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1000 वर्ष का सतयुग आ रहा है, सावधान युग बदल रहा है... भाग -६



।। ॐ ।।

 
 भाग -६

 डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल

         *व्यापक परिवर्तनों से भरा संधिकाल*

युगऋषि ,युगदृष्टा ,युगश्रष्टा , वेदमूर्ति, अवतारीसत्ता पं.श्रीराम शर्मा आचार्य अपने ग्रंथ - "इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य" में युग परिवर्तन के विषय में लिखते हैं कि - 
                 " सृष्टि के आदिकाल से अब तक कई ऐसे अवसर उपस्थित हुए हैं, जिनमें *विनाश की विभिषिकाओं को देखते हुए ऐसा लगता था, जैसे महाविनाश होकर रहेगा, किंतु इससे पूर्व ही ऐसी व्यवस्था बनी, ऐसे साधन उभरे, जिसने गहराते घटाटोप का अंत कर दिया। वृत्रासुर ,रावण, कंस ,दुर्योधन आदि असुरों का आतंक अपने समय में चर्मावस्था तक पहुंचा, किंतु क्रमशः ऐसा कुछ होता चला गया कि जो प्रलंयकारी विनाशकारी दीखता था ,वही आतंक अपनी मौत मर गया।* देवासुर संग्राम के विभिन्न कथानक भी इसी श्रृंखला में आते हैं।
               इतिहास पर हम दृष्टि डालें, तो *हर युग में, हर काल में यह परिवर्तन प्रक्रिया गतिशील रही है।* कितनी ही कुप्रथाएं पिछली एक दो शताब्दियों में प्रचलन में थी, पर समय के प्रवाह ने उन सबको उलटकर सीधा कर दिया। *अगले दिनों यह गतिचक्र और भी तेज होने जा रहा है, ऐसी आशा बिना किसी दुविधा के की जा सकती है।* 
         *इस महान परिवर्तन का आधार इन्हीं दिनों खड़ा हो रहा है। इसे परोक्ष दृष्टि से मनीषिगण देख भी रहे हैं* व पूर्वानुमान के आधार पर उस संभावना की अभिव्यक्ति भी कर रहे हैं।
             पिछले दिनों कितने ही भविष्यवक्ताओं,दिव्यदर्शियों धर्म- ग्रंथो की भविष्यवाणियां- चेतावनियां सामने आती रही हैं। इन सब में *आने वाले समय को संकटों व नवयुग की संभावनाओं से परिपूर्ण बताया है। वर्तमान में प्रकृति प्रकोपों के रूप में घटित होने वाली विभीषिकाओं की संगति भी ईश्वरीय दंड प्रक्रिया के साथ कुछ सीमा तक बैठ जाती है । अस्तु बीसबी और इक्कीसवीं सदी के संधिकाल में विपत्ति भरा वातावरण दीख पड़े तो इसे अप्रत्याशित नहीं समझना चाहिए।* ऐसे में सृजन संभावनाएं भी साथ-साथ गतिशील होती दिखें, तो उन्हें भी छलावा न मानकर यह समझना चाहिए कि ध्वंस व सृजन, संधि बेला की दो अनिवार्य प्रक्रियाएं हैं, जो साथ-साथ चलती हैं।
(*युग परिवर्तन का यही समय क्यों?*)
           'युग' का तात्पर्य विशिष्टता युक्त समय से माना गया है। *"युग निर्माण योजना" आंदोलन अपने अंदर यही भाव छुपाए हुए हैं। समय बदलने जा रहा है ,इसमें इसकी स्पष्ट झांकी है।* कलयुग की समाप्ति और सतयुग की शुरुआत के संबंध में अवधारणा है कि सन 1989 से 2000 तक के 12 वर्ष संधिकाल के रूप में होना चाहिए। 12 वर्ष का समय व्यावहारिक युग भी कहलाता है। युग संधिकाल को यदि इतना मान कर चला जाए तो इसमें कोई अत्युक्ति जैसी बात नहीं होगी। काल गणना में 12 के अंक का विशेष महत्व है। समस्त आकाश सहित सौरमंडल को 12 राशियों - बारह खंडो में विभक्त किया गया है। इस आधार पर यदि वर्तमान 12 वर्षों को उथल-पुथल भरा संधिकाल माना गया है ,तो इसमें विसंगति जैसी कोई बात नहीं है।
     *अंतःस्फुर्णा बनाम भविष्य बोध* 
                        भविष्य कथन का आधार चाहे जिस भी विधा पर अवलंबित हो, उसे आश्चर्यजनक ,अद्भुत या दैवी ही समझा जाता रहा है। पर अब वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकारने लगे हैं कि वर्तमान के अध्ययन द्वारा भविष्य के बारे में बहुत कुछ बताया जा सकता है। इस संबंध में भविष्य विज्ञान (फयूरियोलॉजी) की एक पृथक शाखा का विकास भी हो चुका है। इसे भविष्यवाणी तंत्र का एक अंग माना जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी।
       फ्यूरोलॉजी या भविष्य विज्ञान अब एक पूर्णतया विज्ञान सम्मत विद्या मानी जाने लगी है। काल के प्रवाह में समय-समय पर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इन्हीं संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए *लेखकगण गुंथर स्टेंट, फ्रिटजौफ, काप्रा, एल्विन टॉफ्लर ने अपनी कृतियों कमश: "कमिंग ऑफ द गोल्डन एज " "दि टर्निंग प्वाइंट", एंड "फ्यूचर शॉक" में 21वीं सदी के आरंभ को व्यापक परिवर्तनों का काल और आने वाले समय में सुख -समृद्धि होने की संभावना प्रकट की है।* 
            इन सब संदर्भों ,कथनों, तथ्यों का उद्देश्य मात्र इतना है कि लोगों में यह विश्वास पैदा किया जा सके कि आगे आने वाला समय भयावह- त्रासदी भरा नहीं है, सुखद है । *21वीं सदी वैसी नहीं होगी, जैसी वर्तमान संकट भरी परिस्थितियों को देखकर अंदाजा लगाया जाता है। इस आशावाद का मूल आधार है, मानवीय विभूति अंत:स्फुर्णा, पूर्वानुमान लगा पाने की दिव्य सामर्थ्य,* जिसे कोई भी मनुष्य अपने अंदर जगा सकता है। आज जो भी कुछ भविष्य के संबंध में उज्जवल संभावनाएं व्यक्त करते हुए कहा जा रहा है, उसकी जड़े भी वहीं विद्यमान है। *परोक्ष जगत में चल रही हलचलें व व्यापक स्तर पर किए जा रहे प्रयास- पुरुषार्थ जो प्रत्यक्ष भले ही दृष्टिगोचर न हो,उनकी परिणति निश्चित ही सुखद होगी।* 
          इतिहास बताता है कि हर कल्पना, हर अप्रत्याशित घटनाक्रम को मूर्त रूप देने का कार्य दैवी चेतना ने मानवी प्रज्ञा के माध्यम से ही किया है। राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक, चिंतक प्रकृति के रहस्यों की खोज करने वाले तथ्यांवेषी , लेखक, कवि, संगीतकारों को भी भावी कार्यों संबंधी प्रेरणा इसी आधार पर मिलती रही है। उन्हें भी अन्तर्पृज्ञा ने बोध कराया, परब्रह्म की प्रेरणा उन्हें मिली होगी । *देवदूतों की बात करते हैं तो आशय ऐसी ही विभूतियों से होता है, जिन्हें अन्तर्ज्ञान होता रहा है ,जिनकी विकसित चेतना भविष्य को पढ़ पाने में समर्थ रही है।* 
             वही अंत: प्रेरणा, विकसित चेतना आज भविष्य पर दृष्टि डाले कुछ कहने पर उतारू है। आज संकटो से भरी बेला में दोनों ही प्रकार की भविष्य कथन हमारे सामने हैं। एक वे जिनमें आगामी वर्ष 21वीं सदी के पूर्वार्ध को खतरों-संकटो से घिरा बताया गया है,दूसरी वे जिनमे भविष्य के संबंध में उज्जवल संभावनाएं प्रकट की गई हैं। इन्हीं का कहना है कि *यदि मानवी प्रयास क्रम उलट दिए जाएं, दिशा बदल दी जाए, गलती सुधार ली जाए, तो संभावित विपत्तियों के घटाटोप छठ सकते हैं।* यही बात मानवी पुरुषार्थ के बारे में भी लागू होती है। वह चाहे तो हर भवितव्य्ता को बदल सकता है।
      *प्रस्तुत बेला जिससे विश्व मानवता गुजर रही है, परिवर्तन की है। युग परिवर्तन पूर्व में भी होता रहा है, जिसे सामूहिक विकसित चेतना नाम दिया जा सकता है। यही बिगड़ी स्थिति को देखते हुए सुनियोजित विधि व्यवस्था बनाने, प्राणवान प्रतिभाओं को इकट्ठा कर युग धर्म को निवाहने का सरंजाम पूरा करती है। 'अवतार' इसी प्रवाह का नाम है। इन दिनों उसी महाकाल की प्रबल प्रेरणाएं परिवर्तन के निमित्त नई परिस्थितियां विनिर्मित करती देखी जा सकती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि समय को पहचानकर, अपने प्रयास भी इसी निमित्त झोंक दिए जाएं। श्रेय को पाने व अवतार प्रक्रिया का सहयोगी बनने का ठीक यही समय है।"* 

        *अखिल विश्व गायत्री परिवार के एक गीत की पंक्तियां* इसी सत्य को उजागर करती हुई कहती हैं .....

वानर रीछ गिलहरी बनकर, जो भी कदम बढ़ाएगा।
 सेतु राम बांधेंगे किंतु, पुण्य वही पा जाएगा।
 उठवाना है गोवर्धन तो, लाठी जरा लगाओ तुम।
 प्रभु के सहयोगी बनने का, श्रेय सहज ही पाओ तुम।
 उठो तुम्हारे इम्तहान की, आज घड़ी फिर आई है।।
देव शक्तियों ने मिलजुल कर, दुर्गा शक्ति जागीई है।।...
 नवयुग का मत्स्यावतार ,यह पल-पल बढ़ता जाता है।
 सत सहस्त्र से कोटि-कोटि बढ़, अपना ओज दिखाता है ।
विश्व रुप यह होगा कलको, ऋषि ने हमें बताया है।
 इसीलिए यह महायज्ञ का, अनुष्ठान करबाया है ।
इस युग में भी प्रज्ञावतार बन, ईश चेतना आई है।।....

( पहचान सको तो पहचानो 'कल्कि अवतार' को.... Comming of the golden age. )
क्रमशः....

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