सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

क्या भारतीय इतिहास सचमुच शोषक–शोषित की कहानी है?



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारतीय समाज को लेकर आज जिस तरह “शोषक और शोषित” की स्थायी कहानी सुनाई जाती है, वह मुझे हमेशा अधूरी लगती है। अधूरी इसलिए कि वह भारतीय सभ्यता को उसकी अपनी दृष्टि से नहीं देखती, बल्कि बाहर से आयी किसी वैचारिक चौखट में कस देती है। हमारा समाज रैखिक इतिहास में नहीं बना है। सनातन परंपरा में समय चक्रीय है। यहाँ सृष्टि का कोई एक आरंभिक बिंदु नहीं, बल्कि अनादि प्रवाह है। कल्प, मन्वंतर, युग ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये समय को देखने की सनातन दृष्टि हैं। जब समय ही चक्राकार है तो समाज को स्थायी दो वर्गों में बाँध देना  यह हमारी परंपरा की मूल समझ से मेल नहीं खाता।

भारतीय दर्शन की ओर देखिए। यहाँ अद्वैत है तो द्वैत भी है। विशिष्टाद्वैत है, सांख्य है, योग है, न्याय है। और चार्वाक भी है  जो वेदों को प्रमाण नहीं मानता। जिस सभ्यता में नास्तिक दर्शन को भी स्थान मिलता है, वहाँ बौद्धिक सह-अस्तित्व मूल स्वभाव है। अगर व्यवस्था इतनी कठोर और दमनकारी होती, तो यह बौद्धिक विविधता कैसे बची रहती?

अब सामाजिक स्मृति की बात करें। हमारे पुराणों और कथाओं में ब्राह्मण की छवि क्या है? सत्यनारायण कथा का आरंभ “एक निर्धन ब्राह्मण” से होता है। महाभारत में द्रोणाचार्य की आर्थिक कठिनाई का वर्णन है। भागवत में सुदामा की गरीबी का प्रसंग है। चाणक्य जिन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य जैसा सम्राट खड़ा किया लोककथा में कुटिया में रहने वाले आचार्य के रूप में मिलते हैं। यदि ब्राह्मण वर्ग सर्वव्यापी आर्थिक प्रभुत्व का प्रतीक होता, तो साहित्य में उसकी छवि अलग होती। हमारे यहाँ तो कथा-संरचना ही उसे ज्ञानजीवी, तपस्वी, या दान-आश्रित रूप में दिखाती है।

सातवीं–आठवीं सदी से बाहरी आक्रमणों का क्रम प्रारंभ हुआ। 712 में अरब आक्रमण, 11वीं–12वीं सदी में तुर्क आक्रमण, 1206 से दिल्ली सल्तनत, 1526 से मुगल सत्ता। फिर 1498 के बाद पुर्तगाली, 17वीं सदी में डच और फ्रांसीसी, 1757 के बाद ब्रिटिश प्रभुत्व। 1858 से प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन और 1947 में स्वतंत्रता। लगभग एक सहस्राब्दी तक राजनीतिक सत्ता परिवर्तन और बाहरी हस्तक्षेपों का दौर रहा। यदि आंतरिक सामाजिक संरचना ही सम्पूर्ण पतन का कारण होती, तो औपनिवेशिक आर्थिक आँकड़े इतने तीव्र गिरावट क्यों दिखाते?

अब सोचिए  जो समाज दुनिया को कपड़ा देता था, वही समाज उधार के कपड़े पहनने पर क्यों उतर आया? जो खेत अपने मालिक के थे, वे गिरवी और नीलाम कैसे होने लगे? जो कारीगर अपने हुनर से सम्मान कमाते थे, वे दिहाड़ी पर क्यों उतर आए? यह कोई छोटी बात नहीं है। यह एक सभ्यता की आर्थिक दिशा बदल जाने की कहानी है।

अठारहवीं सदी के मध्य तक भारत की आर्थिक रचना जीवित थी। गाँव उत्पादन का केंद्र था। शहर बाज़ार का। समुद्र व्यापार का। बंगाल का मलमल यूरोप में कीमती माना जाता था। बनारस की बुनाई, सूरत का व्यापार, दक्षिण भारत के व्यापारी संघ  ये सब संगठित आर्थिक ताकतें थीं। किसान अपनी जमीन पर था। बुनकर अपने करघे पर था। लुहार, कुम्हार, सुनार — सबका काम चल रहा था। 1750 के आसपास भारत दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग चौथाई हिस्सा था। यह किसी गौरवगाथा का वाक्य नहीं, आर्थिक इतिहास का आँकड़ा है।

फिर धीरे-धीरे सब कुछ बदलता है।
1757 और 1764 की लड़ाइयों के बाद 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की दीवानी मिलती है। यहीं से असली मोड़ आता है। अब वही कंपनी जो माल खरीदती थी, वही कर भी वसूलती है। पहले व्यापारी को स्थानीय शासक से सौदा करना पड़ता था। अब व्यापारी ही शासक है। उसने दाम तय किए। कर तय किए। निर्यात तय किया।

बुनकरों को अग्रिम पैसा दिया गया, लेकिन बदले में उनसे सस्ता माल लेना अनिवार्य किया गया। वे स्वतंत्र उत्पादक से अनुबंधित मजदूर बनते गए। विरोध किया तो दंड। कर नहीं दिया तो दबाव। यह धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता को तोड़ने की प्रक्रिया थी।

1793 का स्थायी बंदोबस्त आया। जमीन पर कर तय हो गया। नकद देना है। चाहे सूखा पड़े, चाहे बाढ़ आए। किसान को साहूकार से कर्ज लेना पड़ा। कर्ज बढ़ा तो जमीन गई। जमीन गई तो मालिक मजदूर बन गया। यह एक झटके में नहीं हुआ, लेकिन पीढ़ियों में हुआ।
उधर इंग्लैंड में मशीन चल रही थी। औद्योगिक क्रांति। मशीन से कपड़ा बनने लगा। भारत के कपड़े पर ब्रिटेन में कर लगा दिया गया। ब्रिटिश कपड़ा भारत में आया। मुकाबला बराबरी का नहीं था। 1800 के बाद से ही भारतीय हस्तकरघा उद्योग गिरने लगा। 1830, 1860 आते-आते कई केंद्र टूट चुके थे। जो बुनकर कभी निर्यात करते थे, वे खेतों में मजदूरी करने लगे।

आँकड़े देखिए — 1750 में लगभग 24 प्रतिशत। 1800 में लगभग 20 प्रतिशत। 1860 में 8 प्रतिशत। 1900 में लगभग 2 प्रतिशत। डेढ़ सौ साल में इतनी गिरावट यूँ ही नहीं आती। यह कर-नीति, व्यापार-नियंत्रण और संसाधन-निकास से आती है। दादाभाई नौरोजी ने उसी समय कहा था — भारत से धन बाहर जा रहा है, लौटकर नहीं आ रहा।

अकालों को भी इसी क्रम में देखिए। 1770 का बंगाल अकाल। 1876–78 का दक्षिण भारत अकाल। 1899–1900 के अकाल। वर्षा कम थी, पर कर-नीति कठोर थी। राहत सीमित थी। अनाज का निर्यात जारी था। भूख केवल खेत से नहीं, व्यवस्था से पैदा होती है।
और इसी दौर में एक और काम हुआ  समाज को कागज़ पर स्थिर खाँचों में बाँटना। 1871 से जातिगत जनगणना शुरू हुई। जो पहचान पहले लचीली थी, वह सरकारी श्रेणी बन गई। उसी समय यूरोप में वर्ग-संघर्ष का विचार चल रहा था। भारतीय समाज को भी उसी चश्मे से पढ़ा जाने लगा — एक तरफ स्थायी शोषक, दूसरी तरफ स्थायी शोषित।
पर आर्थिक गिरावट का असली चरण तो पहले ही आ चुका था।

जो समुदाय उत्पादन में मजबूत थे  किसान, बुनकर, कारीगर, व्यापारी वे औपनिवेशिक ढाँचे में कमजोर हुए। उनकी संपन्नता घटती गई। और बाद में एक बौद्धिक कथा बनी जिसने जटिल आर्थिक इतिहास को सरल सामाजिक द्वंद्व में बदल दिया।

यही असली गाँठ है।
दरिद्रीकरण पहले हुआ।
उसकी व्याख्या बाद में बनी।

हम बार-बार आर्थिक दरिद्रीकरण की बात करते हैं, पर उसके साथ यह नहीं देखते कि उसी समय हमारे इतिहास को समझने का तरीका भी बदल दिया गया था। पहले हमारी जमीनें गईं, उद्योग टूटे, व्यापार का संतुलन बिगड़ा। उसके बाद हमारी कहानी भी बदल दी गई।

जेम्स मिल की पुस्तक History of British India पहली बार 1817 में प्रकाशित हुई। यह तीन खंडों में थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि मिल कभी भारत नहीं आए थे। उन्होंने अपना अध्ययन मुख्यतः ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेखों, मिशनरी रिपोर्टों और पूर्व यूरोपीय लेखकों के आधार पर किया।

मिल ने भारतीय इतिहास को तीन भागों में विभाजित
किया हिंदू काल मुस्लिम काल ब्रिटिश काल यह विभाजन धार्मिक आधार पर था, सांस्कृतिक या आर्थिक आधार पर नहीं। उनके अनुसार “हिंदू काल” अंधविश्वास, रूढ़ि और सामाजिक जड़ता से भरा हुआ था। उन्होंने हिंदू समाज को “backward” और “rude” जैसे शब्दों से संबोधित किया। उन्होंने लिखा कि हिंदू सभ्यता नैतिक और बौद्धिक दृष्टि से यूरोप से निम्नतर है।

मिल का दृष्टिकोण उपयोगितावादी (Utilitarian) था। वह जेरेमी बेंथम के प्रभाव में थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत में सुधार लाने वाला है। इसीलिए उनकी पुस्तक में बार-बार यह तर्क आता है कि भारत को “सुधार” के लिए बाहरी शासन की आवश्यकता है।
उनकी एक प्रसिद्ध टिप्पणी है कि हिंदू सभ्यता “a people whose whole system of manners, opinions, and institutions” में सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने जाति-व्यवस्था को कठोर और प्रगति-विरोधी बताया, और इसे सामाजिक जड़ता का मुख्य कारण कहा।
यहाँ दो बातें ध्यान देने योग्य हैं:

पहली  उन्होंने भारतीय समाज को स्वयं के स्रोतों से नहीं, बल्कि औपनिवेशिक प्रशासनिक दृष्टि से देखा।दूसरी  उनका इतिहास-लेखन तटस्थ अकादमिक अध्ययन नहीं था; वह ब्रिटिश शासन को वैचारिक औचित्य प्रदान करता था। मिल की पुस्तक का प्रभाव बहुत बड़ा था। 19वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के प्रशिक्षण में यह पुस्तक पढ़ाई जाती थी। बाद में ब्रिटिश शिक्षा-प्रणाली में भी यह संदर्भ-ग्रंथ बनी। इसने भारत के बारे में यूरोप की बौद्धिक छवि को आकार दिया।

अब यह समझना ज़रूरी है कि मिल ने सीधे “शोषक–शोषित” की मार्क्सवादी भाषा का उपयोग नहीं किया, क्योंकि कार्ल मार्क्स की प्रमुख रचनाएँ 1840 के बाद आईं। पर मिल ने भारतीय समाज को स्थायी सामाजिक विभाजनों और जड़ संरचना के रूप में चित्रित किया। यह ढाँचा आगे चलकर वर्ग-संघर्ष और सामाजिक द्वंद्व की व्याख्याओं के लिए अनुकूल आधार बना।

मार्क्स ने 1853 में New York Daily Tribune में भारत पर लेख लिखे। उन्होंने ब्रिटिश शासन को “विनाशकारी” भी कहा, पर साथ ही यह भी लिखा कि वह भारत की पुरानी संरचनाओं को तोड़ रहा है। मार्क्स का दृष्टिकोण औद्योगिक यूरोप की पृष्ठभूमि से आया था। 20वीं सदी में जब वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत भारतीय समाज पर लागू किया गया, तो भारतीय इतिहास को भी स्थायी द्वंद्व की दृष्टि से पढ़ने की प्रवृत्ति मजबूत हुई।

1871 से जनगणना शुरू हुई। पहली बार जातियाँ सरकारी कागज़ पर स्थायी श्रेणियों में दर्ज की गईं। पहले पहचानें थीं, पर वे लचीली भी थीं, क्षेत्र और पेशे से जुड़ी थीं। जनगणना ने उन्हें संख्या में बदल दिया। संख्या से राजनीति पैदा होती है। पहचान अब सामाजिक नहीं रही, प्रशासनिक और राजनीतिक हो गई। यहीं से जाति एक सांख्यिकीय उपकरण बन गई।

उधर यूरोप में 1848 के बाद वर्ग-संघर्ष का विचार मजबूत हुआ। मार्क्स का ढाँचा वहाँ की औद्योगिक व्यवस्था के लिए बना था  कारखाने, मजदूर, पूँजीपति। बाद में वही भाषा यहाँ भी लागू की गई। यहाँ की सामाजिक जटिलता को उसी साँचे में डालने की कोशिश हुई। परिणाम यह हुआ कि इतिहास को पढ़ने का आसान तरीका मिल गया —एक तरफ स्थायी शोषक, दूसरी तरफ स्थायी शोषित।

यहीं मुझे समस्या दिखती है।

जब आर्थिक संरचना औपनिवेशिक नीतियों से टूट चुकी थी, तब उसकी व्याख्या सामाजिक बाइनरी में होने लगी। यह नहीं कहा गया कि व्यापार का नियंत्रण बाहर गया, कि कर-व्यवस्था बदली, कि उद्योग पर चोट हुई। यह कहा गया — समाज अंदर से ही सड़ा हुआ था।
इससे दो काम हुए। पहला  औपनिवेशिक जिम्मेदारी हल्की हुई। दूसरा  समाज स्थायी खाँचों में बँट गया।
आज जो सार्वजनिक भाषा में तीखापन दिखता है — किसी भी समुदाय के विरुद्ध सामूहिक आरोप, नारे, ऐतिहासिक अपराध की घोषणा — वह हवा में पैदा नहीं हुआ। उसकी जड़ें उसी बौद्धिक ढाँचे में हैं जहाँ इतिहास को सरल द्वंद्व में बदल दिया गया।

समकालीन परिदृश्य में इस विमर्श की तीव्रता सार्वजनिक भाषा में भी परिलक्षित होती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में ब्राह्मणों के विरुद्ध नारे लिखे और लगाए जाने की घटनाएँ सामने आई हैं। सार्वजनिक मंचों पर कुछ नेताओं द्वारा यह कहा जाता है कि ब्राह्मण विदेशी हैं, उन्हें यूरेशिया भेज देना चाहिए। मध्यप्रदेश में एक आईएएस अधिकारी का बयान सामने आया जिसमें कहा गया कि जब तक ब्राह्मण अपनी बेटी नहीं देंगे तब तक जातिवाद समाप्त नहीं होगा। भीम आर्मी से जुड़े कुछ तत्वों द्वारा ब्राह्मणों के विरुद्ध अभद्र टिप्पणियाँ की जाती रही हैं। एक ओर हम संविधान में समानता की बात करते हैं, दूसरी ओर ब्राह्मणों के विरुद्ध हिंसक भाषा और सामूहिक दंड की बातें सुनाई देती हैं, और सरकारें मौन दिखाई देती हैं।

एट्रोसिटी लिटरेचर के नाम पर जो कहानियाँ चलती हैं, उन्हें सिर्फ इसलिए सच नहीं मान लिया जा सकता कि वे बार-बार दोहराई गई हैं। कोई भी समाज अपनी स्मृति पर खड़ा होता है, और स्मृति अगर आधी हो तो समझ भी आधी रह जाती है। जिस तरह सामाजिक दावों की जाँच होनी चाहिए, उसी तरह अंग्रेजों के समय जो आर्थिक और बौद्धिक हस्तक्षेप हुए, उनका भी साफ-साफ अध्ययन होना चाहिए। उन्होंने सिर्फ राज नहीं किया; जमीन की व्यवस्था बदली, उद्योग तोड़े, शिक्षा की दिशा बदली और इतिहास को अपने ढंग से लिखा। आज अगर औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलना है तो यह काम नारों से नहीं होगा, तथ्यों से होगा।

लेकिन एक और सच है। पूरी सभ्यता को केवल अत्याचार की कहानी बना देना भी सही नहीं है। भारत का इतिहास एक रंग का नहीं है। इसमें ज्ञान है, उत्पादन है, शिल्प है, संघर्ष है, सुधार है। यहाँ गलतियाँ भी हुईं, सुधार भी हुए। अगर हम लाखों करोड़ों साल की परंपरा को सिर्फ दमन की कहानी कह देंगे तो वह संतुलन नहीं रहेगा।

असली सवाल यह है कि हम इतिहास को कैसे पढ़ना चाहते हैं। जटिल रूप में, या दो आसान खाँचों में? अगर हर बात को “शोषक” और “शोषित” के फ्रेम में ही रखेंगे तो समाज का संवाद खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर हम प्रमाण, संदर्भ और संतुलन के साथ बात करेंगे तो समझ बढ़ेगी।

इतिहास को हथियार बनाना आसान है, पर उसे समझना कठिन है। अब तय हमें करना है कि हम आसान रास्ता चुनते हैं या सही रास्ता।

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