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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
कहानियाँ यूँ ही नहीं बनतीं। पहले उन्हें गढ़ा जाता है, फिर पढ़ाया जाता है, और अंत में उन्हें सच मान लिया जाता है। सामाजिक न्याय की राजनीति इसी प्रक्रिया का सबसे सफल उदाहरण है। आज जिस शोषक–शोषित की भाषा को हम नैतिक सत्य की तरह सुनते हैं, वह न तो सनातन समाज की स्मृति से आई है और न ही भारतीय इतिहास के स्वाभाविक अनुभव से। यह भाषा बाहर से आई है, और उसे बहुत सोच-समझकर भीतर बैठाया गया है।
इस पूरी वैचारिक प्रक्रिया की शुरुआत उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में होती है, जब 1817 में James Mill की पुस्तक History of British India प्रकाशित होती है। यह साधारण बात नहीं है कि यह पुस्तक उस व्यक्ति ने लिखी, जो कभी भारत आया ही नहीं। न उसने भारतीय समाज को देखा, न भारतीय भाषाएँ सीखीं, न वेद-पुराण पढ़े, न लोकजीवन समझा। फिर भी उसने भारत के इतिहास पर तीन खंडों में निर्णय सुना दिया।
पहले खंड में, विशेषकर आरंभिक अध्यायों में, जेम्स मिल हिंदू धर्म को तर्कहीन अंधविश्वासों का संग्रह कहता है। वह स्पष्ट रूप से लिखता है कि हिंदू धार्मिक मान्यताएँ “मोरल रैशनलिटी” से रहित हैं और इसलिए हिंदू समाज स्वभावतः प्रगति करने में अक्षम है। उसके लिए धर्म कोई आध्यात्मिक अनुभूति नहीं, बल्कि सामाजिक पिछड़ेपन का कारण है। यह बात वह Volume I के प्रारंभिक अध्यायों में बार-बार दोहराता है।
दूसरे खंड में आते-आते उसका स्वर और कठोर हो जाता है। Volume II में वह वर्ण-व्यवस्था पर चर्चा करता है और यहीं पहली बार ब्राह्मण को एक सामाजिक शत्रु के रूप में स्थापित करता है। उसके अनुसार ब्राह्मणों ने धार्मिक ग्रंथों को अपने हाथ में रखकर शेष समाज को अज्ञान में रखा, शिक्षा पर एकाधिकार किया और इसी माध्यम से शोषण किया। यह निष्कर्ष किसी भारतीय प्रमाण पर नहीं, बल्कि मिल की अपनी उपयोगितावादी सोच पर आधारित है। वह मानकर चलता है कि जहाँ आध्यात्मिकता है, वहाँ छल है; और जहाँ परंपरा है, वहाँ दमन है।
यहीं से वह बाइनरी पैदा होती है, जो आगे चलकर सामाजिक न्याय की राजनीति की रीढ़ बनती है—एक तरफ जन्मजात शोषक, दूसरी तरफ जन्मजात शोषित। मिल के लिए यह केवल सामाजिक विश्लेषण नहीं था। उसका सीधा राजनीतिक निष्कर्ष था कि यदि हिंदू समाज अपने भीतर से ही अन्यायी है, तो उस पर ब्रिटिश शासन न केवल वैध है, बल्कि नैतिक रूप से आवश्यक है। यही कारण है कि वह ब्रिटिश शासन को “सिविलाइजिंग फोर्स” के रूप में प्रस्तुत करता है।
यह पुस्तक कोई अलमारियों में बंद अकादमिक पुस्तक नहीं थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे भारत आने वाले अधिकारियों के लिए अनिवार्य पाठ बनाया। यानी जो अधिकारी भारत में शासन करने आता था, वह भारत को देखने से पहले ही यह मान चुका होता था कि हिंदू समाज मूलतः दमनकारी है। इसी दृष्टि से कानून बने, शिक्षा नीति बनी और समाज को वर्गीकृत किया गया।
इसका सबसे ठोस उदाहरण जनगणना है। 1872 की पहली औपनिवेशिक जनगणना में तथाकथित ‘अस्पृश्य’ आबादी लगभग 2.50 प्रतिशत दर्ज की जाती है। यह संख्या अपने-आप में कुछ नहीं कहती, लेकिन इसके बाद जो होता है, वही असली कहानी है। 1931 की जनगणना तक आते-आते यही प्रतिशत बढ़कर लगभग 17 प्रतिशत हो जाता है। क्या इस अवधि में समाज अचानक इतना अमानवीय हो गया? नहीं। बदली गई परिभाषाओं, नई श्रेणियों और राजनीतिक दृष्टि ने यह संख्या बढ़ाई।
स्वतंत्रता के बाद भी यह प्रक्रिया रुकी नहीं। 1990 के आसपास मंडल आयोग की राजनीति के बाद एससी-एसटी-ओबीसी को मिलाकर हिंदू समाज की लगभग 60 प्रतिशत आबादी को “शोषित-पिछड़ा” घोषित कर दिया गया। और आज, 2026 में, यह दावा खुले मंचों से किया जा रहा है कि हिंदू समाज की 85 से 90 प्रतिशत आबादी जन्मजात शोषित है और शेष अल्पसंख्यक—विशेषकर ब्राह्मण—जन्मजात शोषक हैं।
यह कोई निष्पक्ष सामाजिक अध्ययन नहीं है। यह एक लगातार विस्तारित नैरेटिव है, जिसमें “शोषित” की परिभाषा हर दशक में बढ़ती जाती है और “शोषक” की परिभाषा सिमटती जाती है। परिणाम यह होता है कि पूरा समाज स्थायी वर्ग-संघर्ष में झोंक दिया जाता है—एससी, एसटी, ओबीसी बनाम तथाकथित सवर्ण या अनारक्षित वर्ग।
इसी प्रक्रिया को वैचारिक आधार देने के लिए जो साहित्य रचा गया, उसे ही आज एट्रोसिटी लिटरेचर कहा जाता है। हजारों वर्षों तक पानी नहीं पीने देने की कहानियाँ, शिक्षा पर पूर्ण ब्राह्मण एकाधिकार के दावे—इन सबके पीछे ठोस भारतीय प्रमाण नहीं हैं। ये औपनिवेशिक कल्पनाएँ हैं, जिन्हें बाद में वामपंथी भाषा में दोबारा गढ़ा गया।
इन दावों का सबसे ठोस खंडन Dharampal ने किया। उनकी पुस्तक The Beautiful Tree यह दिखाती है कि औपनिवेशिक काल से पहले भारत में शिक्षा समाज के लगभग सभी वर्गों में फैली हुई थी। ब्रिटिश अभिलेख स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि गाँव-गाँव में पाठशालाएँ थीं और शिक्षा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं थी। फिर भी इस पुस्तक को न पाठ्यक्रमों में जगह मिली, न सामाजिक न्याय के विमर्श में।
यह भ्रम भी जानबूझकर फैलाया गया कि जाति और कास्ट एक ही चीज़ हैं। जबकि यह अंतर केवल शब्दों का नहीं, पूरी सभ्यतागत दृष्टि का अंतर है। कास्ट यूरोपीय समाज की अवधारणा है, जिसमें मनुष्य को जन्म के साथ ही एक बंद सामाजिक खाँचे में रख दिया जाता है और वही खाँचा उसका भाग्य बन जाता है। भारतीय समाज में जाति का अर्थ ऐसा कभी नहीं रहा। यहाँ जाति कोई कारागार नहीं, बल्कि कुल-वंश-परंपरा की पहचान रही है।
भारतीय भाषाओं, लोक व्यवहार और शास्त्रीय ग्रंथों में ‘जाति’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है—मनुष्य जाति, आर्य जाति, देव जाति। यह शब्द समाज को तोड़ने के लिए नहीं, समाज को पहचान देने के लिए प्रयुक्त हुआ। व्यक्ति की वास्तविक सामाजिक पहचान वर्ण, कुल, वंश और कुटुंब से बनती है। यही हिंदू समाज की मूल संरचना रही है, न कि कास्ट जैसी स्थिर और संघर्ष-प्रधान व्यवस्था।
वर्ण को केवल कर्म से जोड़कर जन्म की भूमिका को पूरी तरह नकार देना भी सत्य का आधा पक्ष है। भारतीय समाज में वर्णाश्रम व्यवस्था जन्म से प्रारंभ होती है, क्योंकि गुण और कर्म किसी शून्य से उत्पन्न नहीं होते। वे परंपरा से आते हैं, अभ्यास से आते हैं, पीढ़ियों की निरंतरता से आते हैं। जन्म के साथ व्यक्ति एक विशेष संस्कार-परिसर में प्रवेश करता है, जहाँ उसकी प्रवृत्ति, रुचि और क्षमता उसी दिशा में आकार लेती है।
भारत में बने मंदिरों, मूर्तियों, स्थापत्य और जल-संरचनाओं को देखकर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यह सब कैसे संभव हुआ। आज की आधुनिक इंजीनियरिंग और मशीनें भी कई बार उन सूक्ष्म अनुपातों, उस सौंदर्य-बोध और उस संरचनात्मक संतुलन को दोहरा नहीं पातीं। इसका उत्तर किसी एक प्रतिभाशाली व्यक्ति में नहीं है। इसका उत्तर उस कुल-वंश परंपरा में है, जिसमें एक ही कार्य सैकड़ों पीढ़ियों तक किया गया। जब कोई व्यक्ति जन्म से ही अपने कुल के औज़ारों, अनुभवों और दृष्टि के बीच पलता है, तो उसका गुण और कर्म उसी दिशा में ढलते हैं। यही कारण है कि वर्णाश्रम व्यवस्था जन्माधारित थी—पर वह जड़ नहीं थी, वह जीवंत थी।
इसी संदर्भ में जाति को वृक्ष के रूप में समझना आवश्यक है। वृक्ष की जड़ परंपरा होती है, तना स्मृति होती है और शाखाएँ समय के साथ फैलती हैं। जाति का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व था। हर कुल, हर वंश समाज की किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति करता था। इसलिए वर्णाश्रम व्यवस्था में श्रेष्ठ-हीन का भाव नहीं, कार्य-संतुलन का भाव था।
इस सामाजिक संरचना के मूल में धर्म की अवधारणा है, न कि रिलिजन की। धर्म और रिलिजन को एक मान लेना भी आधुनिक भ्रम है। रिलिजन विश्वास-केंद्रित होता है और प्रायः एकरेखीय होता है। धर्म जीवन-केंद्रित होता है। धर्म वह नियम है जो सृष्टि को धारण करता है। वह आचरण है, संतुलन है, उत्तरदायित्व है। इसलिए हिंदू समाज में प्रश्न पूछना अधर्म नहीं माना गया, बल्कि बौद्धिक परंपरा का अंग रहा।
भारतीय दृष्टि सृष्टि को त्रिगुणात्मक मानती है—सत्त्व, रज और तम। यही त्रिगुण प्रकृति में भी हैं और मनुष्य में भी। इसी कारण यहाँ एक ही प्रकार का जीवन सभी पर नहीं थोपा गया। सृष्टि को केवल भौतिक नहीं माना गया, बल्कि जीवन को आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों स्तरों पर समझा गया। मनुष्य यहाँ केवल शरीर नहीं, चेतना है।
इसी चेतना के विकास के लिए पुरुषार्थ-चतुष्टय की संकल्पना सामने आती है—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म आधार है, अर्थ साधन है, काम जीवन का रस है और मोक्ष चेतना की पराकाष्ठा। कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत इसी दृष्टि से आता है। मनुष्य को एक जन्म में सीमित नहीं किया गया, बल्कि एक सतत यात्रा के रूप में देखा गया।
इस वैचारिक भूमि पर भारतीय दर्शन विकसित हुए। नौ दर्शनों की परंपरा इस बात का प्रमाण है कि यह समाज किसी एक सत्य को अंतिम नहीं मानता। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत—और इनके साथ बौद्ध, जैन और चार्वाक। यहाँ तक कि चार्वाक जैसे भौतिकवादी दृष्टिकोण को भी ऋषि-परंपरा के भीतर स्थान मिला। यह किसी कमजोर समाज का नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी चेतना का प्रमाण है।
वेदांत की यात्रा द्वैत से विशिष्टाद्वैत तक जाती है और वहाँ रुकती नहीं। वह आगे भी चलती रहती है—भक्ति, संत परंपरा और लोकाचार में। यही कारण है कि हिंदू समाज कोई जड़ संरचना नहीं, बल्कि जीवंत चेतना है। उसकी लोक परंपराएँ, ग्राम देवता, कुल देवता, पर्व और उत्सव—सब इसी जीवंतता की अभिव्यक्ति हैं।
हिंदू समाज का स्वभाव मूलतः लोकतांत्रिक रहा है। यहाँ सत्य थोपा नहीं गया, खोजा गया। मतभेद दबाए नहीं गए, संवाद में बदले गए। संघर्ष यदि हुए भी, तो जातियों के बीच नहीं, धर्म और अधर्म के बीच हुए। इसी कारण यह समाज सहस्राब्दियों तक जीवित रहा।
आज समस्या यह है कि इस पूरी वैचारिक परंपरा को कास्ट, रिलिजन और वर्ग-संघर्ष जैसे आयातित शब्दों में समझने की कोशिश की जा रही है। जाति को कास्ट बना दिया गया, वर्ण को वर्ग-युद्ध बना दिया गया और धर्म को रिलिजन के साँचे में बंद कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि हिंदू समाज अपने ही बारे में दूसरों द्वारा गढ़ी गई परिभाषाओं में जीने लगा।
स्वतंत्र भारत में वामपंथी इतिहासकारों ने जेम्स मिल की इसी सोच को मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष की भाषा में ढाल दिया। फर्क बस इतना था कि अब अंग्रेज़ शासक की जगह “प्रगतिशील बुद्धिजीवी” खड़ा था। आज, 21वीं सदी में, इसी सोच के परिणामस्वरूप ब्राह्मण-विरोध को नैतिक वैधता दी जा रही है। वैश्विक मंचों पर ब्राह्मण समाज के प्रति घृणा फैलाई जाती है, क्योंकि ब्राह्मण—अपने शास्त्रीय, दार्शनिक और बौद्धिक उत्तराधिकार के कारण—मिशनरी, इस्लामी और वामपंथी परियोजनाओं के लिए सबसे बड़ी वैचारिक बाधा बना हुआ है।
सनातन समाज का इतिहास देखें तो स्पष्ट होता है कि संघर्ष कभी जातियों के बीच नहीं रहा। संघर्ष धर्म और अधर्म के बीच रहा है। मतभेदों का समाधान शास्त्रार्थ से हुआ है, तलवार से नहीं। ब्राह्मण और श्रमण परंपराओं के बीच सैकड़ों विषयों पर संवाद हुए। नौ दर्शन इसी परंपरा की उपज हैं। यह समाज वाद-विवाद और तत्वबोध का रहा है, न कि स्थायी वर्ग-युद्ध का।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरी कहानी को उसके मूल स्रोतों सहित पहचाना जाए। यह समझा जाए कि शोषक–शोषित की भाषा कहाँ से आई, किस उद्देश्य से आई और किसे लाभ पहुँचाती है। क्योंकि जब तक हिंदू समाज अपने अतीत को दूसरों द्वारा लिखी कहानियों के माध्यम से देखता रहेगा, तब तक वह अपने ही समाज को तोड़ने का काम करता रहेगा। वास्तविक सामाजिक न्याय विभाजन से नहीं, सत्य की पुनर्स्थापना से आएगा।
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