सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

शक्ति का भ्रष्ट बाज़ार और भारत का चरित्र-संकल्प

🪔 🌹

👉 आज के समय में मनुष्य जितनी तेज़ी से आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक शक्ति अर्जित कर रहा है, उतनी ही तीव्रता से उसका चरित्र, नैतिकता और मानवीय संवेदनाएँ क्षीण होती जा रही हैं। शक्ति जब सद्गुण से कटकर स्वार्थ के हाथों में पड़ जाती है, तो वह समाज का निर्माण नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा विनाशक बन जाती है। व्यक्ति चाहे कितना भी प्रभावशाली, धनी, शिक्षित या प्रसिद्ध हो जाए—यदि उसका सामाजिक और आर्थिक चरित्र भ्रष्ट है, तो वह समाज का सबसे बड़ा शत्रु है। क्योंकि सत्ता और सम्पत्ति का भ्रष्ट प्रयोग किसी भी राष्ट्र की नैतिक नींव को ढहा देता है।
यह संकट आज केवल भारत तक सीमित नहीं है; वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में दुनिया पहले से कहीं अधिक तीव्र गति से चारित्रिक और नैतिक पतन की ओर बढ़ रही है।

🎆 भोगवाद, उपभोगवाद, डिजिटल नशा, कृत्रिम लोकप्रियता, संसाधनों की असीमित दौड़, और शक्ति का अनियंत्रित प्रदर्शन—इन सबने मानवता को अत्यंत नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है। दुनिया के बड़े-बड़े सत्ता-समूह, प्रतिष्ठित कंपनियाँ, कॉर्पोरेट साम्राज्य और मनोरंजन उद्योग मानवीय संवेदनाओं को बचाने का ढोंग करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि अर्थ और संसाधनों की प्रचुरता ने उन्हें अमानवीय-अमानुष में बदल दिया है।

💥 फिल्मों में ब्रह्माण्ड बचाने वाले नायक, वैश्विक कल्याण के नाम पर भाषण देने वाले समूह, लोकतंत्र और मानवाधिकार की दुहाई देने वाले देश—यथार्थ में स्वयं लालच, प्रदूषण, युद्ध, शोषण, तकनीकी दासता और सांस्कृतिक विनाश के सबसे बड़े कारण बने हुए हैं। “विश्व की चिंता” का यह दिखावटी नैतिक अभिनय अब मानवता की आँखों में पर्दा डालने में सफल नहीं हो पा रहा है।

दुनिया जिस तीव्रता से मूल्यहीनता की ओर बढ़ रही है, उसे देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि नैतिकता का संकट अब एक वैश्विक महामारी है।

ऐसे समय में भारत का दायित्व केवल अपने समाज को बचाने का नहीं, बल्कि विश्व को भी एक संतुलित, चरित्रवान और मानवीय दिशा दिखाने का है। भारत की सभ्यता और दर्शन—जो सत्य, करुणा, आत्मसंयम, कर्तव्य, संतुलन और लोककल्याण पर आधारित है—आज पूरे विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकते हैं।
हम भारत के लोगों को स्वयं को भी इस पतन से बचाना है और विश्व को भी बचाना है।
क्योंकि यदि भारत चरित्र, मूल्य और मनुष्यता की अखंड ज्योति को जलाए रखेगा, तभी विश्व के लिए कोई आशा बचेगी।

यही वह समय है जब हमें आत्मावलोकन करना होगा-
क्या हमारी शक्ति हमारे चरित्र के नियंत्रण में है?
क्या हमारी शिक्षा हमें विवेकवान और जिम्मेदार बना रही है?
क्या हम अपनी व्यक्तिगत सफलता को नैतिकता से जोड़कर देखते हैं?
क्या हम राष्ट्रहित और समाजहित को अपने स्वार्थ से ऊपर रख पा रहे हैं?
यही देशभक्ति है। क्योंकि राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती; राष्ट्र की रक्षा उन लाखों निर्णयों में होती है जो हम सत्य, निष्ठा, ईमानदारी और मानवता के पक्ष में प्रतिदिन लेते हैं।

जब एक व्यक्ति अपने चरित्र की रक्षा करता है, वह वास्तव में राष्ट्र की रक्षा करता है। और जब एक समूचा समाज अपनी नैतिकता को बचाए रखता है, तब वही समाज वैश्विक अंधकार में प्रकाशस्तंभ बन जाता है।

आज का युग धर्म- यानी कर्तव्य पालन, नैतिकता और सत्य की रक्षा - यही है।
शिक्षित होने का वास्तविक मर्म भी यही है कि हम केवल ज्ञान न कमाएँ, बल्कि ज्ञान को चरित्र की ज्योति बनाकर समाज और विश्व के हित में इस्तेमाल करें।

और जब हम इस चेतना के साथ कहते हैं—
"भारत माता की जय",
तब यह नारा केवल उद्घोष - जयघोष नहीं रहता; यह एक संकल्प- प्रतिज्ञा बन जाता है। चरित्र की रक्षा करने का, भारत की रक्षा करने का, और मानवता को एक बेहतर भविष्य देने का। जिसमें "सर्वे भवन्तु सुखिन:..." - विश्व का कल्याण हो- का मूल आचरण निहित है🌹🪔🙏#पंचपरिवर्तन
-- कैलाश चन्द्र
#kailash_chandra Kailash Chandra

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