सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

प्रेम से उत्पाद तक: रिश्तों के बाज़ारीकरण की अनकही प्रक्रिया



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 


आज जब परिवार टूटने की चर्चा होती है, तो अक्सर इसे पीढ़ियों के अंतर, आधुनिक सोच या समय के बदलाव का परिणाम मान लिया जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। परिवार यूँ ही नहीं बिखरते। उन्हें धीरे-धीरे कमजोर किया जाता है इतनी चुपचाप कि टूटन दिखाई भी नहीं देती। यह कोई एक दिन में होने वाली घटना नहीं है और न ही किसी एक फैसले का नतीजा। यह एक लंबी प्रक्रिया है, जिसे वर्षों तक धैर्य के साथ आगे बढ़ाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के पीछे वही ताक़तें काम कर रही हैं, जिन्हें आज ग्लोबल मार्केट फोर्सेज कहा जाता है। यही हमारे समय के असली दानव हैं जो शोर मचाकर नहीं, बल्कि चुपचाप समाज की जड़ों को खोखला करते हैं।

ये दानव किसी पुराने किस्से के राक्षसों जैसे नहीं होते। न इनके हाथ में हथियार दिखते हैं, न ये लड़ाई का एलान करते हैं। ये बड़ी सहजता से आते हैं सुविधा देते हुए, विकल्प दिखाते हुए, मुस्कराते हुए। कहते हैं कि आप स्वतंत्र हैं, जो चाहें कर सकते हैं। लेकिन इसी स्वतंत्रता के नाम पर मनुष्य को धीरे-धीरे परिवार से, समाज से और अंततः अपने ही भीतर से काट दिया जाता है। जब आदमी अकेला पड़ जाता है, तब वह बाज़ार के लिए सबसे आसान और सबसे स्थायी ग्राहक बन जाता है।
फरवरी का महीना आते ही वेलेंटाइन डे और वेलेंटाइन वीक की चर्चा हर ओर होने लगती है। आज यह इतना आम हो चुका है कि हम भूल जाते हैं कि तीन से चार दशक पहले तक भारत में इसका कोई सामाजिक अस्तित्व नहीं था। प्रेम तब भी था, रिश्ते तब भी थे, विवाह तब भी होते थे। फर्क बस इतना था कि प्रेम को निजी माना जाता था मर्यादा और जिम्मेदारी के साथ। उसे खुले बाज़ार में सजाकर बेचने की परंपरा नहीं थी।
आज हालात बदल गए हैं। अगर दुनिया की आबादी लगभग आठ अरब मानी जाए और मान लें कि इनमें से तीन अरब युवा भी इस संस्कृति से किसी न किसी रूप में जुड़ जाते हैं, तो समझा जा सकता है कि कितना बड़ा बाज़ार खड़ा होता है। गिफ्ट बिकते हैं, चॉकलेट बिकती है, फूल बिकते हैं, होटल और रेस्तराँ चलते हैं, डेटिंग ऐप, ओटीटी कंटेंट और गर्भनिरोधक गोलियाँ सब कुछ बिकती है। प्रेम धीरे-धीरे भावना से निकलकर एक उत्पाद बन जाता है। और जहाँ उत्पाद होता है, वहाँ मुनाफ़ा अपने आप जुड़ जाता है।

इसके बाद रिश्तों को देखने का नज़रिया बदला जाता है। स्थायी संबंध उबाऊ बताए जाते हैं, विवाह को बंधन और जिम्मेदारी को बोझ कहा जाता है। उसकी जगह कैज़ुअल सेक्स और बिना प्रतिबद्धता वाले रिश्तों को सामान्य बना दिया जाता है। यह बदलाव किसी विचारधारा की जीत नहीं, बल्कि बाज़ार की ज़रूरत है। स्थिर परिवार कम खर्च करता है, लेकिन अस्थायी रिश्ते हर पड़ाव पर खर्च करवाते हैं—रिश्ता बनने से पहले भी और टूटने के बाद भी।

यहीं से लिव-इन रिलेशनशिप को आधुनिक जीवन का प्रतीक बना दिया जाता है। इसे व्यक्तिगत पसंद का प्रश्न बताया जाता है, लेकिन इसके सामाजिक प्रभावों पर कम ही चर्चा होती है। भारत के महानगरों में पिछले एक दशक में साथ रहने वाले अविवाहित जोड़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। अदालतों और पुलिस रिकॉर्ड में लिव-इन से जुड़े विवाद, घरेलू हिंसा, भरण-पोषण और अलगाव के मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है। जब रिश्ते कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी से बाहर रखे जाते हैं, तो उनमें अस्थिरता बढ़ती है। भरोसा कमजोर होता है, अलगाव आम होता है और अकेलापन एक स्थायी स्थिति बनता चला जाता है।

इसी अकेलेपन से जुड़ा हुआ एक नया बाज़ार खड़ा होता है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े ऐप्स और काउंसलिंग सेवाओं का बाज़ार पिछले कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ा है। रिपोर्टें बताती हैं कि कोविड के बाद शहरी भारत में काउंसलिंग और थेरेपी से जुड़ी सेवाओं की माँग में तेज़ उछाल आया है, जिसमें रिश्तों से जुड़ी समस्याएँ एक बड़ा कारण हैं। यानी जिस जीवन-शैली को स्वतंत्रता के नाम पर बढ़ावा दिया गया, उसके दुष्परिणामों का समाधान भी बाज़ार ही बेच रहा है।

परिवार टूटने की यह प्रक्रिया यहीं नहीं रुकती। जब विवाह देर से होते हैं या बार-बार टूटते हैं, तो संतान-उत्पत्ति भी प्रभावित होती है। इसका सीधा असर आईवीएफ और टेस्ट-ट्यूब बेबी उद्योग में दिखाई देता है। वैश्विक स्तर पर यह उद्योग आज 30 से 35 अरब डॉलर के आसपास पहुँच चुका है और भारत को इसका तेज़ी से बढ़ता बाज़ार माना जा रहा है। बड़े शहरों में फर्टिलिटी क्लीनिकों की बढ़ती संख्या और इलाज कराने वालों की लंबी प्रतीक्षा-सूचियाँ इस बदलाव को साफ़ दिखाती हैं। परिवार कमजोर होता है, तो तकनीक उसकी जगह लेने आती है—और यह भी एक मुनाफ़े का क्षेत्र बन जाता है।
इसी तरह पहचान और जेंडर से जुड़ी बहसों को देखिए। यहाँ किसी व्यक्ति की निजी पीड़ा या अनुभव को नकारना उद्देश्य नहीं है। लेकिन यह तथ्य है कि हार्मोन थेरेपी, सर्जरी और काउंसलिंग से जुड़ा बाज़ार वैश्विक स्तर पर तेज़ी से बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार जेंडर-ट्रांज़िशन से जुड़ी मेडिकल सेवाओं का बाज़ार आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। पहचान जितनी जटिल और अस्थिर होती जाती है, व्यक्ति उतना ही लंबे समय तक इन सेवाओं पर निर्भर रहता है।

अब सवाल यह है कि यह सब समाज में इतनी आसानी से स्वीकार कैसे हो जाता है। सरकारें सीधे यह नहीं कह सकतीं कि परिवार की अवधारणा बदल दी जाए, क्योंकि समाज स्वाभाविक रूप से इसका विरोध करता है। यहीं से ग्लोबल मार्केट फोर्सेज का काम शुरू होता है। पहले वामपंथी एनजीओ रिपोर्टें लाते हैं, फिर मीडिया उन्हें बहस का विषय बनाता है। इसके बाद वही सोच फ़िल्मों और वेब-सीरीज़ में दिखाई देने लगती है। वहाँ परिवार बोझ दिखता है, विवाह अप्रासंगिक लगता है और अकेला, अस्थिर व्यक्ति ही आधुनिक जीवन का प्रतीक बनता है। जब यही दृश्य बार-बार सामने आता है, तो धीरे-धीरे वही बात समाज में सामान्य मान ली जाती है।

यह प्रश्न अब टालने योग्य नहीं है कि परिवार व्यवस्था को प्रभावित करने वाले प्रमुख बदलाव किन माध्यमों से आए। स्वतंत्रता के बाद जब लंबे समय तक कांग्रेस की सरकारें सत्ता में रहीं, तब हिंदू समाज की पारिवारिक संरचना में हस्तक्षेप सीधे कानून बनाकर किया गया। हिंदू मैरिज एक्ट, 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण कानून इन सभी ने विवाह को संस्कार की जगह एक कानूनी अनुबंध के रूप में स्थापित किया। तलाक की प्रक्रिया सरल हुई, संयुक्त परिवार की अवधारणा कमजोर पड़ी और पारिवारिक विवादों का समाधान समाज से हटकर अदालतों के अधीन चला गया। इसी कालखंड में यह तथ्य भी सामने आया कि मुस्लिम समाज के लिए पर्सनल लॉ को यथावत रखा गया, जबकि हिंदू परिवार व्यवस्था पर राज्य का हस्तक्षेप लगातार बढ़ता गया। यह असमानता आज भी विद्यमान है।

जब वही वैचारिक शक्तियाँ सत्ता में नहीं रहीं, तब परिवार से जुड़े वही परिवर्तन न्यायिक निर्णयों के माध्यम से आगे बढ़ते दिखाई दिए। सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों ने सामाजिक व्यवहार को सीधे प्रभावित किया। व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करना, समलैंगिक संबंधों को दंडमुक्त करना, लिव-इन रिलेशनशिप को वैधानिक संरक्षण देना, और विवाह की पारंपरिक परिभाषा से जुड़े प्रश्नों पर दिए गए निर्णय—इन सभी का संयुक्त प्रभाव परिवार की नैतिक और सामाजिक सीमाओं को शिथिल करना रहा है। अदालतें यह निर्णय “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” और “गोपनीयता” के आधार पर देती रहीं, लेकिन उनके सामाजिक परिणामों पर व्यापक बहस नहीं हुई।

यह भी तथ्य है कि हाल के समय में रोमियो–जूलियट क्लॉज को लेकर सरकारों से कानून बनाने की अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के आधार पर व्यक्त की है। यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह द्वारा दायर की गई, जिसमें यह तर्क रखा गया कि सहमति से बने किशोर संबंधों को आपराधिक मामलों से अलग देखने के लिए स्पष्ट वैधानिक ढांचा होना चाहिए। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से यह विचार करने को कहा कि क्या इस विषय में अलग से कानून या स्पष्ट प्रावधान बनाए जाने चाहिए। यह घटनाक्रम इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि जब ऐसे विषयों पर सरकारें सीधे पहल नहीं करतीं, तब वही मुद्दे न्यायालय के माध्यम से विधायी दिशा की ओर ले जाए जाते हैं, और उनका प्रभाव केवल कानून तक सीमित न रहकर समाज, नैतिकता और परिवार व्यवस्था तक पहुँचता है।

इससे एक साफ़ पैटर्न उभरता है। जब वैचारिक रूप से अनुकूल सरकारें सत्ता में होती हैं, तब परिवर्तन कानून बनाकर किए जाते हैं। जब वैसी सरकारें सत्ता में नहीं होतीं, तब वही एजेंडा सुप्रीम कोर्ट, आयोगों, प्रशासनिक दिशानिर्देशों और एनजीओ-प्रेरित याचिकाओं के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है। इन सभी प्रक्रियाओं का अंतिम प्रभाव एक ही दिशा में जाता है—परिवार कमजोर होता है, रिश्ते अस्थिर होते हैं और व्यक्ति धीरे-धीरे बाज़ार पर निर्भर उपभोक्ता बनता है। यही वह बिंदु है, जहाँ स्पष्ट होता है कि यह केवल न्यायिक या विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि ग्लोबल मार्केट फोर्सेज के हित में काम करने वाला व्यापक तंत्र है।

इसलिए बात किसी एक दिन, किसी एक चलन या किसी एक फैसले तक सीमित नहीं है। असल सवाल उस पूरी दिशा का है, जिसमें कानून, अदालतें, एनजीओ, मीडिया और वैचारिक समूह एक साथ चलते दिखाई देते हैं। इस दिशा में परिवार धीरे-धीरे कमजोर होता है, रिश्ते ढीले पड़ते हैं और व्यक्ति अकेला होता चला जाता है। यही अकेलापन बाज़ार के लिए सबसे मुफ़ीद स्थिति है, क्योंकि अकेला आदमी ज़्यादा ख़रीदता है, ज़्यादा निर्भर होता है और कम सवाल करता है। इसी कारण आज ग्लोबल मार्केट फोर्सेज हमारे समय के सबसे खतरनाक दानव बन चुके हैं—वे बाहर से हमला नहीं करते, भीतर से समाज को खोखला करते हैं। अगर इस प्रक्रिया को अभी नहीं समझा गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह नहीं पूछेंगी कि परिवार क्यों टूटे, बल्कि यह पूछेंगी कि जब सब कुछ हमारी आँखों के सामने हो रहा था, तब हमने चुप रहना क्यों चुना।

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