सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

राष्ट्र की आत्मा और राज्य की सीमा


✍️दीपक कुमार द्विवेदी

कभी-कभी मुझे लगता है कि हम शब्दों के जंगल में भटक गये हैं। “राष्ट्र”, “राज्य”, “लोकतंत्र”, “समाजवाद”,राष्ट्र की आत्मा और राज्य की सीमा “धर्मनिरपेक्षता”, “सामाजिक न्याय”—ये सब शब्द रोज़ सुनते हैं, पर इनके अर्थ पर गंभीर सार्वजनिक विमर्श कभी हुआ ही नहीं। हमने नारे अपनाए, अवधारणाएँ नहीं समझीं।

एक छोटी-सी कहानी से शुरू करता हूँ।
गाँव में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई घर का प्रबंध संभालता था—खेत देखता, हिसाब रखता, विवाद सुलझाता। छोटा भाई घर की परंपरा, पूजा-पाठ, संस्कार, अतिथि-सत्कार और परिवार की स्मृतियों का ध्यान रखता। एक दिन बड़ा भाई इतना प्रभावशाली हो गया कि उसने कहना शुरू कर दिया—“घर मैं चलाता हूँ, इसलिए घर मैं ही हूँ।” धीरे-धीरे उसने पूजा का तरीका भी तय करना शुरू किया, बच्चों की शिक्षा भी, किससे संबंध रखना है यह भी, यहाँ तक कि परिवार की परंपरा क्या होगी यह भी वही तय करने लगा। परिणाम क्या हुआ? घर चल रहा था, पर घर की आत्मा सूख गई।
यही अंतर राष्ट्र और राज्य का है।

राष्ट्र वह जीवमान सांस्कृतिक सत्ता है जो शताब्दियों में बनती है—स्मृतियों से, तीर्थों से, भाषा से, कथा से, लोकाचार से। राज्य प्रशासनिक ढाँचा है—जो व्यवस्था बनाए रखने के लिए खड़ा होता है। राज्य बदल सकता है, राष्ट्र नहीं।
महाभारत में जब युधिष्ठिर भीष्म से राजधर्म पूछते हैं, तो भीष्म उन्हें सत्ता का विस्तार नहीं बताते, मर्यादा बताते हैं। वे कहते हैं—राजा दंड का अधिकारी है, पर दंड भी धर्मानुसार। यदि राजा अधर्म करे तो प्रजा का विश्वास टूट जाता है। यहाँ तक कि महाभारत यह भी स्वीकार करता है कि यदि राजा अत्याचारी हो जाए तो उसे हटाया जा सकता है। यह बात कितनी गहरी है—राजा अंतिम सत्य नहीं है।

रामायण का प्रसंग देखिए। राम अयोध्या के राजा हैं, पर स्वयं को “राज्य” नहीं मानते। जब एक धुलाईवाले की शंका उठती है, राम उसे गंभीरता से लेते हैं। यह निर्णय सही या गलत पर बहस अलग है, पर एक बात स्पष्ट है—राजा स्वयं को लोकमत से ऊपर नहीं मानता। राज्य मर्यादा में है।

अब यूरोप की कथा देखिए। मध्यकालीन यूरोप में चर्च और राजसत्ता मिलकर समाज पर नियंत्रण रखते थे। सत्य की घोषणा ऊपर से होती थी। असहमति विधर्म थी। धीरे-धीरे आधुनिक नेशन-स्टेट बना—पर संरचना वही रही। केवल पोशाक बदली। मुकुट की जगह संविधान आया, चर्च की जगह वैचारिक संस्थाएँ आईं, पर केंद्र में राज्य ही रहा।

भारत की परंपरा भिन्न थी। यहाँ “धर्म” रिलिजन नहीं था। यहाँ धर्म जीवन-संतुलन था। “धारणाद् धर्म इत्याहुः”—जो धारण करे, संतुलित रखे। यहाँ सत्य की खोज होती है। उपनिषदों में शिष्य प्रश्न करता है—“कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति?” अर्जुन युद्धभूमि में कृष्ण से प्रश्न करता है। यहाँ ईश्वर भी प्रश्नों से परे नहीं।

हमने स्वतंत्रता प्राप्त की, पर क्या हमने राज्य को समझा? यह प्रश्न मुझे बार-बार विचलित करता है। अंग्रेज़ चले गए, पर उनके द्वारा स्थापित राज्य संरचना जस की तस रही। केवल शासक बदले, शासन की आत्मा नहीं बदली। और यही वह बिंदु है जहाँ से भारतीय समाज की आंतरिक शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी।
अंग्रेज़ों के समय भी समाज पूर्णतः राज्याधीन नहीं था। शिक्षा समाज के हाथ में थी। पंचायतें जीवित थीं। रियासतें अपनी आंतरिक स्वायत्तता रखती थीं। मंदिर समाज के केंद्र थे। व्यापारिक श्रेणियाँ स्वतंत्र थीं। गाँव आर्थिक इकाई थे। समाज की संस्थाएँ राज्य से बड़ी थीं। अंग्रेज़ों ने हस्तक्षेप किया, लूटा, संरचना को झकझोरा, पर समाज की जीवनी शक्ति पूरी तरह राज्य के अधीन नहीं हुई थी।

वास्तविक केंद्रीकरण स्वतंत्रता के बाद हुआ।
समाज को बताया गया कि अब राज्य तुम्हारा है, इसलिए राज्य जो करेगा वही राष्ट्रहित होगा। यहीं सबसे बड़ा बौद्धिक छल हुआ। राष्ट्र और राज्य को एक कर दिया गया। जिसने राज्य की आलोचना की, उसे राष्ट्रविरोधी कह दिया गया। जिसने नीति पर प्रश्न उठाया, उसे सामाजिक न्याय का विरोधी घोषित कर दिया गया।
धीरे-धीरे एक मानसिकता बैठाई गई—सरकार ही माई-बाप है। सरकार शिक्षा देगी, सरकार रोज़गार देगी, सरकार उद्योग चलाएगी, सरकार इतिहास लिखेगी, सरकार तय करेगी कौन पिछड़ा है, कौन अगड़ा है, कौन शोषक है, कौन शोषित है। समाज केवल मतदाता रह गया।

और यह सब लोकतांत्रिक समाजवाद के नाम पर हुआ।
कहा गया भारत कृषि प्रधान है, गरीब है, पिछड़ा है। जबकि 17वीं शताब्दी तक भारत विश्व अर्थव्यवस्था का लगभग 24% हिस्सा था। आक्रमणों से पहले यह और अधिक था। भारत केवल कृषि प्रधान नहीं था; यह औद्योगिक-व्यापारिक सभ्यता थी—कपड़ा, इस्पात, जहाज निर्माण, हस्तशिल्प, लघु उद्योग, कुटीर उद्योग—संगठित श्रेणियाँ थीं। अंग्रेज़ों ने व्यवस्थित रूप से उद्योग तोड़े, कर नीति बदली, व्यापार मार्ग बदले, अकाल पैदा किए। करोड़ों लोग कृत्रिम नीतियों से मरे। यह इतिहास है।

पर स्वतंत्रता के बाद भी कथा बदली नहीं। उल्टा यह प्रचार हुआ कि भारतीय समाज स्वभाव से गरीब है। आज भी दुनिया में निजी सोने का सबसे बड़ा भंडार भारतीय परिवारों के पास है। स्वतंत्रता के समय भारतीय समाज संपन्न था, पर राज्य संचालित समाजवादी मॉडल ने उत्पादन से अधिक नियंत्रण को प्राथमिकता दी।
सोवियत संघ से प्रेरित आर्थिक मॉडल अपनाया गया। लाइसेंस-परमिट राज खड़ा हुआ। निजी पहल को संदेह से देखा गया। संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाया गया। दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार है। भारत में नहीं। यहाँ राज्य चाहे तो “वेल्थ डिस्ट्रीब्यूशन” के नाम पर संपत्ति छीन सकता है। यह विचार कहाँ से आया? यह भारतीय दर्शन से नहीं आया। यह साम्यवादी राज्य सिद्धांत से आया।

अब ज़रा शिक्षा की ओर देखिए। प्रशासनिक सेवा की परीक्षा से लेकर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम तक, दशकों तक वही विचारधारा प्रभावी रही जो राज्य को सर्वशक्तिमान मानती है। क्या यह संयोग है कि अधिकांश प्रशासनिक ढाँचे में समाज के प्रति अविश्वास और राज्य के प्रति अंधविश्वास दिखाई देता है? कम्युनिस्ट विचारधारा का मूल सिद्धांत है—समाज को नियंत्रित रखो, संसाधनों का केंद्रीकरण करो, वर्ग पहचान को स्थायी बनाओ। क्या हमने कभी गंभीरता से सोचा कि हमारे नीति-निर्माण तंत्र में यह सोच इतनी गहरी क्यों है?
जाति संघर्ष की जो स्थायी कथा आज पढ़ाई जाती है, उसके अंग्रेज़ों से पहले प्रमाण कहाँ हैं? विदेशी यात्रियों के विवरण पढ़िए—मेगस्थनीज से लेकर ह्वेनसांग तक—कहीं स्थायी जातिगत युद्ध का उल्लेख नहीं। समाज में असमानताएँ थीं, पर स्थायी वर्ग संघर्ष की मार्क्सवादी संरचना नहीं थी। पर औपनिवेशिक जनगणना ने श्रेणियाँ गढ़ीं। पहचानें स्थायी की गईं। और स्वतंत्रता के बाद वही श्रेणियाँ राजनीति का आधार बन गईं।

आज राज्य अगड़ा-पिछड़ा विभाजन करके वर्ग संघर्ष को स्थायी बनाए रखता है। सामाजिक न्याय के नाम पर एक वर्ग को जन्मजात अपराधी की तरह प्रस्तुत किया जाता है। आरक्षण का लाभ वास्तविक निर्धन तक पहुँचे या न पहुँचे, पर राजनीतिक वर्गीकरण स्थायी रहता है। और विडंबना देखिए—जो वास्तव में निर्धन है, वह अक्सर किसी श्रेणी में फिट न होने के कारण उपेक्षित रह जाता है।

और दूसरी ओर, नेता आलोचना से परे होने लगते हैं। प्रधानमंत्री प्रश्नों से परे, महापुरुष आलोचना से परे, विचारधाराएँ आलोचना से परे। जबकि हमारी परंपरा में अर्जुन ने स्वयं भगवान कृष्ण से प्रश्न किया। यहाँ प्रश्न धर्म है, अपराध नहीं। पर आज “पॉलिटिकल करेक्टनेस” का ऐसा वातावरण है कि सत्य बोलना जोखिम बन जाता है।
यह वही मानसिकता है जहाँ राज्य धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप की तरह व्यवहार करने लगता है—पूजा करो, प्रश्न मत करो।

मैं यह नहीं कह रहा कि राज्य अनावश्यक है। राज्य आवश्यक है। पर राज्य सर्वोच्च नहीं है। भारतीय परंपरा में राजधर्म का विस्तृत विवेचन है। मनुस्मृति से लेकर शुक्रनीति और महाभारत के शांति पर्व तक—राजा को दंड का अधिकारी कहा गया, पर धर्म से ऊपर नहीं। राजा धर्म का रक्षक है, स्वामी नहीं। आज स्थिति उलट गई है—धर्म, समाज, परिवार सब राज्य के अधीन मान लिए गए हैं।

समस्या यह नहीं कि लोकतंत्र है। समस्या यह है कि लोकतंत्र में राज्य की सीमाओं पर चर्चा बंद है। राष्ट्र और राज्य का अंतर धुँधला कर दिया गया है। जब तक यह अंतर स्पष्ट नहीं होगा, तब तक हर नीति को राष्ट्रहित कहकर लागू किया जा सकेगा—चाहे वह समाज को विभाजित करे, निर्भर बनाए, या स्मृति को कमजोर करे।
और शायद इसी कारण आज राज्य के दायित्वों पर गंभीर विमर्श आवश्यक है। क्योंकि जब समाज अपनी संस्थाएँ खो देता है—शिक्षा, परिवार, पंचायत, श्रेणियाँ—तो वह मतदाता तो रह जाता है, पर स्वाधीन नहीं।

जब राज्य सर्वशक्तिमान बनता है तो समाज दुर्बल होता है। यही आज दिखता है। परिवार पर कानून, परंपरा पर नियंत्रण, अभिव्यक्ति पर मर्यादा, और राजनीतिक शुचिता के नाम पर सत्य पर अंकुश। यदि कोई ऐतिहासिक महापुरुष पर प्रश्न उठाए तो उसे अपराध की दृष्टि से देखा जाता है। जबकि गीता में अर्जुन स्वयं भगवान से प्रश्न करता है। प्रश्न धर्म का अपमान नहीं, धर्म की प्रक्रिया है।

आज कुछ नेता खुले मंच से संपत्ति पुनर्वितरण की बात करते हैं। यह विचार मार्क्सवादी आर्थिक दृष्टि से प्रेरित है जिसमें राज्य को अंतिम निर्णायक माना जाता है। पर हमारे यहाँ संपत्ति का नैतिक बोध ‘त्याग’ और ‘दान’ से जुड़ा था, राज्य-द्वारा दमन से नहीं। दान धर्म था, दण्ड नहीं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि बुद्धिजीवी वर्ग ने भी राज्य की सीमाओं पर विमर्श छोड़ दिया है। राजनीति सत्ता प्राप्ति का साधन बन गई है; राज्य का दायित्व क्या है—यह प्रश्न गौण हो गया है। राजधर्म, दण्डनीति, लोकाचार—ये शब्द अकादमिक चर्चा से अनुपस्थित हैं।
यदि हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं तो पहले राष्ट्र और राज्य का भेद पुनः स्पष्ट करना होगा। राष्ट्र सांस्कृतिक चेतना है—वह बहुमत-अल्पमत से निर्मित नहीं होता। राज्य उसका उपकरण है—सीमित, उत्तरदायी और धर्माधीन।

जब तक हम राज्य की शक्तियों की सीमा निर्धारित नहीं करेंगे, जब तक हम राजधर्म को पुनः स्थापित नहीं करेंगे, तब तक समाज राज्य के अधीन होता जाएगा और राष्ट्र क्षीण होता जाएगा।

यह विमर्श केवल सैद्धांतिक नहीं है। यह भविष्य का प्रश्न है। क्या हम राज्य-प्रधान समाज चाहते हैं या राष्ट्र-प्रधान व्यवस्था? क्या हम ऐसी लोकतांत्रिक संरचना चाहते हैं जहाँ प्रश्न अपराध हो जाएँ? या ऐसी सांस्कृतिक परंपरा जहाँ ईश्वर तक से संवाद संभव हो?

राज्य आवश्यक है, पर वह अंतिम सत्य नहीं है। अंतिम सत्य राष्ट्र है—और राष्ट्र की आत्मा धर्म है, रिलिजन नहीं; लोकव्यवहार, लोकमत, परंपरा और साझा स्मृति है।
जब तक यह स्पष्टता हमारे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं बनेगी, तब तक हम न नीति में स्थिर होंगे, न समाज में समरस। इसलिए आज राज्य के उत्तरदायित्वों पर चर्चा केवल वैचारिक जिज्ञासा नहीं, राष्ट्रीय आवश्यकता है।

टिप्पणियाँ