाता था। आज उद्योग, एक्सप्रेसवे, रक्षा उत्पादन, डेटा सेंटर और निवेश की चर्चा होती है।
औद्योगिक क्रांति का अर्थ केवल धुआँ छोड़ती चिमनियाँ नहीं है। इसका अर्थ है — विश्वास, संरचना और दिशा। पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने यही तीनों आधार खड़े किए हैं।
उत्तर प्रदेश में पिछले नौ वर्षों में जो कार्य हुए हैं, उन्हें केवल योजनाओं की सूची कह देना अन्याय होगा। यह बदलाव एक साथ कई स्तरों पर हुआ है। कानून-व्यवस्था से लेकर अवसंरचना तक, उद्योग से लेकर तीर्थ-पर्यटन तक, बजट आकार से लेकर रोजगार तक—हर क्षेत्र में गति दिखाई देती है। कुछ वर्ष पहले तक जिस उत्तर प्रदेश के बारे में यह सोचना भी कठिन था कि वह निवेश आकर्षित करने वाले अग्रणी राज्यों में गिना जाएगा, वही आज विकास की चर्चा के केंद्र में है।
इतने विशाल और जटिल राज्य में यह परिवर्तन अपने आप संभव नहीं होता। इसके लिए स्पष्ट दिशा, प्रशासनिक अनुशासन और निर्णय लेने का साहस आवश्यक होता है। यह बात अब छिपी नहीं है कि निर्णायक नेतृत्व ने शासन-व्यवस्था को गति दी। योजनाएँ केवल घोषित नहीं हुईं, उन्हें आगे बढ़ाया गया। परियोजनाएँ केवल स्वीकृत नहीं हुईं, उन्हें धरातल पर उतारने का प्रयास हुआ।
उत्तर प्रदेश की विकासगाथा स्वयं यह संकेत देती है कि जब नेतृत्व लक्ष्य स्पष्ट रखता है, तब परिणाम भी बदलते हैं। पहले जहाँ निराशा और अविश्वास का वातावरण था, वहीं आज निवेश, उद्योग, एक्सप्रेसवे, रक्षा उत्पादन, तीर्थ-पर्यटन और बढ़ती अर्थव्यवस्था की चर्चा होती है।
योगी जी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश जिस तीव्रता से आगे बढ़ रहा है, वह केवल आँकड़ों की वृद्धि नहीं है। यह प्रशासनिक गति, नीति की निरंतरता और आत्मविश्वास की वृद्धि का परिणाम है। परिवर्तन पूर्ण नहीं है, पर दिशा स्पष्ट है। और जब दिशा स्पष्ट हो, तो गति अपने आप दिखाई देने लगती है।
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