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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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राष्ट्रीय और अराष्ट्रीय पाले की समझ न होना—यही आज का सबसे बड़ा वैचारिक संकट है। अपने और पराये की पहचान न कर पाने की यह दुर्बलता तब सबसे हास्यास्पद दिखाई देती है, जब ऐसे लोग स्वयं “शत्रुबोध” पढ़ाने का दावा करते हैं। जिनकी वैचारिक दृष्टि धुँधली हो, जिनकी प्राथमिकताएँ निजी लाभ से संचालित हों, वे जब राष्ट्र-समाज को दिशा देने का दावा करते हैं, तब हँसी आना स्वाभाविक है।
इसी संदर्भ में यह वाक्य अपनी पूरी तीक्ष्णता के साथ खड़ा होता है— “अगर पृथ्वीराज चौहान से कोई नाराज़गी है भी—तो भी विकल्प कभी मोहम्मद गौरी नहीं हो सकता।” यह कथन केवल इतिहास का संदर्भ नहीं है; यह आज के युगधर्म और मानसिक पतन का दस्तावेज़ है।
पृथ्वीराज चौहान से ऐतिहासिक असहमतियाँ हो सकती हैं—राजनीतिक भूलें हो सकती हैं—पर इसका अर्थ यह नहीं कि सभ्यता-विरोधी आक्रांता मोहम्मद गौरी किसी भी रूप में विकल्प माना जाए। ऐसा करना शत्रुबोध का पतन और परिस्थितिबोध का अंत कहलाता है।
एकपक्षीय शत्रुबोध—वर्तमान विमर्श की बीमार प्रवृत्ति
आज कई लोग इतिहास को एकपक्षीय दृष्टि से पढ़ते हैं। उनकी शत्रुबोध की समझ इतनी सतही है कि वे एक ही पक्ष के भीतर दोष खोजते-खोजते अंततः उस पक्ष के बाहर मौजूद वास्तविक खतरों को सामान्य या नैतिक विकल्प की तरह प्रस्तुत करने लगते हैं।
यह वही प्रवृत्ति है जिसके चलते कोई पृथ्वीराज की गलतियों पर इतना अटका रह जाता है कि गौरी को 'तर्कसंगत विकल्प' या 'कम बुरा' मानने लगता है—यह केवल ऐतिहासिक भूल नहीं, बल्कि मानसिक दुरवस्था है। मैं ही एकमात्र सच! मेरी समझ ही अंतिम शत्रुबोध!
2019 के बाद का परिदृश्य—निजी लाभ बनाम वैचारिक अनुशासन :
2019 के बाद यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हुई। अनेक लोग—जिन्हें व्यक्तिगत, राजनीतिक या आर्थिक लाभ नहीं मिला—अचानक अपने ही पाले पर हमला करने लगे। वे संघ, राष्ट्रवादी संगठन, या राष्ट्रीय विचारधारा की आलोचना इस तरह करने लगे मानो वह वर्षों से उनका शत्रु रहा हो। यह वैचारिक भिन्नता नहीं— यह व्यक्तिगत निराशा, कुंठा और महत्वाकांक्षा का विस्फोट था।
ऐसे लोग भूल जाते हैं कि असहमति शत्रु का विकल्प नहीं बनाती। लेकिन व्यक्तिगत ईर्ष्या और आकांक्षाओं की पूर्ति न होने पर वे वही गलती करते हैं—जिसकी सबसे बड़ी कीमत सभ्यता चुकाती है।
. परिस्थितिबोध—जो आज सबसे अधिक खो गया है। परिस्थितिबोध वह बुद्धि है जो यह समझ सके•••
• समय कैसा है?
• परिस्थिति का स्वभाव क्या है?
• कौन-सा निर्णय दूरगामी परिणाम देगा?
• कब मतभेद उचित हैं और कब आत्मघात?
परिस्थितिबोध के अभाव में व्यक्ति वही घातक कार्य करता है— पृथ्वीराज पर नाराज़गी के क्षण में गौरी को विकल्प समझ लेना। आज यही स्थिति सोशल मीडिया और बौद्धिक वर्ग में स्पष्ट दिखती है। जिन्हें भारतीयता की मूल प्रकृति का ज्ञान नहीं, वे “राष्ट्रवाद”, “संघ”, “धर्म-संस्कृति”, “सभ्यतागत संघर्ष” जैसे विषयों पर शत्रुबोध समझाने लगते हैं और हास्यास्पदता की सीमा पार कर जाते हैं।
Marxist और Ex-Marxist रणनीति—समाज को तू-तू, मैं-मैं में तोड़ डालो :
आज का सबसे बड़ा वैचारिक षड्यंत्र है—टकराव की संस्कृति। Cultural Marxism का उद्देश्य ही यही है कि समाज आंतरिक झगड़ों में उलझा रहे।
इनकी रणनीति बिल्कुल स्पष्ट है•••
• मतभेदों को वैमनस्य में बदलो
• असहमति को युद्ध में बदलो
• व्यक्तियों को “मैं बनाम तू” में धकेलो
• और फिर उस टूटे हुए समाज पर वैचारिक कब्ज़ा कर लो
आज Ex-Marxist, Neo-Marxist और वामपंथी बौद्धिक वर्ग यही हथकंडा अपनाता है।
हिंदू समाज के भीतर अतिसंवेदनशील तू-तू, मैं-मैं को बढ़ावा देना, नेताओं को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना, व्यक्तिगत विवादों को वैचारिक संघर्ष घोषित कर देना—इसी की परिणति है कि शत्रुबोध धुँधला पड़ता जा रहा है।
. सोशल मीडिया और राजनीतिक त्वरित प्रतिक्रिया—अग्नि में घी :
आज सोशल मीडिया ने “मैं नहीं तो सब गलत” वाले मानस को जन्म दिया है।
• नेतृत्व पर तीखी प्रतिक्रियाएँ
• बिना संदर्भ के आक्रामकता
• व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का ओवरड्राइव
• आधा सच, आधा झूठ
• और क्षणिक लोकप्रियता की प्यास
इन सबने सिद्धांत, शील, नैतिकता और दीर्घकालिक संघर्ष के संकल्प को पीछे धकेल दिया है। यही मानसिकता समाज के भीतर अविश्वास फैलाती है और वास्तविक शत्रु धुंधला होने लगता है।
वर्तमान उदाहरण—जहाँ परिस्थितिबोध विफल हो रहा है :
• मंदिरों, इतिहास, शिक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन पर हो रहे गहरे आक्रमणों को छोड़कर कई लोग संघ-विरोध या नेतृत्व-विरोध जैसे आंतरिक मुद्दों में उलझे रहते हैं।
• राजनीतिक दलों के भीतर टिकट न मिलने पर कई लोग वैचारिक प्रतिबद्धता छोड़ कर सीधे विरोधी शिविर में खड़े हो जाते हैं।
• सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स लाइक्स और व्यूज़ के लिए अपने ही पक्ष को “तानाशाह”, “संकीर्ण”, “असहिष्णु” जैसी भाषा से चित्रित करने लगते हैं।
• सांस्कृतिक संघर्षों—जैसे मिशनरी तंत्र, इस्लामी कट्टरवाद, वैश्विक भारत विरोधी शक्तियों —पर ध्यान घटता है, जबकि इनकी शक्ति बढ़ती जाती है। यह सब दर्शाता है कि परिस्थितिबोध की कमी का मूल्य पूरा राष्ट्र चुका रहा है।
शत्रुबोध और परिस्थितिबोध ही युगधर्म है :
सभ्यतागत संघर्ष में नाराज़गी से बड़ा मूल्य शत्रुबोध है। और प्रतिक्रिया से बड़ा मूल्य परिस्थितिबोध। व्यक्तिगत असंतोष कभी भी सभ्यता-विरोधी विकल्प को ‘सही’ नहीं बना सकता। युगधर्म यही कहता है कि•••
• मतभेद रहें, पर मर्यादा के भीतर
• आलोचना हो, पर सभ्यता-विरोधियों को विकल्प न बनाया जाए
• व्यक्तिगत आकांक्षा से ऊपर सामूहिक संघर्ष रखा जाए
अपने लम्बे गहरे समग्र इतिहास से सबक लेना है तो अपने ऐतिहासिक पूर्वजों, महापुरुषों के गुण-दोष की ग्राह्य आधारित- आलोचना होगी—चलेगी और चलनी भी चाहिए। पर राष्ट्रीय शक्तियों का विरोध कर अराष्ट्रीय शक्तियों को मजबूत करना कभी भी विकल्प नहीं हो सकता—न इतिहास में, न वर्तमान में, न भविष्य में।
यह कथन केवल इतिहास का संदर्भ नहीं है; यह आज के युगधर्म और मानसिक पतन का दस्तावेज़ है। पृथ्वीराज चौहान से ऐतिहासिक असहमतियाँ हो सकती हैं—राजनीतिक भूलें हो सकती हैं—पर इसका अर्थ यह नहीं कि सभ्यता-विरोधी आक्रांता मोहम्मद गौरी किसी भी रूप में विकल्प माना जाए। ऐसा करना शत्रुबोध का पतन और परिस्थितिबोध का अंत कहलाता है। यह सत्य जितना तीखा है, उतना ही आवश्यक है और यही राष्ट्र-निर्माण का आधार भी।
— कैलाशचंद्र
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