सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जाति, संख्या और सत्ता की राजनीति के बीच फँसा सनातन समाज


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

आज का समय केवल असंतोष का नहीं, बल्कि गहरे मानसिक भ्रम का समय है। चारों ओर एक ही स्वर सुनाई देता है—अब नहीं तो कभी नहीं। इस्लाम का खतरा बहुत बड़ा बताया जा रहा है, ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों पर चिंता जताई जा रही है, परिवार टूटते दिख रहे हैं, और जातियों के नाम पर समाज के भीतर वैमनस्य और अविश्वास लगातार बढ़ता जा रहा है। इन सबको एक साथ सुनकर ऐसा लगता है मानो भारत कुछ ही वर्षों में किसी आंतरिक टकराव या गृहयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा हो।
यह डर केवल भावनात्मक नहीं है। भारत ऐसा समय पहले भी देख चुका है। आज से लगभग अस्सी वर्ष पहले, 1947 में, देश का विभाजन किसी एक दिन की हिंसा का परिणाम नहीं था। 1937 से 1946 के बीच मजहबी आधार पर संगठित भीड़ को बार-बार राजनीतिक रियायतें दी गईं। हर बार कहा गया कि अब शांति स्थापित हो जाएगी, लेकिन हर समझौते के बाद माँगें और बढ़ती गईं। अंततः मजहबी भीड़ निर्णायक बनी और देश विभाजित हो गया। इतिहास का यह अनुभव बताता है कि लोकतंत्र में जब विवेक के स्थान पर भीड़-तंत्र नीति का आधार बन जाता है, तब उसका परिणाम समाज को ही भुगतना पड़ता है।
आज वही प्रक्रिया एक नए रूप में हमारे सामने है। फर्क केवल इतना है कि तब विभाजन का आधार मजहब था और आज हिंदू समाज के भीतर ही जाति और वर्ग को आमने-सामने खड़ा किया जा रहा है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सवर्ण—इनके बीच एक स्थायी बाइनरी बना दी गई है। यह विभाजन स्वाभाविक नहीं है, बल्कि वैचारिक और राजनीतिक रूप से गढ़ा गया है।
यहाँ एक बुनियादी अंतर को समझना आवश्यक है। एससी-एसटी आरक्षण, जो संविधान लागू होने के बाद 1950 के आसपास शुरू हुआ, उसका किसी ने सैद्धांतिक विरोध नहीं किया। उसका आधार मानवीय था। जो समुदाय ऐतिहासिक कारणों से शिक्षा, संसाधन और सामाजिक अवसरों से वंचित रह गए थे, उन्हें मुख्यधारा में लाने का वह प्रयास था। हिंदू समाज ने इसे अपने ही समाज के दुर्बल अंगों को सशक्त करने का कार्य माना और स्वीकार किया।
लेकिन 1990 के बाद मंडल आयोग की रिपोर्ट के साथ जो विमर्श खड़ा हुआ, उसकी प्रकृति बिल्कुल अलग थी। इस रिपोर्ट ने हिंदू समाज की बहुसंख्यक आबादी को ही “पिछड़ा” और “शोषित” घोषित कर दिया। ओबीसी की श्रेणी में ऐसी अनेक जातियाँ शामिल कर दी गईं जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत संपन्न थीं। कई जातियाँ स्वयं को क्षत्रिय परंपरा से जोड़ती हैं, कई वैश्य परंपरा से—फिर भी उन्हें एक साथ पिछड़ा घोषित कर दिया गया। यह सामाजिक यथार्थ का ईमानदार अध्ययन नहीं था, बल्कि हिंदू समाज के भीतर स्थायी वर्ग-संघर्ष खड़ा करने वाली वैचारिक संरचना थी।
इसका परिणाम धीरे-धीरे सामने आया। समाज को यह सिखाया गया कि वह अपने ही भीतर शोषक और शोषित में बँटा हुआ है। हिंदू समाज लगातार आपस में उलझा रहे, अपनी सामूहिक चेतना विकसित न कर सके—यही इस पूरी प्रक्रिया का मूल उद्देश्य रहा है। यही स्थिति ईसाई मिशनरियों के लिए सबसे अनुकूल होती है। जब समाज अपने अतीत को अपराध और अपनी परंपरा को अन्याय मानने लगे, तब मतांतरण किसी दबाव से नहीं, बल्कि मानसिक तैयारी से होता है।
इसी सोच को समय-समय पर कानून और नीति के माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश हुई। औपनिवेशिक काल में 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के ज़रिये कुछ समुदायों को जन्म से अपराधी घोषित किया गया था। स्वतंत्र भारत ने उस सोच को अमानवीय मानकर त्याग दिया, क्योंकि यह स्वीकार किया गया कि अपराध कर्म से होता है, जन्म से नहीं। इसके बावजूद वही मानसिकता अलग-अलग रूपों में लौटती रही। 2011–12 में प्रस्तावित संप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक के समय भी यह आशंका सामने आई कि कानून की भाषा में हिंदुओं को सामूहिक रूप से जन्मजात दंगाई बनाया जा सकता है।
अब 2026 में वही दृष्टि शिक्षा तंत्र के माध्यम से सामने आई। 13 जनवरी 2026 को जारी यूजीसी गाइडलाइंस में सामाजिक न्याय की भाषा के भीतर एक खतरनाक संकेत छिपा था। इन दिशानिर्देशों के माध्यम से अनारक्षित या सामान्य वर्ग को संरचनात्मक रूप से जन्मजात शोषक और अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह कोई राजनीतिक मंच से दिया गया बयान नहीं था, बल्कि विश्वविद्यालयों, शोध और पाठ्यक्रमों के माध्यम से सोच गढ़ने का प्रयास था। इसी कारण 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन गाइडलाइंस पर रोक लगा दी।
लेकिन यह मान लेना कि अदालत की रोक के साथ ही मामला समाप्त हो गया, एक गंभीर भूल होगी। इस प्रकरण की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को निर्धारित है। भारत का राजनीतिक इतिहास बताता है कि सरकारें दबाव में न्यायालय के निर्णयों को भी पलटती रही हैं। 1985 में शाह बानो प्रकरण में राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कानून बनाकर बदल दिया था। 2018 में एससी-एसटी एक्ट से जुड़े निर्णय को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने संशोधन के माध्यम से पलटा। इसलिए यह संघर्ष केवल कानूनी नहीं है; यह वैचारिक संघर्ष है, और ऐसा संघर्ष लंबा चलता है।

यह भी एक सच है कि आज जिन विषयों पर सबसे अधिक शोर है, उन पर सबसे कम ईमानदार चर्चा हो रही है। जातिगत जनगणना, आरक्षण और सामाजिक न्याय की बातें तो हर ओर सुनाई देती हैं, लेकिन इनके साथ जुड़ी एक सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया—परिसीमन—पर लगभग जानबूझकर चुप्पी है। जबकि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति और समाज को सबसे गहराई से प्रभावित करने वाला कारक यही होगा।
परिसीमन कोई सरकार का मूड या चुनावी घोषणा नहीं है। यह संविधान की बाध्यकारी प्रक्रिया है। संविधान का अनुच्छेद 81 साफ़ कहता है कि लोकसभा में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में होगा। अनुच्छेद 82 यह व्यवस्था करता है कि हर जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम के माध्यम से सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा। यही व्यवस्था राज्य विधानसभाओं के लिए अनुच्छेद 170 में भी है। यानी संसद और विधानसभाओं में किसकी कितनी आवाज़ होगी, यह संविधान मूलतः संख्या से जोड़ता है।
लेकिन संविधान निर्माताओं को यह भी समझ में था कि यदि हर जनगणना के बाद तुरंत परिसीमन किया गया, तो जिन राज्यों और समाजों ने जनसंख्या नियंत्रण में जिम्मेदारी दिखाई है, उन्हें राजनीतिक रूप से दंड मिलेगा। इसी कारण 1976 में 42वें संविधान संशोधन के द्वारा परिसीमन को पहले 2001 तक टाल दिया गया और फिर 2001 में 84वें संशोधन के माध्यम से इसे 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया गया। इसका सीधा अर्थ यह है कि 2026 के बाद परिसीमन से बचने का कोई संवैधानिक रास्ता नहीं बचेगा।
आज की स्थिति यह है कि लोकसभा की 543 सीटें अब भी 1971 की जनसंख्या के आधार पर तय हैं। उस समय देश की जनसंख्या लगभग 55 करोड़ थी। आज यह संख्या 140 करोड़ के पार है। स्वाभाविक है कि प्रतिनिधित्व का अनुपात पूरी तरह बिगड़ चुका है। इसी कारण विशेषज्ञों और संसदीय आकलनों में यह कहा जा रहा है कि परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें 750 से 800 तक पहुँच सकती हैं। विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में सीटें बढ़ेंगी।
यह प्रक्रिया संसद सीधे नहीं करती। इसके लिए एक परिसीमन आयोग बनता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारी होते हैं। आयोग जनगणना के आँकड़ों के आधार पर तय करता है कि किस क्षेत्र से कितने प्रतिनिधि होंगे। एक बार आयोग ने निर्णय कर दिया, तो न संसद उसे बदल सकती है और न अदालत। यानी यह प्रक्रिया अंतिम होती है।
अब यहीं पर असली सवाल खड़ा होता है। जब 2027 की जनगणना में जातिगत आँकड़े भी उपलब्ध होंगे—जैसा कि 30 अप्रैल 2025 को केंद्र सरकार के निर्णय से स्पष्ट हो चुका है—तो परिसीमन केवल क्षेत्रीय नहीं रहेगा, बल्कि उसे जाति और वर्ग से जोड़ दिया जाएगा। तब कहा जाएगा कि यदि देश की आबादी में कुछ वर्ग 60–65 प्रतिशत या उससे अधिक हैं, तो संसद और विधानसभाओं में उनकी हिस्सेदारी भी उतनी ही होनी चाहिए।
आज लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं। जातिगत आँकड़े सामने आते ही यह तर्क आएगा कि यह संख्या बहुत कम है। इसके बाद आरक्षित सीटों को 400–500 तक बढ़ाने की माँग उठेगी। साथ ही यह भी कहा जाएगा कि अन्य पिछड़ा वर्ग को अलग राजनीतिक आरक्षण मिलना चाहिए। यह माँग नई नहीं है। समाजवादी और अंबेडकरवादी राजनीति बहुत पहले से संख्या के आधार पर आरक्षण की बात करती रही है।
यहीं से निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँग भी जोर पकड़ेगी। तर्क होगा कि जब संसद, सरकार और सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, तो निजी उद्योग और व्यापार इससे बाहर कैसे रह सकते हैं। इसके बाद बहस केवल नौकरियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संपत्ति तक पहुँचेगी।
यह कोई कल्पना नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान स्वयं राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंचों से यह कहा कि देश की संपत्ति का पुनर्वितरण किया जाना चाहिए और इसके लिए जातिगत आँकड़े आवश्यक हैं। यानी जातिगत जनगणना को केवल प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि वेल्थ डिस्ट्रीब्यूशन का आधार बनाने की मंशा खुलकर सामने आ चुकी है।
इस पूरे क्रम को यदि एक साथ देखा जाए—जातिगत जनगणना, परिसीमन, आरक्षण का विस्तार, निजी क्षेत्र में आरक्षण और संपत्ति का पुनर्वितरण—तो साफ़ दिखाई देता है कि यह किसी एक कानून या एक चुनाव की बात नहीं है। यह एक लंबी वैचारिक परियोजना है। इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि समाज को स्थायी रूप से संख्या के खाँचों में बाँट दिया जाए। कुछ वर्ग हमेशा बहुमत में रहें, कुछ हमेशा अपराध-बोध और असुरक्षा में।
यहीं पर सनातन समाज की मूल दृष्टि इस पूरे विमर्श से टकराती है। सनातन परंपरा में समाज संख्या से नहीं, संतुलन से चलता है। यहाँ अधिकार से पहले कर्तव्य आता है। यहाँ समाज को जोड़ने की चिंता होती है, न कि स्थायी रूप से बाँटने की। जब केवल संख्या को ही सत्य बना दिया जाता है, तब समाज भीतर से टूटने लगता है—और इतिहास गवाह है कि टूटे हुए समाज बाहरी शक्तियों के लिए सबसे आसान लक्ष्य बनते हैं।

वैचारिक दृष्टि से देखें तो यह संकट केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत है। यदि हिंदू समाज आपस में ही संघर्ष करेगा, तो बाहरी शक्तियों के लिए अपने लक्ष्य साधना अत्यंत सरल हो जाएगा। जातिगत वर्ग-संघर्ष का सबसे अधिक लाभ ईसाई मिशनरियों को होता है। ठीक उसी प्रकार, जैसे परिवार के टूटने से वैश्विक बाजार शक्तियाँ सशक्त होती हैं, वैसे ही समाज के विघटन से धर्मांतरण की प्रक्रिया सरल हो जाती है।
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। कोई समुदाय जो परंपरागत रूप से धर्मनिष्ठ था, उसे केवल एक संवैधानिक पहचान में सीमित कर दिया गया। उसके लिए एक प्रतीक गढ़ दिया गया और एक ग्रंथ को उसकी समूची वैचारिक चेतना का आधार बना दिया गया। परिणाम यह हुआ कि जब उस समुदाय का व्यक्ति अपने अतीत पर शोध करता है, तो उसे सनातन परंपरा से विमुख करने वाला साहित्य मिलता है। वह स्वाभाविक रूप से बौद्ध परंपरा की ओर भी नहीं जाता, क्योंकि उसे यह बताया ही नहीं जाता कि बौद्ध चिंतन स्वयं सनातन परंपरा की ही एक धारा है। अंततः वह व्यक्ति ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में चला जाता है। यह प्रक्रिया अचानक नहीं होती, बल्कि वैचारिक रिक्तता के माध्यम से घटित होती है।
यदि इस पूरे संकट को अब्राहमिक, रैखिक दृष्टि से देखा जाए, तो भविष्य अंधकारमय प्रतीत होता है। परंतु सनातन-वैदिक परंपरा की चक्रीय दृष्टि हमें यह सिखाती है कि कोई भी संकट स्थायी नहीं होता। सृष्टि में उत्थान और पतन का क्रम चलता रहता है। समस्या यह है कि हम भविष्य की आशंकाओं पर बहुत चर्चा करते हैं, पर वर्तमान में क्या हो रहा है—जो भविष्य का निर्माण करेगा—उस पर गंभीर विचार नहीं करते।
हम राजनीति, लोकतंत्र और चुनावों को ही सब कुछ मान लेते हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं। किंतु यह सभ्यता केवल सत्ता के सहारे जीवित नहीं रही। इसने चौदह देवासुर संग्राम देखे हैं, हजार वर्षों के इस्लामी आक्रमण झेले हैं, औपनिवेशिक आक्रमण सहन किए हैं—फिर भी यह समाज हिमालय की तरह अडिग खड़ा है। इसका कारण कोई राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि वह आंतरिक शक्ति है जो धर्म में निहित है। विविधता इस समाज की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी संरचना है। जिस दिन हम इस सत्य को स्वीकार कर लेंगे, समाधान का मार्ग स्वयं स्पष्ट हो जाएगा।
वामपंथी विचारधारा व्यवहार में इसलिए विफल हुई, क्योंकि उसका जन्म समाज के बीच नहीं, बल्कि बंद कमरों में हुआ। उसने समाज के आचार, व्यवहार और उसकी आंतरिक शक्ति को समझे बिना समाधान खोजने का प्रयास किया। हिंदू समाज कोई कृत्रिम संरचना नहीं, बल्कि सृष्टि-सहज व्यवस्था है। समाज, धर्म और राष्ट्र की रक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि पुरुषार्थ से होती है।
आज का संकट वैचारिक है, इसलिए उसका समाधान भी वैचारिक और बौद्धिक पुरुषार्थ से ही निकलेगा। ठंडे मन से मंथन किया जाए, तो प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। धर्म कोई संकीर्ण पहचान नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो समस्त ब्रह्मांड को धारण करती है। हम क्या लिखते हैं, क्या बोलते हैं—यह सब पहले भी कहा जा चुका है। इससे बड़े संकट आए हैं और उनका समाधान निकला है।
सृष्टि का पालन परब्रह्म परमात्मा नारायण करते हैं। हमारा कर्तव्य केवल इतना है कि हम धर्म-बीज की रक्षा करें। निष्काम भाव से पुरुषार्थ करते हुए धर्म-रक्षा के कार्य में लगे रहें। धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा—यह कोई भावुक वाक्य नहीं, बल्कि सभ्यता का अनुभवसिद्ध सत्य है।
हमें अपने कर्तव्यों, दायित्वों और स्वधर्म के प्रति स्पष्ट होना होगा। अपनी वर्ण-परंपरा, कुल, जाति और वंश के प्रति गौरव-बोध कोई अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का आधार है। क्रम स्पष्ट है—पहले स्वयं को सशक्त करना, फिर परिवार को, फिर कुटुंब और समाज को। शुरुआत अपने घर से करनी होगी। जो अपने घर की रक्षा नहीं कर सकता, वह केवल भाषणों से राष्ट्र और धर्म की रक्षा नहीं कर पाएगा।
इतिहास बताता है कि जब दिल्ली दूर थी, तब पंचायतें जीवित थीं—वही हमारा वास्तविक शासन था। आज हम सरकारों पर अत्यधिक निर्भर हो चुके हैं, उन्हें माता-पिता मान बैठे हैं। इस स्थिति में न धर्म सुरक्षित रह सकता है, न राष्ट्र। हमें मूल की ओर लौटना होगा—कुटुंब, परिवार और समाज की उस व्यवस्था की ओर, जो हमारी वास्तविक सुरक्षा-कवच रही है। जब यह सुरक्षा-कवच पुनः सुदृढ़ होगा, तभी वर्तमान संकट से उबरना संभव होगा और भारत पुनः अपने वैभव की ओर अग्रसर हो सकेगा।

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