सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भारत की सामाजिक संरचना और जन्मजात अपराधबोध की वैचारिक राजनीति


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

यूजीसी के हालिया विवाद के संदर्भ में आपने अनेक वक्तव्यों को सुना होगा, राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणियाँ पढ़ी-सुनी होंगी। मैंने स्वयं भी इस विषय पर निरंतर लिखा है। यह तथ्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी द्वारा जारी विनियमों पर रोक लगाई है और इस प्रकरण की अगली सुनवाई 19 मार्च को निर्धारित है। किंतु इस समूचे विषय पर चर्चा करते समय एक बड़ी विडंबना यह रही है कि अधिकांश लोग मूल प्रश्न को समझने में असफल रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि विनियम रुके या लागू हुए, बल्कि यह है कि ऐसा विचार भारत में आया कहाँ से।
सबसे गंभीर और विचारणीय तथ्य यह है कि जिस विचारधारा का आधार हिंदुत्व है, जो हिंदू एकता, सामाजिक समरसता, जातिविहीन समाज, तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता की बात करती रही है, स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली उसी भाजपा सरकार ने ऐसा कदम कैसे उठा लिया, जिसके अंतर्गत समाज के एक बड़े वर्ग—अनारक्षित वर्ग—को जन्मजात शोषक के रूप में और एससी, एसटी, ओबीसी समाज को जन्म से ही शोषित, वंचित, पीड़ित और पिछड़ा घोषित करने की वैचारिक भूमि तैयार की गई। इस प्रक्रिया में अनारक्षित वर्ग, अर्थात् सवर्ण समाज, को सामूहिक रूप से अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
यह प्रयास कोई नया नहीं है। वर्ष 2011 में सांप्रदायिक लक्षित विधेयक के माध्यम से इसी प्रकार की सोच को कानून का रूप देने का प्रयास किया गया था, जिसमें यह मान लिया गया था कि किसी भी साम्प्रदायिक हिंसा की स्थिति में अपराधी अनिवार्य रूप से हिंदू ही होगा। उस समय भाजपा सहित अनेक सामाजिक और वैचारिक संगठनों ने इस विधेयक का तीव्र विरोध किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह कानून बन नहीं सका। किंतु आज वही विचार, जिनका तब विरोध किया गया था, भिन्न शब्दावली और नए आवरण के साथ पुनः लागू किए जा रहे हैं। यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए हमें इसकी गहरी वैचारिक पृष्ठभूमि को गंभीरता से समझना होगा।



हमारी सबसे बड़ी भूल यही रही है कि जिस सामाजिक संरचना ने सहस्राब्दियों तक हिंदू समाज को स्थिर, संगठित और आत्मनिर्भर बनाए रखा, उसी को हमने स्वयं अपनी सबसे बड़ी ‘फॉल्ट लाइन’ के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। जाति और वर्ण व्यवस्था को आज जिस तरह केवल शोषण और विखंडन के चश्मे से देखा जा रहा है, वह न तो शास्त्रसम्मत है और न ही ऐतिहासिक सत्य के अनुरूप। वस्तुतः यह व्यवस्था हिंदू समाज के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती रही है, जिसने सामाजिक दायित्व, उत्तराधिकार और ज्ञान–कौशल की निरंतरता को बनाए रखा।
भगवान श्रीकृष्ण जब भगवद्गीता में चातुर्वर्ण्य की बात करते हैं, तो वे उसे केवल कर्म की अस्थायी व्यवस्था नहीं बताते, बल्कि गुण और कर्म—दोनों के संयुक्त आधार पर स्थापित बताते हैं—
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
(भगवद्गीता 4.13)
यहाँ “गुण” का अर्थ स्पष्ट रूप से जन्मजात स्वभाव से है—सत्त्व, रज और तम। कर्म उन गुणों की सामाजिक अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में वर्ण कभी भी केवल पेशा बदल लेने से परिवर्तित नहीं माना गया। यह भ्रम आधुनिक काल में जानबूझकर फैलाया गया कि वर्ण व्यवस्था कर्म से कभी भी बदलने वाली थी।
महाभारत इस विषय पर और अधिक स्पष्ट है। युद्ध से पहले अर्जुन का जो भय है, वह केवल हिंसा का नहीं, बल्कि वर्णसंकर का है—
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
(महाभारत/भगवद्गीता 1.42)
यह श्लोक तभी अर्थपूर्ण है, जब वर्ण व्यवस्था जन्म के साथ जुड़ी हो। यदि वर्ण केवल कर्म के आधार पर स्वतंत्र रूप से बदला जा सकता, तो “वर्णसंकर” जैसा कोई संकट ही उत्पन्न नहीं होता। अर्जुन स्पष्ट रूप से कहता है कि वर्णसंकर से कुल, परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार नष्ट हो जाता है। यह वंशानुगत सामाजिक निरंतरता का स्पष्ट संकेत है।
महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि वर्ण और आश्रम व्यवस्था समाज को अनुशासन, उत्तरदायित्व और संतुलन प्रदान करती है। भीष्म स्पष्ट कहते हैं कि यदि व्यक्ति अपने जन्मगत वर्ण के कर्तव्यों को छोड़ देता है, तो समाज अव्यवस्थित हो जाता है। यह कथन केवल नैतिक नहीं, बल्कि सामाजिक विज्ञान का कथन है।
इसी तथ्य को विष्णु पुराण और भी स्पष्ट रूप से स्थापित करता है। विष्णु पुराण में वर्णों की उत्पत्ति और उनकी वंशानुगत निरंतरता का उल्लेख है, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों को भगवान विष्णु के विराट पुरुष के अंग माना गया है। यह व्यवस्था कर्म से नहीं, जन्म और वंश परंपरा से चलने वाली सामाजिक रचना के रूप में वर्णित है, जिसमें प्रत्येक वर्ण का कार्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक स्थान निश्चित है।
अब इसका तार्किक और वैज्ञानिक पक्ष समझना भी आवश्यक है। किसी भी सभ्यता में ज्ञान, कौशल और सामाजिक दायित्व एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं। आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि अनुवांशिक प्रवृत्तियाँ (genetic tendencies), पारिवारिक वातावरण और दीर्घकालिक प्रशिक्षण व्यक्ति के स्वभाव और दक्षता को गहराई से प्रभावित करते हैं। वर्ण व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आधारित थी—जहाँ ज्ञान, शिल्प, शासन, व्यापार और सेवा जैसी भूमिकाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित होती थीं। यह व्यवस्था सामाजिक स्थिरता और दक्षता सुनिश्चित करती थी।
यही कारण है कि वर्ण व्यवस्था के रहते भारत न केवल सांस्कृतिक रूप से, बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी समृद्ध रहा। यदि यह व्यवस्था केवल कर्म आधारित और पूर्णतः परिवर्तनीय होती, तो न तो ज्ञान परंपराएँ टिक पातीं, न शिल्प परंपराएँ, और न ही सामाजिक संतुलन।
आज विडंबना यह है कि हम उसी व्यवस्था को दोष दे रहे हैं, जिसने समाज को जोड़े रखा, जबकि आधुनिक प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्थाएँ—जो स्वयं को अधिक न्यायपूर्ण बताती हैं—समाज को और अधिक विखंडित कर रही हैं। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि वर्ण व्यवस्था में दोष थे या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या उसके स्थान पर लाई गई कोई व्यवस्था उससे अधिक स्थिर, समरस और वैज्ञानिक सिद्ध हुई है?
यहीं से आगे का विमर्श स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है।


इसी सामाजिक संरचना के रहते भारत ने हजारों वर्षों तक इस्लामिक आक्रमणों और ईसाई मिशनरी दबावों को झेला, फिर भी हिंदू समाज न केवल जीवित रहा, बल्कि आज भी विश्व का तीसरा सबसे बड़ा समाज है। यदि वर्ण व्यवस्था सामाजिक विघटन का कारण होती, तो यह सभ्यता कब की समाप्त हो चुकी होती।
यहीं से एक और बुनियादी भ्रम सामने आता है। इस्लाम और ईसाईयत को ‘धर्म’ कहकर हिंदू धर्म के समकक्ष रख देना स्वयं एक वैचारिक विकृति है। हिंदू परंपरा में धर्म केवल उपासना-पद्धति नहीं है। धर्म वह शाश्वत नियम है जो लोक, जगत और सृष्टि के कॉस्मिक ऑर्डर—ऋत—को धारण करता है। ऋग्वेद कहता है—
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।
(ऋग्वेद 10.190.1)
सूर्य, चंद्र, आकाशगंगा, पृथ्वी, पंचतत्त्व, त्रिगुणात्मक सृष्टि, आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—जो कुछ भी शाश्वत है, वही धर्म का स्वरूप है। जब धर्म को केवल रिलिजन या मजहब मान लिया जाता है, तभी विकृति उत्पन्न होती है और धर्म तथा मजहब के बीच की स्पष्ट रेखा धुंधली हो जाती है।
हिंदू परंपरा सृष्टि को अनादि और चक्रीय मानती है, आत्मा को ब्रह्म का अंश मानती है और पुनर्जन्म व कर्म सिद्धांत में विश्वास करती है। नौ दर्शनों की परंपरा—आस्तिक और नास्तिक, ब्राह्मण और श्रमण, तंत्र और लोक—सबको समाहित करती है। इसके विपरीत अब्राहमिक मजहब एकरेखीय जीवन-दृष्टि पर आधारित हैं—एक जीवन, एक सत्य, एक मार्ग—और जो इसे नहीं मानता, वह काफिर या पगन घोषित कर दिया जाता है।
इसी एकरेखीय और उपभोग-केंद्रित दृष्टि के कारण प्रकृति उनके लिए संतुलन की सत्ता नहीं, बल्कि उपभोग की वस्तु बन जाती है। यही कारण है कि आज पर्यावरण असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग और संसाधनों की अंधाधुंध लूट पूरी दुनिया के सामने है। आज लगभग 72 देश किसी न किसी रूप में युद्ध या हिंसा से जूझ रहे हैं, फिर भी संसाधनों की लालसा समाप्त नहीं हुई है। अब वही दृष्टि पृथ्वी से आगे अन्य ग्रहों तक पहुँचकर वहाँ भी संसाधनों के दोहन की योजनाएँ बना रही है।
विडंबना यह है कि इसी संकटग्रस्त वैचारिकी के सामने हम अपनी ही सामाजिक संरचना—वर्ण व्यवस्था—को अपराधबोध के साथ खड़ा कर रहे हैं, जबकि वही व्यवस्था सदियों तक संतुलन, उत्तरदायित्व और सभ्यतागत निरंतरता का आधार रही है।


हम उस अपराधबोध—उस गिल्ट—में इतने गहरे फँस चुके हैं कि दूसरों द्वारा गढ़ी गई झूठी ऐतिहासिक कथाओं को ही हमने अपना सत्य मान लिया। यह अपराधबोध अचानक उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि इसे योजनाबद्ध ढंग से निर्मित किया गया। औपनिवेशिक काल में जेम्स मिल ने 1817 में History of British India लिखी—जबकि वह अपने पूरे जीवन में कभी भारत आया तक नहीं। इस पुस्तक में हिंदू समाज को अवैज्ञानिक, जड़, और नैतिक रूप से पतित दिखाया गया तथा ब्राह्मणों को जन्मजात शोषक सिद्ध किया गया। दुर्भाग्य यह रहा कि स्वतंत्र भारत में भी उसी औपनिवेशिक दृष्टि को हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने “आधुनिक इतिहासबोध” का रूप देकर आगे बढ़ाया।
इसी लेखन परंपरा से तथाकथित एट्रोसिटी नैरेटिव गढ़ा गया, जिसे धीरे-धीरे शैक्षणिक पाठ्यक्रमों, शोध संस्थानों और नीति-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल किया गया। परिणामस्वरूप सरकारें वर्णविहीन और जातिविहीन समाज की अव्यावहारिक कल्पनाओं में जीने लगीं, जबकि वास्तविक समाज न तो कभी वर्णविहीन रहा है और न ही हो सकता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता में स्पष्ट कहते हैं—
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
(भगवद्गीता 4.13)
अर्थात वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर सृजित है, किंतु यह व्यवस्था पीढ़ीगत निरंतरता से चलती है। आज भी समाज चार वर्गों में ही विभाजित है—अंतर केवल इतना है कि हमने वर्ण के स्थान पर “क्लास” शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया है। वास्तविकता यह है कि आधुनिक क्लास व्यवस्था में सबसे अधिक शोषण तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में ही होता है।
यहाँ एक मूल प्रश्न लगातार टाल दिया जाता है—जो लोग वर्ण व्यवस्था को सामाजिक विखंडन का कारण बताते हैं और ‘ब्राह्मणवाद’ समाप्त करने की बात करते हैं, क्या उन्होंने कभी वर्ण व्यवस्था से बेहतर कोई वैकल्पिक सामाजिक संरचना प्रस्तुत की है? अब तक उत्तर केवल नारे रहे हैं, कोई टिकाऊ मॉडल नहीं।
इतिहास इसके विपरीत ठोस तथ्य प्रस्तुत करता है। प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार, सन् 1700 में भारत विश्व अर्थव्यवस्था में लगभग 23–24 प्रतिशत का योगदान देता था। उस समय न संविधान था, न आरक्षण व्यवस्था, न एससी-एसटी एक्ट। समाज वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत संचालित था। ब्रिटिश शासन के अंत, अर्थात 1947 तक, भारत की वैश्विक हिस्सेदारी घटकर लगभग 1.5 प्रतिशत रह गई और औद्योगिक उत्पादन 4–5 प्रतिशत तक सिमट गया। यह गिरावट वर्ण व्यवस्था के रहते नहीं, बल्कि उसके विध्वंस और औपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचे के थोपे जाने के बाद हुई।
प्रश्न यह है कि यदि वर्ण व्यवस्था ही शोषण का मूल कारण थी, तो उसी व्यवस्था के अंतर्गत भारत आर्थिक, सांस्कृतिक और तकनीकी दृष्टि से विश्व में अग्रणी कैसे रहा? और यदि वर्ण व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया, तो स्वतंत्रता के बाद भी भारत दरिद्रता, असमानता और सामाजिक तनाव से क्यों जूझता रहा?
1947 के बाद भारत ने पहले सोवियत संघ से प्रेरित लोकतांत्रिक समाजवाद को अपनाया—पाँच वर्षीय योजनाएँ, राज्य-नियंत्रित उद्योग और केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था लागू की गई। इसके बाद 1991 से उदारीकरण के नाम पर एडम स्मिथ के सिद्धांतों से प्रेरित पूंजीवादी नीतियाँ अपनाई गईं। इन दोनों वैचारिक प्रयोगों के बावजूद जातिवाद समाप्त क्यों नहीं हुआ?
आज स्थिति यह है कि संविधान के अंतर्गत आरक्षण लागू है, एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) लागू है, और केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा एससी-एसटी-ओबीसी वर्गों के लिए 200 से अधिक कल्याणकारी योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। इसके बावजूद यही वर्ग लगातार “पीड़ित” और “वंचित” क्यों घोषित किए जाते हैं? क्या यह नीति-निर्माण की विफलता नहीं है?
इतिहास बताता है कि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व वे सभी जातियाँ—जिन्हें आज एससी, एसटी और ओबीसी कहा जाता है—अपने-अपने कौशल, शिल्प, कृषि और व्यापार के माध्यम से आत्मनिर्भर थीं। इसके विपरीत, जिन ब्राह्मणों को आज सर्वाधिक संपन्न और शोषक बताया जाता है, वे तब भी साधारण जीवन जीते थे और आज भी बड़ी संख्या में आर्थिक रूप से कमजोर हैं। फिर स्थायी शोषक-शोषित का यह नैरेटिव आखिर आया कहाँ से?
पिछले लगभग 300 वर्षों में पश्चिमी, अब्राहमिक व्यवस्थाएँ स्वयं शोषण समाप्त नहीं कर पाईं। आज भी विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार 70 से अधिक देश किसी न किसी रूप में युद्ध, गृहयुद्ध या हिंसक संघर्ष से ग्रस्त हैं। इसके बावजूद वर्ष 2026 में भारत में यूजीसी जैसे विनियम लाकर सवर्ण समाज को जन्मजात शोषक सिद्ध करने का प्रयास क्यों होता है, जबकि देश मनुस्मृति से नहीं, संविधान से संचालित होता है? यदि संविधान ही सर्वोच्च है, तो यह अपराधबोध किस आधार पर थोपा जा रहा है?
वर्ण व्यवस्था के भीतर अधिकार और कर्तव्य परस्पर जुड़े हुए थे। हर व्यक्ति को उसकी सामाजिक भूमिका के अनुरूप आजीविका और सम्मान प्राप्त था। व्यापक बेरोजगारी जैसी समस्या समाज में नहीं थी। आज, जब हमने वर्ण व्यवस्था को त्यागकर केवल प्रशासनिक क्लास सिस्टम अपनाया है, तब बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अपराध चरम पर हैं। पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की मर्यादाएँ टूट रही हैं और उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में सही-गलत का विवेक समाप्त होता जा रहा है।


यह भी एक कटु सत्य है कि जिन विचारधाराओं के नैरेटिव में आज हमें अपराधबोध में जीने को बाध्य किया जा रहा है, उनके अपने इतिहास रक्त, हिंसा और नरसंहार से भरे पड़े हैं। क्रिश्चियनिटी, इस्लाम और वामपंथ—तीनों ने संगठित वैचारिक सत्ता के रूप में करोड़ों मनुष्यों की हत्या की है, और यह सब किसी व्यक्तिगत विकृति से नहीं, बल्कि ईश्वर, ख़ुदा या समानता के नाम पर राज्य-प्रायोजित नीतियों के तहत किया गया।
क्रिश्चियनिटी के इतिहास में सबसे पहले क्रूसेड्स (1095–1291) आते हैं। इतिहासकारों के अनुसार इन युद्धों में 2 से 4 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। यरूशलम पर 1099 में हुए पहले क्रूसेड के समय मुस्लिमों और यहूदियों का ऐसा संहार हुआ कि समकालीन ईसाई इतिहासकारों ने स्वयं लिखा—“घोड़ों के घुटने तक खून बह रहा था।” यह कोई धार्मिक रक्षा नहीं, बल्कि पवित्रता के नाम पर नरसंहार था।
इसके बाद स्पेनिश इनक्विज़िशन (1478–1834) में ईसाई सत्ता ने यहूदियों, मुसलमानों और तथाकथित विधर्मियों को यातना शिविरों में झोंका। विभिन्न ऐतिहासिक आकलनों के अनुसार 3 से 5 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रूप से मार डाला गया, जबकि लाखों को यातनाएँ दी गईं, संपत्ति छीनी गई और निर्वासन झेलना पड़ा।
क्रिश्चियनिटी के नाम पर ही यूरोप में डायन-हत्या (Witch Hunts, 1450–1750) हुई, जिसमें 60,000 से 1,00,000 महिलाओं को जीवित जलाया गया। इनमें अधिकांश निर्धन, विधवा या समाज से अलग महिलाएँ थीं—यह नारी उत्पीड़न का सबसे संगठित धार्मिक रूप था।
औपनिवेशिक काल में, ईसाई मिशनरी साम्राज्यवाद के साथ मिलकर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के मूल निवासियों का लगभग सफाया कर दिया गया। केवल अमेरिका में यूरोपीय आगमन के बाद 5 से 10 करोड़ मूल निवासियों की मृत्यु हुई—कभी तलवार से, कभी बीमारी से, और कभी जबरन श्रम से। ऑस्ट्रेलिया में एबोरिजिनल जनसंख्या का 80–90% समाप्त कर दिया गया। यह सब “सभ्यता” और “ईश्वर” के नाम पर हुआ।
इस्लामिक इतिहास में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। 7वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक इस्लामी आक्रमणों में—केवल भारतीय उपमहाद्वीप में—इतिहासकार के.एस. लाल जैसे विद्वान 6 से 8 करोड़ हिंदुओं की हत्या का अनुमान देते हैं। मंदिरों का विध्वंस, जबरन धर्मांतरण, जज़िया कर और गुलामी—ये सब इस्लामी राज्य-नीति का हिस्सा थे।
मध्य एशिया, ईरान और अरब क्षेत्रों में इस्लामी विस्तार के दौरान प्राचीन सभ्यताओं का पूर्ण विनाश हुआ। बग़दाद में 1258 में हुई तबाही में लाखों लोग मारे गए और सभ्यता की रीढ़—पुस्तकालय, विश्वविद्यालय, ज्ञान परंपरा—नष्ट कर दी गई। अफ्रीका में इस्लामी दास व्यापार में 1.5 से 2 करोड़ लोगों को गुलाम बनाया गया, जिनमें बड़ी संख्या में स्त्रियाँ और बच्चे थे।
वामपंथ—जो स्वयं को मानवता और समानता का सबसे बड़ा रक्षक बताता है—उसका इतिहास भी रक्तरंजित है। सोवियत संघ (1917–1991) में लेनिन और स्टालिन के शासन में 2 से 3 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई—गुलाग शिविरों, कृत्रिम अकालों और राजनीतिक हत्याओं के कारण।
चीन में माओ त्से तुंग की नीतियों—ग्रेट लीप फॉरवर्ड और कल्चरल रेवोल्यूशन—में 4 से 7 करोड़ लोग मारे गए। कंबोडिया में पोल पॉट के शासन में केवल चार वर्षों (1975–79) में 20–25 लाख लोगों की हत्या हुई—जो देश की कुल जनसंख्या का लगभग एक-तिहाई था।
इन सबके बावजूद आश्चर्य यह है कि इन विचारधाराओं को कभी “जन्मजात हिंसक” नहीं कहा गया, कभी उनके अनुयायियों पर सामूहिक अपराधबोध नहीं थोपा गया। इसके विपरीत, हिंदू समाज—जिसका इतिहास मूलतः आत्मरक्षा, संतुलन और सह-अस्तित्व का रहा है—उसे ही बार-बार कटघरे में खड़ा किया जाता है।
यही वैचारिक असंतुलन आज यूजीसी जैसे विनियमों में दिखाई देता है, जहाँ संविधान से चलने वाले देश में भी एक वर्ग को जन्मजात शोषक सिद्ध करने का प्रयास होता है। प्रश्न यह नहीं है कि इतिहास में हिंसा हुई या नहीं—प्रश्न यह है कि हिंसा किसे विचारधारा बनाकर की गई, और किसे बिना प्रमाण अपराधी बना दिया गया।

हम जिस परंपरा से आते हैं, वह केवल “शांति” की बातें करने वाली परंपरा नहीं रही है। वह सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने की परंपरा रही है। हमारे यहाँ धर्म का अर्थ कभी भी केवल पूजा-पाठ या नैतिक उपदेश नहीं रहा। धर्म का अर्थ रहा—व्यवस्था, मर्यादा और आवश्यकता पड़ने पर अधर्म से टकराने की शक्ति। इसी भाव से ऋषियों ने “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” कहा था, जिसका आशय दुनिया को उपदेश देना नहीं, बल्कि धर्मसम्मत व्यवस्था की स्थापना करना था।
इसी कारण भारतीय इतिहास में रघु से लेकर युधिष्ठिर तक, और युधिष्ठिर से लेकर पुष्यमित्र शुंग और विक्रमादित्य तक, शासन और शस्त्र अलग-अलग नहीं रहे। महाभारत का युद्ध इस बात का प्रमाण है कि जब अधर्म सत्ता बन जाए, तब युद्ध ही धर्म बन जाता है। युधिष्ठिर जैसे धर्मराज को भी शस्त्र उठाना पड़ा। इसके बाद शुंग काल में पुष्यमित्र शुंग ने यवन आक्रमणों को रोका और अश्वमेध यज्ञ कर यह स्पष्ट किया कि भारत की सत्ता वैदिक परंपरा से विमुख नहीं होगी। आगे चलकर विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर उत्तर भारत में सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिरता स्थापित की। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि हमारे यहाँ युद्ध कभी लूट या विस्तार के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था और धर्म की रक्षा के लिए हुआ।
आज हम इस ऐतिहासिक सत्य को भूलकर यह मानने लगे हैं कि संघर्ष अपने-आप में गलत है। इसी सोच का असर तब दिखता है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी यह कहते हैं कि “दुनिया ने युद्ध दिए, हमने बुद्ध दिए” या “भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया।” यह कथन प्रेरक हो सकता है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से अधूरा है। भारत ने अनावश्यक युद्ध नहीं किए, यह सही है; लेकिन धर्म और आत्मरक्षा के लिए युद्ध से कभी पीछे भी नहीं हटा।
अगर ऐसा होता, तो 1947 में कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण का जवाब क्यों दिया जाता? 1965 और 1971 में युद्ध क्यों होते? 1971 में भारत ने केवल रक्षा नहीं की, बल्कि बांग्लादेश का निर्माण कराया। यदि आतंकवाद केवल संवाद से रुकता, तो 2016 में उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक क्यों करनी पड़ती? 2019 में पुलवामा के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक क्यों होती? और मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत को पाकिस्तान के भीतर जाकर कार्रवाई क्यों करनी पड़ी?
ये सभी घटनाएँ एक ही बात कहती हैं—दुनिया केवल उपदेशों से नहीं चलती। शांति की रक्षा के लिए भी शक्ति चाहिए। असुरत्व, आतंकवाद और दानवी प्रवृत्तियाँ नैतिक भाषणों से समाप्त नहीं होतीं। उनका अंत तभी होता है, जब उनके विरुद्ध दृढ़ और निर्णायक कार्रवाई की जाती है।
यही हमारी परंपरा रही है—न युद्ध का उत्सव, न कायरता का गुणगान। आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष, और संघर्ष के बाद पुनः संतुलन। इस सत्य को भूलना ही आज हमारे वैचारिक भ्रम की सबसे बड़ी वजह बन गया है।


अब सवाल यह है कि यूजीसी के इस पूरे विवाद का इन बातों से क्या संबंध है। इसे केवल एक शैक्षणिक या प्रशासनिक निर्णय मान लेना वास्तविकता से आँख चुराना होगा। सच यह है कि यूजीसी के 13 जनवरी 2026 को जारी किए गए विनियम किसी शून्य में पैदा नहीं हुए हैं। इनके पीछे एक लम्बी वैचारिक यात्रा है, जिसकी जड़ें भारत में नहीं, बल्कि पश्चिमी दुनिया में हैं।
बीसवीं सदी की शुरुआत तक यूरोप और अमेरिका अपने ही इतिहास के बोझ से दबे हुए थे। ईसाईयत के नाम पर हुई जबरन धर्मान्तरण की घटनाएँ, अफ्रीका और अमेरिका में दास प्रथा, उपनिवेशवाद, और नस्लीय भेदभाव—इन सबका नैतिक दबाव पश्चिमी समाज के भीतर अपराधबोध के रूप में जमा हो चुका था। इसी अपराधबोध से निकलने के प्रयास में साम्यवाद जैसी विचारधारा को नैतिक औचित्य मिला, जिसने कहा कि समाज को समझने का एकमात्र तरीका शोषक और शोषित की स्थायी श्रेणियाँ बनाना है।
यही सोच आगे चलकर 1930 के दशक में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों—मैक्स हॉर्कहाइमर, थियोडोर अडोर्नो जैसे नामों—के माध्यम से “क्रिटिकल थ्योरी” के रूप में सामने आई। इस थ्योरी का मूल उद्देश्य था परंपरा को संदेह के घेरे में खड़ा करना—परिवार, धर्म, शिक्षा और संस्कृति को सत्ता और वर्चस्व के औज़ार के रूप में प्रस्तुत करना।
1960 और 1970 के दशक में यही विचार अमेरिका पहुँचा और वहाँ “क्रिटिकल रेस थ्योरी” के रूप में स्थापित हुआ। अमेरिका में नस्लीय तनाव पहले से मौजूद था, इसलिए इस थ्योरी ने समाज को साफ़-साफ़ दो वर्गों में बाँट दिया—श्वेत जन्म से शोषक और अश्वेत जन्म से शोषित। यह केवल अकादमिक बहस नहीं रही। स्कूलों के पाठ्यक्रम, मीडिया, फ़िल्में, विश्वविद्यालय और बाद में सोशल मीडिया—हर जगह यही नैरेटिव दोहराया गया।
यहीं से “व्हाइट सुप्रीमेसी” जैसे शब्दों का चलन शुरू हुआ। ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ शोषण की परिभाषा को केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रखा गया। “अप्रत्यक्ष” और “संरचनात्मक” शोषण की अवधारणा लाई गई, जिसकी परिधि इतनी फैला दी गई कि किसी की भाषा, परंपरा, जीवनशैली या यहाँ तक कि चुप्पी भी शोषण मानी जा सकती थी।
जब दशकों तक यह बात समाज के मन में बैठा दी गई कि श्वेत वर्ग जन्म से शोषक है, तब सरकारों के लिए नियम बनाना आसान हो गया। सरकारी दफ्तरों, कॉलेजों, नगरपालिकाओं और निजी संस्थानों तक में ऐसे नियम लागू किए गए, जिनमें कहीं भी सीधे यह नहीं लिखा गया कि शोषक कौन है—क्योंकि यह बात पहले ही सामाजिक चेतना में डाल दी गई थी।
इसी प्रक्रिया से “व्हाइट गिल्ट” यानी श्वेत अपराधबोध की मानसिकता पैदा हुई। बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों के कथित अपराधों के लिए स्वयं को दोषी मानने लगे। इतिहास को फिर से लिखा जाने लगा, नायकों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा और पूरी सभ्यता को अपराधी ठहराने का चलन शुरू हुआ।
1990 के दशक में यही विचारधारा “DEI” और फिर “DEIA”—डाइवर्सिटी, इक्विटी, इन्क्लूज़न और एक्सेसिबिलिटी—के नाम से संस्थागत रूप में सामने आई। अमेरिका में यह नस्ल के आधार पर थी, भारत में आते-आते इसे जाति के आधार पर ढाल दिया गया। वहाँ श्वेत-अश्वेत की बाइनरी थी, यहाँ सवर्ण-एससी-एसटी-ओबीसी की बाइनरी बना दी गई। ढाँचा वही रहा—एक जन्मजात दोषी, दूसरा जन्मजात पीड़ित।
इसी संदर्भ में यदि 2023 में जारी एनसीईआरटी का “National Guidelines and Implementation Framework on Equitable and Inclusive Education” और उसके आधार पर 13 जनवरी 2026 के यूजीसी विनियमों को पढ़ा जाए, तो पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। “Equity”, “Inclusion”, “Diversity”, “Dignity” और “Rights” जैसे शब्द केवल शैक्षणिक शब्द नहीं हैं, बल्कि उसी वैचारिक ढाँचे से आए हैं, जो पश्चिम में क्रिटिकल रेस थ्योरी के रूप में विकसित हुआ था।
यही कारण है कि यूजीसी के विनियम अनारक्षित वर्ग को अप्रत्यक्ष रूप से जन्मजात शोषक और आरक्षित वर्गों को स्थायी पीड़ित के रूप में देखने की दिशा में जाते दिखाई देते हैं। यह कोई भारतीय सामाजिक अनुभव से निकली समझ नहीं है, बल्कि बाहर से आयातित एक वैचारिक मॉडल है।
विडंबना यह है कि जिन नीतियों और विचारों का 2014 से पहले भाजपा तीखा विरोध करती थी—जिन्हें वह वामपंथी और समाज-विभाजनकारी कहती थी—आज वही बातें नए नामों और नए दस्तावेज़ों के साथ लागू होती दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस द्वारा जाति-आधारित राजनीति और समाज को बाँटने के प्रयास पहले से चले आ रहे थे, लेकिन अब वही वैचारिक ढाँचा बिना खुले विरोध के आगे बढ़ रहा है।
ऊपर से सामाजिक समरसता और हिंदू एकता की बात की जाती है, लेकिन नीतिगत स्तर पर परिणाम इसके ठीक उलट दिखाई देते हैं—परिवार व्यवस्था कमजोर होती जा रही है और हिंदू समाज को स्थायी जातिगत खाँचों में बाँटने की प्रक्रिया तेज़ हो रही है। आज सवर्णों को अपराधी ठहराने का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, और कल जातिगत जनगणना के आँकड़ों के आधार पर “वेल्थ डिस्ट्रीब्यूशन” के नाम पर संपत्ति पुनर्वितरण की माँग उठे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा।
यही यूजीसी विवाद का असली अर्थ है—और इसी कारण इसे हल्के में लेना आत्मघाती होगा।


क्योंकि जब विचारधारा से अधिक महत्वपूर्ण सत्ता हो जाती है, तब सिद्धांत और नैतिकता अपने-आप पीछे छूटने लगते हैं। लोकतंत्र में यह दृश्य नया नहीं है। यहाँ कई बार सत्य अल्पमत में होता है, जबकि भीड़ वही स्वीकार करती है जो उसे तत्काल अनुकूल लगता है। ऐसी स्थिति में सत्ता बनाए रखने के लिए यदि देश और समाज को भी दाँव पर लगाना पड़े, तो वह भी स्वीकार्य बना लिया जाता है। धीरे-धीरे वे विचार विस्मृत हो जाते हैं, जिनके सहारे राजनीतिक यात्रा आरंभ हुई थी।
यह बात इसलिए अधिक पीड़ादायक है क्योंकि यहाँ भाजपा की चर्चा है। भाजपा केवल सत्ता पाने के लिए खड़ा हुआ दल नहीं था; वह हिंदुत्व, सनातन धर्म के उत्थान, भारत की एकता और हिंदू समाज की स्वाभाविक एकता के विचार लेकर आगे बढ़ी थी। उसी वैचारिक परंपरा से संघ की वह प्रार्थना आती है, जिसे पीढ़ियों से स्वयंसेवक गाते आए हैं—
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥
अर्थ स्पष्ट है—धर्म की रक्षा करते हुए राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाना। यही वह दृष्टि थी, जिसने भाजपा को कांग्रेस की जातिवादी और विभाजनकारी राजनीति से अलग पहचान दी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी स्वयं संघ के अनुशासन से निकले स्वयंसेवक हैं। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि सत्ता को साधन बनाकर समाज को जोड़ा जाएगा, न कि उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाया जाएगा, जिनका विरोध वर्षों तक किया गया। किंतु आज व्यवहार में वही प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं, जो कभी कांग्रेस की पहचान रही हैं।
आज सत्ता साधन नहीं रह गई है, सत्ता ही साध्य बनती जा रही है। जबकि होना यह चाहिए था कि सत्ता का उपयोग अखंड भारत की दिशा में, भारत को वास्तविक अर्थों में विश्व-महाशक्ति बनाने के लिए और हिंदू समाज में समरसता स्थापित करने के लिए किया जाता। परंतु नीतिगत स्तर पर स्थिति उलट दिखाई देती है—परिवार व्यवस्था को कमजोर करने से लेकर हिंदू समाज को जातियों में बाँटने तक, सत्ता एक औज़ार बनती जा रही है।
यूजीसी का वर्तमान विनियम इसी मानसिकता का केवल एक उदाहरण है। भविष्य में जातिगत जनगणना के आँकड़ों के आधार पर और भी ऐसे प्रयोग किए जा सकते हैं। यह प्रक्रिया स्वतः नहीं रुकेगी, क्योंकि जब सत्ता में बने रहना ही अंतिम लक्ष्य बन जाता है, तब यह नहीं देखा जाता कि समाज किस दिशा में जा रहा है।
और जब राजनीतिक नेतृत्व सत्य को स्वीकार करने से इनकार करने लगे, तब संकट केवल राजनीतिक नहीं रह जाता। तब देश, समाज और आने वाली पीढ़ियाँ—सब उसकी कीमत चुकाती हैं। यही कारण है कि आने वाला समय अत्यंत विकट दिखाई देता है।

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