सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

वन्दे मातरम् : राष्ट्रीय चेतना का शाश्वत उद्गान और आधुनिक भारत की पुनर्स्थापना ॥

॥ 

“वन्दे मातरम्”—इन दो शब्दों में भारत की सांस्कृतिक आत्मा, राष्ट्र-भावना और स्वतंत्रता-संग्राम की पूरी कहानी समायी हुई है। यह केवल एक राष्ट्रीय गीत नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस अनंत परंपरा का आधुनिक पुनर्जागरण है जिसमें भूमि को माता मानकर उसकी सेवा को जीवन का परम धर्म समझा गया। आज जब 150 वर्षों बाद भारत सरकार ने “वन्दे मातरम्” को उसके पूर्ण स्वरूप में पुनः स्थापित करने के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि इस गीत का वास्तविक मर्म क्या है, इसका इतिहास क्या कहता है, और क्यों इसे भारत की राष्ट्र-चेतना का हृदय कहा जाता है।

1. प्राचीन भारत की सांस्कृतिक भूमि : 'माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:'
भारत में ‘भूमि’ केवल मिट्टी नहीं है; वह जीवन का आधार है, संस्कृति का स्रोत है और राष्ट्र-चेतना की जननी है।
अथर्ववेद में कहा गया—“माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:” अर्थात “भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।”
यह भावना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और दार्शनिक दोनों है।
भारतीय चिंतन में राष्ट्र एक देवी के रूप में प्रतिष्ठित है—दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के संयुक्त स्वरूप के रूप में।
यही कारण है कि “वन्दे मातरम्” में प्रकृति (लक्ष्मी), ज्ञान (सरस्वती) और शक्ति (दुर्गा) का संगम दिखाई देता है।
यहीं से यह गीत केवल गीत नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद का आध्यात्मिक रूप बन जाता है—एक ऐसा विचार जिसकी तुलना विश्व में किसी अन्य राष्ट्रगीत से संभव नहीं।

2. बंकिमचन्द्र और ‘वन्दे मातरम्’ का जन्म
सन् 1870 के दशक में बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय ने बंगाल में ब्रिटिश शासन के दमन, सांस्कृतिक अपमान और सामाजिक पराजय के वातावरण को देखा।
भारत को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण चाहिए—यह वे भली-भाँति समझते थे।
इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने आनंद मठ उपन्यास रचा।
यह उपन्यास सन्यासी आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित था, जिसमें भारतभक्ति, त्याग और शक्ति की प्रेरणा प्रमुख थी।
उसी उपन्यास का हृदय था—“वन्दे मातरम्”।
• “सुजलाम् सुफलाम् मलयज-शीतलाम्”—यह भारत की प्रकृति का काव्यमय चित्र है।
• “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी”—यह राष्ट्र की शक्ति-चेतना का प्रतिरूप है।
• “त्वं हि वाणी विद्यादायिनी”—यह ज्ञान और विवेक की अधिष्ठात्री सरस्वती का रूप है।
इस प्रकार यह गीत धरती, संस्कृति और शक्ति—तीनों का समग्र राष्ट्र-रूप है। यही कारण है कि यह केवल भावना नहीं, भारतीय राष्ट्रवाद का दर्शन है।

3. कांग्रेस और वन्दे मातरम् : राष्ट्रीय आंदोलन का ऊर्जा-स्रोत
बंकिम का यह गीत केवल साहित्य में नहीं रहा; वह स्वतंत्रता संघर्ष का रणघोष बन गया।

1896 : कांग्रेस अधिवेशन में पहली प्रस्तुति
कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वरबद्ध कर प्रस्तुत किया।
उस समय यह गीत सभा में उपस्थित हजारों लोगों के लिए आत्मजागरण का मंत्र बन गया।

1905 : बंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन
जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया, तब वन्दे मातरम् केवल गीत नहीं रहा—
यह
• छात्रों की रैली का नारा बना,
• महिलाओं का गीत बना,
• क्रांतिकारियों का प्रेरणा-मंत्र बना,
• और हर भारतीय के भीतर प्रतिरोध की लौ जलाने लगा।
अरविन्द घोष ने कहा- “वन्दे मातरम् इस राष्ट्र की आत्मा है।” - ब्रिटिश सरकार ने इस गीत पर प्रतिबंध लगाने की अनेक कोशिशें कीं, क्योंकि यह जनता को संगठित करता था। किन्तु जितना इसे रोका गया, उतना ही यह जन-मन में गहराता गया। ह्रदयों में धदकती ज्वाला बनकर मुखरित हुआ है।

4. धार्मिक विवाद : वास्तविकता क्या है?
20वीं सदी के प्रारम्भ में ब्रिटिश शासन और विभाजनकारी राजनीति के चलते इस गीत पर अनावश्यक विवाद खड़े किये गए।
कुछ लोगों ने कहा कि इसमें देवी-रूपक है, इसलिए इसे केवल “हिंदू गीत” कहा गया।
परन्तु वस्तुस्थिति स्पष्ट है— “वन्दे मातरम्” की देवी-कल्पना धार्मिक पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्र-रूपक है।
भारत को शक्ति, समृद्धि और ज्ञान देने वाली माता के रूप में चित्रित करना भारतीय सांस्कृतिक परंपरा है, किसी धार्मिक पुस्तक का सिद्धांत नहीं।
इसलिए कांग्रेस ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए केवल पहले दो पदों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाने की परंपरा अपनाई। किन्तु यह समझना आवश्यक है कि पूरा गीत ही एकीकृत राष्ट्र-चेतना का स्रोत है।

5. 2026 की नई गाइडलाइंस : वन्दे मातरम् का पुनर्स्थापन
10 फरवरी 2026 को गृह मंत्रालय ने जो दिशानिर्देश जारी किए, वे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण हैं।
मुख्य बिंदु—
(1) पूर्ण गीत अनिवार्य
अब सभी छह छंद वाला पूरा गीत—
• राष्ट्रपति के आगमन/प्रस्थान
• पद्म पुरस्कार
• राष्ट्रीय ध्वज-फहराव
• सभी सरकारी कार्यक्रम
• सभी स्कूलों की असेंबली
में राष्ट्रगान से पहले गाया जाएगा। इसका उद्देश्य गीत की पूर्णता को पुनः स्थापित करना है।
(2) कानूनी दंड नहीं
Prevention of Insults to National Honour Act, 1971
के अनुसार राष्ट्रगान और ध्वज के अनादर पर दंड है— परन्तु राष्ट्रगीत पर कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है। नई गाइडलाइंस भी केवल “प्रोटोकॉल” हैं, कानून नहीं। इसका उल्लंघन होने पर प्रशासनिक चेतावनी, संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई तक ही अभी सीमित रहेगी। आगे संभव है कि कठोर कानून बने।
(3) सांस्कृतिक उद्देश्य
इसका मुख्य लक्ष्य यह है कि वन्दे मातरम् केवल नारा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण काव्य और राष्ट्र-दर्शन के रूप में जनमानस में लौटे।

6. गीत की आध्यात्मिक–दार्शनिक गहराई
वन्दे मातरम् भारतीय राष्ट्रवाद को किसी राजनीतिक नीतिवाद से नहीं जोड़ता।
यह राष्ट्रीयता को प्रकृति, संस्कृति, शक्ति, ज्ञान
— इन चार स्तंभों पर स्थापित करता है।
• “सुजलाम्”—जल-समृद्धि (जीवन)
• “सुफलाम्”—अन्न-समृद्धि (सम्पदा)
• “मलयज-शीतलाम्”—वायु की पवित्रता (स्वास्थ्य)
• “दुर्गा दशप्रहरणधारिणी”—शक्ति (सुरक्षा)
• “वाणी विद्या-दायिनी”—ज्ञान (सभ्यता)
इसलिए वन्दे मातरम् एक संपूर्ण राष्ट्र-दर्शन है—
जिसमें भक्ति भी है, काव्य भी है, दर्शन भी है और राष्ट्र-सेवा का उत्साह भी।

7. दो शब्द बनाम पूरा गीत : आज का निर्णायक प्रश्न
आज “वन्दे मातरम्” को अक्सर केवल उद्घोष के रूप में समझा एवं प्रयोग जाता है। यह उचित है, पर पूर्ण नहीं। “वन्दे मातरम्” का वैभव उसके सम्पूर्ण स्वरूप में है। इन दो शब्दों से भावनाएँ जागती हैं,
किन्तु पूरा गीत आत्मा और चेतना दोनों को प्रकाशित करता है।

🌹वन्दे मातरम् भारत की आत्मा का संगीत
वन्दे मातरम् केवल इतिहास की स्मृति नहीं—
यह भविष्य की दिशा भी है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि
• राष्ट्र केवल राजनीतिक संरचना नहीं, सांस्कृतिक जीव सत्ता है।
• राष्ट्र-सेवा केवल कर्तव्य नहीं, आध्यात्मिक साधना है।
• मातृभूमि केवल भू-भाग नहीं, चेतना है।
वन्दे मातरम् भारत की आत्मा का शाश्वत संगीत है और उसका सम्पूर्ण स्वरूप ही हमारे राष्ट्र-स्वरूप की सच्ची प्रतिष्ठा है।🌹🪔🙏
- कैलाश चन्द्र

टिप्पणियाँ