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दिग्भ्रम नहीं, प्रवृत्तियों का संतुलन: हिंदू समाज की वास्तविक संरचना पर एक आवश्यक विमर्श


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

हिंदू समाज पर टिप्पणी करना जितना सरल प्रतीत होता है, उसे समझना उतना ही कठिन है। आजकल एक वाक्य बहुत सहजता से बोल दिया जाता है—“पूरा हिंदू समाज दिग्भ्रमित है।” मैं इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो पाता। कोई भी समाज एकरूप नहीं होता, और हिंदू समाज तो स्वभावतः विविधता में संगठित समाज है। उसकी संरचना को समझे बिना उसकी मानसिकता पर निर्णय दे देना बौद्धिक शॉर्टकट है।

जब हम हिंदू समाज की चर्चा करते हैं और कहते हैं कि समाज दिग्भ्रमित है, तब हमें पहले यह समझना चाहिए कि समाज एकरूप इकाई नहीं होता। हमारे शास्त्र स्वयं बताते हैं कि मनुष्य के भीतर भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ रहती हैं। वही प्रवृत्तियाँ समाज में भी समूहों के रूप में दिखाई देती हैं।

गीता के सोलहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने दो प्रकार की संपदाओं का उल्लेख किया है—दैवी और आसुरी। दैवी संपदा में अभय, सत्य, दान, संयम, अहिंसा जैसे गुण बताए गए हैं। आसुरी संपदा में दंभ, अहंकार, क्रोध, कठोरता और अज्ञान। यह विभाजन किसी समुदाय का नहीं, प्रवृत्तियों का है। यही से स्पष्ट होता है कि हर समाज में कम से कम दो समूह तो सदैव रहेंगे—एक जो धर्माधारित जीवन जीने का प्रयास करेगा, और दूसरा जो स्वार्थ और अहंकार के मार्ग पर चलेगा।

जिसे मैं धर्मनिष्ठ समूह कह रहा हूँ, वही गीता की दैवी प्रवृत्ति वाला समूह है। मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए—धैर्य, क्षमा, दमन, अस्तेय, शुचिता, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध। जो व्यक्ति इन गुणों को जीवन में धारण करने का प्रयास करता है, वही धर्मनिष्ठ है। यह संख्या में बड़ा नहीं होता, पर समाज की नैतिक दिशा इसी से तय होती है। महाभारत में युधिष्ठिर अकेले सत्य के पक्ष में खड़े दिखते हैं, पर उनकी उपस्थिति ही धर्म की पहचान बनती है। इतिहास में भी ऐसे ही लोग समाज की आत्मा को बचाए रखते हैं।
दूसरा समूह अधर्मनिष्ठ है। गीता में आसुरी प्रवृत्ति का वर्णन करते हुए कहा गया कि ऐसे लोग संसार को आधारहीन और नैतिक नियमों से रहित मानते हैं।

महाभारत में दुर्योधन का कथन—“जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति”—यह स्पष्ट करता है कि अधर्म केवल अज्ञान नहीं है; कई बार वह जानबूझकर चुना गया मार्ग होता है। जब स्वार्थ, सत्ता और अहंकार नीति पर हावी हो जाते हैं, तब यह समूह प्रभावी हो जाता है। समाज में विभाजन, अन्याय और भ्रष्टाचार इसी प्रवृत्ति के परिणाम होते हैं।
तीसरा समूह प्रमादनिष्ठ है, जिसका उल्लेख सीधे-सीधे कम होता है, पर संकेत स्पष्ट हैं। कठोपनिषद् में कहा गया—“उत्तिष्ठत जाग्रत…” अर्थात जागो। जागने का आह्वान तभी होता है जब प्रमाद उपस्थित हो। उसी उपनिषद् में प्रमाद को मृत्यु कहा गया है—“प्रमादो वै मृत्यु:”। यहाँ मृत्यु का अर्थ शारीरिक अंत नहीं, बल्कि चेतना का क्षय है। जब व्यक्ति या समाज सजग नहीं रहता, जब कर्तव्यबोध शिथिल हो जाता है, जब अन्याय देखकर भी मौन साध लिया जाता है—वही प्रमाद है। यह समूह सबसे बड़ा होता है। यह सीधे अधर्म का समर्थन नहीं करता, पर अपने मौन से अधर्म को बल देता है।

अब यदि इन तीनों समूहों को एक साथ देखें, तो समाज की स्थिति अधिक स्पष्ट होती है। धर्मनिष्ठ समूह दिशा देता है, अधर्मनिष्ठ समूह चुनौती देता है, और प्रमादनिष्ठ समूह संतुलन को तय करता है। महाभारत इसका उदाहरण है। कौरवों की सभा में दुर्योधन अधर्मनिष्ठ था, भीष्म और द्रोण धर्म का ज्ञान रखते हुए भी निष्क्रियता में फँसे थे—यह प्रमाद था। वहीं कृष्ण और पांडव धर्मनिष्ठ पक्ष थे। परिणाम इस संतुलन से निकला।

इसीलिए पूरे समाज को दिग्भ्रमित कहना उचित नहीं। समाज में धर्मनिष्ठ चेतना कभी समाप्त नहीं होती। प्रश्न यह है कि प्रमादनिष्ठ समूह किस ओर झुक रहा है। यदि वह जागृत होकर धर्मनिष्ठ समूह के साथ खड़ा हो जाए, तो अधर्मनिष्ठ प्रवृत्तियाँ सीमित हो जाती हैं। यदि वह उदासीन बना रहे, तो अधर्म को विस्तार मिलता है।
हिंदू समाज की विवेचना करते समय यह त्रि-समूह संरचना ध्यान में रखनी होगी। यह विभाजन किसी व्यक्ति को स्थायी रूप से किसी श्रेणी में बाँधने के लिए नहीं है। एक ही व्यक्ति के भीतर भी ये तीनों प्रवृत्तियाँ संघर्षरत रहती हैं। समाज उसी आंतरिक संघर्ष का बाहरी रूप है।

यदि यह मान लें कि पूरा समाज भ्रमित था, तो प्रश्न उठता है—इतिहास में बाहरी शक्तियों को यहाँ स्थायी सत्ता स्थापित करने में इतना समय क्यों लगा? शक, हूण और कुषाणों का प्रभाव सीमित भूभागों तक रहा। दिल्ली सल्तनत को स्थिर होने में दशकों लगे। मुग़ल सत्ता को भी अपने आरंभिक काल में तीव्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा—राणा सांगा, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, मराठा शक्ति, जाट और सिख विद्रोह—ये सब उस “धर्मनिष्ठ अल्पमत” की ऐतिहासिक उपस्थिति के प्रमाण हैं, जिसने संख्या से नहीं, संकल्प से इतिहास की दिशा बदली। अंग्रेजों को भी 1757 से 1857 तक पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने में एक शताब्दी लगी। 1857 का महासंग्राम यह सिद्ध करता है कि समाज कभी पूर्णतः पराजित मानसिकता में नहीं था।

समाज और नेतृत्व को अलग-अलग सत्ता मानना भी भूल है। जब नेतृत्व दृढ़ और दूरदर्शी होता है, तो वही समाज असाधारण अनुशासन और त्याग का परिचय देता है। स्वतंत्रता आंदोलन इसका उदाहरण है—नेतृत्व के आह्वान पर करोड़ों लोग संगठित हुए। इसके विपरीत जब नेतृत्व दिशाहीन होता है, तो वही समाज विखंडित और भ्रमित दिखाई देता है। इसलिए “जैसा राजा, वैसी प्रजा” केवल कहावत नहीं, सामाजिक मनोविज्ञान का सिद्धांत है।

हिंदू समाज की एक विशेषता है—यह भीड़-चालित समाज नहीं है। यहाँ वाद-विवाद, खंडन-मंडन और तर्क परंपरा का हिस्सा रहे हैं। उपनिषदों से लेकर शंकराचार्य और मंडन मिश्र तक शास्त्रार्थ की परंपरा इसका प्रमाण है। यह समाज विचार करता है, तुरंत उन्माद में नहीं बहता। महाभारत का युद्ध भी समस्त आर्यावर्त का एकरूप युद्ध नहीं था; अनेक जनपद तटस्थ रहे। इसका अर्थ यह नहीं कि समाज दिग्भ्रमित था, बल्कि यह कि उसकी संरचना बहुकेन्द्रीय थी।

ग्राम-स्वायत्तता हिंदू समाज की रीढ़ रही है। औपनिवेशिक काल के राजस्व अभिलेख बताते हैं कि अठारहवीं सदी तक गाँव आर्थिक इकाई के रूप में आत्मनिर्भर थे। भूमि व्यवस्था, जल प्रबंधन, सामाजिक न्याय—इन सबका संचालन स्थानीय स्तर पर होता था। औपनिवेशिक राजस्व नीति और केंद्रीकृत प्रशासन ने इस संरचना को तोड़ा। स्वतंत्रता के बाद भी केंद्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी। परिणाम यह हुआ कि समाज की स्वायत्त शक्ति क्षीण होती गई और राज्य पर निर्भरता बढ़ती गई। जब समाज से निर्णय की क्षमता छिनती है, तो वह प्रतिक्रियाशील दिखता है। इसे दिग्भ्रम कहना समस्या की जड़ को न देखना है।

आज जिन चुनौतियों की चर्चा होती है—परिवार व्यवस्था का विघटन, उपभोक्तावाद का दबाव, वैश्विक सांस्कृतिक प्रभाव, धार्मिक मतांतरण की गतिविधियाँ—ये सब वास्तविक प्रश्न हैं। परंतु इनका अर्थ यह नहीं कि समाज समाप्त हो जाएगा। हिंदू समाज का इतिहास चक्रीय उत्थान-पतन का इतिहास है। आठवीं सदी में जब उत्तर भारत पर आक्रमण हुए, तब दक्षिण में सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ। तेरहवीं सदी में राजनीतिक पराभव के बीच भक्ति आंदोलन फला-फूला। सत्रहवीं सदी में मराठा शक्ति का उदय हुआ। हर संकट के भीतर पुनरुत्थान का बीज रहा है।

इसलिए समाधान “पूरा समाज दिग्भ्रमित है” कह देने में नहीं है। समाधान यह है कि धर्मनिष्ठ चेतना को संगठित और सक्रिय किया जाए। धर्म यहाँ संकीर्ण अनुष्ठान नहीं, बल्कि सत्य, धैर्य, संयम, क्षमा, शुचिता और आत्मनियंत्रण जैसे गुणों का समुच्चय है। जब ये गुण समाज में सुदृढ़ होते हैं, तब राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं से नहीं, संस्कृति से होती है।

हिंदू समाज भावनात्मक अवश्य है, परंतु केवल भावनात्मक नहीं है। वह स्मृति-प्रधान समाज है। उसकी स्मृति में राम, कृष्ण, शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु परंपरा, संत परंपरा सब साथ चलते हैं। यही कारण है कि वह पूर्णतः किसी एक विचारधारा में सीमित नहीं हो पाता। पिछले सौ वर्षों में अनेक “वाद” आए—समाजवाद, पूँजीवाद, पंथनिरपेक्षता, जाति-आधारित राजनीति—परंतु कोई भी उसे पूर्णतः आत्मसात नहीं कर सका। इसका कारण भ्रम नहीं, बल्कि उसकी मूल संरचना की जटिलता है।

मेरे विचार से हमें शब्दों की कठोरता से बचना चाहिए। समाज को दिग्भ्रमित कह देना आत्मालोचना नहीं, निराशा की अभिव्यक्ति है। यदि दिशा स्पष्ट हो, नेतृत्व सशक्त हो और सांस्कृतिक आत्मविश्वास जागृत हो, तो वही समाज जो आज विभाजित दिखता है, कल संगठित भी दिख सकता है। इतिहास इसका साक्षी है।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि समाज भ्रमित है या नहीं; प्रश्न यह है कि हम उसे किस दृष्टि से देख रहे हैं। यदि हम केवल विघटन देखेंगे, तो निराशा बढ़ेगी। यदि हम उसकी अंतर्निहित शक्ति, उसकी चिति और उसकी पुनरुत्थान क्षमता को समझेंगे, तो आशा का आधार भी मिलेगा। हिंदू समाज को समझने के लिए उसकी बहुलता, उसकी स्मृति, उसकी ग्राम-आधारित संरचना और उसके धर्माधारित नैतिक ढाँचे को एक साथ देखना होगा। तभी विवेचना स्पष्ट होगी और निष्कर्ष भी संतुलित।

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