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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
जाति सनातन वैदिक धर्म की मूल सामाजिक व्यवस्था है, कोई सामाजिक विकृति नहीं। आज समस्या जाति की नहीं है, समस्या उस दृष्टि की है, जिसके कारण हमें अपनी ही सामाजिक संरचना से भयभीत कर दिया गया है। धीरे-धीरे यह भाव बैठाया गया कि जाति का उल्लेख करना असभ्यता है, उसकी रक्षा करना पिछड़ापन है, और जब तक जाति समाप्त नहीं होगी तब तक न हिन्दू समाज एक हो सकता है, न राष्ट्र सुरक्षित रह सकता है। यह सोच अपने-आप में प्रश्नों से बचती है, क्योंकि यदि हम मूल शब्दों का अर्थ ही न समझें—राष्ट्र, राज्य, धर्म, रिलिजन और जाति—तो भ्रम स्वाभाविक है।
भारतीय राष्ट्र की आत्मा सनातन वैदिक धर्म में निहित है। भारत कोई ऐसा राष्ट्र नहीं है जो किसी तिथि को बना हो। न इसका जन्म 1947 में हुआ, न किसी संविधान सभा के प्रस्ताव से। भारत सत्ता की उपज नहीं है। यह राष्ट्र सृष्टि के साथ चला आ रहा है। वैदिक दृष्टि में जब ब्रह्म से सृष्टि का विस्तार हुआ, तभी भारत राष्ट्र की चेतना भी प्रकट हुई। और जब प्रलय के बाद सृष्टि पुनः आकार लेती है, तब यह चेतना भी पुनः व्यक्त होती है। कारण सीधा है भारत कोई शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवित चेतना है।
इसी चेतना को भारतीय परंपरा ने ‘चिति’ कहा है। चिति वह तत्व है जो किसी समाज को केवल जनसमूह नहीं रहने देता, बल्कि राष्ट्र बनाता है। यह चिति सत्ता से पैदा नहीं होती। यह समाज की स्मृति से जन्म लेती है—कुल की स्मृति, वंश की स्मृति, परंपरा और आचार की स्मृति से। भारत की इस चिति का नाम धर्म है। यहाँ धर्म किसी मत या पंथ का नाम नहीं, बल्कि वह नियम है जो लोक और संसार को धारण करता है। जब तक यह चिति जाग्रत रहती है, राष्ट्र जीवित रहता है। इसी भाव को यजुर्वेद में कहा गया—
“वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः”
अर्थात् राष्ट्र को जाग्रत रखना समाज का दायित्व है।
यहीं से राष्ट्र और राज्य का भेद स्पष्ट होता है। राज्य समय, परिस्थितियों और सत्ता की आवश्यकता से बनता है। सत्ता बदलते ही राज्य बदल जाता है। मौर्य राज्य आया और गया, गुप्त राज्य आया और गया, मुगल शासन आया और समाप्त हुआ, अंग्रेज़ी राज्य 15 अगस्त 1947 को समाप्त हो गया। पर इन सबके बीच भारत राष्ट्र बना रहा। इसका कारण यह है कि राज्य सत्ता पर आधारित होता है, जबकि राष्ट्र समाज पर आधारित होता है।
राज्य आदेश से चलता है, राष्ट्र संस्कार से।
राज्य कानून से चलता है, राष्ट्र परंपरा से।
राज्य की सीमाएँ नक्शों पर खिंचती हैं, राष्ट्र की सीमाएँ स्मृति में रहती हैं।
जब देश गुलाम हुआ, तब भारतीय राज्य नष्ट हो गया था या परायी सत्ता का आश्रित बन गया था। पर क्या उस समय भारतीय राष्ट्र नष्ट हो गया था? यदि राष्ट्र जीवित न होता, तो स्वतंत्रता का संघर्ष ही क्यों होता? फाँसी के फंदों को चूमते समय, काले पानी की यातनाएँ सहते समय जो विश्वास और आनंद भीतर जीवित रहता था, वह राज्य की देन नहीं था। वह राष्ट्र की चेतना थी।
इसी राष्ट्रबोध के कारण भारतीय परंपरा में भूमि को केवल भौगोलिक विस्तार नहीं माना गया। यह भूमि स्मृति की भूमि रही है। इसी भूमि पर समाज ने अपने आचार गढ़े, अपने संस्कार रचे, अपने पर्व बनाए, अपनी भाषा और दर्शन विकसित किए। जिस समाज का जीवन इसी भूमि से निरंतर आकार लेता रहा हो, वहाँ भूमि और समाज का संबंध उपभोक्ता और संसाधन का नहीं रह जाता। वह संबंध माता और संतान का बन जाता है।
इसीलिए इस भूमि को भारत माता कहा गया। यह कोई भावनात्मक संबोधन नहीं है। जिस भूमि ने समाज को अन्न दिया, आश्रय दिया, पीढ़ियों को पोषित किया और उन्हें दिशा दी, उसे माता कहना स्वाभाविक है। यहाँ भूमि निर्जीव नहीं मानी गई, बल्कि जीवनदायिनी मानी गई। राज्य की कोई माता नहीं होती, क्योंकि राज्य एक व्यवस्था है। व्यवस्था की पूजा नहीं होती। राष्ट्र की माता होती है, क्योंकि राष्ट्र स्मृति, संस्कृति और चेतना से बना होता है।
यहीं से एक गहरा भ्रम आरंभ होता है धर्म को रिलिजन मान लेने का। सनातन धर्म कोई रिलिजन नहीं है। रिलिजन एक ऐतिहासिक सत्ता-संरचना है, जिसका विकास पश्चिमी एशिया और यूरोप के विशेष ऐतिहासिक संदर्भ में हुआ। सामान्यतः वह एक पैगंबर, एक पवित्र ग्रंथ और “एकमात्र सत्य” की अवधारणा पर आधारित होता है। इसके विपरीत धर्म जीवन-व्यवस्था है—मनुष्य, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन का शास्त्र। धर्म आचरण है, केवल आस्था की घोषणा नहीं।
ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि जहाँ-जहाँ रिलिजन सत्ता के रूप में स्थापित हुआ, वहाँ उसने स्थानीय सभ्यताओं और स्मृतियों को नष्ट किया। चौथी शताब्दी ईस्वी के बाद, जब रोमन साम्राज्य में ईसाई रिलिजन को स्टेट रिलिजन का दर्जा मिला (313 ई. का मिलान आदेश और 380 ई. का थेस्सालोनिका आदेश), तब यूरोप की प्राचीन पैगन परंपराओं पर संगठित प्रहार शुरू हुआ। यूनान-रोम की दार्शनिक, प्रकृति-पूजक और स्थानीय धार्मिक परंपराएँ क्रमशः विधर्मी घोषित की गईं।
मध्ययुगीन यूरोप में 15वीं से 17वीं शताब्दी के बीच तथाकथित विच-हंट (डायन शिकार) हुए। आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार इस काल में लगभग 40,000 से 60,000 लोगों को विधिवत् अदालतों द्वारा मृत्युदंड दिया गया, जिनमें लगभग 75 प्रतिशत महिलाएँ थीं। इन्हें डायन, शैतान की सेवक या विधर्मी घोषित कर जलाया गया। यह कोई लोककथा नहीं, बल्कि चर्च-समर्थित न्यायिक प्रक्रिया थी।
1492 के बाद अमेरिका में जो हुआ, वह और भी व्यापक था। यूरोपीय ईसाई उपनिवेशवाद के आगमन से पहले अमेरिकी महाद्वीप की मूल जनसंख्या के विषय में इतिहासकारों में मतभेद हैं, किंतु अधिकांश आधुनिक शोध 5 से 6 करोड़ के बीच संख्या मानते हैं। सोलहवीं शताब्दी के अंत तक यह जनसंख्या 80–90 प्रतिशत तक नष्ट हो चुकी थी। इसमें बीमारियाँ (जैसे स्मॉलपॉक्स), तलवार, जबरन श्रम, और संगठित धर्मांतरण सभी कारण थे। यह प्रक्रिया “सभ्य बनाने” और “आत्मा बचाने” के नाम पर चलाई गई।
अफ्रीका में भी यही हुआ। पंद्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी के बीच ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार में लगभग 1.2 करोड़ अफ्रीकियों को जबरन अमेरिका ले जाया गया। इनमें से अनुमानतः 15–20 प्रतिशत लोग यात्रा के दौरान ही मारे गए। स्थानीय धर्म, सामाजिक संरचनाएँ और सांस्कृतिक स्मृतियाँ या तो नष्ट कर दी गईं या “असभ्य” घोषित कर दी गईं।
ऑस्ट्रेलिया में 18वीं और 19वीं शताब्दी में मूल एबोरिजिनल जनसंख्या का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ। मिशन स्कूलों के माध्यम से बच्चों को परिवारों से अलग किया गया, जिसे आज “स्टोलन जनरेशन” कहा जाता है। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—स्थानीय पहचान समाप्त कर एक नया धार्मिक-सांस्कृतिक ढाँचा स्थापित करना।
इन सभी उदाहरणों में एक समान तत्व दिखता है—रिलिजन जब सत्ता बनता है, तो वह विविधता को सहन नहीं करता। वह स्थानीय स्मृतियों को नष्ट कर अपने ढाँचे में ढालना चाहता है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना जब सनातन धर्म को रिलिजन के चश्मे से देखा जाता है, तब स्वाभाविक है कि अपनी ही परंपराएँ बोझ लगने लगती हैं। जो धर्म जीवन को संतुलित करने के लिए था, वही जब बाहरी सत्ता-संरचना में मापा जाता है, तो आत्मविस्मृति, अपराधबोध और भ्रम जन्म लेते हैं।
अंग्रेज़ जब भारत आए, तो उन्होंने जल्दी समझ लिया कि भारत को राज्य के स्तर पर जीता जा सकता है, पर राष्ट्र के स्तर पर नहीं। इसलिए उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। इसी नीति के अंतर्गत भारतीय जाति व्यवस्था को ‘Caste’ कहा गया। कास्ट यूरोप की सामंती व्यवस्था का शब्द है—जहाँ शासक और शासित के बीच कोई नैतिक दायित्व नहीं होता। भारतीय जाति इससे सर्वथा भिन्न थी। भारतीय जाति सत्ता नहीं थी, सामाजिक दायित्व थी। जाति ने समाज को बाँटा नहीं, जोड़े रखा।
ब्राह्मण का दायित्व ज्ञान और संयम था, क्षत्रिय का दायित्व रक्षा और शासन, वैश्य का दायित्व उत्पादन और पोषण, और शूद्र का दायित्व श्रम और कौशल। कोई भी जाति पूर्ण नहीं थी। सभी एक-दूसरे पर निर्भर थीं। यही संतुलन समाज को स्थिर रखता था।
उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेज़ों ने जनगणनाओं के माध्यम से इस जीवंत व्यवस्था को जड़ वर्गों में बदल दिया। 1871 की पहली औपनिवेशिक जनगणना से जातियों को स्थायी प्रशासनिक श्रेणियों में बाँधना शुरू हुआ। ‘Scheduled Caste’ और ‘Scheduled Tribe’ जैसे शब्द गढ़े गए। स्वतंत्रता के बाद भी यह ढाँचा टूटा नहीं। 1950 के संविधान में यह वर्गीकरण बना रहा। 1990 में मंडल आयोग के बाद OBC जोड़ा गया। फिर ‘सवर्ण’ शब्द चलन में आया, जिसमें तीन वर्ण गिनाए गए और शूद्र को अलग कर दिया गया। इस प्रकार चार वर्णों वाला हिन्दू समाज चार परस्पर विरोधी राजनीतिक वर्गों में बदल दिया गया।
इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में यह प्रचार किया गया कि वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित नहीं थी, केवल कर्म आधारित थी। यह कथन न शास्त्रसम्मत है, न ऐतिहासिक, न व्यवहारिक। यदि जाति कर्म आधारित होती, तो समाज कभी स्थिर नहीं रह सकता था। कर्म बदलते हैं, गुण बदलते हैं, पर समाज की निरंतरता जन्म से चलती है। इसलिए शास्त्र जन्म को निर्णायक मानते हैं और कर्म को अनुशासन का विषय।
इतिहास इसका प्रमाण देता है। ईसा से लगभग 302 वर्ष पूर्व पश्चिम एशिया के शोक सम्राट सेल्यूकस निकेटर के राजदूत मेगास्थिनिस मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की राजसभा में आए। उन्होंने भारत का विस्तृत विवरण लिखा, जिसके अंश स्ट्रैबो और डियोडोरस जैसे यूनानी लेखकों के माध्यम से उपलब्ध हैं। मेगास्थिनिस स्पष्ट लिखते हैं कि भारत में जाति के बाहर विवाह निषिद्ध था और कोई व्यक्ति अपनी जाति की वृत्ति छोड़कर दूसरी वृत्ति नहीं अपना सकता था। योद्धा कृषक नहीं बन सकता, शिल्पी दार्शनिक नहीं बन सकता। केवल दार्शनिकों को ही कुछ विशेष छूट थी, क्योंकि त्याग का जीवन अत्यंत कठोर होता है।
यह प्रमाण है कि आज से 2200–2300 वर्ष पूर्व भारत में जाति जन्माधारित थी और कर्म उसी के अनुसार निश्चित था। उस समय समाज मनु के विधान से संचालित होता था। यह कोई हिन्दू ग्रंथ नहीं, बल्कि एक विदेशी का निष्पक्ष ऐतिहासिक साक्ष्य है।
इसके विपरीत आधुनिक विमर्श यह कहता है कि वर्ण व्यवस्था तो गुण-कर्म आधारित थी। यह तर्क व्यवहार में असंभव है। महाभारत के पात्र इसे स्पष्ट करते हैं। द्रोणाचार्य और कृपाचार्य युद्ध करते थे, पर ब्राह्मण थे—क्योंकि जन्म से थे। अश्वत्थामा में न ब्राह्मणोचित गुण थे, न कर्म, फिर भी उसे ब्राह्मण होने के कारण वध नहीं दिया गया। अर्जुन युद्ध छोड़कर भिक्षा माँगने की बात करता है—यदि गुण-कर्म से जाति बदलती, तो श्रीकृष्ण उसे ब्राह्मण बनने देते। पर गीता (2.33) में स्पष्ट कहा गया कि युद्ध न करने पर अर्जुन पाप का भागी होगा, क्योंकि वह जन्म से क्षत्रिय है।
वेद, उपनिषद् और स्मृतियाँ एक स्वर में जन्मना जाति को स्वीकार करती हैं—ऋग्वेद का पुरुषसूक्त (10.90), छान्दोग्य उपनिषद् (5.10.7), मनुस्मृति, हारीत संहिता, अत्रि संहिता—सब यही कहते हैं। “गुणकर्मविभागशः” का अर्थ जाति परिवर्तन नहीं, बल्कि जन्मजात गुणों के अनुसार कर्तव्य निर्धारण है। जन्म आकस्मिक घटना नहीं है; वह पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम है।
आज जब हम जातिविहीन, वर्गविहीन समाज की बात करते हैं, तो हम अनजाने में उन्हीं मिशनरी और औपनिवेशिक एजेंडों को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने दुनिया की असंख्य सभ्यताओं को नष्ट किया। झूठ की बुनियाद पर एकता संभव नहीं होती। हिन्दू एकता अपराधबोध से नहीं, सत्य से बनेगी। जाति की रक्षा हिन्दू समाज की रक्षा है, और हिन्दू समाज की रक्षा ही राष्ट्र की रक्षा है। भविष्य में हमें कोई बचाएगा, तो वही सत्य—जिससे हम आज डर रहे हैं।
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