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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
पश्चिम, क्रिश्चियनिटी और वामपंथी बौद्धिक प्रवृत्तियों में बुद्ध के प्रति जो विशेष आकर्षण दिखाई देता है, उसे केवल आध्यात्मिक या नैतिक कारणों से समझना पर्याप्त नहीं है। यह आकर्षण एक बड़े बौद्धिक परिप्रेक्ष्य में खड़ा है—सृष्टि की अवधारणा, काल-दृष्टि, इतिहास-लेखन की पद्धति, औपनिवेशिक विमर्श और आधुनिक वैचारिक राजनीति के संदर्भ में। इस प्रश्न को भावनात्मक प्रतिक्रिया की बजाय तर्क और संदर्भ के साथ देखना आवश्यक है।
सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि बौद्ध मत को सनातन वैदिक धर्म से पृथक या विरोधी धारा के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से संतुलित दृष्टि नहीं है। गौतम बुद्ध उस सांस्कृतिक और दार्शनिक वातावरण में प्रकट हुए जहाँ उपनिषदों में आत्मा, ब्रह्म, कर्म और पुनर्जन्म पर गहन विमर्श पहले से चल रहा था। बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य आत्मा की अनंतता पर विचार करते हैं। कठोपनिषद में नचिकेता मृत्यु के पार के सत्य को जानना चाहता है। छांदोग्य उपनिषद “तत्त्वमसि” का उद्घोष करता है। भगवद्गीता में आत्मा की अनश्वरता और कर्मफल का सिद्धांत प्रतिपादित है। बुद्ध ने कर्म और पुनर्जन्म की अवधारणा को नकारा नहीं। उन्होंने यज्ञकर्म और वेद-प्रामाण्य की अनिवार्यता पर प्रश्न उठाए, पर उनका चिंतन उसी दार्शनिक धरातल पर विकसित हुआ जिसे सनातन वैदिक परंपरा कहा जाता है।
भारतीय दर्शन की परंपरा में सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा (वेदांत), जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसे दर्शनों का उल्लेख मिलता है। यह सूची इस बात का संकेत है कि बौद्ध दर्शन को भारतीय बौद्धिक परंपरा से बाहर नहीं रखा गया। चार्वाक जैसे भौतिकवादी मत को भी स्थान मिला, जिसे परंपरा देवगुरु बृहस्पति से जोड़ती है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय दार्शनिक संरचना में मतभेद को संवाद के रूप में स्वीकार किया गया, संघर्ष के रूप में नहीं। श्रमण और वैदिक धाराएँ एक ही दार्शनिक भूमि की अभिव्यक्तियाँ थीं।
अब पश्चिमी सृष्टि-दृष्टि पर विचार करें। यूरोप में लंबे समय तक बाइबिल-आधारित कालगणना प्रभावी रही। सत्रहवीं शताब्दी में आयरलैंड के आर्चबिशप जेम्स अशर ने बाइबिल की वंशावलियों के आधार पर सृष्टि की तिथि 4004 ईसा पूर्व निर्धारित की। इस प्रकार मानव इतिहास को कुछ हजार वर्षों की रेखीय समयरेखा में सीमित कर दिया गया। यह दृष्टि एक आरंभ-बिंदु से प्रारंभ होकर क्रमिक विकास और अंत की ओर बढ़ती रेखा पर आधारित थी।
उन्नीसवीं शताब्दी में चार्ल्स डार्विन की “On the Origin of Species” (1859) प्रकाशित हुई। विकासवाद ने जीवों के क्रमिक परिवर्तन की परिकल्पना दी। डार्विन ने यह कहा कि मनुष्य और आधुनिक वानरों का एक साझा पूर्वज रहा है। लोकप्रिय समझ में यह विचार इस रूप में बैठा कि मनुष्य बंदर से उत्पन्न हुआ। आज भी सामान्य स्तर पर यह प्रश्न उठता है कि यदि ऐसा है तो बंदर अभी भी क्यों हैं। वैज्ञानिक उत्तर यह देता है कि विकास शाखाओं में हुआ, एक सीधी रेखा में नहीं। फिर भी समग्र ढाँचा रेखीय जैविक विकास पर आधारित है।
इसके विपरीत सनातन वैदिक ग्रंथों में सृष्टि की अवधारणा बहुस्तरीय और चक्रीय है। पुराणों में मानसिक सृष्टि का उल्लेख है—ब्रह्मा द्वारा संकल्प से उत्पत्ति। उसके पश्चात मैथुनिक सृष्टि का क्रम है। यह संकेत करता है कि सृष्टि को केवल भौतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि चेतना और प्रकृति के संयुक्त आयाम में देखा गया। विष्णु पुराण में सृष्टि और प्रलय को चक्र में वर्णित किया गया है। श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध में ब्रह्मा के एक दिन की गणना 4.32 अरब वर्ष कही गई है। महाभारत के शांति पर्व में कल्पों और मन्वंतरों का विस्तार मिलता है। योगवासिष्ठ में असंख्य ब्रह्मांडों की चर्चा है। यहाँ समय अनादि और चक्रीय है।
यदि इस चक्रीय काल-दृष्टि को स्वीकार किया जाए तो सृष्टि को कुछ हजार वर्षों में सीमित करने की धारणा चुनौती के घेरे में आ जाती है। औपनिवेशिक काल में भारत के इतिहास को इसी रेखीय ढाँचे में ढालने का प्रयास हुआ। जेम्स मिल की “History of British India” (1817) ने भारतीय परंपरा को अंधविश्वासी और अविकसित बताया। मैक्स मूलर ने वेदों का काल सीमित किया। उन्नीसवीं शताब्दी में आर्य आक्रमण सिद्धांत प्रस्तुत हुआ—यह सिद्ध करने के लिए कि वैदिक संस्कृति स्वदेशी नहीं थी। इससे भारतीय परंपरा की प्राचीनता और निरंतरता पर प्रश्न उठे।
इसी पृष्ठभूमि में “बौद्ध बनाम ब्राह्मण” का आख्यान विकसित हुआ। कुछ मिशनरी लेखनों और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने यह प्रतिपादित किया कि बौद्ध मत सामाजिक विद्रोह था और वैदिक परंपरा दमनकारी। इससे दार्शनिक निरंतरता को खंडित दिखाया गया और बुद्ध को एक वैकल्पिक नैतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। बुद्ध को “ईश्वर-निरपेक्ष नैतिक शिक्षक” के रूप में चित्रित करना पश्चिमी बौद्धिकता के लिए अनुकूल था। इससे बाइबिल-आधारित ढाँचे को सीधी चुनौती नहीं मिलती और वामपंथी चिंतन को एक ऐतिहासिक प्रतीक मिल जाता है।
ऐतिहासिक स्रोत इस सरलीकरण का समर्थन नहीं करते। सम्राट अशोक के शिलालेखों में वैदिक परंपरा के विरुद्ध कोई धार्मिक युद्ध का उल्लेख नहीं मिलता। हर्षवर्धन ने बौद्ध विहारों और ब्राह्मणों दोनों को संरक्षण दिया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने “The Buddha and His Dhamma” में संकेत किया कि भारत में बौद्ध संस्थानों के पतन में विदेशी आक्रमणों की भूमिका रही। नालंदा और विक्रमशिला के विनाश का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों में है। अतः बौद्ध मत के लोप को केवल “ब्राह्मणीय दमन” की कथा में सीमित करना एकांगी दृष्टि है।
पश्चिम, क्रिश्चियनिटी और वामपंथी चिंतन में बुद्ध के प्रति विशेष आग्रह का एक कारण आध्यात्मिक आकर्षण हो सकता है, पर उससे अधिक वह वैचारिक सुविधा है जो बुद्ध को सनातन से पृथक प्रस्तुत करने में निहित है। यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि बौद्ध मत उसी दार्शनिक परंपरा की धारा है, कि श्रमण और वैदिक विचार एक ही बौद्धिक भूमि के अंग हैं, तो यह कृत्रिम द्वंद्व समाप्त हो जाता है।
बुद्ध और सनातन के बीच विभाजन स्थापित करना ऐतिहासिक जटिलता को सरल बनाना है। समस्या बुद्ध में नहीं है; समस्या उस व्याख्या में है जो उन्हें सनातन के विरुद्ध खड़ा करती है। जब सृष्टि-दृष्टि, काल-दृष्टि और दार्शनिक निरंतरता के संदर्भ में विषय को देखा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि दोनों को अलग करके देखना ही मूल भ्रम है।
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