सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जब इतिहास पढ़ाया नहीं गया, गढ़ा गया



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

हिंदू समाज की मानसिकता पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ। पर आज जिस विषय पर विस्तार से लिखना आवश्यक है, वह केवल वर्तमान की कोई घटना या किसी एक सामाजिक वर्ग की समस्या नहीं है। यह उस दीर्घकालिक वैचारिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसने हिंदू समाज को अपने ही इतिहास, अपने ही धर्म और अपनी ही सामाजिक व्यवस्था के प्रति संदेह, अपराधबोध और आत्महीनता से भर दिया है। यह मानसिकता अपने आप नहीं बनी। इसे क्रमबद्ध ढंग से गढ़ा गया, पढ़ाया गया और पीढ़ी दर पीढ़ी सामान्य बुद्धि का हिस्सा बनाया गया।

जेम्स मिल ने भारत के इतिहास को तीन कालों में बाँटा—हिंदू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल। हिंदू काल को उसने अंधकारमय, क्रूर और पिछड़ा बताया। वैदिक धर्म को कर्मकांड और हिंसा से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। वर्ण-व्यवस्था को जन्म के आधार पर बनी स्थायी दमन-व्यवस्था बताया गया। ब्राह्मण को ऐसा वर्ग सिद्ध किया गया जिसने ज्ञान को हथियार बनाकर समाज पर प्रभुत्व रखा। यह सब भारतीय वेदों, उपनिषदों, रामायण या महाभारत के आधार पर नहीं था, बल्कि मिशनरी दृष्टि और यूरोपीय पूर्वाग्रहों पर आधारित था। इसी पुस्तक के आधार पर प्रशासनिक दृष्टि बनी, नीतियाँ बनीं और समाज को देखने का एक ही चश्मा तय कर दिया गया।

इसी वैचारिक धारा को शिक्षा के माध्यम से समाज में बैठाने का कार्य थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने किया। मैकाले की शिक्षा-नीति का उद्देश्य भारतीयों को उनकी जड़ों से काटना था। भारतीय भाषाएँ, वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, स्मृति-ग्रंथ—इन सबको शिक्षा से बाहर कर दिया गया और वही इतिहास पढ़ाया गया जो जेम्स मिल की दृष्टि से लिखा गया था। मैकाले का लक्ष्य ऐसा वर्ग तैयार करना था जो शरीर से भारतीय हो, पर सोच से अंग्रेज़ हो। यहीं से यह बात सामान्य बुद्धि में बैठी कि वैदिक धर्म और हिंदू समाज का अतीत गर्व करने योग्य नहीं, बल्कि शर्म करने योग्य है।

यही औपनिवेशिक दृष्टि आगे चलकर यूरोप के वैचारिक जगत में भी स्थापित हुई। कार्ल मार्क्स ने भारत को इसी चश्मे से देखा। उसने भारतीय समाज को जड़, असमान और परिवर्तन-विरोधी बताया और वर्ण-व्यवस्था को स्थायी शोषण का उपकरण मान लिया। यह कोई भारतीय आत्मालोचना नहीं थी, बल्कि जेम्स मिल और मैकाले द्वारा गढ़ी गई व्याख्या का ही विस्तार था। इस प्रकार वैदिक धर्म, ब्राह्मण और हिंदू समाज के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय वैचारिक कथा खड़ी हो गई।

इस जहरीले विमर्श को मज़बूती देने के लिए जनगणना का इस्तेमाल किया गया। 1871 की जनगणना में तथाकथित “अस्पृश्य” जनसंख्या लगभग 2.5 प्रतिशत बताई गई। 1931 तक आते-आते यह आँकड़ा 17 प्रतिशत हो गया। समाज रातों-रात नहीं बदला था, बल्कि वर्गीकरण की परिभाषाएँ बदली गई थीं। 1931 की जनगणना को आधार बनाकर आगे चलकर 1979 मंडल आयोग बना और “पिछड़े वर्ग” की श्रेणी को लगातार विस्तृत किया गया। समय के साथ यह प्रतिशत 60 के पार पहुँचा और आज, जब ओबीसी में मुस्लिम जातियों को भी शामिल किया जाता है, तो यह आँकड़ा 80–85 प्रतिशत तक बताया जाता है .

अब ज़रा सोचिए—2.5 प्रतिशत से 60–85 प्रतिशत तक की यह यात्रा कैसे हुई? यह ईसाई मिशनरियों द्वारा गढ़ा गया वही फार्मूला था, जिसे हिंदू समाज के एक वर्ग ने बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप समाज को “शोषित बनाम शोषक” की एक स्थायी बाइनरी में बाँट दिया गया। एससी, एसटी और ओबीसी को जन्म से शोषित घोषित कर दिया गया और सामान्य या अनारक्षित वर्ग को जन्म से शोषणकर्ता। 

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक आघात ब्राह्मण और सामान्य वर्ग पर पड़ा। जबकि वैदिक समाज में ब्राह्मण न राजा था, न ज़मींदार, न सैनिक। उसका कार्य ज्ञान-साधना था। उपनिषद स्पष्ट कहते हैं—“सा विद्या या विमुक्तये” जो मुक्ति का मार्ग दिखाए, वही विद्या है। ब्राह्मण अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ, संस्कार और उपचार करता था, प्रायः निःशुल्क। इसी कारण समाज के अन्य वर्णों पर यह दायित्व माना गया कि वे ज्ञान-परंपरा का संरक्षण करें। यह व्यवस्था शोषण नहीं, सामाजिक संतुलन थी। किंतु इसी को उलटकर ब्राह्मण को अत्याचारी सिद्ध कर दिया गया।
वर्ण-व्यवस्था को लेकर भी भ्रम फैलाया गया।

वर्ण-व्यवस्था को लेकर भी भ्रम फैलाया गया। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं।चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः”

वर्ण जन्म से नहीं, गुण और कर्म से है। अहिंसा के विषय में भी गीता की दृष्टि संतुलित है। दैवी गुणों में अहिंसा से पहले अभय आता है। अर्जुन से कहा गया “स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि” धर्म की रक्षा में संकोच मत करो। और यह भी “निहत्य नैनं हन्ति”अहंकार-रहित कर्तव्य-कर्म हिंसा नहीं कहलाता।

अब जाति शब्द के अर्थ को समझना आवश्यक है। वैदिक साहित्य में पहचान कुल, वंश, गोत्र, वर्ण और आश्रम से होती है। जाति शब्द वहाँ सामाजिक ऊँच-नीच के अर्थ में नहीं, बल्कि मानव-जाति, आर्य-जाति, नाग-जाति जैसे व्यापक अर्थों में आता है। रामायण में केवट और राम का संवाद इसका प्रमाण है, जहाँ केवट कहता है कि हम एक ही जाति के हैं—अर्थात आर्य। रामायण में श्रीराम को आर्यपुत्र और आर्यश्रेष्ठ कहा गया है। महाभारत में युधिष्ठिर को आर्यपुत्र कहा गया है। नाग-जाति का उल्लेख आता है और अर्जुन का विवाह नागराज की पुत्री उलूपी से होता है। यह दिखाता है कि जाति का अर्थ वहाँ सांस्कृतिक और वंशीय पहचान था, न कि सामाजिक तिरस्कार।

बौद्ध मत के प्रभाव को समझे बिना यह पूरी तस्वीर अधूरी रहती है। भारत ही नहीं, अफगानिस्तान भी कभी बौद्ध बहुल क्षेत्र था। गांधार, बामियान और काबुल क्षेत्र में विशाल बौद्ध विहार और मूर्तियाँ थीं। जब बौद्ध मत का प्रभाव शासन और समाज पर बढ़ा, तब वैदिक समाज से दूरी बनी और क्षात्र-धर्म तथा आत्मरक्षा की भावना कमजोर हुई। यही स्थिति पूर्वी भारत और बंगाल में भी दिखाई देती है। पाल काल में बौद्ध प्रभाव अत्यधिक था। वैदिक समाज से दूरी बढ़ी। जब इस्लामी आक्रमण हुए, तो कई स्थानों पर बौद्ध मतावलंबियों ने वैदिक समाज के साथ खड़े होने के बजाय तात्कालिक लाभ या प्रतिशोध की भावना में व्यवहारिक समझौते किए। पर जैसे ही इस्लामी सत्ता सुदृढ़ हुई, उसी ने बौद्ध परंपरा को भी समाप्त कर दिया। नालंदा और विक्रमशिला का विध्वंस, बामियान की मूर्तियों का नाश और अफगानिस्तान से बौद्ध परंपरा का पूर्ण लोप—यह उसी क्रम का परिणाम है। जहाँ-जहाँ बौद्ध प्रभाव अधिक था, वहाँ आगे चलकर इस्लामी प्रभाव भी अधिक बढ़ा। बंगाल और अफगानिस्तान इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।

यही वैचारिक प्रवृत्ति आधुनिक काल में नए रूप में सामने आई। प्राचीन काल के बौद्ध, वैचारिक स्तर पर आधुनिक कम्युनिस्ट जैसे दिखाई देते हैं—परंपरा से विच्छेद, राष्ट्र और धर्म के प्रति संशय, और समाज को स्थायी शोषक-शोषित वर्गों में बाँटने की प्रवृत्ति। इसी कारण जहाँ-जहाँ वामपंथी प्रभाव बढ़ा, वहाँ हिंदू समाज भीतर से टूटता चला गया।

इन वैचारिक खतरों को विनायक दामोदर सावरकर ने बहुत पहले पहचान लिया था। अपनी पुस्तक स्वर्णिम छः पृष्ठ में उन्होंने स्पष्ट किया कि अहिंसा की ऐसी व्याख्या, जो आत्म-रक्षा और राष्ट्र-रक्षा को अधर्म बताए, अंततः राष्ट्र-विघातक बन जाती है।

इस वैचारिक विष का प्रभाव केवल विचार और भाषा तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ इसने भौतिक और हिंसक रूप भी लिया। जिन ब्राह्मणों को सदियों तक समाज का मार्गदर्शक, शिक्षक और संस्कारकर्ता माना गया, उन्हें अचानक समाज का शत्रु घोषित कर दिया गया। यह परिवर्तन केवल विचारों में नहीं हुआ, यह सड़कों, गाँवों और घरों तक पहुँचा।
तमिलनाडु इसका सबसे पहला और सबसे स्पष्ट उदाहरण है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आत्मसम्मान आंदोलन और उसके बाद की राजनीति ने ब्राह्मण को केवल एक सामाजिक समूह नहीं, बल्कि शत्रु वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया। मंदिरों से ब्राह्मणों को हटाया गया, विद्यालयों और प्रशासन से उन्हें व्यवस्थित रूप से बाहर किया गया। अनेक स्थानों पर घर जलाए गए, सामाजिक बहिष्कार किया गया और भय का वातावरण बनाया गया। परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में ब्राह्मण परिवारों को तमिलनाडु छोड़कर अन्य राज्यों में पलायन करना पड़ा। यह पलायन स्वेच्छा से नहीं था, यह निरंतर दबाव और हिंसा का परिणाम था।

महाराष्ट्र में स्थिति और अधिक गंभीर रूप में सामने आई। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जिस प्रकार से चिंतपावन ब्राह्मण समाज को सामूहिक अपराधी घोषित किया गया, वह आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे बड़ी लक्षित हिंसाओं में से एक है। हत्या एक व्यक्ति ने की, लेकिन दंड पूरे समाज को दिया गया। सैकड़ों घरों को जलाया गया, लोगों को पीटा गया, कई स्थानों पर हत्याएँ हुईं। हजारों परिवारों को अपना गाँव, कस्बा और नगर छोड़ना पड़ा। यह कोई स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि वर्षों से तैयार की गई ब्राह्मण-विरोधी मानसिकता का विस्फोट था। इसे कभी भी उसी स्पष्टता से “लक्षित नरसंहार” नहीं कहा गया, जिस स्पष्टता से अन्य सामाजिक हिंसाओं को कहा जाता है।

गोवा में भी यही प्रवृत्ति अलग रूप में दिखाई देती है। पुर्तगाली शासन और ईसाई मिशनरी गतिविधियों के दौरान ब्राह्मणों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। मंदिर तोड़े गए, जबरन धर्मांतरण हुए और ब्राह्मण परिवारों को या तो पलायन करना पड़ा या अपनी पहचान छिपानी पड़ी। गोवा का सामाजिक इतिहास इस बात का प्रमाण है कि वैदिक परंपरा और ब्राह्मण उपस्थिति को समाप्त करना वहाँ के औपनिवेशिक एजेंडे का प्रमुख लक्ष्य था।

बिहार में भी ब्राह्मण और सामान्य वर्ग के विरुद्ध हिंसा का स्वरूप अलग रहा, लेकिन उतना ही गंभीर रहा। वामपंथी उग्रवाद और जातीय संघर्षों के नाम पर सामान्य वर्ग को “शोषक वर्ग” घोषित किया गया। गाँवों में ब्राह्मण परिवारों की हत्याएँ हुईं, जमीनें छीनी गईं और भय का वातावरण बनाया गया। कई क्षेत्रों में ब्राह्मण परिवारों का गाँव से पूर्णतः लोप हो गया। यह हिंसा केवल आर्थिक नहीं थी, यह वैचारिक थी—एक पूरे वर्ग को जन्म से अपराधी घोषित करने की हिंसा।

इन सभी घटनाओं की एक समान रेखा है। पहले ब्राह्मण और सामान्य वर्ग को वैचारिक रूप से शोषक सिद्ध किया गया। फिर उस विचार को सामाजिक स्वीकृति दी गई। और अंततः उसी स्वीकृति के आधार पर हिंसा को नैतिक ठहराया गया। यही कारण है कि इन घटनाओं पर कभी वैसा शोक, वैसी संवेदना या वैसी ऐतिहासिक समीक्षा नहीं हुई, जैसी अन्य सामूहिक हिंसाओं पर होती है।

विडंबना यह है कि अस्पृश्यता-विरोधी प्रयासों में अग्रणी रहे लोगों और परिवारों को भी यही दंड झेलना पड़ा। सावरकर के परिवार पर हमले, सामाजिक बहिष्कार—ये उसी मानसिकता की अभिव्यक्तियाँ थीं।

यह समूचा परिप्रेक्ष्य दिखाता है कि आज हिंदू समाज की मानसिकता किन परतों से बनी है औपनिवेशिक इतिहास-लेखन, प्रशासनिक वर्गीकरण, अतिवादी वैचारिक व्याख्याएँ और उनके सामाजिक परिणाम। जब समाज अपने ग्रंथों और परंपराओं को दूसरों की लिखी दृष्टि से देखने लगता है, तब आत्मविश्वास टूटता है और विभाजन गहरा होता है।

हिंदू समाज की मानसिकता के सामने जो चुनौतियाँ आज दिखाई देती हैं, उनका समाधान बाहर से नहीं आएगा। इसका समाधान हमें अपने ही समाज की मूल संरचना को समझकर खोजना होगा। वैदिक समाज में व्यक्ति की पहचान केवल किसी आर्थिक या राजनीतिक वर्ग से नहीं होती थी। उसकी पहचान उसके कुल, वंश और गोत्र से होती थी। इसका उद्देश्य किसी को ऊँचा या नीचा ठहराना नहीं था, बल्कि यह तय करना था कि व्यक्ति किस परंपरा से आया है और उस परंपरा की रक्षा और आगे बढ़ाने का दायित्व उसका है। रामायण और महाभारत में यह बात स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहाँ व्यक्ति का परिचय उसके कुल और वंश के साथ दिया गया है।

कुलदेवी और कुलदेवता की परंपरा भी इसी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा थी। यह परंपरा समाज को स्मृति से जोड़ती थी। यह याद दिलाती थी कि हम किसी एक समय की उपज नहीं हैं, बल्कि एक निरंतर परंपरा का हिस्सा हैं। जब तक यह स्मृति जीवित रहती है, समाज अपने आप संतुलन में रहता है। जब यह स्मृति टूटती है, तब समाज अपनी पहचान को लेकर भ्रमित होने लगता है और बाहर से आए विचारों को बिना जाँच स्वीकार करने लगता है।

आज जाति को जिस रूप में देखा जाता है, वह वैदिक समाज की मूल अवधारणा से अलग है। पहले जाति कुल और वंश से जुड़ी सामाजिक पहचान थी, जो उत्तरदायित्व और कर्तव्य से जुड़ी थी। आधुनिक काल में इसे संघर्ष और टकराव का माध्यम बना दिया गया। इसी कारण समाज अपने ही भीतर बँटता चला गया और वह बोध समाप्त होने लगा कि हिंदू समाज एक साझा सांस्कृतिक इकाई है।

जहाँ वैदिक धर्म के मूल सिद्धांत—कर्तव्य, मर्यादा, आत्मरक्षा और समाज-रक्षा कमज़ोर पड़े, वहीं से हिंदू समाज का क्षरण आरंभ हुआ। वैदिक धर्म किसी एक पूजा-पद्धति का नाम नहीं है, बल्कि वह जीवन को धारण करने वाला नियम है। यही कारण है कि धर्म को शाश्वत कहा गया है। यह नियम मनुष्य द्वारा बनाए नहीं गए हैं कि उन्हें समय-समय पर बदला जा सके।
हम समय की गति को नहीं रोक सकते और न ही सृष्टि के नियमों को बदल सकते हैं। वैदिक परंपरा यह स्पष्ट करती है कि स्वयं परब्रह्म जब मानव रूप में अवतरित होते हैं, तब भी वे सृष्टि और धर्म के नियमों के भीतर ही कार्य करते हैं। वे नियमों को तोड़ते नहीं हैं। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि धर्म किसी व्यक्ति, समाज या सत्ता से बड़ा है।

इस दृष्टि से देखा जाए तो हिंदू समाज का कर्तव्य किसी से संघर्ष करना नहीं, बल्कि धर्म के बीज की रक्षा करना है। धर्म का बीज अर्थात् ज्ञान, आचार और स्मृति। जब यह बीज सुरक्षित रहता है, तब समाज स्वयं को संभाल लेता है। जब इन नियमों को तोड़ने का प्रयास किया जाता है चाहे वह वैचारिक रूप से हो या सामाजिक रूप से—तो उसके परिणाम भी नियमबद्ध रूप से सामने आते हैं।

इसी कारण कहा गया है कि धर्म की रक्षा करने से ही धर्म हमारी रक्षा करता है। यही भाव हिंदू मानस का आधार रहा है। आज जिन झूठे विमर्शों और कृत्रिम कथाओं को वर्षों से फैलाया गया है, उनका शोधन किसी तात्कालिक प्रतिक्रिया से नहीं होगा। उसका समाधान केवल बौद्धिक पुरुषार्थ से होगा अध्ययन से, स्मृति की पुनर्स्थापना से और अपनी परंपरा को आत्मविश्वास के साथ समझने से। इसी वैचारिक संघर्ष में हम जिस रूप में भी योगदान दे सकते हैं, वही हमारा वास्तविक कर्तव्य है।

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