- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
*
डॉ. नितिन सहारिया ,महाकौशल
( इक्कीसवीं सदी एवं भविष्य वक्ताओं के अभिमत )
*युग मनीषी डॉ. प्रणव पंड्या* जी का कथन है कि - " स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जन्म 1836 से 175 वर्ष का युग संधिकाल का समय है, जो सन 2011 में पूर्ण होता है अतः 2011 से भारत का भाग्य सूर्योदय होगा।"
वेदमूर्ति ,युगऋषि, युगश्रष्ठा, युगदृष्टा , अध्यात्म वेत्ता , युगविभूति, अवतारी चेतना *पं श्रीराम शर्मा आचार्य* अपने ग्रंथ- *" इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य, भाग- 1 "* में भारत व विश्व के भविष्य के बारे में लिखते हैं कि -
" विश्व के मूर्धन्य विचारक, मनीषी, ज्योर्तिविद्व एवं अतींद्रिय दृष्टा *अब इस संबंध में एकमत हैं कि युग परिवर्तन का समय आ पहुंचा है।*
ऐसे मनीषियों में जिनकी गणना मूर्धन्यों में की जाती है, वह हैं - फ्रांस के प्रख्यात चिकित्सक नोस्ट्राडेमस और काउंट लुईसन जो कीरो के नाम से विख्यात हैं। सुप्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक शॉपेन हावर, इंग्लैंड की मदर श्रीपटन ,अमेरिका की परा मनोवैज्ञानिक जीन डिक्सन एवं श्री एडगर के .सी. इसराइल के प्रोफेसर हरार आदि की गणना महान दिव्यदर्शियों में होती है। भारत की महान विभूतियां एवं दिव्यदर्शियों में महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद के नाम अग्रणी है। यह सभी नाम उन मनीषियों- विभूतियों के हैं, जिन्होंने अपने दिव्य चक्षु के आधार पर जो देखा और कहा, वह प्राय: यथासमय सत प्रतिशत सच साबित होता चला गया।
*नोस्ट्राड़ेमस* फ्रांस के विख्यात चिकित्सक उनकी 400 भविष्यवाणियों का संकलन ' *सेंचुरी* ' नामक पुस्तक में कई खंडो में प्रकाशित हुआ है। जिसमें 15वीं शताब्दी से लेकर 2037 की अवधि तक की भविष्यवाणियों का संकलन संग्रहित है। वे सभी भविष्यवाणियां समय अनुसार सही उतरी हैं । *नोस्ट्राडेमस* ने अपने भविष्य कथन में लिखा है - " सेंचुरी में उनने हिटलर का हिस्टलर के नाम से सबसे निरंकुश तनाशाह के रूप में उल्लेख किया है। जापान में हुए बम प्रहार और उससे उत्पन्न विभिषिका एवं नरसंहार का वर्णन भी उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर कर दिया था, जिसका साक्षी द्वितीय विश्व युद्ध रहा है। इसके अतिरिक्त उनकी भविष्यवाणियों में 20वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में बुद्धिवाद का चरमोत्कर्ष पर पहुंचना, वैज्ञानिक क्षेत्र में अविष्कार, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने में दैवी प्रकोपों के घाटा- टोपों का गहराना और अंततः *एशिया से मानव जाति के उज्जवल भविष्य के निर्धारण हेतु एक प्रचंड शक्ति का प्रादुर्भाव होना आदि सम्मिलित है।*
*नास्त्रेदमस ने लिखा है* की - " *बुद्धिवाद के पराकाष्ठा पर पहुंचने के बाद भक्तिवाद की, श्रद्धा संवर्धन की एक बड़ी शांति की लहर आएगी और युग परिवर्तन होकर ही रहेगा।"*
*नोस्ट्राड़ेमस* की पुस्तक ' *सेंचुरी* ' का विश्व भर के 50 से अधिक विद्वानों ने गहराई से अध्ययन किया। इनमें से एक ऑक्सफोर्ड की 18 वर्षीय छात्रा ' *एरिका* ' ने उनकी हस्तलिखित पुस्तक को पुस्तकालय से ढूंढ निकाला। जिसके अनुसार *नोस्ट्राड़ेमस ने "सतयुग के आगमन से पूर्व एक तीसरी विध्वंसक महाशक्ति 'एंटीक्राइस्ट' का उल्लेख किया है, जिसे कलयुग की असुरता का चरमोत्कर्ष कहा जा सकता है।" इन दिनों विश्व इसी अवधि से गुजर रहा है।* यह संधिकाल सन 1999 तक चलेगा। *इस अवधि में एक नई आध्यात्मिक चेतना का उदय अनुशासनों, मान्यताओं एवं वैज्ञानिक निर्धारणों को समन्वित कर, संहार की संभावनाओं को निरस्त करेगा और नए युग का श्रीगणेश होगा जिसे उन्होंने 'ऐज आफ ट्रुथ' - 'सतयुग' का नाम दिया है।*
*नोस्ट्राड़ेमस* ने सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न भारतवर्ष के एक महान शक्ति के रूप में उभरने की बात अपनी भविष्यवाणी में लिखी है और कहा है कि- *" तीन ओर से सागर से घिरे,धर्म प्रधान, सबसे पुरातन संस्कृति वाले एक महाद्वीप से वह विचारधारा निस्रत होगी, जो विश्व को विनाश के मार्ग से हटाकर विकास के पथ पर ले जाएगी।*
*सभी मनीषी इन भविष्यवाणियों में भारतवर्ष के एक विश्व नेता के रूप में उभरने की झलक देखते हैं और कहते हैं कि भावी समय की 'विचार क्रांति' ही नवयुग की आधारशिला रखेंगी।*
*महर्षि अरविंद एवं भविष्यवक्ताओ, दिव्य दृष्टि संपन्न मनीषियों का मत है* कि- सन 2000 के आगमन से पूर्व जो प्रलयंकारी हलचलें दिखाई पड़ेगी इससे किसी को निराश नहीं होना चाहिए। *महर्षि अरविंद* का कथन है कि-" *जब भी कभी उछ्न्खलता अपनी सीमा लाँघ जाती है, तो आत्मबल संपन्न व्यक्तियों में सुपरचेतन सत्ता अवतरित होती है। इस सामूहिक चेतना का नाम ही 'अवतार' प्रक्रिया है। अब महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया व्यक्ति के रूप में नहीं विचार शक्ति के रूप में अवतरित होगी एवं इसे ही निष्कलंक प्रज्ञा अवतार कहा जाएगा। व्यक्ति की विचारणा में परिवर्तन के प्रवाह के रूप में यह जन्म ले चुकी है एवं बुद्वावतार के उत्तरार्ध के रूप में विगत शताब्दी से गतिशील है।*
*स्वामी विवेकानंद :* ने सन 1897 में अपने मद्रास प्रवास की अवधि में एक भाषण दिया था जो *'भारत का भविष्य'* *शीर्षक से 'विवेकानंद संचयन'* नामक पुस्तक में प्रकाशित हुआ है। इसमें उन्होंने भविष्यवाणी की थी की- *"जन-जन तक व्यावहारिक अध्यात्म के सूत्रों को पहुंचाने के लिए मंदिरों को जन जागृति केंद्रो के रूप में विकसित होते देखा जा सकेगा। व्यापक स्तर पर संस्कार शिक्षा के केंद्र खुलेंगे। संस्कृति का प्रचार- प्रसार होगा और संस्कृत विश्व भाषा बनेगी। आने वाला युग एकता- समता का होगा। इस 'आध्यात्मिक साम्यवाद' को कार्य रुप मे परिणित करने में अनेक नवयुवकों की महिती भूमिका होगी। वे ही संस्कृति के उद्दारक -रक्षक बनेंगे और नवयुग की कल्पना को साकार रूप में परिणित करके दिखाएंगे।"*
*दिव्य दृष्टा प्रोफेसर हरार* : " मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि- *"भारतवर्ष एक विराट शक्ति के रूप में उभरेगा। वहां एक संस्थान धर्मतंत्र को माध्यम बनाकर 'विचार क्रांति' का विश्व व्यापी वातावरण बनाएगा। सन 2000 तक समस्त छोटी- बड़ी शक्तियां मिलकर एकाकार हो जाएगी। तब न भाषा का बंधन रहेगा और न सांप्रदायिकता एवं क्षेत्रीय विभाजन की संकीर्णता का । सब मिल-जुलकर रहेंगे और मिल बाँटकर खाएंगे।"*
*ध्यान देने की बात यह है कि-*
( यह सारे भविष्यवक्ता- दिव्यदृष्टा ,महापुरुष अखिल विश्व गायत्री परिवार- 'प्रज्ञा अभियान'- 'विचार क्रांति अभियान' की ओर ही संकेत कर रहे हैं। वर्तमान में गायत्री परिवार विश्व के लगभग 180 से अधिक देशों में पहुंच चुका है एवं विश्व के 20 करोड़ से अधिक वैश्विक जन इससे जुड़कर आत्म परिष्कार की साधना- गायत्री उपासना कर रहे हैं व संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति की स्थापना कर रहे हैं , नवयुग के निर्माण में सक्रिय है। यही "संघ शक्ति कलियुगे " जो गीता का वक्य है के रुप में अनुभूति ,अनुभव में दिखाई भी दे रहा है एव्ं संघ शक्ति की प्रतीक लाल मशाल के नीचे विश्व के संगठित नर-नारी का मोनो भी इसी मिशन- संस्था ( शांतिकुंज हरिद्धार) में दिखाई दे रहा है और यही संकेत पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी भी तो कर रहें हैं, की पहचानो। यदी आचार्य जी के व्यक्तित्व व कृतित्व का सूक्ष्म दृष्टि से कोई प्रज्ञावान व्यक्ति आकलन करें तो यह सब स्पष्ट हो जाता है कि वह श्रीराम व श्रीकृष्ण के स्तर की सत्ता हैं । मानाकी अभी सभी को विश्वास नहीं होगा किंतु समय के साथ धीरे-धीरे यह सब स्पष्ट होता चला जाएगा। भगवान श्रीराम व भगवान श्रीकृष्ण भी जब धरती पर आए थे तो सभी लोग उनको नहीं पहचान पाए थे कोई कुछ कहता था, कोई कुछ कहता था ...। इसीलिए तो श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज लिखते हैं कि -
" सोई जानई जेही देई जनाई " )
क्रमशः ......
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें