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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
हमारे बारे में एक अजीब-सी कहानी बार-बार दोहराई जाती है। कहा जाता है कि भारत तो बस आध्यात्मिक देश था, यहाँ लोग मोक्ष की बात करते थे, अर्थ की नहीं। यहाँ तप था, तकनीक नहीं। यहाँ वेद थे, उद्योग नहीं। और दूसरी ओर यह भी समझाया जाता है कि यूरोप तो शुरू से ही प्रगतिशील और समृद्ध था, उसने अपनी मेहनत से दुनिया को दिशा दी। पर जब मैं इन बातों को ठहरकर देखता हूँ, तो लगता है कि सच इतना सीधा नहीं है।
यदि यह देश केवल आध्यात्मिक होता, तो हमारे पुरुषार्थों में “अर्थ” को इतना स्पष्ट स्थान क्यों दिया जाता? धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — यह क्रम संयोग नहीं है। अर्थ को धर्म के बाद रखा गया, उसके पहले नहीं, उसके नीचे भी नहीं। इसका मतलब साफ है — जीवन के संतुलन में संपन्नता आवश्यक है। जो समाज अर्थ को तुच्छ समझता है, वह हजारों वर्षों तक विश्व उत्पादन का केंद्र नहीं बन सकता।
सिंधु–सरस्वती क्षेत्र की खुदाइयों को ही देख लीजिए। मोहेंजोदड़ो की गलियाँ सीधी रेखाओं में बसी हुई हैं, जल-निकासी इतनी सुव्यवस्थित कि आज के कई शहर भी वैसी व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। धोलावीरा में वर्षाजल संचयन की बहुस्तरीय संरचना मिली है। लोथल में समुद्री गोदी मिली। ये सब चार-पाँच हजार वर्ष पहले की बातें हैं। यह कोई बिखरा हुआ समाज नहीं था। यह संगठन जानता था, निर्माण जानता था, व्यापार जानता था। मेसोपोटामिया के अभिलेखों में “Meluhha” का उल्लेख मिलता है, और अधिकांश विद्वान उसे इसी भूभाग से जोड़ते हैं। वहाँ सिंधु शैली की मुहरें मिली हैं। इसका अर्थ है कि यह सभ्यता दुनिया से कटी हुई नहीं थी, वह व्यापारिक ताने-बाने का हिस्सा थी।
आगे चलिए। जब एंगस मैडिसन जैसे आर्थिक इतिहासकार यह लिखते हैं कि 1700 के आसपास भारत विश्व GDP का लगभग एक चौथाई हिस्सा रखता था, तो यह भावुकता नहीं, आर्थिक गणना है। उस समय मशीनें नहीं थीं। हर धागा हाथ से काता जाता था, हर कपड़ा करघे पर बनता था, हर औज़ार किसी कारीगर की हथेली से निकलता था। बंगाल की मलमल इतनी महीन थी कि यूरोप के बाजार में वह विलासिता की वस्तु मानी जाती थी। ब्रिटिश संसद को 1700 और 1721 में “Calico Acts” पास करने पड़े, क्योंकि भारतीय कपड़ा उनके अपने उद्योग के लिए खतरा बन रहा था। यदि भारतीय वस्त्र साधारण होते, तो अंग्रेज कानून बनाकर उन्हें रोकने की कोशिश क्यों करते?
दक्कन का वूट्ज़ इस्पात, जिससे दमिश्क की प्रसिद्ध तलवारें बनीं, कोई साधारण धातु-कर्म नहीं था। दिल्ली का लौह स्तंभ, जो सदियों से जंग का सामना कर रहा है, धातु-विज्ञान की परिपक्व समझ का उदाहरण है। यह सब अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे पीढ़ियों की साधना थी।
यहीं वंशानुगत पेशागत संरचना की भूमिका सामने आती है। यह मानना पड़ेगा कि भारत में अनेक पेशे पीढ़ी दर पीढ़ी चलते थे। लोहार का पुत्र बचपन से भट्ठी के पास बड़ा होता था। बुनकर का बच्चा सूत की महीनता पहचानना सीखता था। शिल्पकार का बेटा पत्थर की नसों को पढ़ना सीखता था। यह केवल सामाजिक पहचान नहीं थी; यह प्रशिक्षण की जीवित पद्धति थी। आज हम “स्किल डेवलपमेंट” पर योजनाएँ बनाते हैं, तब यह घर-घर में था। यह व्यवस्था पूर्णतः निर्दोष थी, ऐसा नहीं कह रहा; समय के साथ उसमें कठोरता आई होगी। पर यह कहना कि वह केवल अवरोध थी और विकास में बाधक थी, इतिहास से मेल नहीं खाता। यदि वह पूरी तरह जड़ और दमनकारी होती, तो भारत 1500 से 1700 तक वैश्विक विनिर्माण का केंद्र कैसे बना रहता?
फिर स्थिति बदली। 1757 के बाद औपनिवेशिक सत्ता स्थापित हुई। उसी समय ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति आरंभ हो रही थी। भारत से कच्चा कपास गया, मशीनों से बना कपड़ा वापस आया। व्यापारिक नियम ऐसे बनाए गए कि स्थानीय उद्योग प्रतिस्पर्धा में टिक न सकें। दादाभाई नौरोजी ने “ड्रेन थ्योरी” के माध्यम से बताया कि भारत से व्यवस्थित रूप से आर्थिक अधिशेष बाहर जा रहा है। आर.सी. दत्त ने औपनिवेशिक नीतियों को भारतीय उद्योग के पतन से जोड़ा। आधुनिक अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने यह अनुमान लगाया कि 1765 से 1938 के बीच भारत से निकला अधिशेष आज के मूल्य में लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर के बराबर था। यह रकम बोरी में भरकर ले जाने वाली लूट नहीं थी, बल्कि राजस्व और व्यापारिक संरचना के माध्यम से पूँजी का हस्तांतरण था। पर इससे यह तो स्पष्ट होता है कि भारत का आर्थिक संतुलन बदला।
1700 में जो देश वैश्विक उत्पादन में लगभग 23 प्रतिशत का हिस्सेदार था, 1900 तक लगभग 4 प्रतिशत पर सिमट गया। यह केवल तकनीकी पिछड़ापन नहीं था; यह संरचनात्मक परिवर्तन था। यूरोप की औद्योगिक वृद्धि में उपनिवेशों से मिले संसाधनों और बाजारों की भूमिका थी। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि पूरा औद्योगीकरण केवल भारत की लूट से हुआ, पर यह कहना असंगत नहीं कि उस पूँजी और बाजार ने यूरोपीय विस्तार को बल दिया।
स्वतंत्रता के बाद हमने सामाजिक न्याय की दिशा में कदम उठाए, जो आवश्यक भी थे। पर धीरे-धीरे समाज का ध्यान उत्पादन से हटकर पहचान की राजनीति की ओर झुक गया। परंपरागत कौशल का सम्मान घटा, और नौकरी-आधारित सुरक्षा प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई। फिर भी एक बात आज भी दिखाई देती है — भारतीय घरों में दुनिया का सबसे बड़ा निजी स्वर्ण भंडार माना जाता है। यह बताता है कि अर्थ की चेतना इस समाज में कभी समाप्त नहीं हुई। हमारे पुरुषार्थों का संतुलन अभी भी भीतर कहीं जीवित है।
आज दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन की बात कर रही है। पर मशीनें भी मनुष्य के कौशल पर निर्भर हैं। तकनीकी दक्षता, व्यावहारिक प्रशिक्षण, हाथ का हुनर — इनकी आवश्यकता फिर सामने आ रही है। इतिहास मानो याद दिला रहा है कि जिस समाज ने कौशल के आधार पर विश्व बाजार जीता था, वह यदि अपनी परंपरा को आधुनिक अवसर से जोड़ दे, तो फिर खड़ा हो सकता है।
मुझे लगता है कि हमें अतीत को या तो महिमा-मंडित करने की ज़रूरत नहीं है, न उसे कोसने की। हमें उसे समझने की आवश्यकता है। भारत की शक्ति केवल आध्यात्मिकता में नहीं थी, केवल जन्माधारित संरचना में भी नहीं थी। उसकी शक्ति संतुलन में थी — धर्म और अर्थ के संतुलन में, ज्ञान और कौशल के संतुलन में। यदि हम उस संतुलन को फिर पहचान सकें, तो इतिहास बोझ नहीं रहेगा, प्रेरणा बन जाएगा।
ॐ नमः शिवाय।
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